2 Surah Baqarah Hindi Arabic

सूरह बकराह 2:201-286

Surah Baqrah : All Parts

1-100 | 101-200 | 201-286

Arabic Verse
Transliteration
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بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम

अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।

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وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ ﴾ 201 ﴿

तथा उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो ये कहते हैं कि हमारे पालनहार! हमें संसार में भलाई दे तथा परलोक में भी भलाई दे और हमें नरक की यातना से सुरक्षित रख।

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أُولَـٰئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّمَّا كَسَبُوا ۚ وَاللَّـهُ سَرِيعُ الْحِسَابِ ﴾ 202 ﴿

इन्हीं को इनकी कमाई के कारण भाग मिलेगा और अल्लाह शीघ्र ह़िसाब चुकाने बाला है।

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وَاذْكُرُوا اللَّـهَ فِي أَيَّامٍ مَّعْدُودَاتٍ ۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ لِمَنِ اتَّقَىٰ ۗ وَاتَّقُوا اللَّـهَ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴾ 203 ﴿

तथा इन गिनती[1] के कुछ दिनों में अल्लाह को स्मरण (याद) करो, फिर जो व्यक्ति शीघ्रता से दो ही दिन में (मिना से) चल[2] दे, उसपर कोई दोष नहीं और जो विलम्ब[3] करे, उसपर भी कोई दोष नहीं, उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह से डरा तथा तुम अल्लाह से डरते रहो और ये समझ लो कि तुम उसी के पास प्रलय के दिन एकत्र किए जाओगो। 1. गिनती के कुछ दिनों से अभिप्रेत ज़ुलह़िज्जा मास की 11, 12, और 13 तारीख़ें हैं। जिन को "अय्यामे तश्रीक़" कहा जाता है। 2. अर्थात 12 ज़ुलह़िज्जा को ही सूर्यास्त के पहले कंकरी मारने के पश्चात् चल दे। 3. बिलम्ब करे, अर्थात मिना में रात बिताये। और तेरह ज़ुलह़िज्जह को कंकरी मारे, फिर मिना से निकल जाये।

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وَمِنَ النَّاسِ مَن يُعْجِبُكَ قَوْلُهُ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَيُشْهِدُ اللَّـهَ عَلَىٰ مَا فِي قَلْبِهِ وَهُوَ أَلَدُّ الْخِصَامِ ﴾ 204 ﴿

(हे नबी!) लोगों[1] में ऐसा व्यक्ति भी है, जिसकी बात आपको सांसारिक विषय में भाती है तथा जो कुछ उसके दिल में है, वह उसपर अल्लाह को साक्षी बनाता है, जबकि बह बड़ा झगड़ालू है। 1. अर्थात मुनाफ़िक़ों (दुविधवादियों) में।

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وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِي الْأَرْضِ لِيُفْسِدَ فِيهَا وَيُهْلِكَ الْحَرْثَ وَالنَّسْلَ ۗ وَاللَّـهُ لَا يُحِبُّ الْفَسَادَ ﴾ 205 ﴿

तथा जब वह आपके पास से जाता है, तो धरती में उपद्रव मचाने का प्रयास करता है और खेती तथा पशुओं का विनाश करता है और अल्लाह उपद्रव से प्रेम नहीं करता।

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وَإِذَا قِيلَ لَهُ اتَّقِ اللَّـهَ أَخَذَتْهُ الْعِزَّةُ بِالْإِثْمِ ۚ فَحَسْبُهُ جَهَنَّمُ ۚ وَلَبِئْسَ الْمِهَادُ ﴾ 206 ﴿

तथा जब उससे कहा जाता है कि अल्लाह से डर, तो अभिमान उसे पाप पर उभार देता है। अतः उसके (दण्ड) के लिए नरक काफ़ी है और वह बहुत बुरा बिछौना है।

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وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّـهِ ۗ وَاللَّـهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ ﴾ 207 ﴿

तथा लोगों में ऐसा व्यक्ति भी है, जो अल्लाह की प्रसन्नता की खोज में अपना प्राण बेच[1] देता है और अल्लाह अपने भक्तों के लिए अति करुणामय है। 1. अर्थात उस की राह में और उस की आज्ञा के अनुपालन द्वारा।

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يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا ادْخُلُوا فِي السِّلْمِ كَافَّةً وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ ۚ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴾ 208 ﴿

हे ईमान वालो! तुम सर्वथा इस्लाम में प्रवेश[1] कर जाओ और शैतान की राहों पर मत चलो, निश्चय वह तुम्हारा खुला शत्रु है। 1. अर्थात इस्लाम के पूरे संविधान का अनुपालन करो।

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فَإِن زَلَلْتُم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَتْكُمُ الْبَيِّنَاتُ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴾ 209 ﴿

फिर यदि तुम खुले तर्कों (दलीलों)[1] के आने के पश्चात विचलित हो गये, तो जान लो कि अल्लाह प्रभुत्वशाली तथा तत्वज्ञ[2] है। 1. खुले तर्कों से अभिप्राय क़ुर्आन और सुन्नत है। 2. अर्थात तथ्य को जानता और प्रत्येक वस्तु को उस के उचित स्थान पर रखता है।

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هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا أَن يَأْتِيَهُمُ اللَّـهُ فِي ظُلَلٍ مِّنَ الْغَمَامِ وَالْمَلَائِكَةُ وَقُضِيَ الْأَمْرُ ۚ وَإِلَى اللَّـهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ ﴾ 210 ﴿

क्या (इन खुले तर्कों के आ जाने के पश्चात्) वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उनके समक्ष अल्लाह तथा फ़रिश्ते बादलों के छत्र में आ जायें और निर्णय ही कर दिया जाये? और सभी विषय अल्लाह ही की ओर फेरे[1] जायेंगे। 1. अर्थात सब निर्णय प्रलोक में वही करेगा।

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سَلْ بَنِي إِسْرَائِيلَ كَمْ آتَيْنَاهُم مِّنْ آيَةٍ بَيِّنَةٍ ۗ وَمَن يُبَدِّلْ نِعْمَةَ اللَّـهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُ فَإِنَّ اللَّـهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ ﴾ 211 ﴿

बनी इस्राईल से पूछो कि हमने उन्हें कितनी खुली निशानियाँ दीं? इसपर भी जिसने अल्लाह की अनुकम्पा को, उसके अपने पास आ जाने के पश्चात् बदल दिया, तो अल्लाह की यातना भी बहुत कड़ी है।

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زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا ۘ وَالَّذِينَ اتَّقَوْا فَوْقَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ وَاللَّـهُ يَرْزُقُ مَن يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ ﴾ 212 ﴿

काफ़िरों के लिए सांसारिक जीवन शोभनीय (मनोहर) बना दिया गया है तथा जो ईमान लाये ये उनका उपहास[1] करते हैं और प्रलय के दिन अल्लाह के आज्ञाकारी उनसे उच्च स्थान[1] पर रहेंगे तथा अल्लाह जिसे चाहे, अगणित आजीविका प्रदान करता है। 1. अर्थात उन की निर्धनता तथा दरिद्रता के कारण। 2. आयत का भावार्थ यह है कि काफ़िर संसारिक धन धान्य ही को महत्व देते हैं। जब कि परलोक की सफलता जो सत्धर्म और सत्कर्म पर आधारित है, वही सब से बड़ी सफलता है।

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كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّـهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا الَّذِينَ أُوتُوهُ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا لِمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ ۗ وَاللَّـهُ يَهْدِي مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴾ 213 ﴿

(आरंभ में) सभी मानव एक ही (स्वाभाविक) सत्धर्म पर थे। (फिर विभेद हुआ) तो अल्लाह ने नबियों को शुभ समाचार सुनाने[1] और (अवज्ञा) से सचेत करने के लिए भेजा और उनपर सत्य के साथ पुस्तक उतारी, ताकि वे जिन बातों में विभेद कर रहे हैं, उनका निर्णय कर दे। और आपकी दुराग्रह के कारण उन्होंने ही विभेद किया, जिन्हें (विभेद निवारण के लिए) ये पुस्तक दी गयी। (अल्बत्ता) जो ईमान लाये, अल्लाह ने उस विभेद में उन्हें अपनी अनुमति से सत्पथ दर्शा दिया और अल्लाह जिसे चाहे, सत्पथ दर्शा देता है। 1. आयत 213 का सारांश यह है कि सभी मानव आरंभिक युग में स्वाभाविक जीवन व्यतीत कर रहे थे। फिर आपस में विभेद हुआ तो अत्याचार और उपद्रव होने लगा। तब अल्लाह की ओर से नबी आने लगे ताकि सब को एक सत्धर्म पर कर दें। और आकाशीय पुस्तकें भी इसी लिये अवतरित हुयीं कि विभेद में निर्णय कर के सब को एक मूल सत्धर्म पर लगायें। परन्तु लोगों की दुराग्रह और आपसी द्वेष विभेद का कारण बने रहे। अन्यथा सत्धर्म (इस्लाम) जो एकता का आधार है, वह अब भी सुरक्षित है। और जो व्यक्ति चाहेगा तो अल्लाह उस के लिये यह सत्य दर्शा देगा। परन्तु यह स्वयं उस की इच्छा पर आधारित है।

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أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِكُم ۖ مَّسَّتْهُمُ الْبَأْسَاءُ وَالضَّرَّاءُ وَزُلْزِلُوا حَتَّىٰ يَقُولَ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ مَتَىٰ نَصْرُ اللَّـهِ ۗ أَلَا إِنَّ نَصْرَ اللَّـهِ قَرِيبٌ ﴾ 214 ﴿

क्या तुमने समझ रखा है कि यूँ ही स्वर्ग में प्रवेश कर जाओगे, ह़ालाँकि अभी तक तुम्हारी वह दशा नहीं हुई, जो तुमसे पूर्व के ईमान वालों की हुई? उन्हें तंगियों तथा आपदाओं ने घेर लिया और वे झंझोड़ दिये गये, यहाँ तक कि रसूल और जो उसपर ईमान लाये, गुहारने लगे कि अल्लाह की सहायता कब आयेगी? (उस समय कहा गयाः)सुन लो! अल्लाह की सहायता समीप[1] है। 1. आयत का भावार्थ यह है कि ईमान के लिये इतना ही बस नहीं कि ईमान को स्वीकार कर लिया तथा स्वर्गीय हो गये। इस के लिये यह भी आवश्यक है कि उन सभी परीक्षाओं में स्थिर रहो जो तुम से पूर्व सत्य के अनुयायियों के सामने आयीं, और तुम पर भी आयेंगी।

