02. सूरह बकराह | Aayat 1-50

सूरह बकराह: संक्षिप्त परिचय

यह सूरह मदनी है, इस में 286 आयते है।

  • यह सूरह कुरान की सब से बडी सूरह है। इस के एक स्थान पर “बकरह “(अर्थात: गाय ) कि चर्चा आई है जिस के कारण इसे यह नाम दिया गाया है।
  • इस कि आयत 1 से 21 तक में इस पुस्तक का परिचय देते हुये यह बताया गया है कि किस प्रकार के लोग इस मार्गदर्शन को स्वीकार करेगे। और किस प्रकार के लोग इसे स्वीकार नहीं करेगे।
  • आयत 22 से 29 तक में सर्व साधारण लोगों को अपने पालनहार कि आज्ञा का पालन करने के निर्देश दिये गये है। और जो इस से विमुख हों उन के दुराचारी जीवन और उस के दुष्परिणाम को, और जो स्वीकार कर ले उन के सदाचारी जीवन और शुभपरिणाम को बताय गया है।
  • आयत 30 से 39 तक के अन्दर प्रथम मनुष्य आदम (अलैहिस्सलाम) की उत्पति और शैतान के विरोध की चर्चा करते हुये यह बताया गया है कि मनुष्य की रचना कैसे हुई , उसे क्यों पैदा किया गया, और उस की सफलता की राह क्या है ?
  • आयत 40 से 123 तक , बनी इस्रराईल को सम्बोधित किया गया है की यह अन्तिम पुस्तक और अन्तिम नबी वही है जिन की भविष्यवाणी और उन पर ईमान लाने का वचन तुम से तुम्हारी पुस्तक तौरात में लिया गया है। इस लिये उन पर ईमान लाओ। और इस आधार पर उन का विरोध न करो की वह तुम्हारे वंश से नहीं है। वह अरबों में पैदा हुये है, इसी के साथ उन के दुराचारों और अपराधों का वर्णन भी किया गया है|
  • आयत 124 से 167 तक आदरणीय इब्रराहीम (अलैहिस्सलाम ) के काबा का निर्माण करने तथा उन के धर्म को बताया गया है जो बनी इस्राईल तथा बनी ईसमाईल (अरबों) दोनों ही के परम पिता थे कि वह यहूदी, ईसाई या किसी अन्य धर्म के अनुयायी नहीं थे। उन का धर्म यही इस्लाम था। और उन्हों ने ही काबा बनाने के समय मक्का में एक नबी भेजने की प्रार्थना की थी जिसे अल्लाह ने पूरी किया। और प्रेषित मुहम्मद (सलल्लाहु अलैहि वसल्लम) को धर्म पुस्तक कुरान के साथ भेजा।
  • आयत 168 से 242 तक बहुत से धार्मिक , सामाजिक तथा परिवारिक विधान और नियम बताये गये है जो इस्लामी जीवन से जिन के कारण मनुष्य मार्गदर्शन पर स्थित रह सकता है।
  • आयत 243 से 283 तक के अन्दर मार्गदर्शन केंद्र काबा को मुशरिकों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिये जिहाद की प्रेरणा दी गई है तथा ब्याज को अवैध घोषित कर के आपस के व्यावहार को उचित रखने के निर्देश दिये गये है।
  • आयत 284 से 286 तक अन्तिम आयतो में उन लोगों के ईमान लाने की चर्चा की गई है जो किसी भेद – भाव के बिना अल्लाह के रसूलो पर ईमान लाये। इस लिये अल्लाह ने उन पर सीधी राह खोल दी। और उन्होंने ऐसी दुआये की जो उन के ईमान को उजागर करती है।
  • हदीस में है कि “जिस घर में सूरह बक़रह: पढ़ी जाये उस से शैतान भाग जाता है।” ( सहिह मुस्लिम -780 )

सूरह बकराह 2:1-10

Arabic Verse Transliteration

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम

الم

1

अलिफ़-लाम्-मीम्

ذَٰلِكَ الْكِتَابُ لَا رَيْبَ ۛ فِيهِ ۛ هُدًى لِّلْمُتَّقِينَِ

2

ज़ालिकल्किताबु ला रै-ब फीहि हुदल्-लिलमुत्तकीन

الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِالْغَيْبِ وَيُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ

