सूरह शुअरा के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 227 आयतें है
- इस में मक्का के मुर्ति पूजकों के आरोप का खण्डन किया गया है जो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को शायर (कवि) कहते थे। और कवि और नबी के बीच अन्तर बताया गया है।
- इस में धर्म प्रचार के लिये नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की चिन्ता और विरोधियों के आप के साथ उपहास की चर्चा है।
- इस में मूसा अलैहिस्सलाम तथा इब्राहीम अलैहिस्सलाम के एकेश्वरवाद के उपदेश को प्रस्तुत किया गया है जो उन्होंने अपनी जाति को दिया था।
- इस में कई नबियों के धर्म प्रचार और उन के विरोधियों के दुष्परिणाम को बताया गया है।
- अनेक युग में नबियों के आने और उन के उपदेश में समानता का भी वर्णन है।
- कुन तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से संबंधित संदेहों का निवारण किया गया है।
सूरह अस-शुआरा | Surah Shuara in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ الْمُبِينِ ﴾ 2 ﴿
तिल् क आयातुल् किताबिल्-मुबीन
ये प्रकाशमय पुस्तक की आयतें हैं।
لَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَّفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا مُؤْمِنِينَ ﴾ 3 ﴿
लअ़ल्ल-क बाखिअुन्-नफ़्स क अल् ला यकूनू मुअ्मिनीन
संभवतः, आप अपना प्राण[1] खो देने वाले हैं कि वे ईमान लाने वाले नहीं हैं? 1. अर्थात उन के ईमान न लाने के शोक में।
إِن نَّشَأْ نُنَزِّلْ عَلَيْهِم مِّنَ السَّمَاءِ آيَةً فَظَلَّتْ أَعْنَاقُهُمْ لَهَا خَاضِعِينَ ﴾ 4 ﴿
इन् न-शअ् नुनज़्ज़िल् अ़लैहिम् मिनस्समा-इ आ-यतन् फ़-ज़ल्लत अअ्नाकुहुम् लहा ख़ाज़िईन
यदि हम चाहें, तो उतार दें उनपर आकाश से ऐसी निशानी कि उनकी गर्दनें उसके आगे झुकी की झुकी रह जायें[1]। 1. परन्तु ऐसा नहीं किया, क्यों कि दबाव का ईमान स्वीकार्य तथा मान्य नहीं होता।
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّنَ الرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا عَنْهُ مُعْرِضِينَ ﴾ 5 ﴿
वमा यअतीहिम मिन ज़िकरिम मिनर-रह्मानि मुहदसिन इल्ला कानू अन्हु मुअरिदीन।
और नहीं आती है उनके पालनहार, अति दयावान् की ओर से कोई नई शिक्षा, परन्तु वे उससे मुख फेरने वाले बन जाते हैं।
فَقَدْ كَذَّبُوا فَسَيَأْتِيهِمْ أَنبَاءُ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ ﴾ 6 ﴿
फ़-क़द् कज़्ज़बू फ़-सयअ्तीहिम् अम्बा-उ मा कानू बिही यस्तह्ज़िऊन
तो उन्होंने झुठला दिया! अब उनके पास शीघ्र ही उसकी सूचनाएँ आ जायेंगी, जिसका उपहास वे कर रहे थे।
أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَى الْأَرْضِ كَمْ أَنبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍ كَرِيمٍ ﴾ 7 ﴿
अ – व लम् यरौ इलल् – अर्ज़ि कम् अम्बतना फ़ीहा मिन् कुल्लि ज़ौजिन् करीम
और क्या उन्होंने धरती की ओर नहीं देखा कि हमने उसमें उगाई हैं, बहुत-सी प्रत्येक प्रकार की अच्छी वनस्पतियाँ?
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 8 ﴿
इन् – न फ़ी ज़ालि- क लआ यतन्, व मा का-न अक्सरुहुम् मुअ्मिनीन
निश्चय ही, इसमें बड़ी निशानी (लक्षण[1] है। फिर उनमें अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं हैं। 1. अर्थात अल्लाह के सामर्थ्य की।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 9 ﴿
व इन् – न रब्ब-क लहुवल अज़ीजुर्रहीम *
तथा वास्तव में, आपका पालनहार ही प्रभुत्वशाली, अति दयावान् है।
وَإِذْ نَادَىٰ رَبُّكَ مُوسَىٰ أَنِ ائْتِ الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ﴾ 10 ﴿
व इज् नादा रब्बु-क मूसा अनिअ्तिल् क़ौमज़्ज़ालिमीन
(उन्हें उस समय की कथा सुनाओ) जब पुकारा आपके पालनहार ने मूसा को कि जाओ अत्याचारी जाति[1] के पास! 1. यह उस समय की बात है जब मूसा (अलैहिस्सलाम) दस वर्ष मद्यन में रह कर मिस्र वापिस आ रहे थे।
قَوْمَ فِرْعَوْنَ ۚ أَلَا يَتَّقُونَ ﴾ 11 ﴿
क़ौ-म फिरऔन-न, अला यत्तकून
फ़िरऔन की जाति के पास, क्या वे डरते नहीं?
قَالَ رَبِّ إِنِّي أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ ﴾ 12 ﴿
का – ल रब्बि इन्नी अख़ाफु अंय्यु कज़्ज़िबून
उसने कहाः मेरे पालनहार! वास्तव में, मुझे भय है कि वे मुझे झुठला देंगे।
وَيَضِيقُ صَدْرِي وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِي فَأَرْسِلْ إِلَىٰ هَارُونَ ﴾ 13 ﴿
व यज़ीकु सद्री व ला यन्तलिकु लिसानी फ़ – अर्सिल् इला हारून
और संकुचित हो रहा है मेरा सीना और नहीं चल रही है मेरी ज़ुबान, अतः वह़्यी भेज दे हारून की ओर (भी)।
وَلَهُمْ عَلَيَّ ذَنبٌ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ ﴾ 14 ﴿
व लहुम् अ़लय्-य ज़म्बुन् फ़ अख़ाफु अंय्यक्तुलून
और उनका मुझपर एक अपराध भी है। अतः, मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे।
قَالَ كَلَّا ۖ فَاذْهَبَا بِآيَاتِنَا ۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسْتَمِعُونَ ﴾ 15 ﴿
का – ल कल्ला फ़ज़्हबा बिआयातिना इन्ना म-अ़कुम् मुस्तमिअन
अल्लाह ने कहाः कदापि ऐसा नहीं होगा। तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ, हम तुम्हारे साथ सुनने[1] वाले हैं। 1. अर्थात तुम दोनों की सहायता करते रहेंगे।
فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَا إِنَّا رَسُولُ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 16 ﴿
फ़अ्तिया फिरऔन न फ़कूला इन्ना रसूलु रब्बिल्-आ़लमीन
तो तुम दोनों जाओ और कहो कि हम विश्व के पालनहार के भेजे हुए (रसूल) हैं।
أَنْ أَرْسِلْ مَعَنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ ﴾ 17 ﴿
अन् अर्सिल् म अ़ना बनी इस्राईल
कि तू हमारे साथ बनी इस्राईल को जाने दे।
قَالَ أَلَمْ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدًا وَلَبِثْتَ فِينَا مِنْ عُمُرِكَ سِنِينَ ﴾ 18 ﴿
का-ल अलम् नुरब्बि – क फ़ीना वलीदंव् – व लबिस् त फ़ीना मिन् अमुरि क सिनीन
(फ़िरऔन ने) कहाः क्या हमने तेरा पालन नहीं किया है, अपने यहाँ बाल्यवस्था में और तू (नहीं) रहा है, हममें अपनी आयु के कई वर्ष?
وَفَعَلْتَ فَعْلَتَكَ الَّتِي فَعَلْتَ وَأَنتَ مِنَ الْكَافِرِينَ ﴾ 19 ﴿
व फ़अ़ल्-त फ़अ्-ल-तकल्लती फ़अ़ल्-त व अन्-त मिनल्-काफ़िरीन
और तू कर गया वह कार्य,[1] जो किया और तू कृतघनों में से है! 1. यह उस हत्या काण्ड की ओर संकेत है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) से नबी होने से पहले हो गया था। (देखियेः सूरह क़स़स़)
قَالَ فَعَلْتُهَا إِذًا وَأَنَا مِنَ الضَّالِّينَ ﴾ 20 ﴿
का-ल फ़अ़ल्तुहा इजंव्-व अ-न मिनज़्ज़ाल्लीन
(मूसा ने) कहाः मैंने ऐसा उस समय कर दिया, जबकि मैं अनजान था।
فَفَرَرْتُ مِنكُمْ لَمَّا خِفْتُكُمْ فَوَهَبَ لِي رَبِّي حُكْمًا وَجَعَلَنِي مِنَ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 21 ﴿
फ़-फ़र्रतु मिन्कुम् लम्मा ख़िफ़्तुकुम् फ़-व-ह ब ली रब्बी हुक्मंव् -व-ज-अ़-लनी मिनल्-मुर्सलीन
फिर मैं तुमसे भाग गया, जब तुमसे भय हुआ। फिर प्रदान कर दिया मुझे, मेरे पालनहार ने तत्वदर्शिता और मुझे बना दिया रसूलों में से।
وَتِلْكَ نِعْمَةٌ تَمُنُّهَا عَلَيَّ أَنْ عَبَّدتَّ بَنِي إِسْرَائِيلَ ﴾ 22 ﴿
व तिल्-क निअ्-मतुन् तमुन्नुहा अ़लय् य अन् अ़ब्बत्-त बनी इस्राईल
और ये कोई उपकार है, जो तू मुझे जता रहा है कि तूने दास बना लिया है, इस्राईल के पुत्रों को।
قَالَ فِرْعَوْنُ وَمَا رَبُّ الْعَالَمِينَ ﴾ 23 ﴿
का-ल फ़िरऔनु व मा रब्बुल आलमीन
फ़िरऔन ने कहाः विश्व का पालनहार क्या है?