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يَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ ۖ قُلْ مَا أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍ فَلِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّـهَ بِهِ عَلِيمٌ ﴾ 215 ﴿

(हे नबी!) वे आपसे प्रश्न करते हैं कि कैसे व्यय (ख़र्च) करें? उनसे कह दीजिये कि जो भी धन तुम ख़र्च करो, तो अपने माता-पिता, समीपवर्तियों, अनाथों, निर्धनों तथा यात्रियों (को दो)। तथा जो भी भलाई तुम करते हो, उसे अल्लाह भलि-भाँति जानता है।

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كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تُحِبُّوا شَيْئًا وَهُوَ شَرٌّ لَّكُمْ ۗ وَاللَّـهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴾ 216 ﴿

(हे ईमान वालो!) तुमपर युध्द करना अनिवार्य कर दिया गया है, ह़लाँकि वह तुम्हें अप्रिय है। हो सकता है कि कोई चीज़ तुम्हें अप्रिय हो और वही तुम्हारे लिए अच्छी हो और इसी प्रकार सम्भव है कि कोई चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है और तुम नहीं[1] जानते। 1. आयत का भावार्थ यह है कि युध्द ऐसी चीज़ नहीं, जो तुम्हें प्रिय हो। परन्तु जब ऐसी स्थिति आ जाये कि शत्रु इस लिये आक्रमण और अत्याचार करने लगे कि लोगों ने अपने पूर्वजों की आस्था परम्परी त्याग कर सत्य को अपना लिया है, जैसा कि इस्लाम के आरंभिक युग में हुआ, तो सत्धर्म की रक्षा के लिये युध्द करना अनिवार्य हो जाता हो।

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يَسْأَلُونَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ ۖ قُلْ قِتَالٌ فِيهِ كَبِيرٌ ۖ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ اللَّـهِ وَكُفْرٌ بِهِ وَالْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِ مِنْهُ أَكْبَرُ عِندَ اللَّـهِ ۚ وَالْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ الْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَاتِلُونَكُمْ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ اسْتَطَاعُوا ۚ وَمَن يَرْتَدِدْ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌ فَأُولَـٰئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۖ وَأُولَـٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ﴾ 217 ﴿

(हे नबी!) वे[1] आपसे प्रश्न करते हैं कि सम्मानित मास में युध्द करना कैसा है? आप उनसे कह दें कि उसमें युध्द करना घोर पाप है, परन्तु अल्लाह की राह से रोकना, उसका इन्कार करना, मस्जिदे ह़राम से रोकना और उसके निवासियों को उससे निकालना, अल्लाह के समीप उससे भी घोर पाप है तथा फ़ितना (सत्धर्म से विचलाना) हत्या से भी भारी है। और वे तो तुमसे युध्द करते ही जायेंगे, यहाँ तक कि उनके बस में हो, तो तुम्हें तुम्हारे धर्म से फेर दें और तुममें से जो व्यक्ति अपने धर्म (इस्लाम) से फिर जायेगा, फिर कुफ़्र पर ही उसकी मौत होगी, ऐसों का किया-कराया, संसार तथा परलोक में व्यर्थ हो जायेगा तथा वही नारकी हैं और वे उसमें सदावासी होंगे। 1. अर्थात मिश्रणवादी।

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إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّـهِ أُولَـٰئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ اللَّـهِ ۚ وَاللَّـهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴾ 218 ﴿

(इसके विपरीत) जो लोग ईमान लाये, हिजरत[1] की तथा अल्लाह की राह में जिहाद किया, वास्तव में, वही अल्लाह की दया की आशा रखते हैं तथा अल्लाह अति क्षमाशील और बहुत दयालु है। 1. हिजरत का अर्थ हैः अल्लाह के लिये स्वदेश त्याग देना।

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يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ ۖ قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَا أَكْبَرُ مِن نَّفْعِهِمَا ۗ وَيَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ قُلِ الْعَفْوَ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّـهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ ﴾ 219 ﴿

(हे नबी!) वे आपसे मदिरा और जुआ के विषय में प्रश्न करते हैं। आप बता दें कि इन दोनों में बड़ा पाप है तथा लोगों का कुछ लाभ भी है; परन्तु उनका पाप उनके लाभ से अधिक[1] बड़ा है। तथा वे आपसे प्रश्न करते हैं कि अल्लाह की राह में क्या ख़र्च करें? उनसे कह दीजिये कि जो अपनी आवश्यक्ता से अधिक हो। इसी प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए आयतों (धर्मादेशों) को उजागर करता है, ताकि तुम सोच-विचार करो। 1. अर्थात अपने लोक परलोक के लाभ के विषय में विचार करो, और जिस में अधिक हानि हो उसे त्याग दो, यद्यपि उस में थोड़ा लाभ ही क्यों न हो। यह मदिरा और जुआ से संबंधित प्रथम आदेश है। आगामी सूरह निसा आयत 43 तथा सूरह माइदह आयत 90 में इन के विषय में अन्तिम आदेश आ रहा है।

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فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۗ وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَىٰ ۖ قُلْ إِصْلَاحٌ لَّهُمْ خَيْرٌ ۖ وَإِن تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ ۚ وَاللَّـهُ يَعْلَمُ الْمُفْسِدَ مِنَ الْمُصْلِحِ ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّـهُ لَأَعْنَتَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴾ 220 ﴿

दुनिया और आख़रित दोनो में और वे आपसे अनाथों के विषय में प्रश्ण करते हैं। उनसे कह दीजिए कि जिस बात में उनका सुधार हो वही सबसे अच्छी है। यदि तुम उनसे मिलकर रहो, तो वे तुम्हारे भाई ही हैं और अल्लाह जानता है कि कौन सुधारने और कौन बिगाड़ने वाला है और यदि अल्लाह चाहता, तो तुमपर सख्ती[1] कर देता। वास्तव में, अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वज्ञ है। 1. उन का खाना पीना अलग करने का आदेश दे कर।

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وَلَا تَنكِحُوا الْمُشْرِكَاتِ حَتَّىٰ يُؤْمِنَّ ۚ وَلَأَمَةٌ مُّؤْمِنَةٌ خَيْرٌ مِّن مُّشْرِكَةٍ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ ۗ وَلَا تُنكِحُوا الْمُشْرِكِينَ حَتَّىٰ يُؤْمِنُوا ۚ وَلَعَبْدٌ مُّؤْمِنٌ خَيْرٌ مِّن مُّشْرِكٍ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ ۗ أُولَـٰئِكَ يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَاللَّـهُ يَدْعُو إِلَى الْجَنَّةِ وَالْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِ ۖ وَيُبَيِّنُ آيَاتِهِ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴾ 221 ﴿

तथा मुश्रिक[1] स्त्रियों से तुम विवाह न करो, जब तक वे ईमान न लायें और ईमान वाली दासी मुश्रिक स्त्री से उत्तम है, यद्यपि वह तुम्हारे मन को भा रही हो और अपनी स्त्रियों का निकाह़ मुश्रिकों से न करो, जब तक वे ईमान न लायें और ईमान वाला दास मुश्रिक से उत्तम है, यद्यपि वह तुम्हें भा रहा हो। वे तुम्हें अग्नि की ओर बुलाते हैं तथा अल्लाह स्वर्ग और क्षमा की ओर बुला रहा है और (अल्लाह) सभी मानव के लिए अपनी आयतें (आदेश) उजागर कर रहा है, ताकि वह शिक्षा ग्रहन करें। 1. इस्लाम के विरोधियों से युध्द ने यह प्रश्न उभार दिया कि उन से विवाह उचित है या नहीं? उस पर कहा जा रहा है कि उन से विवाह संबंध अवैध है, और इस का कारण भी बता दिया गया है कि वह तुम्हें सत्य से फेरना चाहते हैं। उन के साथ तुम्हारा वैवाहिक सम्बंध कभी सफलता का कारण नहीं हो सकता।

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وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ ۖ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ ۖ وَلَا تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّىٰ يَطْهُرْنَ ۖ فَإِذَا تَطَهَّرْنَ فَأْتُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَمَرَكُمُ اللَّـهُ ۚ إِنَّ اللَّـهَ يُحِبُّ التَّوَّابِينَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِينَ ﴾ 222 ﴿

तथा वे आपसे मासिक धर्म के विषय में प्रश्न करते हैं। तो कह दें कि वह मलीनता है और उनके समीप भी न[1] जाओ, जब तक पवित्र न हो जायें। फिर जब वे भली भाँति स्वच्छ[2] हो जायें, तो उनके पास उसी प्रकार जाओ, जैसे अल्लाह ने तुम्हें आदेश[3] दिया है। निश्चय अल्लाह तौबा करने वालों तथा पवित्र रहने वालों से प्रेम करता है। 1. अर्थात संभोग करने के लिये। 2. मासिक धर्म बन्द होने के पश्चात् स्नान कर के स्वच्छ हो जायें। 3. अर्थात जिस स्थान को अल्लाह ने उचित किया है, वहीं संभोग करो।

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نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَّكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ ۖ وَقَدِّمُوا لِأَنفُسِكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّـهَ وَاعْلَمُوا أَنَّكُم مُّلَاقُوهُ ۗ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 223 ﴿

तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारे लिए खेतियाँ[1] हैं। तुम्हें अनुमति है कि जैसे चाहो, अपनी खेतियों में जाओ; परन्तु भविष्य के लिए भी सत्कर्म करो तथा अल्लाह से डरते रहो और विश्वास रखो कि तुम्हें उससे मिलना है और ईमान वालों को शुभ सूचना सुना दो। 1. अर्थात संतान उत्पन्न करने का स्थान और इस में यह संकेत भी है कि भग के सिवा अन्य स्थान में संभोग ह़राम (अनुचित) है।