3

अल्लज़ी-न युमिनू-न बिल-गैबि व युकीमूनस्सला-त व सिम्मा रजनाहुम् युन्फिकून

وَالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ وَبِالْآخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ

4

वल्लज़ी-न युमिनू-न बिमा उन्जि-ल इलै-क व मा उन्ज़ि-ल मिन् कब्लि-क व बिल्-आखि-रति हुम् यूकिनून

َأُولَـٰئِكَ عَلَىٰ هُدًى مِّن رَّبِّهِمْ ۖ وَأُولَـٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ

5

उलाइ-क अला हुदम्-मिर्रब्बिहिम् व उलाइ-क हुमुल्-मुफ्लिहून

إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا سَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ

6

इन्नल्लजी-न क-फरू सवाउन् अलैहिम् अ-अन्जर-तहुम् अम् लम् तुन्ज़िर्छम् ला युमिनून

خَتَمَ اللَّـهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَعَلَىٰ سَمْعِهِمْ ۖ وَعَلَىٰ أَبْصَارِهِمْ غِشَاوَةٌ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ

7

ख-तमल्लाहु अला कुलूबिहिम् व अला समिहिम् व अला अब्सारिहिम् गिशा-वतुंव- व लहुम् अजाबुन् अज़ीम

وَمِنَ النَّاسِ مَن يَقُولُ آمَنَّا بِاللَّـهِ وَبِالْيَوْمِ الْآخِرِ وَمَا هُم بِمُؤْمِنِينَ

8

व मिनन्नासि मय्यकू लु आमन्ना बिल्लाहि व बिल्यौमिल्-आखिरि व मा हुम् बिमुग्मिनीन

يُخَادِعُونَ اللَّـهَ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ

9

युखादिनल्ला-ह वल्लज़ी-न आमनू, व मा यख्दयू-न इल्ला अन्फुसहुम् व मा यश् रून

فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَهُمُ اللَّـهُ مَرَضًا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ

10

फी कुलू बिहिम् म-रजुन् फज़ा-दहुमुल्लाहु म-रजन् व लहुम् अज़ाबुन् अलीमुम् बिमा कानू यक्ज़िबून

तर्जुमा (Translation)

अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।

1 ﴿ अलिफ़, लाम, मीम।

2 ﴿ ये पुस्तक है, जिसमें कोई संशय (संदेह) नहीं, उन्हें सीधी डगर दिखाने के लिए है, जो (अल्लाह से) डरते हैं।

3 ﴿ जो ग़ैब (परोक्ष)[1] पर ईमान (विश्वास) रखते हैं तथा नमाज़ की स्थापना करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से दान करते हैं।
1. इस्लाम की परिभाषा में, अल्लाह, उस के फ़रिश्तों, उस की पुस्तकों, उस के रसूलों तथा अन्तदिवस (प्रलय) और अच्छे-बुरे भाग्य पर ईमान (विश्वास) को ‘ईमान बिल ग़ैब’ कहा गया है। (इब्ने कसीर)

4 ﴿ तथा जो आप (हे नबी!) पर उतारी गयी (पुस्तक क़ुर्आन) तथा आपसे पूर्व उतारी गयी (पुस्तकों)[1] पर ईमान रखते हैं तथा आख़िरत (परलोक)[2] पर भी विश्वास रखते हैं।
1. अर्थात तौरात, इंजील तथा अन्य आकाशीय पुस्तकों पर। 2.आख़िरत पर ईमान का अर्थ हैः प्रलय तथा उस के पश्चात् फिर जीवित किये जाने तथा कर्मों के ह़िसाब एवं स्वर्ग तथा नरक पर विश्वास करना।

5 ﴿ वही अपने पालनहार की बताई सीधी डगर पर हैं तथा वही सफल होंगे।

6 ﴿ वास्तव[1] में, जो काफ़िर (विश्वासहीन) हो गये, (हे नबी!) उन्हें आप सावधान करें या न करें, वे ईमान नहीं लायेंगे।
1. इस से अभिप्राय वह लोग हैं, जो सत्य को जानते हुए उसे अभिमान के कारण नकार देते हैं।