قَالَ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ ﴾ 24 ﴿
का-ल रब्बुस्समावाति वल्अर्ज़ि व मा बैनहुमा, इन् कुन्तुम् मूकिनीन
(मूसा ने) कहाः आकाशों तथा धरती और उसका पालनहार, जो कुछ दोनों के बीच है, यदि तुम विश्वास रखने वाले हो।
قَالَ لِمَنْ حَوْلَهُ أَلَا تَسْتَمِعُونَ ﴾ 25 ﴿
का-ल लिमन् हौलहू अला तस्तमिअून
उसने उनसे कहा, जो उसके आस-पास थेः क्या तुम सुन नहीं रहे हो?
قَالَ رَبُّكُمْ وَرَبُّ آبَائِكُمُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 26 ﴿
का-ल रब्बुकुम् व रब्बु आबाइकुमुल्-अव्वलीन
(मुसा ने) कहाः तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे पूर्वोजों का पालनहार है।
قَالَ إِنَّ رَسُولَكُمُ الَّذِي أُرْسِلَ إِلَيْكُمْ لَمَجْنُونٌ ﴾ 27 ﴿
का-ल इन्-न रसूलकुमुल्लज़ी उर्सि-ल इलैकुम् ल – मज्नून
(फ़िरऔन ने) कहाः वास्तव में, तुम्हारा रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, पागल है।
قَالَ رَبُّ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ إِن كُنتُمْ تَعْقِلُونَ ﴾ 28 ﴿
का-ल रब्बुल म श्रिकि वल्-मग्रिबि व मा बैनहुमा, इन् कुन्तुम् तअ्किलून
(मूसा ने) कहाः वह, पूर्व तथा पश्चिम तथा दोनों के मध्य जो कुछ है, सबका पालनहार है।
قَالَ لَئِنِ اتَّخَذْتَ إِلَٰهًا غَيْرِي لَأَجْعَلَنَّكَ مِنَ الْمَسْجُونِينَ ﴾ 29 ﴿
का-ल ल-इनित्त ख़ज् त इलाहन् ग़ैरि ल-अज्अ़ लन्न क मिनल्-मस्जूनीन
(फ़िरऔन ने) कहाः यदि तूने कोई पूज्य बना लिया मेरे अतिरिक्त, तो तुझे बंदियों में कर दूँगा।
قَالَ أَوَلَوْ جِئْتُكَ بِشَيْءٍ مُّبِينٍ ﴾ 30 ﴿
का-ल अ-व लौ जिअ्तु-क बिशैइम्-मुबीन
(मूसा ने) कहाः क्या यद्यपि मैं ले आऊँ तेरे पास एक खुली चीज़?
قَالَ فَأْتِ بِهِ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ﴾ 31 ﴿
का-ल फ़अ्ति बिही इन् कुन्-त मिनस्सादिक़ीन
उसने कहाः तू उसे ले आ, यदि सच्चा है।
فَأَلْقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ ثُعْبَانٌ مُّبِينٌ ﴾ 32 ﴿
फ़-अल्का अ़साहु फ़-इज़ा हि-य सुअ्बानुम्-मुबीन
फिर उसने अपनी लाठी फेंक दी, तो अकस्मात वह एक प्रत्यक्ष अजगर बन गयी।
وَنَزَعَ يَدَهُ فَإِذَا هِيَ بَيْضَاءُ لِلنَّاظِرِينَ ﴾ 33 ﴿
वन-ज़-अ़ य-दहू फ़-इज़ा हि-य बैज़ा-उ लिन्नाज़िरीन *
तथा अपना हाथ निकाला, तो अकस्मात वह उज्ज्वल था, देखने वालों के लिए।
قَالَ لِلْمَلَإِ حَوْلَهُ إِنَّ هَٰذَا لَسَاحِرٌ عَلِيمٌ ﴾ 34 ﴿
का-ल लिल्म-लइ हौलहू इन्-न हाज़ा लसाहिरून् अलीम
उसने अपने प्रमुखों से कहा, जो उसके पास थेः वास्तव में, ये तो बड़ा दक्ष जादूगर है।
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ ﴾ 35 ﴿
युरीदु अंय्युख़ि-जकुम् मिन् अरजिकुम् बिसिहरिही फ़ – माज़ा तअ्मुरून
ये चाहता है कि तुम्हें, तुम्हारी धरती से निकाल[1] दे, अपने जादू के बल से, तो अब तुम क्या आदेश देते हो? 1. अर्थात यह उग्रवाद कर के हमारे देश पर अधिकार कर ले।
قَالُوا أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَابْعَثْ فِي الْمَدَائِنِ حَاشِرِينَ ﴾ 36 ﴿
कालू अर्जिह् व अख़ाहु वब्अ़स् फ़िल्मदाइनि हाशिरीन
सबने कहाः अवसर (समय) दो मूसा और उसके भाई (के विषय) को और भेज दो नगरों में एकत्र करने वालों को।
يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَحَّارٍ عَلِيمٍ ﴾ 37 ﴿
यअतू-क बिकुल्लि सह्हारिन् अ़लीम
वे तुम्हारे पास प्रत्येक बड़े दक्ष जादूगर को लायें।
فَجُمِعَ السَّحَرَةُ لِمِيقَاتِ يَوْمٍ مَّعْلُومٍ ﴾ 38 ﴿
फ़जुमिअ़स्स ह-रतु लिमीक़ाति यौमिम्-मअ्लूम
तो एकत्र कर लिए गये जादूगर एक निश्चित दिन के समय के लिए।
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلْ أَنتُم مُّجْتَمِعُونَ ﴾ 39 ﴿
व की-ल लिन्नासि हल् अन्तुम् मुज्तमिअून
तथा लोगों से कहा गया कि क्या तुम एकत्र होने वाले[1] हो? 1. अर्थात लोगों को प्रेरणा दी जा रही है कि इस प्रतियोगिता में अवश्य उपस्थित हों।
لَعَلَّنَا نَتَّبِعُ السَّحَرَةَ إِن كَانُوا هُمُ الْغَالِبِينَ ﴾ 40 ﴿
लअ़ल्लना नत्तबिअुस्स-ह-र-त इन् कानू हुमुल् – ग़ालिबीन
ताकि हम पीछे चलें जादूगरों के यदि वही प्रभुत्वशाली (विजयी) हो जायें।
فَلَمَّا جَاءَ السَّحَرَةُ قَالُوا لِفِرْعَوْنَ أَئِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ الْغَالِبِينَ ﴾ 41 ﴿
फ-लम्मा जाअस्स ह-रतु कालू लिफिरऔ-न अ-इन्- न लना ल-अज्रन् इन् कुन्ना नह्नुल – ग़ालिबीन
और जब जादूगर आये, तो फ़िरऔन से कहाः क्या हमें कुछ पुरस्कार मिलेगा, यदि हम ही प्रभुत्वशाली होंगे?
قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ إِذًا لَّمِنَ الْمُقَرَّبِينَ ﴾ 42 ﴿
का-ल न-अ़म् व इन्नकुम् इज़ल् लमिनल्-मुक़र्रबीन
उसने कहाः हाँ! और तुम उस समय (मेरे) समीपवर्तियों में हो जाओगे।
قَالَ لَهُم مُّوسَىٰ أَلْقُوا مَا أَنتُم مُّلْقُونَ ﴾ 43 ﴿
का-ल लहुम् मूसा अल्कू मा अन्तुम् मुल्कून
मूसा ने उनसे कहाः फेंको, जो कुछ तुम फेंकने वाले हो।
فَأَلْقَوْا حِبَالَهُمْ وَعِصِيَّهُمْ وَقَالُوا بِعِزَّةِ فِرْعَوْنَ إِنَّا لَنَحْنُ الْغَالِبُونَ ﴾ 44 ﴿
फ़-अल्क़ौ हिबा-लहुम् व अिसिय्यहुम् व क़ालू बिअिज्जति फ़िरऔं-न इन्ना ल-नह्नुल-ग़ालिबून
तो उन्होंने फेंक दी उपनी रस्सियाँ तथा अपनी लाठियाँ तथा कहाः फ़िरऔन के प्रभुत्व की शपथ! हम ही अवश्य प्रभुत्वशाली (विजयी) होंगे।
فَأَلْقَىٰ مُوسَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ ﴾ 45 ﴿
फ़-अल्का मूसा अ़साहु फ़-इज़ा हि-य तल्क़फु मा यअ्फिकून
अब मूसा ने फेंक दी अपनी लाठी, तो तत्क्षण वह निगलने लगी (उसे), जो झूठ वे बना रहे थे।
فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سَاجِدِينَ ﴾ 46 ﴿
फ़ उल्कियस्स ह-रतु साजिदीन
तो गिर गये सभी जादूगर[1] सज्दा करते हुए। 1. क्यों कि उन्हें विश्वास हो गया कि मूसा (अलैहिस्सलाम) जादूगर नहीं, बल्कि वह सत्य के उपदेशक हैं।
قَالُوا آمَنَّا بِرَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 47 ﴿
कालू आमन्ना बिरब्बिल् आलमीन
और सबने कह दियाः हम विश्व के पालनहार पर ईमान लाये।
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَارُونَ ﴾ 48 ﴿
रब्बि मूसा व हारून
मूसा तथा हारून के पालनहार पर।
قَالَ آمَنتُمْ لَهُ قَبْلَ أَنْ آذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُ لَكَبِيرُكُمُ الَّذِي عَلَّمَكُمُ السِّحْرَ فَلَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَافٍ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ ﴾ 49 ﴿
काल आमन्तुम् लहू कब्-ल अन् आज़ न लकुम् इन्नहू लकबीरु कुमुल्लज़ी अ़ल्ल-मकुमुस्- सिह्-र फ़-लसौ फ़ तअ्लमू-न, ल उक़त्ति अ़न् न ऐदि-यकुम् व अर्जु-लकुम् मिन् खिलाफिंव्-व ल-उसल्लिबन्नकुम् अज्मईन
(फ़िरऔन ने) कहाः तुम उसका विश्वास कर बैठे, इससे पहले कि मैं तुम्हें आज्ञा दूँ? वास्तव में, वह तुम्हारा बड़ा (गुरू) है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है, तो तुम्हें शीघ्र ज्ञान हो जायेगा, मैं अवश्य तुम्हारे हाथों तथा पैरों को विपरीत दिशा[1] से काट दूँगा तथा तुम सभी को फाँसी दे दूँगा! 1. अर्थात दाँया हाथ और बायाँ पैर या बायाँ हाथ और दायाँ पैर।
قَالُوا لَا ضَيْرَ ۖ إِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ ﴾ 50 ﴿
क़ालू ला ज़ै-र इन्ना इला रब्बिना मुन्क़लिबून
सबने कहाः कोई चिन्ता नहीं, हमतो अपने पालनहार हीकी ओर फिरकर जाने वाले हैं।
إِنَّا نَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَايَانَا أَن كُنَّا أَوَّلَ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 51 ﴿
इन्ना नत्मअु अंय्यग्फ़ि-र लना रब्बुना ख़तायाना अन् कुन्ना अव्वलल्-मुअ्मिनीन *
हम आशा रखते हैं कि क्षमा कर देगा, हमारे लिए, हमारा पालनहार, हमारे पापों को, क्योंकि हम सबसे पहले ईमान लाने वाले हैं।
وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِي إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ ﴾ 52 ﴿
व औहैना इला मूसा अन् असि बिअिबादी इन्नकुम मुत्त बअून
और हमने मूसा की ओर वह़्यी की कि रातों-रात निकल जा मेरे भक्तों को लेकर, तुम सबका पीछा किया जायेगा।
فَأَرْسَلَ فِرْعَوْنُ فِي الْمَدَائِنِ حَاشِرِينَ ﴾ 53 ﴿
फ़- अर्स ल फ़िरऔनु फ़िल्मदाइनि हाशिरीन
तो फ़िरऔन ने भेज दिया नगरों में (सेना) एकत्र करने[1] वालों को। 1. जब मूसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के आदेशानुसार अपने साथियों को ले कर निकल गये तो फ़िरऔन ने उन का पीछा करने के लिये नगरों में हरकारे भेजे।
إِنَّ هَٰؤُلَاءِ لَشِرْذِمَةٌ قَلِيلُونَ ﴾ 54 ﴿
इन् – न हाउला – इ लशिरज़ि – मतुन् क़लीलून
कि वे बहुत थोड़े लोग हैं।
وَإِنَّهُمْ لَنَا لَغَائِظُونَ ﴾ 55 ﴿
व इन्नहुम् लना लग़ाइजून
और (इसपर भी) वे हमें अति क्रोधित कर रहे हैं।
وَإِنَّا لَجَمِيعٌ حَاذِرُونَ ﴾ 56 ﴿
व इन्ना ल- जमीअुन् हाज़िरून
और वास्तव में, हम एक गिरोह हैं सावधान रहने वाले।
فَأَخْرَجْنَاهُم مِّن جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ ﴾ 57 ﴿
फ़- अख़्रज्नाहुम् मिन् जन्नातिंव व अुयून
अन्ततः, हमने निकाल दिया उन्हें, बागों तथा स्रोतों से।
وَكُنُوزٍ وَمَقَامٍ كَرِيمٍ ﴾ 58 ﴿
व कुनूजिंव – व मक़ामिन् करीम
तथा कोषों और उत्तम निवास स्थानों से।
كَذَٰلِكَ وَأَوْرَثْنَاهَا بَنِي إِسْرَائِيلَ ﴾ 59 ﴿
कज़ालि-क, व औरस्नाहा बनी इस्राईल
इसी प्रकार हुआ और हमने उनका उत्तराधिकारी बना दिया, इस्राईल की संतान को।
فَأَتْبَعُوهُم مُّشْرِقِينَ ﴾ 60 ﴿
फ़-अत्ब अू हुम् मुश्रिकीन
तो उन्होंने उनका पीछा किया, प्रातः होते ही।
فَلَمَّا تَرَاءَى الْجَمْعَانِ قَالَ أَصْحَابُ مُوسَىٰ إِنَّا لَمُدْرَكُونَ ﴾ 61 ﴿
फ़-लम्मा तरा-अल्-जम्आनि का ल अस्हाबु मूसा इन्ना लमुद्-रकून्
और जब दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे को देख लिया, तो मूसा के साथियों ने कहाः हमतो निश्चय ही पकड़ लिए[1] गये। 1. क्यों कि अब सामने सागर और पीछे फ़िरऔन की सेना थी।
قَالَ كَلَّا ۖ إِنَّ مَعِيَ رَبِّي سَيَهْدِينِ ﴾ 62 ﴿
का-ल कल्ला इन्-न मअि-य रब्बी स-यह्दीन
(मूसा ने) कहाः कदापि नहीं, निश्चय मेरे साथ मेरा पालनहार है।
فَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ أَنِ اضْرِب بِّعَصَاكَ الْبَحْرَ ۖ فَانفَلَقَ فَكَانَ كُلُّ فِرْقٍ كَالطَّوْدِ الْعَظِيمِ ﴾ 63 ﴿
फ़-औहैना इला मूसा अनिज्रिब बिअसाकल्-बह्-र, फ़न्फ़-ल-क फका-न कुल्लु फिरकिन् कत्तौदिल् – अ़ज़ीम
तो हमने मूसा को वह़्यी की कि मार अपनी लाठी से सागर को, अकस्मात् सागर फट गया तथा प्रत्येक भाग, भारी पर्वत के समान[1] हो गया। 1. अर्थात बीच से मार्ग बन गया और दोनों ओर पानी पर्वत के समान खड़ा हो गया।
وَأَزْلَفْنَا ثَمَّ الْآخَرِينَ ﴾ 64 ﴿
वअज़लफ़ना सम्मल अख़रीन
तथा हमने समीप कर दिया उसी स्थान के, दूसरे गिरोह को।
وَأَنجَيْنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُ أَجْمَعِينَ ﴾ 65 ﴿
व अन्जैना मूसा व मम्-म-अ़हू अज्मईन
और मुक्ति प्रदान कर दी मूसा और उसके सब साथियों को।
ثُمَّ أَغْرَقْنَا الْآخَرِينَ ﴾ 66 ﴿
सुम् – म अग्ररक़्नल् – आ-ख़रीन
फिर हमने डुबो दिया दूसरों को।
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 67 ﴿
इन् – न फ़ी ज़ालि-क लआ यतन्, व मा का- न अक्सरुहुम् मुअ्मिनीन
वास्तव में, इसमें बड़ी शिक्षा है और उनमें से अधिक्तर लोग ईमान वाले नहीं थे।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 68 ﴿
व इन-न रब्ब – क लहुवल अज़ीजुर्रहीम *
तथा वास्तव में, आपका पालनहार निश्चय अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَاهِيمَ ﴾ 69 ﴿
वत्लु अ़लैहिम् न-ब-अ इब्राही-म
तथा आप, उन्हें सुना दें, इब्राहीम का समाचार (भी)।
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَا تَعْبُدُونَ ﴾ 70 ﴿
इज् का-ल लि – अबीहि व क़ौमिही मा तअ्बुदून
जब उसने कहा, अपने बाप तथा अपनी जाति से कि तुम क्या पूज रहे हो?
قَالُوا نَعْبُدُ أَصْنَامًا فَنَظَلُّ لَهَا عَاكِفِينَ ﴾ 71 ﴿
कालू नअ्बुदु असनामन् फ़-नज़ल्लु लहा आकिफ़ीन
उन्होंने कहाः हम मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं और उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।
قَالَ هَلْ يَسْمَعُونَكُمْ إِذْ تَدْعُونَ ﴾ 72 ﴿
का – ल हल् यस्मअूनकुम् इज् तद्अून
उसने कहाः क्या वे तुम्हारी सुनती हैं, जब तुम पुकारते हो?
أَوْ يَنفَعُونَكُمْ أَوْ يَضُرُّونَ ﴾ 73 ﴿
औ यन्फअूनकुम् औ यजुर्रून
या तुम्हें लाभ पहुँचाती या हानि पहुँचाती हैं?
قَالُوا بَلْ وَجَدْنَا آبَاءَنَا كَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ ﴾ 74 ﴿
कालू बल् वजद्ना आबा अना कज़ालि क यफ्अलून
उन्होंने कहाः बल्कि हमने अपने पूर्वोजों को ऐसा ही करते हुए पाया है।
قَالَ أَفَرَأَيْتُم مَّا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ ﴾ 75 ﴿
क़ा-ल अ-फ रऐतुम् मा कुन्तुम् तअ्बुदून
उसने कहाः क्या तुमने कभी (आँख खोलकर) उसे देखा, जिसे तुम पूज रहे हो।
أَنتُمْ وَآبَاؤُكُمُ الْأَقْدَمُونَ ﴾ 76 ﴿
अन्तुम् व आबाउकुमुल्अक़्दमून
तुम तथा तुम्हारे पहले पूर्वज?