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وَلَا تَجْعَلُوا اللَّـهَ عُرْضَةً لِّأَيْمَانِكُمْ أَن تَبَرُّوا وَتَتَّقُوا وَتُصْلِحُوا بَيْنَ النَّاسِ ۗ وَاللَّـهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴾ 224 ﴿

तथा अल्लाह के नाम पर, अपनी शपथों को उपकार तथा सदाचार और लोगों में मिलाप कराने के लिए रोक[1] न बनाओ और अल्लाह सब कुछ सुनता-जानता है। 1. अर्थात सदाचार और पुण्य न करने की शपथ लेना अनुचित है।

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لَّا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّـهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَـٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ ۗ وَاللَّـهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ ﴾ 225 ﴿

अल्लाह तम्हारी निरर्थक शपथों पर तुम्हें नहीं पकड़ेगा, परन्तु जो शपथ अपने दिलों के संकल्प से लोगे, उनपर पकड़ेगा और अल्लाह अति क्षमाशील, सहनशील है।

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لِّلَّذِينَ يُؤْلُونَ مِن نِّسَائِهِمْ تَرَبُّصُ أَرْبَعَةِ أَشْهُرٍ ۖ فَإِن فَاءُوا فَإِنَّ اللَّـهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴾ 226 ﴿

तथा जो लोग अपनी पत्नियों से संभोग न करने की शपथ लेते हों, वे चार महीने प्रतीक्षा करें। फिर[1] यदि (इस बीच) अपनी शपथ से फिर जायें, तो अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है। 1. यदि पत्नि से संबंध न रखने की शपथ ली जाये, जिसे अर्बी में "ईला" के नाम से जाना जाता है, तो उस का यह नियम है कि चार महीने प्रतीक्षा की जायेगी। यदि इस बीच पति ने फिर संबंध स्थापित कर लिया तो उसे शपथ का कफ़्फ़ारह (प्रायश्चित) देना होगा। अन्यथा चार महीने पूरे हो जाने पर न्यायालय उसे शपथ से फिरने या तलाक़ देने पर बाध्य करेगा।

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وَإِنْ عَزَمُوا الطَّلَاقَ فَإِنَّ اللَّـهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴾ 227 ﴿

और यदि उन्होंने तलाक़ का संकल्प ले लिया हो, तो निःसंदेह अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।

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وَالْمُطَلَّقَاتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَاثَةَ قُرُوءٍ ۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكْتُمْنَ مَا خَلَقَ اللَّـهُ فِي أَرْحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤْمِنَّ بِاللَّـهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِي ذَٰلِكَ إِنْ أَرَادُوا إِصْلَاحًا ۚ وَلَهُنَّ مِثْلُ الَّذِي عَلَيْهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيْهِنَّ دَرَجَةٌ ۗ وَاللَّـهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴾ 228 ﴿

तथा जिन स्त्रियों को तलाक़ दी गयी हो, वे तीन बार रजवती होने तक अपने आपको विवाह से रोके रखें। उनके लिए ह़लाल (वैध) नहीं है कि अल्लाह ने जो उनके गर्भाशयों में पैदा किया[1] है, उसे छुपायें, यदि वे अल्लाह तथा आख़िरत (परलोक) पर ईमान रखती हों तथा उनके पति इस अवधि में अपनी पत्नियों को लौटा लेने के अधिकारी[2] हैं, यदि वे मिलाप[3] चाहते हों तथा सामान्य नियमानुसार स्त्रियों[4] के लिए वैसे ही अधिकार हैं, जैसे पुरुषों के उनके ऊपर हैं। फिर भी पुरुषों को स्त्रियों पर एक प्रधानता प्राप्त है और अल्लाह अति प्रभुत्वशाली, तत्वज्ञ है। 1. अर्थात मासिक धर्म अथवा गर्भ को। 2. यह बताया गया है कि पति तलाक़ के पश्चात् पत्नि को लौटाना चाहे तो उसे इस का अधिकार है। क्यों कि विवाह का मूल लक्ष्य मिलाप है, अलगाव नहीं। 3. हानि पहुँचाने अथवा दुःख देने के लिये नहीं। 4. यहाँ यह ज्ञातव्य है कि जब इस्लाम आया तो संसार यह जानता ही न था कि स्त्रियों के भी कुछ अधिकार हो सकते हैं। स्त्रियों को संतान उत्पन्न करने का एक साधन समझा जाता था, और उन की मुक्ति इसी में थी कि वह पुरुषों की सेवा करें, प्राचीन धर्मानुसार स्त्री को पुरुष की सम्पत्ति समझा जाता था। पुरुष तथा स्त्री समान नहीं थे। स्त्री में मानव आत्मा के स्थान पर एक दूसरी आत्मा होती थी। रूमी विधान में भी स्त्री का स्थान पुरुष से बहुत नीचे था। जब कभी मानव शब्द बोला जाता तो उस से संबोधित पुरुष होता था। स्त्री पुरुष के साथ खड़ी नहीं हो सकती थी। कुछ अमानवीय विचारों में जन्म से पाप का सारा बोझ स्त्री पर डाल दिया जाता। आदम के पाप का कारण ह़व्वा हुयी। इस लिये पाप का पहला बीज स्त्री के हाथों पड़ा। और वही शैतान का साधन बनी। अब सदी स्त्री में पाप की प्रेरणा उभरती रहेगी। धार्मिक विषय में भी स्त्री पुरुष के समान न हो सकी। परन्तु इस्लाम ने केवल स्त्रियों के अधिकार का विचार ही नहीं दिया, बल्कि खुला एलान कर दिया कि जैसे पुरुषों के अधिकार हैं, वैस स्त्रियों के भी पुरुषों पर अधिकार हैं। कुर्आन ने इन चार शब्दों में स्त्री को वह सब कुछ दे दिया है जो उस का अधिकार था। और जो उसे कभी नहीं मिला था। इन शब्दों द्वारा उस के सम्मान और समता की घोषणा कर दी। दामपत्य जीवन तथा सामाजिक्ता की कोई ऐसी बात नहीं जो इन चार शब्दों में न आ गई हो। यद्यपि आगे यह भी कहा गया है कि पुरुषों के लिये स्त्रियों पर एक विशेष प्रधानता है। ऐसा क्यों है? इस का कारण हमें आगामी सूरह निसा में मिल जाता है कि यह इस लिये है कि पुरुष अपना धन स्त्रियों पर खर्च करते हैं। अर्थात परिवारिक जीवन की व्यवस्था के लिये एक व्यवस्थापक अवश्य होना चाहिये। और इस का भार पुरुषों पर रखा गया है। यही उन की प्रधानता तथा विशेषता है, जो केवल एक भार है। इस से पुरुष की जन्म से कोई प्रधानता सिध्द नहीं होती। यह केवल एक परिवारिक व्यवस्था के कारण हुआ है।

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الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا مِمَّا آتَيْتُمُوهُنَّ شَيْئًا إِلَّا أَن يَخَافَا أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّـهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّـهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ اللَّـهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّـهِ فَأُولَـٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ﴾ 229 ﴿

तलाक़ दो बार है; फिर नियमानुसार स्त्री को रोक लिया जाये या भली-भाँति विदा कर दिया जाये और तुम्हारे लिए ये ह़लाल (वैध) नहीं है कि उन्हें जो कुछ तुमने दिया है, उसमें से कुछ वापिस लो। फिर यदि तुम्हें ये भय[1] हो कि पति पत्नि अल्लाह की निर्धारित सीमाओं को स्थापित न रख सकेंगे, तो उन दोनों पर कोई दोष नहीं कि पत्नि अपने पति को कुछ देकर मुक्ति[2] करा ले। ये अल्लाह की सीमायें हैं, इनका उल्लंघन न करो और जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करेंगे, वही अत्याचारी हैं। 1. अर्थात पति के पति के संरक्षकों को। 2. पत्नि के अपनी पति को कुछ दे कर विवाह बंधन से मुक्त करा लेने को इस्लाम की परिभाषा में "खुल्अ" कहा जाता है। इस्लाम ने जैसे पुरुषों को तलाक़ का अधिकार दिया है, उसी प्रकार स्त्रियों को भी "खुल्अ" ले लेने का अधिकार दिया है। अर्थात वह अपने पति से तलाक़ माँग सकती हैं।

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فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِن بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يَتَرَاجَعَا إِن ظَنَّا أَن يُقِيمَا حُدُودَ اللَّـهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّـهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴾ 230 ﴿

फिर यदि उसे (तीसरी बार) तलाक़ दे दी, तो वह स्त्री उसके लिए ह़लाल (वैध) नहीं होगी, जब तक दूसरे पति से विवाह न कर ले। अब यदि दूसरा पति (संभोग के पश्चात्) उसे तलाक दे दे, तब प्रथम पति से (निर्धारित अवधि पूरी करके) फिर विवाह कर सकती है, यदि वे दोनों समझते हों कि अल्लाह की सीमाओं को स्थापित रख[1] सकेंगे और ये अल्लाह की सीमायें हैं, जिन्हें उन लोगों के लिए उजागर कर रहा है, जो ज्ञान रखते हैं। 1. आयत का भावार्थ यह है कि प्रथम पति ने तीन तलाक़ दे दी हों तो निर्धारित अवधि में भी उसे पत्नी को लौटाने का अवसर नहीं दिया जायेगा। तथा पत्नी को यह अधिकार होगा कि निर्धारित अवधि पूरी कर के किसी दूसरे पति से धर्मविधान के अनुसार सह़ीह़ विवाह कर ले, फिर यदि दूसरा पति उसे सम्भोग के पश्चात् तलाक़ दे, या उस का देहांत हो जाये तो प्रथम पति से निर्धारित अवधि पूरी करने के पश्चात नये महर के साथ नया विवाह कर सकती है। लेकिन यह उस समय है जब दोनों यह समझते हों कि वे अल्लाह के आदेशों का पालन कर सकेंगे।

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وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ ۚ وَلَا تُمْسِكُوهُنَّ ضِرَارًا لِّتَعْتَدُوا ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُ ۚ وَلَا تَتَّخِذُوا آيَاتِ اللَّـهِ هُزُوًا ۚ وَاذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّـهِ عَلَيْكُمْ وَمَا أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنَ الْكِتَابِ وَالْحِكْمَةِ يَعِظُكُم بِهِ ۚ وَاتَّقُوا اللَّـهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ﴾ 231 ﴿