7 ﴿ अल्लाह ने उनके दिलों तथा कानों पर मुहर लगा दी है और उनकी आंखों पर पर्दे पड़े हैं तथा उन्हीं के लिए घोर यातना है।

8 ﴿ और[1] कुछ लोग कहते हैं कि हम अल्लाह तथा आख़िरत (परलोक) पर ईमान ले आये, जबकि वे ईमान नहीं रखते।
1. प्रथम आयतों में अल्लाह ने ईमान वालों की स्थिति की चर्चा करने के पश्चात् दो आयतों में काफ़िरों की दशा का वर्णन किया है। और अब उन मुनाफ़िक़ों (दुविधावादियों) की दशा बता रहा है, जो मुख से तो ईमान की बात कहते हैं, लेकिन दिल से अविश्वास रखते हैं।

9 ﴿ वे अल्लाह तथा जो ईमान लाये, उन्हें धोखा देते हैं। जबकि वे स्वयं अपने-आप को धोखा देते हैं, परन्तु वे इसे समझते नहीं।

10 ﴿ उनके दिलों में रोग (दुविधा) है, जिसे अल्लाह ने और अधिक कर दिया और उनके लिए झूठ बोलने के कारण दुखदायी यातना है।


सूरह बकराह 2:11-20

Arabic Verse Transliteration

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ

11

व इज़ा की-ल लहुम् ला तुफिसदू फिल्अर्जि कालू इन्नमा ननु मुस्लिहून

أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلَـٰكِن لَّا يَشْعُرُونَ

12

अला इन्नहुम् हुमुल्-मुफ्सिदू-न व ला किल्ला यश्शुरून

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا كَمَا آمَنَ النَّاسُ قَالُوا أَنُؤْمِنُ كَمَا آمَنَ السُّفَهَاءُ ۗ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ السُّفَهَاءُ وَلَـٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ

13

व इज़ा की-ल लहुभु आमिनू कमा आ-मनन्नासु कालू अनुभूमिनु कमा आ-मनस्सु-फ़हा-उ, अला इन्नहुम् हुमुस्सु-फहा-उ व लाकिल्ला यअलमून

وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا إِلَىٰ شَيَاطِينِهِمْ قَالُوا إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِئُونَ

14

व इजा लकुल्लज़ी-न आमनू कालू आमन्ना व इज़ा खलौ इला शयातीनिहिम् कालू इन्ना म-अकुम् इन्नमा नहनु मुस्तज़िऊन

اللَّـهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ

15

अल्लाहु यस्तजिउ बिहिम् व यमुद्बुहुम् फी तुयानिहिम् यञ्जमहून

أُولَـٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَىٰ فَمَا رَبِحَت تِّجَارَتُهُمْ وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ

16

उला-इकल्लज़ीन- -श्त-रवुज्ज़ला-ल-त बिल्हुदा फमा रबिहत्-तिजारतुहुम् व मा कानू मुह्तदीन

مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ الَّذِي اسْتَوْقَدَ نَارًا فَلَمَّا أَضَاءَتْ مَا حَوْلَهُ ذَهَبَ اللَّـهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ فِي ظُلُمَاتٍ لَّا يُبْصِرُونَ

17

भ-सलुहुम् क-म-सलिलू-लज़िस्तौक-द नारन् फ-लम्मा अज़ा-अत् मा हौलहू ज़-हबल्लाहु बिनूरिहिम् व त-र-कहुम् फी जुलुमातिलू-ला युब्सिरून

صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَ

18

सम्मुम्-बुक्मुन् अम्युन् फहुम् ला यर्जिन

أَوْ كَصَيِّبٍ مِّنَ السَّمَاءِ فِيهِ ظُلُمَاتٌ وَرَعْدٌ وَبَرْقٌ يَجْعَلُونَ أَصَابِعَهُمْ فِي آذَانِهِم مِّنَ الصَّوَاعِقِ حَذَرَ الْمَوْتِ ۚ وَاللَّـهُ مُحِيطٌ بِالْكَافِرِينَ

19

औ क-सय्यिबिम्मिनस्समा-इ फीहि जुलुमातु-व – र दुव्-व बर्कुन्, यअलू-न असाबि-अहुम् फी आजानिहिम् मिनस्सवाअिकि ह-ज़रल्मौति वल्लाहु मुहीतुम्-बिल्काफिरीन

