सूरह अल-काफिरून [109]

सूरह काफिरून के संक्षिप्त विषय

यह सूरह मक्की है, इस में 6 आयतें हैं।

  • इस की प्रथम आयत में ((काफ़िरून)) शब्द आने के कारण इस का यह नाम रखा गया है।[1]

1. (हे नबी) कह दोः हे काफ़िरो! 2. मैं उन (मूर्तियों) को नहीं पूजता जिन्हें 1 यह सूरह भी मक्की है। इस सूरह की भूमिका यह है कि मक्का में यद्यपि इस्लाम का कड़ा विरोध हो रहा था फिर भी अभी मूर्ति पूजक आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से निराश नहीं हुये थे और उन के प्रमुख किसी न किसी प्रकार आप को संधि के लिये तैयार कर रहे थे। और आप के पास समय समय से अनेक प्रस्ताव लेकर आया करते थेअन्त में यह प्रस्ताव लेकर आये किः एक वर्ष आप हमारे पूजितों (लात, उज्जा आदि) की पूजा करें, और एक वर्ष हम आप के पूज्य की पूजा करें। और इसी पर संधि हो जाये| उसी समय यह सूरह अवतीर्ण हुई, और सदा के लिये बता दिया गया कि दीन में कोई समझौता नहीं हो सकता है। इसीलिये हदीस में इसे शिर्क से रक्षा की सूरह कहा गया है।

  • आयत 1 में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को निर्देश दिया गया है कि काफिरों से कह दें कि वंदना (उपासना) के विषय में मुझ में और तुम में क्या अन्तर है?
  • आयत 4 से 5 तक में यह ऐलान है कि दीन (धर्म) के विषय में कोई समझौता और उदारता असंभव है।
  • आयत 6 में काफ़िरों के धर्म से अप्रसन्न (विमुख) होने का ऐलान है।
  • हदीस में है कि नबी (सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम) ने तवाफ की दो रकअत में यह सूरह और सूरह इख्लास पढ़ी थी| (सहीह मुस्लिमः 1218)
Arabic Verse Transliteration

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

 

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम

قُلْ يَا أَيُّهَا الْكَافِرُونَ

1

कुल या अय्युहल काफिरून

لَا أَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَ

2

ला अ’अबुदु मा तअ’बुदून

وَلَا أَنتُمْ عَابِدُونَ مَا أَعْبُدُ

3

वला अन्तुम आबिदूना मा अ’अबुद

وَلَا أَنَا عَابِدٌ مَّا عَبَدتُّمْ

4

वला अना आबिदुम मा अबद्तुम

وَلَا أَنتُمْ عَابِدُونَ مَا أَعْبُدُ

5

वला अन्तुम आबिदूना मा अअ’बुद

لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِيَ دِينِ

6

लकुम दीनुकुम वलिय दीन

तर्जुमा (Translation)

1 ﴿ (हे नबी!) कह दोः हे काफ़िरो!

2 ﴿ मैं उन (मूर्तियों) को नहीं पूजता, जिन्हें तुम पूजते हो।

3 ﴿ और न तुम उसे पूजते हो, जिसे मैं पूजता हूँ।

4 ﴿ और न मैं उसे पूजूँगा, जिसे तुम पूजते हो।

5 ﴿ और न तुम उसे पूजोगे, जिसे मैं पूजता हूँ।

6 ﴿ तुम्हारे लिए तम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।[1]
1. (1-6) पूरी सूरह का भावार्थ यह है कि इस्लाम में वही ईमान (विश्वास) मान्य है जो पूर्ण तौह़ीद (एकेश्वर्वाद) के साथ हो, अर्थात अल्लाह के अस्तित्व तथा गुणों और उस के अधिकारों में किसी को साझी न बनाया जाये। क़ुर्आन की शिक्षानुसार जो अल्लाह को नहीं मानता, और जो मानता है परन्तु उस के साथ देवी देवताओं को भी मानात है तो दोनों में कोई अन्तर नहीं। उस के विशेष गुणों को किसी अन्य में मानना उस को न मानने के ही बराबर है और दोनों ही काफ़िर हैं। (देखियेः उम्मुल किताब, मौलाना आज़ाद)

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