और यदि स्त्रियों को (एक या दो) तलाक़ दे दो और उनकी निर्धारित अवधि (इद्दत) पूरी होने लगे, तो नियमानुसार उन्हें रोक लो अथवा नियमानुसार विदा कर दो। उन्हें हानि पहुँचाने के लिए न रोको, ताकि उनपर अत्याचार करो और जो कोई ऐसा करेगा, वह स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करेगा तथा अल्लाह की आयतों (आदेशों) को उपहास न बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह के उपकार तथा पुस्तक (क़ुर्आन) एवं ह़िक्मत (सुन्नत) को याद करो, जिन्हें उसने तुमपर उतारा है और उनके द्वारा तुम्हें शिक्षा दे रहा है तथा अल्लाह से डरो और विश्वास रखो कि अल्लाह सब कुछ जानता है।[1] 1. आयत का अर्थ यह है कि पत्नी को पत्नी के रूप में रखो, और उन के अधिकार दो। अन्यथा तलाक़ दे कर उन की राह खोल दो। जाहिलिय्यत के युग के समान अंधेरे में न रखो। इस विषय में भी नैतिकती एवं संयम के आदर्श बनो, और क़ुर्आन तथा सुन्नत के आदेशों का अनुपालन करो।

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وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحْنَ أَزْوَاجَهُنَّ إِذَا تَرَاضَوْا بَيْنَهُم بِالْمَعْرُوفِ ۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِ مَن كَانَ مِنكُمْ يُؤْمِنُ بِاللَّـهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۗ ذَٰلِكُمْ أَزْكَىٰ لَكُمْ وَأَطْهَرُ ۗ وَاللَّـهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴾ 232 ﴿

और जब तुम अपनी पत्नियों को (तीन से कम) तलाक़ दो और वे अपनी निश्चित अवधि (इद्दत) पूरी कर लें, तो (स्त्रियों के संरक्षको!) उन्हें अपने पतियों से विवाह करने से न रोको, जबकि सामान्य नियमानुसार वे आपस में विवाह करने पर सहमत हों, ये तुममें से उसे निर्देश दिया जा रहा है, जो अल्लाह तथा अंतिम दिन (प्रलय) पर ईमान (विश्वास) रखता है, यही तुम्हारे लिए अधिक स्वच्छ तथा पवित्र है और अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते।

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وَالْوَالِدَاتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَادَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ ۖ لِمَنْ أَرَادَ أَن يُتِمَّ الرَّضَاعَةَ ۚ وَعَلَى الْمَوْلُودِ لَهُ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۚ لَا تُكَلَّفُ نَفْسٌ إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَا تُضَارَّ وَالِدَةٌ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوْلُودٌ لَّهُ بِوَلَدِهِ ۚ وَعَلَى الْوَارِثِ مِثْلُ ذَٰلِكَ ۗ فَإِنْ أَرَادَا فِصَالًا عَن تَرَاضٍ مِّنْهُمَا وَتَشَاوُرٍ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا ۗ وَإِنْ أَرَدتُّمْ أَن تَسْتَرْضِعُوا أَوْلَادَكُمْ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِذَا سَلَّمْتُم مَّا آتَيْتُم بِالْمَعْرُوفِ ۗ وَاتَّقُوا اللَّـهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴾ 233 ﴿

और मातायें अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष दूध पिलायें और पिता को नियमानुसार उन्हें खाना-कपड़ा देना है, किसी पर उसकी सकत से अधिक भार नहीं डाला जायेगा; न माता को उसके बच्चे के कारण हानि पहुँचाई जाये और न पिता को उसके बच्चे के कारण। और इसी प्रकार उस (पिता) के वारिस (उत्तराधिकारी) पर (खाना कपड़ा देने का) भार है। फिर यदि दोनों आपस की सहमति तथा प्रामर्श से (दो वर्ष से पहले) दूध छुड़ाना चाहें, तो दोनों पर कोई दोष नहीं और यदि (तुम्हारा विचार किसी अन्य स्त्री से) दूध पिलवाने का हो, तो इसमें भी तुमपर कोई दोष नहीं, जबकि जो कुछ नियमानुसार उसे देना है, उसे चुका दो तथा अल्लाह से डरते रहो और जान लो कि तुम जो कुछ करते हो, उसे अल्लाह देख रहा[1] है। 1. तलाक़ की स्थिति में यदि माँ की गोद में बच्चा हो तो यह आदेश दिया गया है कि माँ ही बच्चे को दूध पिलाये और दूध पिलाने तक उस का ख़र्च पिता पर है। और दूध पिलाने की अवधि दो वर्ष है। साथ ही दो मूल नियम भी बताये गये हैं कि न तो माँ को बच्चे के कारण हानि पहुँचाई जाये और न पिता को। और किसी पर उस की शक्ति से अधिक ख़र्च का भार न डाला जाये।

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وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۗ وَاللَّـهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴾ 234 ﴿

और तुममें से जो मर जायें और अपने पीछे पत्नियाँ छोड़ जायें, तो वे स्वयं को चार महीने दस दिन रोके रखें।[1] फिर जब उनकी अवधि पूरी हो जाये, तो वे सामान्य नियमानुसार अपने विषय में जो भी करें, उसमें तुमपर कोई दोष[2] नहीं तथा अल्लाह तुम्हारे कर्मों से सूचित है। 1. उस की निश्चित अवधि चार महीने दस दिन है। वह तुरंत दूसरा विवाह नहीं कर सकती, और न इस से अधिक पति का सोग मनाये। जैसा जाहिलिय्यत में होता था कि पत्नी को एक वर्ष तक पति का सोग मनाना पड़ता था। 2. यदि स्त्री निश्चित अवधि के पश्चात दूसरा निकाह़ करना चाहे तो उसे राका न जाये।

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وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا عَرَّضْتُم بِهِ مِنْ خِطْبَةِ النِّسَاءِ أَوْ أَكْنَنتُمْ فِي أَنفُسِكُمْ ۚ عَلِمَ اللَّـهُ أَنَّكُمْ سَتَذْكُرُونَهُنَّ وَلَـٰكِن لَّا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّا أَن تَقُولُوا قَوْلًا مَّعْرُوفًا ۚ وَلَا تَعْزِمُوا عُقْدَةَ النِّكَاحِ حَتَّىٰ يَبْلُغَ الْكِتَابُ أَجَلَهُ ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ يَعْلَمُ مَا فِي أَنفُسِكُمْ فَاحْذَرُوهُ ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ ﴾ 235 ﴿

इस अवधि में यदि तुम (उन) स्त्रियों को विवाह का संकेत दो अथवा अपने मन में छुपाये रखो, तो तुमपर कोई दोष नहीं। अल्लाह जानता है कि उनका विचार तुम्हारे मन में आयेगा, परन्तु उन्हें गुप्त रूप से विवाह का वचन न दो। परन्तु ये कि नियमानुसार[1] कोई बात कहो तथा विवाह के बंधन का निश्चय उस समय तक न करो, जब तक निर्धारित अवधि पूरी न हो जाये[2] तथा जान लो कि जो कुछ तुम्हारे मन में है, उसे अल्लाह जानता है। अतः उससे डरते रहो और जान लो कि अल्लाह क्षमाशील, सहनशील है। 1. विवाह के विषय में जो बात की जाये वह खुली तथा नियमानुसार हो, गुप्त नहीं। 2. जब तक अवधि पूरी न हो विवाह की बात तथा वचन नहीं होना चाहिये।

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لَّا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِن طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا لَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى الْمُوسِعِ قَدَرُهُ وَعَلَى الْمُقْتِرِ قَدَرُهُ مَتَاعًا بِالْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى الْمُحْسِنِينَ ﴾ 236 ﴿

और तुमपर कोई दोष नहीं, यदि तुम स्त्रियों को संभोग करने तथा महर (विवाह उपहार) निर्धारित करने से पहले तलाक़ दे दो, (अल्बत्ता) उन्हें नियमानुसार कुछ दो; धनी पर अपनी शक्ति के अनुसार तथा निर्धन पर अपनी शक्ति के अनुसार देना है। ये उपकारियों पर आवश्यक है।

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وَإِن طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةً فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إِلَّا أَن يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَ الَّذِي بِيَدِهِ عُقْدَةُ النِّكَاحِ ۚ وَأَن تَعْفُوا أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۚ وَلَا تَنسَوُا الْفَضْلَ بَيْنَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴾ 237 ﴿

और यदि तुम उनहें, उनसे संभोग करने से पहले तलाक़ दो, इस स्थिति में कि तुमने उनके लिए महर (विवाह उपहार) निर्धारित किया है, तो निर्धारित महर का आधा देना अनिवार्य है। ये और बात है कि वे क्षमा कर दें अथवा वे क्षमा कर दें जिनके हाथ में विवाह का बंधन[1] है और क्षमा कर देना संयम से अधिक समीप है और आपस में उपकार को न भूलो। तुम जो कुछ कर रहे हो, अल्लाह सब देख रहा है। 1. अर्थात पति अपनी ओर से अधिक अर्थात पूरा महर दे तो यह प्रधानता की बात होगी। इन दो आयतों में यह नियम बताया गया है कि यदि विवाह के पश्चात् पति और पत्नी में कोई संबंध स्थापित हुआ हो, तो इस स्थिति में यदि महर निर्धारित न किया गया हो तो पति अपनी शक्ति अनुसार जो भी दे सकता हो, उसे अवश्य दे। और यदि महर निर्धारित हो तो इस स्थिति में आधा महर पत्नि को देना अनिवार्य है। और यदि पुरुष इस से अधिक दे सके तो संयम तथा प्रधानता की बात होगी।

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حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَىٰ وَقُومُوا لِلَّـهِ قَانِتِينَ ﴾ 238 ﴿

नमाज़ों का, विशेष रूप से माध्यमिक नमाज़ (अस्र) का ध्यान रखो[1] तथा अल्लाह के लिए विनय पूर्वक खड़े रहो। 1. अस्र की नमाज़ पर ध्यान रखने के लिये इस कारण बल दिया गया है कि व्यवसाय में लीन रहने का समय होता है।