فَإِنَّهُمْ عَدُوٌّ لِّي إِلَّا رَبَّ الْعَالَمِينَ ﴾ 77 ﴿
फ़- इन्नहुम् अ़दुव्वुल-ली इल्ला रब्बल् आ़लमीन
क्योंकि ये सब मेरे शत्रु हैं, पूरे विश्व के पालनहार के सिवा।
الَّذِي خَلَقَنِي فَهُوَ يَهْدِينِ ﴾ 78 ﴿
अल्लज़ी ख़-ल-कनी फहु व यह्दीन
जिसने मुझे पैदा किया, फिर वही मुझे मार्ग दर्शा रहा है।
وَالَّذِي هُوَ يُطْعِمُنِي وَيَسْقِينِ ﴾ 79 ﴿
वल्लज़ी हु-व युत्अिमुनी व यस्कीन
और जो मुझे खिलाता और पिलाता है।
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ ﴾ 80 ﴿
व इज़ा मरिज्तु फ़हु व यश्फ़ीन
और जब रोगी होता हूँ, तो वही मुझे स्वस्थ करता है।
وَالَّذِي يُمِيتُنِي ثُمَّ يُحْيِينِ ﴾ 81 ﴿
वल्लज़ी युमीतुनी सुम्-म युह़्यीन
तथा वही मुझे मारेगा, फिर[1] मुझे जीवित करेगा। 1. अर्थात प्रलय के दिन अपने कर्मों का फल भोगने के लिये।
وَالَّذِي أَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لِي خَطِيئَتِي يَوْمَ الدِّينِ ﴾ 82 ﴿
वल्लज़ी अत्मअु अंय्यग्फि-र ली खती-अती यौमद्दीन
तथा मैं आशा रखता हूँ कि क्षमा कर देगा, मेरे लिए, मेरे पाप, प्रतिकार (प्रलय) के दिन।
رَبِّ هَبْ لِي حُكْمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ ﴾ 83 ﴿
रब्बि हब् ली हुक्मंव्-व अल्हिक्नी बिस्सालिहीन
हे मेरे पालनहार! प्रदान कर दे मुझे तत्वदर्शिता और मुझे सम्मिलित कर सदाचारियों में।
وَاجْعَل لِّي لِسَانَ صِدْقٍ فِي الْآخِرِينَ ﴾ 84 ﴿
वज्अ़ल्ली लिसा-न सिद्किन् फ़िल-आख़िरीन
और मुझे सच्ची ख्याति प्रदान कर, आगामी लोगों में।
وَاجْعَلْنِي مِن وَرَثَةِ جَنَّةِ النَّعِيمِ ﴾ 85 ﴿
वज्अ़ल्नी मिंव्व-र सति जन्नतिन्-नईम
और बना दे मुझे, सुख के स्वर्ग का उत्तराधिकारी।
وَاغْفِرْ لِأَبِي إِنَّهُ كَانَ مِنَ الضَّالِّينَ ﴾ 86 ﴿
वग़्फिर् लि-अबी इन्नहू का-न मिनज़्ज़ाल्लीन
तथा मेरे बाप को क्षमा कर दे,[1] वास्तव में, वह कुपथों में से है। 1. (देखियेः सूरह तौबा, आयतः114)
وَلَا تُخْزِنِي يَوْمَ يُبْعَثُونَ ﴾ 87 ﴿
व ला तुख़्जिनी यौ-म युबअ़सून
तथा मुझे निरादर न कर, जिस दिन सब जीवित किये[1]जायेंगे। 1. ह़दीस में वर्णित है कि प्रलय के दिन इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बाप से मिलेंगे। और कहेंगेः हे मेरे पालनहार! तू ने मुझे वचन दिया था कि मुझे पुनः जीवित होने के दिन अपमानित नहीं करेगा। तो अल्लाह कहेगाः मैं ने स्वर्ग को काफ़िरों के लिये अवैध कर दिया है। (सह़ीह़ बुख़ारीः4769)
يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌ وَلَا بَنُونَ ﴾ 88 ﴿
यौ-म ला यन्फअु मालुंव्-व ला बनून
जिस दिन, लाभ नहीं देगा कोई धन और न संतान।
إِلَّا مَنْ أَتَى اللَّهَ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ ﴾ 89 ﴿
इल्ला मन् अतल्ला-ह बि-कल्बिन सलीम
परन्तु, जो अल्लाह के पास स्वच्छ दिल लेकर आयेगा।
وَأُزْلِفَتِ الْجَنَّةُ لِلْمُتَّقِينَ ﴾ 90 ﴿
व उज्लि – फ़तिल् – जन्नतु लिल्मुत्तक़ीन
और समीप कर दी जायेगी स्वर्ग आज्ञाकारियों के लिए।
وَبُرِّزَتِ الْجَحِيمُ لِلْغَاوِينَ ﴾ 91 ﴿
व बुर्रि – ज़तिल् – जहीमु लिल्ग़ावीन
तथा खोल दी जायेगी नरक कुपथों के लिए।
وَقِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ ﴾ 92 ﴿
व की – ल लहुम् ऐ-नमा कुन्तुम् तअ्बुदून
तथा कहा जायेगाः कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम पूज रहे थे?
مِن دُونِ اللَّهِ هَلْ يَنصُرُونَكُمْ أَوْ يَنتَصِرُونَ ﴾ 93 ﴿
मिन् दूनिल्लाहि, हल् यन्सुरूनकुम् औ यन्तसिरून
अल्लाह के सिवा, क्या वे तुम्हारी सहायता करेंगे अथवा स्वयं अपनी सहायता कर सकते हैं?
فَكُبْكِبُوا فِيهَا هُمْ وَالْغَاوُونَ ﴾ 94 ﴿
फ़कुब्किबू फ़ीहा हुम् वल्ग़ावून
फिर उसमें औंधे झोंक दिये जायेंगे वे और सभी कुपथ।
وَجُنُودُ إِبْلِيسَ أَجْمَعُونَ ﴾ 95 ﴿
व जुनूदु इब्ली-स अज्मअून
और इब्लीस की सेना सभी।
قَالُوا وَهُمْ فِيهَا يَخْتَصِمُونَ ﴾ 96 ﴿
कालू व हुम् फ़ीहा यख़्तसिमून
और वे उसमें आपस में झगड़ते हुए कहंगेः
تَاللَّهِ إِن كُنَّا لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ﴾ 97 ﴿
तल्लाहि इन् कुन्ना लफ़ी ज़लालिम् मुबीन
अल्लाह की शपथ! वास्तव में, हम खुले कुपथ में थे।
إِذْ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 98 ﴿
इज् नुसव्वीकुम् बिरब्बिल् आलमीन
जब हम तुम्हें, बराबर समझ रहे थे विश्व के पालनहार के।
وَمَا أَضَلَّنَا إِلَّا الْمُجْرِمُونَ ﴾ 99 ﴿
व मा अज़ल्लना इल्लल्-मुज्रिमून
और हमें कुपथ नहीं किया, परन्तु अपराधियों ने।
فَمَا لَنَا مِن شَافِعِينَ ﴾ 100 ﴿
फ़मा लना मिन् शाफिईन
तो हमारा कोई अभिस्तावक (सिफ़ारिशी) नहीं रह गया।
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍ ﴾ 101 ﴿
व ला सदीकिन् हमीम
तथा न कोई प्रेमी मित्र।
فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 102 ﴿
फलौ अन्-न लना कर्र तन् फ-नकू-न मिनल्-मुअ्मिनीन
तो यदि हमें पुनः संसार में जाना होता,[1] तो हम ईमान वालों में हो जाते। 1. इस आयत में संकेत है कि संसार में एक ही जीवन कर्म के लिये मिलता है। और दूसरा जीवन प्रलोक में कर्मों के फल के लिये मिलेगा।
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 103 ﴿
इन्-न फ़ी ज़ालि क लआ-यतन्, व मा का-न अक्सरुहुम् मुअ्मिनीन
निःसंदेह, इसमें बड़ी निशानी है और उनमें से अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं हैं।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 104 ﴿
व इन्-न रब्ब-क लहुवल अ़ज़ीजुर्रहीम *
और वास्तव में, आपका पालनहार ही अति प्रभुत्वशाली,[1] दयावान् है। 1. परन्तु लोग स्वयं अत्याचार कर के नरक के भागी बन रहे हैं।
كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 105 ﴿
कज़्ज़बत् क़ौमु नूहि-निल्-मुर्सलीन
नूह़ की जाति ने भी रसूलों को झुठलाया।
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 106 ﴿
इज् का-ल लहुम् अखूहुम् नूहुन् अला तत्तकून
जब उनसे उनके भाई नूह़ ने कहाः क्या तुम (अल्लाह से) डरते नहीं हो?
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ﴾ 107 ﴿
इन्नी लकुम् रसूलुन् अमीन
वास्तव में, मैं तुम्हारे लिए एक[1] रसूल हूँ। 1. अल्लाह का संदेश बिना कमी और अधिक्ता के तुम्हें पहूँचा रहा हूँ।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 108 ﴿
फ़त्तकुल्ला-ह व अतीअून
अतः, तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 109 ﴿
व मा अस्अलुकुम् अ़लैहि मिन् अज्रिन् इन् अज्रि-य इल्ला अ़ला रब्बिल्-आ़लमीन
मैं नहीं माँगता इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला), मेरा बदला तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 110 ﴿
फत्तकुल्ला-ह व अतीअून
अतः, तुम अल्लाह से डरो और मेरी आज्ञा का पालन करो।
قَالُوا أَنُؤْمِنُ لَكَ وَاتَّبَعَكَ الْأَرْذَلُونَ ﴾ 111 ﴿
काल अनुअ्मिनु ल क वत्त-ब अ़कल् अर् ज़लून
उन्होंने कहाः क्या हम तुझे मान लें, जबकि तेरा अनुसरण पतित (नीच) लोग[1] कर रहे हैं? 1. अर्थात धनी नहीं, निर्धन लोग कर रहे हैं।
قَالَ وَمَا عِلْمِي بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 112 ﴿
का-ल व मा ज़िल्मी बिमा कानू यअ्मलून
(नूह़ ने) कहाः मूझे क्य ज्ञान कि वे क्या कर्म करते रहे हैं?