يَكَادُ الْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَارَهُمْ ۖ كُلَّمَا أَضَاءَ لَهُم مَّشَوْا فِيهِ وَإِذَا أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُوا ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّـهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَارِهِمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

20

यकादुल्ब यस्तफु अब्सा-रहुम्, कुल्लमा अज़ा-अ लहुम् मशौ फीहि व इज़ा| अगल-म अलैहिम् काम, व लो शा-अल्लाहु ल-ज़-ह-ब बिसमिहिम् व अब्सारिहिम्, इन्नल्ला-हें अला कुल्लि शैइन् कदीर

तर्जुमा (Translation)

11 ﴿ और जब उनसे कहा जाता है कि धरती में उपद्रव न करो, तो कहते हैं कि हम तो केवल सुधार करने वाले हैं।

12 ﴿ सावधान! वही लोग उपद्रवी हैं, परन्तु उन्हें इसका बोध नहीं।

13 ﴿ और[1] जब उनसे कहा जाता है कि जैसे और लोग ईमान लाये, तुमभी ईमान लाओ, तो कहते हैं कि क्या मूर्खों के समान हमभी विश्वास कर लें? सावधान! वही मूर्ख हैं, परन्तु वे जानते नहीं।
1. यह दशा उन मुनाफ़िक़ों की है, जो अपने स्वार्थ के लिये मुसलमान हो गये, परन्तु दिल से इन्कार करते रहे।

14 ﴿ तथा जब वे ईमान वालों से मिलते हैं, तो कहते हैं कि हम ईमान लाये और जब अकेले में अपने शैतानों (प्रमुखों) के साथ होते हैं, तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं। हम तो मात्र परिहास कर रहे हैं।

15 ﴿ अल्लाह उनसे परिहास कर रहा है तथा उन्हें, उनके कुकर्मों में बहकने का अवसर दे रहा है।

16 ﴿ ये वे लोग हैं, जिन्होंने सीधी डगर (सुपथ) के बदले गुमराही (कुपथ) खरीद ली। परन्तु उनके व्यापार में लाभ नहीं हुआ और न उन्होंने सीधी डगर पायी।

17 ﴿ उनकी[1] दशा उनके जैसी है, जिन्होंने अग्नि सुलगायी और जब उनके आस-पास उजाला हो गया, तो अल्लाह ने उनका उजाला छीन लिया तथा उन्हें ऐसे अन्धेरों में छोड़ दिया, जिनमें उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता।
1. यह दशा उन की है जो संदेह तथा दुविधा में पड़े रह गये। कुछ सत्य को उन्हों ने स्वीकार भी किया, फिर भी अविश्वास के अंधेरों ही में रह गये।

18 ﴿ वे गूँगे, बहरे, अंधे हैं। अतः अब वे लौटने वाले नहीं।

19 ﴿ अथवा[1] (उनकी दशा) आकाश की वर्षा के समान है, जिसमें अंधेरे और कड़क तथा विद्धुत हो, वे कड़क के कारण, मृत्यु के भय से, अपने कानों में उंगलियाँ डाल लेते हैं और अल्लाह, काफ़िरों को अपने नियंत्रण में लिए हुए है।
1. यह दुसरी उपमा भी दूसरे प्रकार के मुनाफ़िक़ों की दशा की है।

20 ﴿ विद्धुत उनकी आँखों को उचक लेने के समीप हो जाती है। जब उनके लिए चमकती है, तो उसके उजाले में चलने लगते हैं और जब अंधेरा हो जाता है, तो खड़े हो जाते हैं और यदि अल्लाह चाहे, तो उनके कानों को बहरा और उनकी आँखों का अंधा कर दे। निश्चय अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।

21 ﴿ हे लोगो! केवल अपने उस पालनहार की इबादत (वंदना) करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले वाले लोगों को पैदा किया, इसी में तुम्हारा बचाव[1] है।
1. अर्थात संसार में कुकर्मों तथा प्रलोक की यातना से।