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فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًا ۖ فَإِذَا أَمِنتُمْ فَاذْكُرُوا اللَّـهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ ﴾ 239 ﴿

और यदि तुम्हें भय[1] हो, तो पैदल या सवार (जैसे सम्भव हो) नमाज़ पढ़ो, फिर जब निश्चिंत हो जाओ, तो अल्लाह ने तुम्हें जैसे सिखाया है, जिसे पहले तुम नहीं जानते थे, वैसे अल्लाह को याद करो। 1. अर्थात शत्रु आदि का।

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وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِّأَزْوَاجِهِم مَّتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ ۚ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِي مَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ مِن مَّعْرُوفٍ ۗ وَاللَّـهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴾ 240 ﴿

और जो तुममें से मर जायें तथा पत्नियाँ छोड़ जायें, वे अपनी पत्नियों के लिए एक वर्ष तक, उनहें खर्च देने तथा (घर से) न निकालने की वसिय्यत कर जायें, यदि वे स्वयं निकल जायें[1] तथा सामान्य नियमानुसार अपने विषय में कुछ भी करें, तो तुमपर कोई दोष नहीं। अल्लाह प्रभावशाली तत्वज्ञ है। 1. अर्थात एक वर्ष पूरा होने से पहले। क्यों कि उन की निश्चित अवधि चार महीने और दस दिन ही निर्धारित है।

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وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ ﴾ 241 ﴿

तथा जिन स्त्रियों को तलाक़ दी गयी हो, तो उन्हें भी उचित रूप से सामग्री मिलनी चाहिए। ये आज्ञाकारियों पर आवश्यक है।

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كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّـهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴾ 242 ﴿

इसी प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को उजागर कर देता है, ताकि तुम समझो।

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أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ خَرَجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ الْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ اللَّـهُ مُوتُوا ثُمَّ أَحْيَاهُمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ ﴾ 243 ﴿

क्या आपने उनकी दशा पर विचार नहीं किया, जो अपने घरों से मौत के भय से निकल गये[1], जबकि उनकी संख्या हज़ारों में थी, तो अल्लाह ने उनसे कहा कि मर जाओ, फिर उन्हें जीवित कर दिया। वास्तव में, अल्लाह लोगों के लिए बड़ा उपकारी है, परन्तु अधिकांश लोग कृतज्ञता नहीं करते।[1] 1. इस में बनी इस्राईल के एक गिरोह की ओर संकेत किया गया है। 2. आयत का भावार्थ यह है कि जो लोग मौत से डरते हों, वह जीवन में सफल नहीं हो सकते, तथा जीवन और मौत अल्लाह के हाथ में है।

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وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّـهِ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴾ 244 ﴿

और तुम अल्लाह (के धर्म के समर्थन) के लिए युध्द करो और जान लो कि अल्लाह सब कुछ सुनता-जानता है।

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مَّن ذَا الَّذِي يُقْرِضُ اللَّـهَ قَرْضًا حَسَنًا فَيُضَاعِفَهُ لَهُ أَضْعَافًا كَثِيرَةً ۚ وَاللَّـهُ يَقْبِضُ وَيَبْسُطُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴾ 245 ﴿

कौन है, जो अल्लाह को अच्छा उधार[1] देता है, ताकि अल्लाह उसे उसके लिए कई गुना अधिक कर दे? और अल्लाह ही थोड़ा और अधिक करता है और उसी की ओर तुम सब फेरे जाओगे। 1. अर्थात जिहाद के लिये धन ख़र्च करना अल्लाह को उधार देना है।

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أَلَمْ تَرَ إِلَى الْمَلَإِ مِن بَنِي إِسْرَائِيلَ مِن بَعْدِ مُوسَىٰ إِذْ قَالُوا لِنَبِيٍّ لَّهُمُ ابْعَثْ لَنَا مَلِكًا نُّقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ ۖ قَالَ هَلْ عَسَيْتُمْ إِن كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ أَلَّا تُقَاتِلُوا ۖ قَالُوا وَمَا لَنَا أَلَّا نُقَاتِلَ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ وَقَدْ أُخْرِجْنَا مِن دِيَارِنَا وَأَبْنَائِنَا ۖ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ تَوَلَّوْا إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ ۗ وَاللَّـهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ ﴾ 246 ﴿

(हे नबी!) क्या आपने बनी इस्राईल के प्रमुखों के विषय पर विचार नहीं किया, जो मूसा के बाद सामने आया? जब उसने अपने नबी से कहाः हमारे लिए एक राजा बना दो। हम अल्लाह की राह में युध्द करेंगे, (नबी ने) कहाः ऐसा तो नहीं होगा कि तुम्हें युध्द का आदेश दे दिया जाये तो अवज्ञा कर जाओ? उन्होंने कहाः ऐसा नहीं हो सकता कि हम अल्लाह की राह में युध्द न करें। जबकि हम अपने घरों और अपने पुत्रों से निकाल दिये गये हैं। परन्तु, जब उन्हें युध्द का आदेश दे दिया गया, तो उनमें से थोड़े के सिवा सब फिर गये। और अल्लाह अत्याचारियों को भली भाँति जानता है।

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وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ اللَّـهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًا ۚ قَالُوا أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُ الْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِالْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةً مِّنَ الْمَالِ ۚ قَالَ إِنَّ اللَّـهَ اصْطَفَاهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُ بَسْطَةً فِي الْعِلْمِ وَالْجِسْمِ ۖ وَاللَّـهُ يُؤْتِي مُلْكَهُ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّـهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ ﴾ 247 ﴿

तथा उनके नबी ने कहाः अल्लाह ने 'तालूत' को तुम्हारा राजा बना दिया है। वे कहने लगेः 'तालूत' हमारा राजा कैसे हो सकता है? हम उससे अधिक राज्य का अधिकार रखते हैं, वह तो बड़ा धनी भी नहीं है। (नबी ने) कहाः अल्लाह ने उसे तुमपर निर्वाचित किया है और उसे अधिक ज्ञान तथा शारीरिक बल प्रदान किया है और अल्लाह जिसे चाहे, अपना राज्य प्रदान करे तथा अल्लाह ही विशाल, अति ज्ञानी[1] है। 1. अर्थात उसी के अधिकार में सब कुछ है। और कौन राज्य की क्षमता रखता है? उसे भी वही जानता है।

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وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ آيَةَ مُلْكِهِ أَن يَأْتِيَكُمُ التَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌ مِّمَّا تَرَكَ آلُ مُوسَىٰ وَآلُ هَارُونَ تَحْمِلُهُ الْمَلَائِكَةُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 248 ﴿

तथा उनके नबी ने उनसे कहाः उसके राज्य का लक्षण ये है कि वह ताबूत तुम्हारे पास आयेगा, जिसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए संतोष तथा मूसा और हारून के घराने के छोड़े हुए अवशेष हैं, उसे फ़रिश्ते उठाये हुए होंगे। निश्चय यदि तुम ईमान वाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी[1] (लक्षण) है। 1. अर्थात अल्लाह की ओर से तालूत को निर्वाचित किये जाने की।

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فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِالْجُنُودِ قَالَ إِنَّ اللَّـهَ مُبْتَلِيكُم بِنَهَرٍ فَمَن شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّي وَمَن لَّمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُ مِنِّي إِلَّا مَنِ اغْتَرَفَ غُرْفَةً بِيَدِهِ ۚ فَشَرِبُوا مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ ۚ فَلَمَّا جَاوَزَهُ هُوَ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ قَالُوا لَا طَاقَةَ لَنَا الْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِ ۚ قَالَ الَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَاقُو اللَّـهِ كَم مِّن فِئَةٍ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةً كَثِيرَةً بِإِذْنِ اللَّـهِ ۗ وَاللَّـهُ مَعَ الصَّابِرِينَ ﴾ 249 ﴿

फिर जब तालूत सेना लेकर चला, तो उसने कहाः निश्चय अल्लाह एक नहर द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेने वाला है। जो उसमें से पियेगा वह मेरा साथ नहीं देगा और जो उसे नहीं चखेगा, वह मेरा साथ देगा, परन्तु जो अपने हाथ से चुल्लू भर पी ले, (तो कोई दोष नहीं)। तो थोड़े के सिवा सबने उसमें से पी लिया। फिर जब उस (तालूत) ने और जो उसके साथ ईमान लाये, उसे (नहर को) पार किया, तो कहाः आज हममें (शत्रु) जालूत और उसकी सेना से युध्द करने की शक्ति नहीं। (परन्तु) जो समझ रहे थे कि उन्हें अल्लाह से मिलना है, उन्होंने कहाः बहुत-से छोटे दल, अल्लाह की अनुमति से, भारी दलों पर विजय प्राप्त कर चुके हैं और अल्लाह सहनशीलों के साथ है।

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وَلَمَّا بَرَزُوا لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِ قَالُوا رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ ﴾ 250 ﴿

और जब वे, जालूत और उसकी सेना के सम्मुख हुए, तो प्रार्थना कीः हे हमारे पालनहार! हमें धैर्य प्रदान कर तथा हमारे चरणों को (रणक्षेत्र में) स्थिर कर दे और काफ़िरों पर हमारी सहायता कर।

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فَهَزَمُوهُم بِإِذْنِ اللَّـهِ وَقَتَلَ دَاوُودُ جَالُوتَ وَآتَاهُ اللَّـهُ الْمُلْكَ وَالْحِكْمَةَ وَعَلَّمَهُ مِمَّا يَشَاءُ ۗ وَلَوْلَا دَفْعُ اللَّـهِ النَّاسَ بَعْضَهُم بِبَعْضٍ لَّفَسَدَتِ الْأَرْضُ وَلَـٰكِنَّ اللَّـهَ ذُو فَضْلٍ عَلَى الْعَالَمِينَ ﴾ 251 ﴿