إِنْ حِسَابُهُمْ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّي ۖ لَوْ تَشْعُرُونَ ﴾ 113 ﴿
इन् हिसाबुहुम् इल्ला अ़ला रब्बी लौ तश्अुरून
उनका ह़िसाब तो बस मेरे पालनहार के ऊपर है, यदि तुम समझो।
وَمَا أَنَا بِطَارِدِ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 114 ﴿
व मा अ-न बितारिदिल्-मुअ्मिनीन
और मैं धुतकारने वाला[1] नहीं हूँ, ईमान वालों को। 1. अर्थात मैं हीन वर्ग के लोगों को जो ईमान लाये हैं अपने से दूर नहीं कर सकता जैसा कि तुम चाहते हो।
إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴾ 115 ﴿
इन् अ-न इल्ला नज़ीरूम्-मुबीन
मैं तो बस खुला सावधान करने वाला हूँ।
قَالُوا لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَا نُوحُ لَتَكُونَنَّ مِنَ الْمَرْجُومِينَ ﴾ 116 ﴿
कालू ल-इल्लम् तन्तहि या नूहु ल-तकूनन्-न मिनल्- मरजूमीन
उन्होंने कहाः यदि रुका नहीं, हे नूह़! तो तू अवश्य पथराव करके मारे हुओं में होगा।
قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوْمِي كَذَّبُونِ ﴾ 117 ﴿
का-ल रब्बि इन्-न क़ौमी कज्ज़बून
उसने कहाः मेरे पालनहार! मेरी जाति ने मुझे झुठला दिया।
فَافْتَحْ بَيْنِي وَبَيْنَهُمْ فَتْحًا وَنَجِّنِي وَمَن مَّعِيَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 118 ﴿
फ़फ़्तह् बैनी व बैनहुम् फ़त्हंव्-व नज्जिनी व मम्-मअि-य मिनल्-मुअ्मिनीन
अतः, तू निर्णय कर दे मेरे और उनके बीच और मुक्त कर दे मुझे तथा उन्हें जो मेरे साथ हैं, ईमान वालों में से।
فَأَنجَيْنَاهُ وَمَن مَّعَهُ فِي الْفُلْكِ الْمَشْحُونِ ﴾ 119 ﴿
फ़- अन्जैनाहु व मम्-म-अ़हू फ़िल्फुल्किल् मश्हून
तो हमने उसे मुक्त कर दिया तथा उन्हें जो उसके साथ भरी नाव में थे।
ثُمَّ أَغْرَقْنَا بَعْدُ الْبَاقِينَ ﴾ 120 ﴿
सुम्म अग्ररक़्ना बअ्दुल् – बाक़ीन
फिर हमने डुबो दिया उसके पश्चात्, शेष लोगों को।
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 121 ﴿
इन्-न फ़ी ज़ालि क लआ-यतन् व मा का-न अक्सरुहुम्-मुअ्मिनीन
वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है तथा उनमें से अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 122 ﴿
व इन्-न रब्ब-क लहुवल अ़ज़ीजुर्रहीम *
और निश्चय आपका पालनहार ही अति प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
كَذَّبَتْ عَادٌ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 123 ﴿
कज़्ज़-बत् आ़दु-निल् मुर्सलीन
झुठला दिया आद (जाति) ने (भी) रसूलों को।
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 124 ﴿
इज् का-ल लहुम् अखूहुम् हूदुन् अला तत्तकून
जब कहा उनसे, उनके भाई हूद[1] नेः क्या तुम डरते नहीं हो? 1. आद जाति के नबी हूद (अलैहिस्सलाम) को उन का भाई कहा गया है क्यों कि वह भी उन्हीं के समुदाय में से थे।
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ﴾ 125 ﴿
इन्नी लकुम् रसूलुन् अमीन
वस्तुतः, मैं तुम्हारे लिए एक न्यासिक (अमानतदार) रसूल हूँ।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 126 ﴿
फ़त्तकुल्ला-ह व अतीअून
अतः, अल्लाह से डरो और मेरा अनुपालन करो।
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 127 ﴿
व मा अस् अ़लुकुम् अ़लैहि मिन् अज्रिन् इन् अज्रि – य इल्ला अ़ला रब्बिल् आ़लमीन
और मैं तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ آيَةً تَعْبَثُونَ ﴾ 128 ﴿
अ-तबनू – न बिकुल्लि रीअिन् आ-यतन् तअ्-बसून
क्यों तुम बना लेते हो, हर ऊँचे स्थान पर एक यादगार भवन, व्यर्थ में?
وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ ﴾ 129 ﴿
व तत्तखिजू – न मसानि – अ़ लअ़ल्लकुम् तख़्लुदून
तथा बनाते हो, बड़े-बड़े भवन, जैसे कि तुम सदा रहोगे।
وَإِذَا بَطَشْتُم بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ ﴾ 130 ﴿
व इज़ा ब – तश्तुम् ब – तश्तुम् जब्बारीन
और जबकिसी को पकड़ते हो, तो पकड़ते हो, महा अत्याचारी बनकर।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 131 ﴿
फ़त्तकुल्ला-ह व अतीअून
तो अल्लाह से डरो और मेरी आज्ञा का पालन करो।
وَاتَّقُوا الَّذِي أَمَدَّكُم بِمَا تَعْلَمُونَ ﴾ 132 ﴿
वत्तकुल्लज़ी अ – मद्दकुम् बिमा तअ्लमून
तथा उससे भय रखो, जिसने तुम्हारी सहायता की है उससे, जो तुम जानते हो।
أَمَدَّكُم بِأَنْعَامٍ وَبَنِينَ ﴾ 133 ﴿
अ – मद्दकुम बिअन् आ़मिंव् – व बनीन
उसने सहायता की है तुम्हारी चौपायों तथा संतान से।
وَجَنَّاتٍ وَعُيُونٍ ﴾ 134 ﴿
व जन्नातिंव् – व अुयून
तथा बाग़ों (उद्यानो) तथा जल स्रोतों से।
إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴾ 135 ﴿
इन्नी अख़ाफु अ़लैकुम् अ़ज़ा-ब यौमिन् अ़ज़ीम
मैं तुमपर डरता हूँ, भीषण दिन की यातना से।
قَالُوا سَوَاءٌ عَلَيْنَا أَوَعَظْتَ أَمْ لَمْ تَكُن مِّنَ الْوَاعِظِينَ ﴾ 136 ﴿
क़ालू सवाअुन अलैना आ वअज़्ता अम लम तकुन मिनल वाअिज़ीन
उन्होंने कहाः नसीह़त करो या न करो, हमपर सब समान है।
إِنْ هَٰذَا إِلَّا خُلُقُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 137 ﴿
इन् हाज़ा इल्ला खुलुकुल अव्वलीन
ये बात तो बस प्राचीन लोगों की नीति[1] है। 1. अर्थात प्राचीन युग से होती चली आ रही है।
وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ ﴾ 138 ﴿
व मा नह्नु बिमु अ़ज़्ज़बीन
और हम उनमें से नहीं हैं, जिन्हें यातना दी जायेगी।
فَكَذَّبُوهُ فَأَهْلَكْنَاهُمْ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 139 ﴿
फ़- कज़्ज़बूहु फ़-अह़्लक्नाहुम्, इन्-न फ़ी ज़ालि-क लआ-यतन्, व मा का-न अक्सरुहुम् मुअ्मिनीन
अन्ततः, उन्होंने हमें झुठला दिया, तो हमने उन्हें ध्वस्त कर दिया। निश्चय इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है और लोगों में अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं हैं।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 140 ﴿
व इन्-न रब्ब-क लहुवल अ़ज़ीजुर्रहीम *
और वास्तव में, आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
كَذَّبَتْ ثَمُودُ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 141 ﴿
कज्ज-बत् समूदुल मुर्सलीन
झुठला दिया समूद ने (भी)[1] रसूलों को। 1. यहाँ यह बात याद रखने की है कि एक रसूल का इन्कार सभी रसूलों का इन्कहार है क्यों कि सब का उपदेश एक ही था।
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ صَالِحٌ أَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 142 ﴿
इज् का – ल लहुम् अखूहुम् सालिहुन् अला तत्तकून
जब कहा उनसे उनके भाई सालेह़ नेः क्या तुम डरते नहीं हो?
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ﴾ 143 ﴿
इन्नी लकुम रसूलुन अमीन
वास्तव में, मैं तुम्हारा विश्वसनीय रसूल हूँ।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 144 ﴿
फत्तकुल्ला – ह व अतीअून
तो तुम अल्लाह से डरो और मेरा कहा मानो।
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 145 ﴿
व मा अस्अलुकुम अ़लैहिमिन् अज्रिन इन् अज्रि – य इल्ला अ़ला रब्बिल् -आ़लमीन
तथा मैं नहीं माँगता इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक, मेरा पारिश्रमिक तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
أَتُتْرَكُونَ فِي مَا هَاهُنَا آمِنِينَ ﴾ 146 ﴿
अ-तुत्रकू-न फ़ी मा हाहुना आमिनीन
क्या तुम छोड़ दिये जाओगे उसमें, जो यहाँ हैं निश्चिन्त रहकर?
فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ ﴾ 147 ﴿
फ़ी जन्नातिंव व अुयून
बाग़ों तथा स्रोतों में।
وَزُرُوعٍ وَنَخْلٍ طَلْعُهَا هَضِيمٌ ﴾ 148 ﴿
व जुरूअिव् व नख्लिन् तल् अुहा हज़ीम
तथा खेतों और खजूरों में, जिनके गुच्छे रस भरे हैं।
وَتَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا فَارِهِينَ ﴾ 149 ﴿
व तन्हितू – न मिनल्- जिबालि बुयूतन् फ़ारिहीन
तथा तुमपर्वतों को तराशकर घर बनाते हो, गर्व करते हुए।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 150 ﴿
फ़त्तकुल्ला – ह व अतीअून
अतः, अल्लाह से डरो और मेरा अनुपालन करो।
وَلَا تُطِيعُوا أَمْرَ الْمُسْرِفِينَ ﴾ 151 ﴿
व ला तुतीअू अमरल मुस्रिफ़ीन
और पालन न करो उल्लंघनकारियों के आदेश का।
الَّذِينَ يُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ ﴾ 152 ﴿
अल्लज़ी – न युफ़्सिदू – न फिल्अर्ज़ि व ला युस्लिहून
जो उपद्रव करते हैं धरती में और सुधार नहीं करते।
قَالُوا إِنَّمَا أَنتَ مِنَ الْمُسَحَّرِينَ ﴾ 153 ﴿
कालू इन्नमा अन् – त मिनल्- मुसह्हरीन
उन्होंने कहाः वास्तव में, तू उनमें से है, जिनपर जादू कर दिया गया है।
مَا أَنتَ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُنَا فَأْتِ بِآيَةٍ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ﴾ 154 ﴿
मा अन् – त इल्ला ब – शरुम् मिस्लुना फअ्ति बिआ यतिन् इन् – कुन्-त मिनस्सादिक़ीन
तू तो बस हमारे समान एक मानव है। तो कोई चमत्कार ले आ, यदि तू सच्चा है।
قَالَ هَٰذِهِ نَاقَةٌ لَّهَا شِرْبٌ وَلَكُمْ شِرْبُ يَوْمٍ مَّعْلُومٍ ﴾ 155 ﴿
का – ल हाज़िही ना कतुल् – लहा शिरबुंव् – व लकुम् शिरबु यौमिम् – मअलूम
कहाः ये ऊँटनी है,[1] इसके लिए पानी पीने का एक दिन है और तुम्हारे लिए पानी लेने का निश्चित दिन है। 1. अर्थता यह ऊँटनी चमत्कार है जो उन की माँग पर पत्थर से निकली थी।
وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴾ 156 ﴿
व ला तमस्सूहा बिसूइन् फ़-यअ्खु-ज़कुम् अ़ज़ाबु यौमिन् अ़ज़ीम
तथा उसे हाथ न लगाना बुराई से, अन्यथा तुम्हें पकड़ लेगी एक भीषण दिन की यातना।
فَعَقَرُوهَا فَأَصْبَحُوا نَادِمِينَ ﴾ 157 ﴿
फ़- अ – क़रूहा फ़ – अस्बहू नादिमीन
तो उन्होंने वध कर दिया उसे, अन्ततः, पछताने वाले हो गये।
فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 158 ﴿
फ़-अ-ख़-ज़हुमुल अ़ज़ाबु, इन्-न फ़ी ज़ालि-क लआ-यतन्, व मा का-न अक्सरुहुम् मुअ्मिनीन
और पकड़ लिया उन्हें यातना ने। वस्तुतः, इसमें बड़ी निशानी है और नहीं थे उनमें से अधिक्तर ईमान वाले।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 159 ﴿
व इन् – न रब्ब – क लहुवल अ़ज़ीजुर्रहीम *
और निश्चय आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 160 ﴿
कज़्ज़ बत् कौमु लूति – निल् – मुर्सलीन
झुठला दिया लूत की जाति ने (भी) रसूलों को।
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ لُوطٌ أَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 161 ﴿
इज् का – ल लहुम् अख़ूहुम् लूतुन् अला तत्तकून
जब कहा उनसे उनके भाई लूत नेः क्या तुम डरते नहीं हो?
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ﴾ 162 ﴿
इन्नी लकुम् रसूलुन् अमीन
वास्तव में, मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 163 ﴿
फत्तकुल्ला-ह व अतीअून
अतः अल्लाह से डरो और मेरा अनुपालन करो।
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 164 ﴿
व मा अस् अलुकुम् अ़लैहि मिन् अज्रिन् इन् अज्रि – य इल्ला अ़ला रब्बिल्-आ़लमीन
और मैं तुमसे प्रश्न नहीं करता, इसपर किसी पारिश्रमिक (बदले) का। मेरा बदला तो बस सर्वलोक के पालनहार पर है।
أَتَأْتُونَ الذُّكْرَانَ مِنَ الْعَالَمِينَ ﴾ 165 ﴿
अ -तअ्तूनज्जु क्रा-न मिनल् -आ़लमीन
क्या तुम जाते[1]हो पुरुषों के पास, संसार वासियों में से। 1. इस कुकर्म का आरंभ संसार में लूत (अलैहिस्सलाम) की जाति से हुआ। और अब यह कुकर्म पूरे विश्व में विशेष रूप से यूरोपीय सभ्य देशों में व्यापक है। और समलैंगिक विवाह को यूरोप के बहुत से देशों में वैध मान लिया गया है। जिस के कारण कभी भी उन पर अल्लाह की यातना आ सकती है।
وَتَذَرُونَ مَا خَلَقَ لَكُمْ رَبُّكُم مِّنْ أَزْوَاجِكُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ عَادُونَ ﴾ 166 ﴿
वत ज़रू-न मा ख़-ल-क लकुम् रब्बुकुम् मिन् अज़्वाजिकुम्, बल् अन्तुम् क़ौमुन् आदून
तथा छोड़ देते हो उसे, जिसे पैदा किया है तुम्हारे पालनहार ने, अर्थात अपनी प्तनियों को, बल्कि तुम एक जाति हो, सीमा का उल्लंघन करने वाली।
قَالُوا لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَا لُوطُ لَتَكُونَنَّ مِنَ الْمُخْرَجِينَ ﴾ 167 ﴿
क़ालू ल – इल्लम् तन्तहि या लूतु ल-तकूनन् – न मिनल् मुख़्रजीन
उन्होंने कहाः यदि तू नहीं रुका, हे लूत! तो अवश्य तेरा बहिष्कार कर दिया जायेगा।
قَالَ إِنِّي لِعَمَلِكُم مِّنَ الْقَالِينَ ﴾ 168 ﴿
का-ल इन्नी लि-अ मलिकुम् मिनल्-कालीन
उसने कहाः वास्तव में, मैं तुम्हारे करतूत से बहुत अप्रसन्न हूँ।
رَبِّ نَجِّنِي وَأَهْلِي مِمَّا يَعْمَلُونَ ﴾ 169 ﴿
रब्बि नज्जिनी व अह़्ली मिम्मा यअ्मलून
मेरे पालनहार! मुझे बचा ले तथा मेरे परिवार को उससे, जो वे कर रहे हैं।
فَنَجَّيْنَاهُ وَأَهْلَهُ أَجْمَعِينَ ﴾ 170 ﴿
फ़ – नज्जैनाहु व अह़्लहू अज्मईन
तो हमने उसे बचा लिया तथा उसके सभी परिवार को।
إِلَّا عَجُوزًا فِي الْغَابِرِينَ ﴾ 171 ﴿
इल्ला अ़जूज़न फ़िल्-ग़ाबिरीन
परन्तु, एक बुढ़िया[1]को, जो पीछे रह जाने वालों में थी। 1. इस से अभिप्रेत लूत (अलैहिस्सलाम) की काफ़िर पत्नी थी।
ثُمَّ دَمَّرْنَا الْآخَرِينَ ﴾ 172 ﴿
सुम्-म दम्मर्नल आख़रीन
फिर हमने विनाश कर दिया दूसरों का।
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَسَاءَ مَطَرُ الْمُنذَرِينَ ﴾ 173 ﴿
व अम्तरना अ़लैहिम् म-तरन् फ़सा-अ म-तरुल् – मुन्ज़रीन
और वर्षा की उनपर, एक घोर[1]वर्षा। तो बुरी हो गयी डराये हुए लोगों की वर्षा। 1. अर्थात पत्थरों की वर्षा। (देखियेः सूरह हूद, आयतः82-83)
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 174 ﴿
इन्-न फी ज़ालि – क लआ-यतन् व मा का-न अक्सरुहुम् मुअ्मिनीन
वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है और उनमें से अधिक्तर ईमान लाने वाले नहीं थे।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 175 ﴿
व इन्-न रब्ब-क लहुवल् अ़ज़ीजुर रहीम *
और निश्चय आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
كَذَّبَ أَصْحَابُ الْأَيْكَةِ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 176 ﴿
कज़्ज़-ब अस्हाबुल-ऐ-कतिल् मुर्सलीन
झुठला दिया ऐय्का[1] वालों ने रसूलों को। 1. ऐय्का का अर्थ झाड़ी है। यह मद्यन का क्षेत्र है जिस में शोऐब अलैहिस्सलाम को भेजा गया था।
إِذْ قَالَ لَهُمْ شُعَيْبٌ أَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 177 ﴿
इज् का – ल लहुम् शुऐबुन् अला तत्तकून
जब कहा उनसे शोऐब नेः क्या तुम डरते नहीं हो?