22 ﴿ जिसने धरती को तुम्हारे लिए बिछौना तथा गगन को छत बनाया और आकाश से जल बरसाया, फिर उससे तुम्हारे लिए प्रत्येक प्रकार के खाद्य पदार्थ उपजाये, अतः, जानते हुए[1] भी उसके साझी न बनाओ।
1. अर्थात जब यह जानते हो कि तुम्हारा उत्पत्तिकार तथा पालनहार अल्लाह के सिवा कोई नहीं, तो वंदना भी उसी एक की करो, जो उत्पत्तिकार तथा पूरे विश्व का व्यवस्थापक है।

23 ﴿ और यदि तुम्हें उसमें कुछ संदेह हो, जो (अथवा क़ुर्आन) हमने अपने भक्त पर उतारा है, तो उसके समान कोई सूरह ले आओ? और अपने समर्थकों को भी, जो अल्लाह के सिवा हों, बुला लो, यदि तुम सच्चे[1] हो।
1. आयत का भावार्थ यह है कि नबी के सत्य होने का प्रमाण आप पर उतारा गया क़ुर्आन है। यह उन की अपनी बनाई बात नहीं है। क़ुर्आन ने ऐसी चुनौती अन्य आयतों में भी दी है। (देखियेः सूरह क़सस, आयतः49, इस्रा, आयतः88, हूद, आयतः13, और यूनुस, आयतः38)

24 ﴿ और यदि ये न कर सको तथा कर भी नहीं सकोगे, तो उस अग्नि (नरक) से बचो, जिसका ईंधन मानव तथा पत्थर होंगे।

25 ﴿ (हे नबी!) उन लोगों को शुभ सूचना दो, जो ईमान लाये तथा सदाचार किये कि उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनमें नहरें बह रही होंगी। जब उनका कोई भी फल उन्हें दिया जायेगा, तो कहेंगेः ये तो वही है, जो इससे पहले हमें दिया गया और उन्हें समरूप फल दिये जायेंगे तथा उनके लिए उनमें निर्मल पत्नियाँ होंगी और वे उनमें सदावासी होंगे।

26 ﴿ अल्लाह,[1] मच्छर अथवा उससे तुच्छ चीज़ से उपमा (मिसाल) देने से नहीं लज्जाता। जो ईमान लाये, वे जानते हैं कि ये उनके पालनहार की ओर से उचित है और जो काफ़िर (विश्वासहीन) हो गये, वे कहते हैं कि अल्लाह ने इससे उपमा देकर क्या निश्चय किया है? अल्लाह इससे बहुतों को गुमराह (कुपथ) करता है और बहुतों को मार्गदर्शन देता है तथा जो अवज्ञाकारी हैं, उन्हीं को कुपथ करता है।
1. जब अल्लाह ने मुनाफ़िक़ों की दो उपमा दी, तो उन्हों ने कहा कि अल्लाह ऐसी तुच्छ उपमा कैसे दे सकता है? इसी पर यह आयत उतरी। (देखिये तफ़्सीर इब्ने कसीर)

27 ﴿ जो अल्लाह से पक्का वचन करने के बाद उसे भंग कर देते हैं तथा जिसे अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया, उसे तोड़ते हैं और धरती में उपद्रव करते हैं, वही लोग क्षति में पड़ेंगे।

28 ﴿ तुम अल्लाह का इन्कार कैसे करते हो? जबकि पहले तुम निर्जीव थे, फिर उसने तुम्हें जीवन दिया, फिर तुम्हें मौत देगा, फिर तुम्हें (परलोक में) जीवन प्रदान करेगा, फिर तुम उसी की ओर लौटाये[1] जाओगे!
1. अर्थात परलोक में अपने कर्मों का फल भोगने के लिये।

29 ﴿ वही है, जिसने धरती में जो भी है, सबको तुम्हारे लिए उत्पन्न किया, फिर आकाश की ओर आकृष्ट हुआ, तो बराबर सात आकाश बना दिये और वह प्रत्येक चीज़ का जानकार है।