तो उन्होंने अल्लाह की अनुमति से उन्हें पराजित कर दिया और दावूद ने जालूत को वध कर दिया तथा अल्लाह ने उसे (दावूद[1] को) राज्य और ह़िक्मत (नुबूवत) प्रदान की तथा उसे जो ज्ञान चाहा, दिया और यदि अल्लाह कुछ लोगों की कुछ लोगों द्वारा रक्षा न करता, तो धरती की व्यवस्था बिगड़ जाती, परन्तु संसार वासियों पर अल्लाह बड़ा दयाशील है। 1. दाऊद अलैहिस्सलाम तालूत की सेना में एक सैनिक थे, जिन को अल्लाह ने राज्य देने के साथ नबी भी बनाया। उन्हीं के पुत्र सुलैमान अलैहिस्सलाम थे। दावूद अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने धर्म पुस्तक ज़बूर प्रदान की। सूरह साद में उन की कथा आ रही है।

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تِلْكَ آيَاتُ اللَّـهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ ۚ وَإِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 252 ﴿

(हे नबी!) ये अल्लाह की आयतें हैं, जो हम आपको सुना रहे हैं तथा वास्तव में, आप रसूलों में से हैं।

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تِلْكَ الرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۘ مِّنْهُم مَّن كَلَّمَ اللَّـهُ ۖ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَاتٍ ۚ وَآتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ ۗ وَلَوْ شَاءَ اللَّـهُ مَا اقْتَتَلَ الَّذِينَ مِن بَعْدِهِم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ وَلَـٰكِنِ اخْتَلَفُوا فَمِنْهُم مَّنْ آمَنَ وَمِنْهُم مَّن كَفَرَ ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّـهُ مَا اقْتَتَلُوا وَلَـٰكِنَّ اللَّـهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ ﴾ 253 ﴿

वो रसूल हैं। उनहें हमने एक-दूसरे पर प्रधानता दी है। उनमें से कुछ ने अल्लाह से बात की और कुछ को कई श्रेणियाँ ऊँचा किया तथा मर्यम के पुत्र ईसा को खुली निशानियाँ दीं और रूह़ुलक़ुदुस[1] द्वारा उसे समर्थन दिया और यदि अल्लाह चाहता, तो इन रसूलों के पश्चात् खुली निशानियाँ आ जाने पर लोग आपस में न लड़ते, परन्तु उन्होंने विभेद किया, तो उनमें से कोई ईमान लाया और किसी ने कुफ़्र किया और यदि अल्लाह चाहता, तो वे नहीं लड़ते, परन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है। 1. "रूह़ुल क़ुदुस" का शाब्दिक अर्थ पवित्रात्मा है। और इस से अभिप्रेत एक फ़रिश्ता है, जिस का नाम "जिब्रील" अलैहिस्सलाम है।

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يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَاعَةٌ ۗ وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ ﴾ 254 ﴿

हे ईमान वालो! हमने तुम्हें जो कुछ दिया है, उसमें से दान करो, उस दिन (अर्थातः प्रलय) के आने से पहले, जिसमें न कोई सौदा होगा, न कोई मैत्री और न ही कोई अनुशंसा (सिफ़ारिश) काम आएगी तथा काफ़िर लोग[1] ही अत्याचारी[2] हैं। 1. अर्थात जो इस तथ्य को नहीं मानते वही स्वयं को हानि पहुँचा रहे हैं। 2. आयत का भावार्थ यह है कि परलोक की मुक्ति ईमान और सदाचार पर निरभर है, न वहाँ मुक्ति का सौदा होगा न मैत्री और सिफ़ारिश काम आयेगी।

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اللَّـهُ لَا إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِندَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۖ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ ﴾ 255 ﴿

अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, वह जीवित[1] तथा नित्य स्थायी है, उसे ऊँघ तथा निद्रा नहीं आती। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का[2] है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, सब जानता है। उसके ज्ञान में से वही जान सकते हैं, जिसे वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोये हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च[3], महान है। 1. अर्थात स्वयंभु, अनन्त है। 2. अर्थात जो स्वयं स्थित तथा सब उस की सहायता से स्थित हैं। 3. यह क़ुर्आन की सर्वमहान आयत है। और इस का नाम "आयतुल कुर्सी" है। ह़दीस में इस की बड़ी प्रधानता बताई गई है। (तफ़्सीर इब्ने कसीर)

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لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَيِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِن بِاللَّـهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ لَا انفِصَامَ لَهَا ۗ وَاللَّـهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴾ 256 ﴿

धर्म में बल प्रयोग नहीं। सुपथ, कुपथ से अलग हो चुका है। अतः, अब जो ताग़ूत (अर्थात अल्लाह के सिवा पूज्यों) को नकार दे तथा अल्लाह पर ईमान लाये, तो उसने दृढ़ कड़ा (सहारा) पकड़ लिया, जो कभी खण्डित नहीं हो सकता तथा अल्लाह सब कुछ सुनता-जानता[1] है। 1. आयत का भावार्थ यह है कि धर्म तथा आस्था के विषय में बल प्रयोग की अनुमति नहीं, धर्म दिल की आस्था और विश्वास की चीज़ है। जो शिक्षा दिक्षा से पैदा हो सकता है, न कि बल प्रयोग और दबाव से। इस में यह संकेत भी है कि इस्लाम में जिहाद अत्याचार को रोकने तथा सत्धर्म की रक्षा के लिये है न कि धर्म के प्रसार के लिये। धर्म के प्रसार का साधन एक ही है, और वह प्रचार है, सत्य प्रकाश है। यदि अंधकार हो तो केवल प्रकाश की आवश्यक्ता है। फिर प्रकाश जिस ओर फिरेगा तो अंधकार स्वयं दूर हो जायेगा।

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اللَّـهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا أَوْلِيَاؤُهُمُ الطَّاغُوتُ يُخْرِجُونَهُم مِّنَ النُّورِ إِلَى الظُّلُمَاتِ ۗ أُولَـٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ﴾ 257 ﴿

अल्लाह उनका सहायक है, जो ईमान लाये। वह उनहें अंधेरों से निकालता है और प्रकाश में लाता है और जो काफ़िर (विश्वासहीन) हैं, उनके सहायक ताग़ूत (उनके मिथ्या पूज्य) हैं। जो उन्हें प्रकाश से अंधेरों की और ले जाते हैं। यही नारकी हैं, जो उसमें सदावासी होंगे।

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أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِي حَاجَّ إِبْرَاهِيمَ فِي رَبِّهِ أَنْ آتَاهُ اللَّـهُ الْمُلْكَ إِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّيَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا أُحْيِي وَأُمِيتُ ۖ قَالَ إِبْرَاهِيمُ فَإِنَّ اللَّـهَ يَأْتِي بِالشَّمْسِ مِنَ الْمَشْرِقِ فَأْتِ بِهَا مِنَ الْمَغْرِبِ فَبُهِتَ الَّذِي كَفَرَ ۗ وَاللَّـهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ﴾ 258 ﴿

(हे नबी!) क्या आपने उस व्यक्ति की दशा पर विचार नहीं किया, जिसने इब्राहीम से उसके पालनहार के विषय में विवाद किया, इसलिए कि अल्लाह ने उसे राज्य दिया था? जब इब्राहीम ने कहाः मेरा पालनहार वो है, जो जीवित करता तथा मारता है, तो उसने कहाः मैं भी जीवित[1] करता तथा मारता हूँ। इब्राहीम ने कहाः अल्लाह सूर्य को पूर्व से लाता है, तू उसे पश्चिम से ले आ! (ये सुनकर) काफ़िर चकित रह गया और अल्लाह अत्याचारियों को मार्गदर्शन नहीं देता। 1. अर्थात जिसे चाहूँ मार दूँ और जिसे चाहूँ क्षमा कर दूँ। इस आयत में अल्लाह के विश्व व्यवस्थापक होने का प्रमाणिकरण है। और इस के पश्चात की आयत में उस के मुर्दे को जीवित करने की शक्ति का प्रमाणिकरण है।

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أَوْ كَالَّذِي مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍ وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْيِي هَـٰذِهِ اللَّـهُ بَعْدَ مَوْتِهَا ۖ فَأَمَاتَهُ اللَّـهُ مِائَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُ ۖ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ ۖ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِائَةَ عَامٍ فَانظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَانظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ آيَةً لِّلنَّاسِ ۖ وَانظُرْ إِلَى الْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا ۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ اللَّـهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ﴾ 259 ﴿

अथवा उस व्यक्ति के प्रकार, जो एक ऐसी नगरी से गुज़रा, जो अपनी छतों सहित ध्वस्त पड़ी थी? उसने कहाः अल्लाह इसके ध्वस्त हो जाने के पश्चात् इसे कैसे जीवित (आबाद) करेगा? फिर अल्लाह ने उसे सौ वर्ष तक मौत दे दी। फिर उसे जीवित किया और कहाः तुम कितनी अवधि तक मुर्दा पड़े रहे? उसने कहाः एक दिन अथवा दिन के कुछ क्षण। (अल्लाह ने) कहाः बल्कि तुम सौ वर्ष तक पड़े रहे। अपने खाने पीने को देखो कि तनिक परिवर्तन नहीं हुआ है तथा अपने गधे की ओर देखो, ताकी हम तुम्हें लोगों के लिए एक निशानी (चिन्ह) बना दें तथा (गधे की) अस्थियों को देखो कि हम उन्हें कैसे खड़ा करते हैं और उनपर कैसे माँस चढ़ाते हैं? इस प्रकार जब उसके समक्ष बातें उजागर हो गयीं, तो वह[1] पुकार उठा कि मझे (प्रत्यक्ष) ज्ञान हो गया कि अल्लाह जो चाहे, कर सकता है। 1. इस व्यक्ति के विषय में भाष्यकारों ने विभेद किया है। परन्तु सम्भवतः वह व्यक्ति "उज़ैर" थे। और नगरी "बैतुल मक़्दिस" थी। जिसे बुख़्त नस्सर राजा ने आक्रमण कर के उजाड़ दिया था। (तफ़्सीर इब्ने कसीर)

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وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِي الْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَـٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِي ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةً مِّنَ الطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ اجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍ مِّنْهُنَّ جُزْءًا ثُمَّ ادْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًا ۚ وَاعْلَمْ أَنَّ اللَّـهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴾ 260 ﴿