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ﴾ 178 ﴿
इन्नी लकुम् रसूलुन् अमीन
मैं तुम्हारे लिए एक विश्वसनीय रसूल हूँ।
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴾ 179 ﴿
फत्तकुल्ला – ह व अतीअून
अतः, अल्लाह से डरो तथा मेरी आज्ञा का पालन करो।
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 180 ﴿
व मा अस् अलुकुम् अ़लैहि मिन् अज्रिन् इन् अज्रि – य इल्ला अ़ला रब्बिल्-आ़लमीन
और मैं नहीं माँगता तुमसे इसपर कोई पारिश्रमिक, मेरा पारिश्रमिक तो बस समस्त विश्व के पालनहार पर है।
أَوْفُوا الْكَيْلَ وَلَا تَكُونُوا مِنَ الْمُخْسِرِينَ ﴾ 181 ﴿
औ फुल्कै – ल व ला तकूनू मिनल्- मुख्सिरीन
तुम नाप-तोल पूरा करो और न बनो कम देने वालों में।
وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَقِيمِ ﴾ 182 ﴿
व ज़िनू बिल – किस्तासिल् – मुस्तक़ीम
और तोलो सीधी तराज़ू से।
وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ﴾ 183 ﴿
व ला तब्ख़सुन्ना स अश्या अहुम् व ला तअ्सौ फ़िलअर्ज़ि मुफ़्सिदीन
और मत कम दो लोगों को उनकी चीज़ें और मत फिरो धरती में उपद्रव फैलाते।
وَاتَّقُوا الَّذِي خَلَقَكُمْ وَالْجِبِلَّةَ الْأَوَّلِينَ ﴾ 184 ﴿
वत्तकुल्लज़ी ख-ल-क कुम् वल् – जिबिल्ल तल अव्वलीन
और डरो उससे, जिसने पैदा किया है तुम्हें तथा अगले लोगों को।
قَالُوا إِنَّمَا أَنتَ مِنَ الْمُسَحَّرِينَ ﴾ 185 ﴿
कालू इन्नमा अन् – त मिनल् – मुसह्हरीन
उन्होंने कहाःवास्तव में, तू उनमें से है, जिनपर जादू कर दिया गया है।
وَمَا أَنتَ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُنَا وَإِن نَّظُنُّكَ لَمِنَ الْكَاذِبِينَ ﴾ 186 ﴿
व मा अन् – त इल्ला ब – शरुम्-मिस्लुना व इन् नजुन्नु – क लमिनल-काज़िबीन
और तू तो बस एक पुरुष[1] है, हमारे समान और हम तो तुझे झूठों में समझते हैं। 1. यहाँ यह बात विचारणीय है कि सभी विगत जातियों ने अपने रसूलों को उन के मानव होने के कारण नकार दिया। और जिस ने स्वीकार भी किया तो उस ने कुछ युग व्यतीत होने के पश्चात् अति कर के अपने रसूलों को प्रभु अथवा प्रभु का अंश बना कर उन्हीं को पूज्य बना लिया। तथा एकेश्वरवाद को कड़ा आघात पहुँचा कर मिश्रणवाद का द्वार खोल लिया और कुपथ हो गये। वर्तमान युग में भी इसी का प्रचलन है और इस का आधार अपने पूर्वजों की रीतियों को बनाया जाता है। इस्लाम इसी कुपथ का निवारण कर के एकेश्वरवाद की स्थापना के लिये आया है और वास्तव में यही सत्धर्म है। ह़दीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः मूझे वैसे न बढ़ा चढ़ाना जैसे ईसाईयों ने मर्यम के पुत्र (ईसा) को बढ़ा चढ़ा दिया। वास्तव में मैं उस का दास हूँ। अतः मुझे अल्लाह का दास और उस का रसूल कहो। (देखिये सह़ीह़ बुख़ारीः 3445)
فَأَسْقِطْ عَلَيْنَا كِسَفًا مِّنَ السَّمَاءِ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ﴾ 187 ﴿
फ – अस्कित् अ़लैना कि- सफम् – मिनस्समा इ इन् कुन् – त मिनस्सादिक़ीन
तो हमपर गिरा दे कोई खण्ड आकाश का, यदि तू सच्चा है।
قَالَ رَبِّي أَعْلَمُ بِمَا تَعْمَلُونَ ﴾ 188 ﴿
का – ल रब्बी अअ्लमु बिमा तअ्मलून
उसने कहाः मेरा पालनहार भली प्रकार जानता है उसे, जो कुछ तुम कर रहे हो।
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمْ عَذَابُ يَوْمِ الظُّلَّةِ ۚ إِنَّهُ كَانَ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴾ 189 ﴿
फ़ – कज़्ज़बूहु फ़ – अ – ख़ – ज़हुम् अ़ज़ाबु यौमिज़्ज़ुल्लति इन्नहू का-न अ़ज़ा-ब यौमिन् अ़ज़ीम
तो उन्होंने उसे झुठला दिया। अन्ततः, पकड़ लिया उन्हें छाया के[1] दिन की यातना ने। वस्तुतः, वह एक भीषण दिन की यातना थी। 1. अर्थात उन की यातना के दिन उन पर बादल छा गया। फिर आग बरसने लगी और धरती कंपित हो गई। फिर एक कड़ी ध्वनि ने उन की जानें ले लीं। (इब्ने कसीर)
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 190 ﴿
इन् – न फ़ी ज़ालि – क लआ यतन्, व मा का-न अक्सरुहुम् मुअमिनीन
निश्चय ही, इसमें एक बड़ी निशानी (शिक्षा) है और नहीं थे उनमें अधिक्तर ईमान लाने वाले।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 191 ﴿
व इन् – न रब्ब – क लहुवल अ़ज़ीजुर रहीम *
और वास्तव में, आपका पालनहार ही अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
وَإِنَّهُ لَتَنزِيلُ رَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 192 ﴿
व इन्नहू ल – तन्ज़ीलु रब्बिल् – आलमीन
तथा निःसंदेह, ये (क़ुर्आन) पूरे विश्व के पालनहार का उतारा हुआ है।
نَزَلَ بِهِ الرُّوحُ الْأَمِينُ ﴾ 193 ﴿
न-ज़-ल बिहिर-रूहुल-अमीन
इसे लेकर रूह़ुल अमीन[1] उतरा। 1. रूह़ुल अमीन से अभिप्राय आदरणीय फ़रिश्ता जिब्रील (अलैहिस्सलाम) हैं। जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अल्लाह की ओर से वह़्यी ले कर उतरते थे जिस के कारण आप रसूलों की और उन की जातियों की दशा से अवगत हुये। अतः यह आप के सत्य रसूल होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
عَلَىٰ قَلْبِكَ لِتَكُونَ مِنَ الْمُنذِرِينَ ﴾ 194 ﴿
अ़ला कल्बि-क लि-तकू न मिनल्-मुन्ज़िरीन
आपके दिल पर, ताकि आप हो जायें सावधान करने वालों में।
بِلِسَانٍ عَرَبِيٍّ مُّبِينٍ ﴾ 195 ﴿
बिलिसानिन अरबियिम मुबीन
खुली अरबी भाषा में।
وَإِنَّهُ لَفِي زُبُرِ الْأَوَّلِينَ ﴾ 196 ﴿
व इत्तहू लफ़ी जुबुरिल् – अव्वलीन
तथा इसकी चर्चा[1] अगले रसूलों की पुस्तकों में (भी) है। 1. अर्थात सभी आकाशीय ग्रन्थों में अन्तिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन तथा आप पर पुस्तक क़ुर्आन के अवतरित होने की भविष्वाणी की गई है। और सब नबियों ने इस की शुभ सूचना दी है।
أَوَلَمْ يَكُن لَّهُمْ آيَةً أَن يَعْلَمَهُ عُلَمَاءُ بَنِي إِسْرَائِيلَ ﴾ 197 ﴿
अ-व लम् यकुल्लहुम् आ यतन् अंय्यअ्-ल-महू अु-लमा-उ बनी इस्राईल
क्या और उनके लिए ये निशानी नहीं है कि इस्राईलियों के विद्वान[1] इसे जानते हैं। 1. बनी इस्राईल के विद्वान अब्दुल्लाह बिन सलाम आदि जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और क़ुर्आन पर ईमान लाये वह इस के सत्य होने का खुला प्रमाण हैं।
وَلَوْ نَزَّلْنَاهُ عَلَىٰ بَعْضِ الْأَعْجَمِينَ ﴾ 198 ﴿
व लौ नज्ज़ल्नाहु अ़ला बअ्जिल-अअ्-जमीन
और यदि हम इसे उतार देते किसी अजमी[1] पर। 1. अर्थात ऐसे व्यक्ति पर जो अरब देश और जाति के अतिरिक्त किसी अन्य जाति का हो।
فَقَرَأَهُ عَلَيْهِم مَّا كَانُوا بِهِ مُؤْمِنِينَ ﴾ 199 ﴿
फ़-क-र अहू अ़लैहिम् मा कानू बिही मुअ्मिनीन
और वह, इसे उनके समक्ष पढ़ता, तो वे उसपर ईमान लाने वाले न होते[1]। 1. अर्थात अर्बी भाषा में न होता तो कहते कि यह हमारी समझ में नहीं आता। (देखियेः सूरह ह़ा, मीम, सज्दा, आयतः44)
كَذَٰلِكَ سَلَكْنَاهُ فِي قُلُوبِ الْمُجْرِمِينَ ﴾ 200 ﴿
कज़ालि – क सलक्नाहु फ़ी कुलूबिल्-मुज्रिमीन
इसी प्रकार, हमने घुसा दिया है इस (क़ुर्आन के इन्कार) को पापियों के दिलों में।
لَا يُؤْمِنُونَ بِهِ حَتَّىٰ يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ ﴾ 201 ﴿
ला युअ्मिनू – न बिही हत्ता य-रवुल अ़ज़ाबल् – अलीम
वे नहीं ईमान लायेंगे उसपर, जब तक देख नहीं लेंगे दुःखदायी यातना।
فَيَأْتِيَهُم بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴾ 202 ﴿
फ़- यअ्ति-यहुम् बग्त-तंव्-व हुम् ला यश्अुरून
फिर, वह उनपर सहसा आ जायेगी और वे समझ भी नहीं पायेंगे।
فَيَقُولُوا هَلْ نَحْنُ مُنظَرُونَ ﴾ 203 ﴿
फ़- यकूलू हल् नह्नु मुन्ज़रून
तो कहेंगेः क्या हमें अवसर दिया जायेगा?