30 ﴿ और (हे नबी! याद करो) जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं धरती में एक ख़लीफ़ा[1] बनाने जा रहा हूँ। वे बोलेः क्या तू उसमें उसे बनायेग, जो उसमें उपद्रव करेगा तथा रक्त बहायेगा? जबकि हम तेरी प्रशंसा के साथ तेरे गुण और पवित्रता का गान करते हैं! (अल्लाह) ने कहाः जो मैं जानता हूँ, वह तुम नहीं जानते।
1. ख़लीफ़ा का अर्थ हैः स्थानापन्न, अर्थात ऐसा जीव जिस का वंश हो और एक दूसरे का स्थान ग्रहण करे। (तफ़्सीर इब्ने कसीर)

31 ﴿ और उसने आदम[1] को सभी नाम सिखा दिये, फिर उन्हें फ़रिश्तों के समक्ष प्रस्तुत किया और कहाः मुझे इनके नाम बताओ, यदि तुम सच्चे हो!
1. आदम प्रथम मनु का नाम।

32 ﴿ सबने कहाः तू पवित्र है। हम तो उतना ही जानते हैं, जितना तूने हमें सिखाया है। वास्तव में, तू अति ज्ञानी तत्वज्ञ[1] है।
1. तत्वज्ञः अर्थात जो भेद तथा रहस्य को जानता हो।

33 ﴿ (अल्लाह ने) कहाः हे आदम! इन्हें इनके नाम बताओ और आदम ने जब उनके नाम बता दिये, तो (अल्लाह ने) कहाःक्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मैं आकाशों तथा धरती की क्षिप्त बातों को जानता हूँ तथा तुम जो बोलते और मन में रखते हो, सब जानता हूँ?

34 ﴿ और जब हमने फ़रिश्तों से कहाः आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया, उसने इन्कार तथा अभिमान किया और काफ़िरों में से हो गया।

35 ﴿ और हमने कहाः हे आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी स्वर्ग में रहो तथा इसमें से जिस स्थान से चाहो, मनमानी खाओ और इस वृक्ष के समीप न जाना, अन्यथा अत्याचारियों में से हो जाओगे।

36 ﴿ तो शैतान ने दोनों को उससे भटका दिया और जिस (सुख) में थे, उससे उन्हें निकाल दिया और हमने कहाः तुम सब उससे उतरो, तुम एक-दूसरे के शत्रु हो और तुम्हारे लिए धरती में रहना तथा एक निश्चित अवधि[1] तक उपभोग्य है।
1. अर्थात अपनी निश्चित आयु तक सांसारिक जीवन के संसाधन से लाभान्वित होना है।

37 ﴿ फिर आदम ने अपने पालनहार से कुछ शब्द सीखे, तो उसने उसे क्षमा कर दिया। वह बड़ा क्षमी दयावान्[1] है।
1. आयत का भावार्थ यह है कि आदम ने कुछ शब्द सीखे और उन के द्वारा क्षमा याचना की, तो अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया। आदम के उन शब्दों की व्याख्या भाष्यकारों ने इन शब्दों से की हैः “आदम तथा ह़व्वा दोनों ने कहाः हे हमारे पालनहार! हम ने अपने प्राणों पर अत्याचार कर लिया और यदि तू ने हमें क्षमा और हम पर दया नहीं की, तो हम क्षतिग्रस्तों में हो जायेंगे।” (सूरह आराफ, आयतः23)

38 ﴿ हमने कहाः इससे सब उतरो, फिर यदि तुम्हारे पास मेरा मार्गदर्शन आये, तो जो मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे, उनके लिए कोई डर नहीं होगा और न वे उदासीन होंगे।

39 ﴿ तथा जो अस्वीकार करेंगे और हमारी आयतों को मिथ्या कहेंगे, तो वही नारकी हैं और वही उसमें सदावासी होंगे।

40 ﴿ हे बनी इस्राईल![1] मेरे उस पुरस्कार को याद करो, जो मैंने तुमपर किया तथा मुझसे किया गया वचन पूरा करो, मैं तुम्हें अपना दिया वचन पूरा करूँगा तथा मुझी से डरो।[2]
1. इस्राईल आदरणीय इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पौत्र याक़ूब अलैहिस्सलाम की उपाधि है। इस लिये उन की संतान को बनी इस्राईल कहा गया है। यहाँ उन्हें यह प्रेरणा दी जा रही है कि क़ुर्आन तथा अन्तिम नबी को मान लें, जिस का वचन उन की पुस्तक “तौरात” में लिया गया है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दो पुत्र इस्माईल तथा इस्ह़ाक़ हैं। इस्ह़ाक़ की संतान से बहुत से नबी आये, परन्तु इस्माईल अलैहिस्सलाम के गोत्र से केवल अन्तिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आये। 2. अर्थात वचन भंग करने से।