तथा (याद करो) जब इब्राहीम ने कहाः हे मेरे पालनहार! मुझे दिखा दे कि तू मुर्दों को कैसे जीवित कर देता है? (अल्लाह ने) कहाः क्या तुम ईमान नहीं लाये? उसने कहाः क्यों नहीं? परन्तु ताकि मेरे दिल को संतोष हो जाये। अल्लाह ने कहाः चार पक्षी ले आओ और उनहें अपने से परचा लो। (फिर उन्हें वध करके) उनका एक-एक अंश (भाग) पर्वत पर रख दो। फिर उन्हें पुकारो। वे तुम्हारे पास दौड़े चले आयेंगे और ये जान ले कि अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वज्ञ है।

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مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍ ۗ وَاللَّـهُ يُضَاعِفُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّـهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ ﴾ 261 ﴿

जो अल्लाह की राह में अपना धन दान करते हैं, उस (दान) की दशा उस एक दाने जैसी है, जिसने सात बालियाँ उगायी हों। (उसकी) प्रत्येक बाली में सौ दाने हों और अल्लाह जिसे चाहे और भी अधिक देता है तथा अल्लाह विशाल[1], ज्ञानी है। 1. अर्थात उस का प्रदान विशाल है, और उस के योग्य को जानता है।

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الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَا أَنفَقُوا مَنًّا وَلَا أَذًى ۙ لَّهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴾ 262 ﴿

जो अपना धन अल्लाह की राह में दान करते हैं, फिर दान करने के पश्चात् उपकार नहीं जताते और न (जिसे दिया हो उसे) दुःख देते हैं, उन्हीं के लिए उनके पालनहार के पास उनका प्रतिकार (बदला) है और उनपर कोई डर नहीं होगा और न ही वे उदासीन[1] होंगे। 1. अर्थात संसार में दान न करने पर कोई संताप होगा।

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قَوْلٌ مَّعْرُوفٌ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌ مِّن صَدَقَةٍ يَتْبَعُهَا أَذًى ۗ وَاللَّـهُ غَنِيٌّ حَلِيمٌ ﴾ 263 ﴿

भली बात बोलना तथा क्षमा, उस दान से उत्तम है, जिसके पश्चात् दुःख दिया जाये तथा अल्लाह निस्पृह, सहनशील है।

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يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُبْطِلُوا صَدَقَاتِكُم بِالْمَنِّ وَالْأَذَىٰ كَالَّذِي يُنفِقُ مَالَهُ رِئَاءَ النَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُ بِاللَّـهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ صَفْوَانٍ عَلَيْهِ تُرَابٌ فَأَصَابَهُ وَابِلٌ فَتَرَكَهُ صَلْدًا ۖ لَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَيْءٍ مِّمَّا كَسَبُوا ۗ وَاللَّـهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ ﴾ 264 ﴿

हे ईमान वालो! उस व्यक्ति के समान उपकार जताकर तथा दुःख देकर, अपने दानों को व्यर्थ न करो, जो लोगों को दिखाने के लिए दान करता है और अल्लाह तथा अन्तिम दिन (परलोक) पर ईमान नहीं रखता। उसका उदाहरण उस चटेल पत्थर जैसा है, जिसपर मिट्टी पड़ी हो और उसपर घोर वर्षा हो जाये और उस (पत्थर) को चटेल छोड़ दे। वे अपनी कमाई का कुछ भी न पा सकेंगे और अल्लाह काफ़िरों को सीधी डगर नहीं दिखाता।

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وَمَثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّـهِ وَتَثْبِيتًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ كَمَثَلِ جَنَّةٍ بِرَبْوَةٍ أَصَابَهَا وَابِلٌ فَآتَتْ أُكُلَهَا ضِعْفَيْنِ فَإِن لَّمْ يُصِبْهَا وَابِلٌ فَطَلٌّ ۗ وَاللَّـهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴾ 265 ﴿

तथा उनकी उपमा, जो अपना धन अल्लाह की प्रसन्नता की इच्छा में अपने मन की स्थिरता के साथ दान करते हैं, उस बाग़ (उद्यान) जैसी है, जो पृथ्वी तल के किसी ऊँचे भाग पर हो, उसपर घोर वर्षा हुई, तो दोगुना फल लाया और यदि घोर वर्षा नहीं हुई, तो (उसके लिए) फुहार ही बस[1] हो तथा तुम जो कुछ कर रहे हो, उसे अल्लाह देख रहा है। 1. यहाँ से अल्लाह की प्रसन्नता के लिये जिहाद तथा दीन-दुखियों की सहायता के लिये धन दान करने की विभिन्न रूप से प्रेरणा दी जा रही है। भावार्थ यह है कि यदि निःस्वार्थता से थोड़ा दान भी किया जाये, तो शुभ होता है, जैसे वर्षा की फुहारें भी एक बाग़ (उद्यान) को हरा भरा कर देती हैं।

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أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ لَهُ فِيهَا مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ وَأَصَابَهُ الْكِبَرُ وَلَهُ ذُرِّيَّةٌ ضُعَفَاءُ فَأَصَابَهَا إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ فَاحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّـهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ ﴾ 266 ﴿

क्या तुममें से कोई चाहेगा कि उसके खजूर तथा अँगूरों के बाग़ हों, जिनमें नहरें बह रही हों, उनमें उसके लिए प्रत्येक प्रकार के फल हों तथा वह बूढ़ा हो गया हो और उसके निर्बल बच्चे हों, फिर वह बगोल के आघात से जिसमें आग हो, झुलस जाये।[1] इसी प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए आयतें उजागर करता है, ताकि तुम सोच विचार करो। 1. अर्थात यही दशा प्रलय के दिन काफ़िर की होगी। उस के पास फल पाने के लिये कोई कर्म नहीं होगा। और न कर्म का अवसर होगा। तथा जैसे उस के निर्बल बच्चे उस के काम नहीं आ सके, उसी प्रकार उस का दिखावे का दान भी काम नहीं आयेगा, वह अपनी आवश्यक्ता के समय अपने कर्मों के फल से वंचित कर दिया जायेगा। जैसे इस व्यक्ति ने अपने बुढ़ापे तथा बच्चों की निर्बलता के समय अपना बाग़ खो दिया।

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يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنفِقُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّا أَخْرَجْنَا لَكُم مِّنَ الْأَرْضِ ۖ وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنفِقُونَ وَلَسْتُم بِآخِذِيهِ إِلَّا أَن تُغْمِضُوا فِيهِ ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ غَنِيٌّ حَمِيدٌ ﴾ 267 ﴿

हे ईमान वालो! उन स्वच्छ चीजों में से, जो तुमने कमाई हैं तथा उन चीज़ों में से, जो हमने तुम्हारे लिए धरती से उपजायी हैं, दान करो तथा उसमें से उस चीज़ को दान करने का निश्चय न करो, जिसे तुम स्वयं न ले सको, परन्तु ये कि अनदेखी कर जाओ तथा जान लो कि अल्लाह निःस्पृह, प्रशंसित है।

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الشَّيْطَانُ يَعِدُكُمُ الْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِالْفَحْشَاءِ ۖ وَاللَّـهُ يَعِدُكُم مَّغْفِرَةً مِّنْهُ وَفَضْلًا ۗ وَاللَّـهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ ﴾ 268 ﴿

शैतान तुम्हें निर्धनता से डराता है तथा निर्लज्जा की प्रेरणा देता है तथा अल्लाह तुम्हें अपनी क्षमा और अधिक देने का वचन देता है तथा अल्लाह विशाल ज्ञानी है।

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يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ ﴾ 269 ﴿

वह जिसे चाहे, प्रबोध (धर्म की समझ) प्रदान करता है और जिसे प्रबोध प्रदान कर दिया गया, उसे बड़ा कल्याण मिल गया और समझ वाले ही शिक्षा ग्रहण करते हैं।

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وَمَا أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍ فَإِنَّ اللَّـهَ يَعْلَمُهُ ۗ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ ﴾ 270 ﴿

तथा तुम जो भी दान करो अथवा मनौती[1] मानो, अल्लाह उसे जानता है तथा अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा। 1. अर्थात अल्लाह की विशेष रूप से इबादत (वन्दना) करने का संकल्प ले। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)

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إِن تُبْدُوا الصَّدَقَاتِ فَنِعِمَّا هِيَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا الْفُقَرَاءَ فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّئَاتِكُمْ ۗ وَاللَّـهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴾ 271 ﴿

यदि तुम खुले दान करो, तो वह भी अच्छा है तथा यदी छुपाकर करो और कंगालों को दो, तो वह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा[1] है। ये तुमसे तुम्हारे पापों को दूर कर देगा तथा तुम जो कुछ कर रहे हो, उससे अल्लाह सूचित है। 1. आयत का भवार्थ यह है कि दिखावे के दान से रोकने का यह अर्थ नहीं है किः छुपा कर ही दान दिया जाये, बल्कि उस का अर्थ केवल यह है कि निःस्वार्थ दान जैसे भी दिया जाये, उस का प्रतिफल मिलेगा।

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لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَاهُمْ وَلَـٰكِنَّ اللَّـهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ اللَّـهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ ﴾ 272 ﴿

उन्हें सीधी डगर पर लगा देना, आपका दायित्व नहीं, परन्तु अल्लाह जिसे चाहे, सीधी डगर पर लगा देता है तथा तुम जो भी दान देते हो, तो अपने लाभ के लिए देते हो तथा तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ही देते हो तथा तुम जो भी दान दोगे, तुम्हें उसका भर पूर प्रतिफल (बदला) दिया जायेगा और तुमपर अत्याचार[1] नहीं किया जायेगा। 1. अर्थात उस के प्रतिफल में कोई कमी न की जायेगी।

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لِلْفُقَرَاءِ الَّذِينَ أُحْصِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّـهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ الْجَاهِلُ أَغْنِيَاءَ مِنَ التَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَاهُمْ لَا يَسْأَلُونَ النَّاسَ إِلْحَافًا ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّـهَ بِهِ عَلِيمٌ ﴾ 273 ﴿