أَفَبِعَذَابِنَا يَسْتَعْجِلُونَ ﴾ 204 ﴿
अ फ़बि अ़ज़ाबिना यस्तअ्जिलून
तो क्या वे हमारी यातना की जल्दी मचा रहे हैं?
أَفَرَأَيْتَ إِن مَّتَّعْنَاهُمْ سِنِينَ ﴾ 205 ﴿
अ-फ-रऐ – त इम् मत्तअ्नाहुम् सिनीन
(हे नबी!) तो क्या आपने विचार किया कि यदि हम लाभ पहुँचायें इन्हें वर्षों।
ثُمَّ جَاءَهُم مَّا كَانُوا يُوعَدُونَ ﴾ 206 ﴿
सुम- म जा- अहुम् मा कानू यू-अ़दून
फिर आ जाये उनपर वह, जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही थी।
مَا أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا يُمَتَّعُونَ ﴾ 207 ﴿
मा अ़ग्ना अ़न्हुम् मा कानू युमत्तअून
तो कुछ काम नहीं आयेगा उनके, जो उन्हें लाभ पहुँचाया जाता रहा?
وَمَا أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا لَهَا مُنذِرُونَ ﴾ 208 ﴿
व मा अह़्लक्ना मिन् क़र् – यतिन् इल्ला लहा मुन्ज़िरून
और हमने किसी बस्ती का विनाश नहीं किया, परन्तु उसके लिए सावधान करने वाले थे।
ذِكْرَىٰ وَمَا كُنَّا ظَالِمِينَ ﴾ 209 ﴿
ज़िक्रा व मा कुन्ना ज़ालिमीन
शिक्षा देने के लिए और हम अत्याचारी नहीं हैं।
وَمَا تَنَزَّلَتْ بِهِ الشَّيَاطِينُ ﴾ 210 ﴿
व मा तनज़्ज़ – लत् बिहिश्शयातीन
तथा नहीं उतरे हैं (इस क़ुर्आन) को लेकर शैतान।
وَمَا يَنبَغِي لَهُمْ وَمَا يَسْتَطِيعُونَ ﴾ 211 ﴿
व मा यम्बग़ी लहुम व मा यस्तती अून
और न योग्य है उनके लिए और न वे इसकी शक्ति रखते हैं।
إِنَّهُمْ عَنِ السَّمْعِ لَمَعْزُولُونَ ﴾ 212 ﴿
इन्नहुम् अ़निस्सम्अिल- मअ्जूलून
वास्तव में, वे तो (इसके) सुनने से भी दूर[1] कर दिये गये हैं। 1. अर्थात इस के अवतरित होने के समय शैतान आकाश की ओर जाते हैं तो उल्का उन्हें भष्म कर देते हैं।
فَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَكُونَ مِنَ الْمُعَذَّبِينَ ﴾ 213 ﴿
फ़ला तद्अु मअ़ल्लाहि इलाहन् आ – ख़-र फ़-तकू-न मिनल् – मुअ़ज़्ज़बीन
अतः, आप न पुकारें अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को, अन्यथा आप दण्डितों में हो जायेंगे।
وَأَنذِرْ عَشِيرَتَكَ الْأَقْرَبِينَ ﴾ 214 ﴿
व अन्जिर अ़शी-र-तकल् अक्रबीन
और आप सावधान कर दें अपने समीपवर्ती[1] संबंधियों को। 1. आदरणीय इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि जब यह आयत उतरी तो आप सफ़ा पर्वत पर चढ़े। और क़ुरैश के परिवारों को पुकरा। और जब सब एकत्र हो गये, और जो स्वयं नहीं आ सका तो उस ने किसी प्रतिनिधि को भेज दिया। और अबू लहब तथा क़ुरैश आ गये तो आप ने फ़रमायाः यदि मैं तुम से कहूँ कि उस वादी में एक सेना है जो तुम पर आक्रमण करने वाली है, तो क्या तुम मुझे सच्चा मानोगे? सब ने कहाः हाँ। हम ने आप को सदा ही सच्चा पाया है। आप ने कहाः मैं तुम्हें आगामी कड़ी यातना से सावधान कर रहा हूँ। इस पर अबू लहब ने कहाः तेरा पूरे दिन नाश हो! क्या हमें इसी के लिये एकत्र किया है? और इसी पर सूरह लह्ब उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारीः4770)
وَاخْفِضْ جَنَاحَكَ لِمَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 215 ﴿
वख़्फ़िज़् जना – ह – क लि मनित्त ब-अ़-क मिनल् मुअ्मिनीन
और झुका दें अपना बाहु[1] उसके लिए, जो आपका अनुयायी हो, ईमान वालों में से। 1. अर्थात उस के साथ विनम्रता का व्यवहार करें।
فَإِنْ عَصَوْكَ فَقُلْ إِنِّي بَرِيءٌ مِّمَّا تَعْمَلُونَ ﴾ 216 ﴿
फ़ – इन् अ़सौ – क फ़कुल इन्नी बरीउम्-मिम्मा त अ्मलून
और यदि वे आपकी अवज्ञा करें, तो आप कह दें कि मैं निर्दोष हूँ उससे, जो तुम कर रहे हो।
وَتَوَكَّلْ عَلَى الْعَزِيزِ الرَّحِيمِ ﴾ 217 ﴿
व त – वक्कल् अलल् – अज़ीज़र्रहीम
तथा आप भरोसा करें अत्यंत प्रभुत्वशाली, दयावान् पर।
الَّذِي يَرَاكَ حِينَ تَقُومُ ﴾ 218 ﴿
अल्लज़ी यरा-क ही-न तकूम
जो देखता है आपको, जिस समय (नमाज़) में खड़े होते हैं।
وَتَقَلُّبَكَ فِي السَّاجِدِينَ ﴾ 219 ﴿
व तक़ल्लु – ब-क फिस्साजिदीन
और आपके फिरने को सज्दा करने[1] वालों में। 1. अर्थात प्रत्येक समय अकेले हों या लोगों के बीच हों।
إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ ﴾ 220 ﴿
इन्नहू हुवस्समीअुल्-अ़लीम
निःसंदेह, वही सब कुछ सुनने-जानने वाला है।
هَلْ أُنَبِّئُكُمْ عَلَىٰ مَن تَنَزَّلُ الشَّيَاطِينُ ﴾ 221 ﴿
हल् उनब्बिउकुम् अला मन् तनज़्ज़लुश्शयातीन
क्या मैं तुम सबको बताऊँ कि किसपर शैतान उतरते हैं?
تَنَزَّلُ عَلَىٰ كُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٍ ﴾ 222 ﴿
तनज़्ज़लु अ़ला कुल्लि अफ्फ़ाकिन् असीम
वे उतरते हैं, प्रत्येक झूठे पापी[1] पर। 1. ह़दीस में है कि फ़रिश्ते बादल में उतरते हैं, और आकाश के निर्णय की बात करते हैं, जिसे शैतान चोरी से सुन लेते हैं। और ज्योतिषियों को पहुँचा देते हैं। फिर वह उस में सौ झूठ मिलाते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः3210)
يُلْقُونَ السَّمْعَ وَأَكْثَرُهُمْ كَاذِبُونَ ﴾ 223 ﴿
युल्कू नस्सम्-अ़ व अक्सरुहुम् काज़िबून
वे पहुँचा देते हैं, सुनी सुनाई बातों को और उनमें अधिक्तर झूठे हैं।
وَالشُّعَرَاءُ يَتَّبِعُهُمُ الْغَاوُونَ ﴾ 224 ﴿
वश्शु-अ़रा-उ यत्तबिअुहुमुल्-गावून
और कवियों का अनुसरण बहके हुए लोग करते हैं।
أَلَمْ تَرَ أَنَّهُمْ فِي كُلِّ وَادٍ يَهِيمُونَ ﴾ 225 ﴿
अलम् त – र अन्नहुम् फ़ी कुल्लि वादिंय् – यहीमून
क्या आप नहीं देखते कि वे प्रत्येक वादी में फिरते[1] हैं। 1. अर्थात कल्पना की उड़ान में रहते हैं।
وَأَنَّهُمْ يَقُولُونَ مَا لَا يَفْعَلُونَ ﴾ 226 ﴿
व अन्नहुम् यकूलू – न मा ला यफ्अ़लून
और ऐसी बात कहते हैं, जो करते नहीं।
إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَذَكَرُوا اللَّهَ كَثِيرًا وَانتَصَرُوا مِن بَعْدِ مَا ظُلِمُوا ۗ وَسَيَعْلَمُ الَّذِينَ ظَلَمُوا أَيَّ مُنقَلَبٍ يَنقَلِبُونَ ﴾ 227 ﴿
इल्लल्लज़ी – न आमनू व अ़मिलुस् – सालिहाति व ज़ करुल्ला – ह कसीरंव् – वन्त – सरू मिम् – बअ्दि मा जुलिमू, व स-यअ् – लमुल्लज़ी – न ज़ – लमू अय् – य मुन्क़ – लबिंय् – यन्क़लिबून*
परन्तु वो (कवि), जो[1]ईमान लाये, सदाचार किये, अल्लाह का बहुत स्मरण किया तथा बदला लिया इसके पश्चात् कि उनके ऊपर अत्याचार किया गया! तथा शीघ्र ही जान लेंगे, जिन्होंने अत्याचार किया है कि व किस दुष्परिणाम की ओर फिरते हैं! 1. इन से अभिप्रेत ह़स्सान बिन साबित आदि कवि हैं जो क़ुरैश के कवियों की भर्त्सना किया करते थे। (देखियेः सह़ीह़ बुख़ारीः4124)