41 ﴿ तथा उस (क़ुर्आन) पर ईमान लाओ, जो मैंने उतारा है, वह उसका प्रमाणकारी है, जो तुम्हारे पास[1] है और तुम, सबसे पहले इसके निवर्ती न बन जाओ तथा मेरी आयतों को तनिक मूल्य पर न बेचो और केवल मुझी से डरो।
1. अर्थात धर्म-पुस्तक तौरात।

42 ﴿ तथा सत्य को असत्य से न मिलाओ और न सत्य को जानते हुए छुपाओ।[1]
1. अर्थात अन्तिम नबी के गुणों को, जो तुम्हारी पुस्तकों में वर्णित किये गये हैं।

43 ﴿ तथा नमाज़ की स्थापना करो और ज़कात दो तथा झुकने वालों के साथ झुको (रुकू करो)

44 ﴿ क्या तुम, लोगों को सदाचार का आदेश देते हो और अपने-आपको भूल जाते हो? जबकि तुम पुस्तक (तौरात) का अध्ययन करते हो! क्या तुम समझ नहीं रखते?[1]
1. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक ह़दीस (कथन) में इस का दुष्परिणाम यह बताया गया है कि प्रलय के दिन एक व्यक्ति को लाया जायेगा, और नरक में फेंक दिया जायेगा। उस की अंतड़ियाँ निकल जायेंगी, और वह उन को ले कर नरक में ऐसे फिरेगा, जैसे गधा चक्की के साथ फिरता है। तो नारकी उस के पास जायेंगे तथा कहेंगे कि तुम पर यह क्या आपदा आ पड़ी है? तुम तो हमें सदाचार का आदेश देते, तथा दुराचार से रोकते थे! वह कहेगा कि मैं तुम्हें सदाचार का आदेश देता था, परन्तु स्वयं नहीं करता था। तथा दुराचार से रोकता था और स्वयं नहीं रुकता था। (सह़ीह़ बुखारी, ह़दीस संख्याः3267)

45 ﴿ तथा धैर्य और नमाज़ का सहारा लो, निश्चय नमाज़ भारी है, परन्तु विनीतों पर (भारी नहीं)[1]
1. भावार्थ यह है कि धैर्य तथा नमाज़ से अल्लाह की आज्ञा के अनुपालन तथा सदाचार की भावना उत्पन्न होती है।

46 ﴿ जो समझते हैं कि उन्हें अपने पालनहार से मिलना है और उन्हें फिर उसी की ओर (अपने कर्मों का फल भोगने के लिए) जाना है।

47 ﴿ हे बनी इस्राईल! मेरे उस पुरस्कार को याद करो, जो मैंने तुमपर किया और ये कि तुम्हें संसार वासियों पर प्रधानता दी थी।

48 ﴿ तथा उस दिन से डरो, जिस दिन कोई किसी के कुछ काम नहीं आयेगा और न उसकी कोई अनुशंसा (सिफ़ारिश) मानी जायेगी और न उससे कोई अर्थदण्ड लिया जायेगा और न उन्हें कोई सहायता मिल सकेगी।

49 ﴿ तथा (वह समय याद करो) जब हमने तुम्हें फ़िरऔनियों[1] से मुक्ति दिलाई। वे तुम्हें कड़ी यातना दे रहे थे; वे तुम्हारे पुत्रों को वध कर रहे थे तथा तुम्हारी नारियों को जीवित रहने देते थे। इसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से कड़ी परीक्षा थी।
1. फ़िरऔन मिस्र के शासकों की उपाधि होती थी।

50 ﴿ तथा (याद करो) जब हमने तुम्हारे लिए सागर को फाड़ दिया, फिर तुम्हें बचा लिया और तुम्हारे देखते-देखते फ़िरऔनियों को डुबो दिया।

Surah Baqrah : All Parts

1-50 | 51-100 | 101-150 | 151-200 | 201-250 | 251-286

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