दान उन निर्धनों (कंगालों) के लिए है, जो अल्लाह की राह में ऐसे घिर गये हों कि धरती में दौड़-भाग न कर[1] सकते हों, उन्हें अज्ञान लोग न माँगने के कारण धनी समझते हैं, वे लोगों के पीछे पड़ कर नहीं माँगते। तुम उन्हें उनके लक्षणों से पहचान लोगे तथा जो भी धन तुम दान करोगे, निःसंदेह अल्लाह उसे भलि-भाँति जानने वाला है। 1. इस से सांकेतिक वह मुहाजिर हैं जो मक्का से मदीना हिज्रत कर गये। जिस के कारण उन का सारा सामान मक्का में छूट गया। और अब उन के पास कुछ भी नहीं बचा। परन्तु वह लोगों के सामने हाथ फैला कर भीख नहीं माँगते।

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الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُم بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ سِرًّا وَعَلَانِيَةً فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴾ 274 ﴿

जो लोग अपना धन रात-दिन खुले-छुपे दान करते हैं, तो उन्हीं के लिए उनके पालनहार के पास, उनका प्रतिफल (बदला) है और उन्हें कोई डर नहीं होगा और न वे उदासीन होंगे।

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الَّذِينَ يَأْكُلُونَ الرِّبَا لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ الَّذِي يَتَخَبَّطُهُ الشَّيْطَانُ مِنَ الْمَسِّ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا إِنَّمَا الْبَيْعُ مِثْلُ الرِّبَا ۗ وَأَحَلَّ اللَّـهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ الرِّبَا ۚ فَمَن جَاءَهُ مَوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّهِ فَانتَهَىٰ فَلَهُ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُ إِلَى اللَّـهِ ۖ وَمَنْ عَادَ فَأُولَـٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ﴾ 275 ﴿

जो लोग ब्याज खाते हैं, ऐसे उठेंगे जैसे वह उठता है, जिसे शैतान ने छूकर उनमत्त कर दिया हो। उनकी ये दशा इस कारण होगी कि उन्होंने कहा कि व्यापार भी तो ब्याज ही जैसा है, जबकि अल्लाह ने व्यापार को ह़लाल (वैध) , तथा ब्याज को ह़राम (अवैध) कर[1] दिया है। अब जिसके पास उसके पालनहार की ओर से निर्देश आ गया और इस कारण उससे रुक गया, तो जो कुछ पहले लिया, वह उसी का हो गया तथा उसका मामला अल्लाह के ह़वाले है और जो (लोग) फिर वही करें, तो वही नारकी हैं, जो उसमें सदावासी होंगे। 1. इस्लाम मानव में परस्पर प्रेम तथा सहानुभूति उत्पन्न करना चाहता है, इसी कारण उस ने दान करने का निर्देश दिया है कि एक मानव दूसरे की आवश्यक्ता पूर्ति करे। तथा उस की आवश्यक्ता को अपनी आवश्यक्ता समझे। परन्तु ब्याज खाने की मान्सिकता सर्वथा इस के विपरीत है। ब्याज भक्षी किसी की आवश्यक्ता को देखता है तो उस के भीतर उस की सहायता की भावना उत्पन्न नहीं होती। वह उस की विवश्ता से अपना स्वार्थ पूरा करता तथा उस की आवश्यक्ता को अपने धनी होने का साधन बनाता है। और क्रमशः एक निर्दयी हिंसक पशु बन कर रह जाता है, इस के सिवा ब्याज की रीति धन को सीमित करती है, जब कि इस्लाम धन को फैलाना चाहता है, इस के लिये ब्याज को मिटाना, तथा दान की भावना का उत्थान चाहता है। यदि दान की भावना का पूर्णतः उत्थान हो जाये तो कोई व्यक्ति दीन तथा निर्धन रह ही नहीं सकता।

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يَمْحَقُ اللَّـهُ الرِّبَا وَيُرْبِي الصَّدَقَاتِ ۗ وَاللَّـهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ أَثِيمٍ ﴾ 276 ﴿

अल्लाह ब्याज को मिटाता है और दानों को बढ़ाता है और अल्लाह किसी कृतघ्न, घोर पापी से प्रेम नहीं करता।

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إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴾ 277 ﴿

वास्तव में, जो ईमान लाये, सदाचार किये, नमाज़ की स्थाप्ना करते रहे और ज़कात देते रहे, उन्हीं के लिए उनके पालनहार के पास उनका प्रतिफल है और उन्हें कोई डर नहीं होगा और न वे उदासीन होंगे।

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يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّـهَ وَذَرُوا مَا بَقِيَ مِنَ الرِّبَا إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 278 ﴿

हे ईमान वालो! अल्लाह से डरो और जो ब्याज शेष रह गया है, उसे छोड़ दो, यदि तुम ईमान रखने वाले हो तो।

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فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا فَأْذَنُوا بِحَرْبٍ مِّنَ اللَّـهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَإِن تُبْتُمْ فَلَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَالِكُمْ لَا تَظْلِمُونَ وَلَا تُظْلَمُونَ ﴾ 279 ﴿

और यदि तुमने ऐसा नहीं किया, तो अल्लाह तथा उसके रसूल से युध्द के लिए तैयार हो जाओ और यदि तुम तौबा (क्षमा याचना) कर लो, तो तुम्हारे लिए तुम्हारा मूलधन है। न तुम अत्याचार करो[1], न तुमपर अत्याचार किया जाये। 1. अर्थात मूल धन से अधिक लो।

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وَإِن كَانَ ذُو عُسْرَةٍ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيْسَرَةٍ ۚ وَأَن تَصَدَّقُوا خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴾ 280 ﴿

और यदि तुम्हारा ऋणि असुविधा में हो, तो उसे सुविधा तक अवसर दो और अगर क्षमा कर दो, (अर्थात दान कर दो) तो ये तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है, यदि तुम समझो तो।

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وَاتَّقُوا يَوْمًا تُرْجَعُونَ فِيهِ إِلَى اللَّـهِ ۖ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴾ 281 ﴿

तथा उस दिन से डरो, जिसमें तुम अल्लाह की ओर फेरे जाओगे, फिर प्रत्येक प्राणी को उसकी कमाई का भरपूर प्रतिकार दिया जायेगा तथा किसी पर अत्याचार न होगा।

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يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيْنٍ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى فَاكْتُبُوهُ ۚ وَلْيَكْتُب بَّيْنَكُمْ كَاتِبٌ بِالْعَدْلِ ۚ وَلَا يَأْبَ كَاتِبٌ أَن يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ اللَّـهُ ۚ فَلْيَكْتُبْ وَلْيُمْلِلِ الَّذِي عَلَيْهِ الْحَقُّ وَلْيَتَّقِ اللَّـهَ رَبَّهُ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْئًا ۚ فَإِن كَانَ الَّذِي عَلَيْهِ الْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا أَوْ لَا يَسْتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُ بِالْعَدْلِ ۚ وَاسْتَشْهِدُوا شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَامْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَدَاءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَاهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَاهُمَا الْأُخْرَىٰ ۚ وَلَا يَأْبَ الشُّهَدَاءُ إِذَا مَا دُعُوا ۚ وَلَا تَسْأَمُوا أَن تَكْتُبُوهُ صَغِيرًا أَوْ كَبِيرًا إِلَىٰ أَجَلِهِ ۚ ذَٰلِكُمْ أَقْسَطُ عِندَ اللَّـهِ وَأَقْوَمُ لِلشَّهَادَةِ وَأَدْنَىٰ أَلَّا تَرْتَابُوا ۖ إِلَّا أَن تَكُونَ تِجَارَةً حَاضِرَةً تُدِيرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَلَّا تَكْتُبُوهَا ۗ وَأَشْهِدُوا إِذَا تَبَايَعْتُمْ ۚ وَلَا يُضَارَّ كَاتِبٌ وَلَا شَهِيدٌ ۚ وَإِن تَفْعَلُوا فَإِنَّهُ فُسُوقٌ بِكُمْ ۗ وَاتَّقُوا اللَّـهَ ۖ وَيُعَلِّمُكُمُ اللَّـهُ ۗ وَاللَّـهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ﴾ 282 ﴿

हे ईमान वालो! जब तुम आपस में किसी निश्चित अवधि तक के लिए उधार लेन-देन करो, तो उसे लिख लिया करो, तुम्हारे बीच न्याय के साथ कोई लेखक लिखे, जिसे अल्लाह ने लिखने की योग्यता दी है, वह लिखने से इन्कार न करे तथा वह लिखवाये, जिसपर उधार है और अपने पालनहार अल्लाह से डरे और उसमें से कुछ कम न करे। यदि जिसपर उधार है, वह निर्बोध अथवा निर्बल हो अथवा लिखवा न सकता हो, तो उसका संरक्षक न्याय के साथ लिखवाये तथा अपने में से दो पुरुषों को साक्षी (गवाह) बना लो। यदि दो पुरुष न हों, तो एक पुरुष तथा दो स्त्रियों को, उन साक्षियों में से, जिन्हें साक्षी बनाना पसन्द करो। ताकि दोनों (स्त्रियों) में से एक भूल जाये, तो दूसरी याद दिला दे तथा जब साक्षी बुलाये जायें, तो इन्कार न करें तथा विषय छोटा हो या बड़ा, उसकी अवधि सहित लिखवाने में आलस्य न करो, ये अल्लाह के समीप अधिक न्याय है तथा साक्ष्य के लिए अधिक सहायक और इससे अधिक समीप है कि संदेह न करो। परन्तु यदि तुम व्यापारिक लेन-देन हाथों-हाथ (नगद करते हो), तो तुमपर कोई दोष नहीं कि उसे न लिखो तथा जब आपस में लेन-देन करो, तो साक्षी बना लो और लेखक तथा साक्षी को हानि न पहुँचाई जाये और यदि ऐसा करोगो, तो तुम्हारी अवज्ञा ही होगी तथा अल्लाह से डरो और अल्लाह तुम्हें सिखा रहा है और निःसंदेह अल्लाह सब कुछ जानता है।

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وَإِن كُنتُمْ عَلَىٰ سَفَرٍ وَلَمْ تَجِدُوا كَاتِبًا فَرِهَانٌ مَّقْبُوضَةٌ ۖ فَإِنْ أَمِنَ بَعْضُكُم بَعْضًا فَلْيُؤَدِّ الَّذِي اؤْتُمِنَ أَمَانَتَهُ وَلْيَتَّقِ اللَّـهَ رَبَّهُ ۗ وَلَا تَكْتُمُوا الشَّهَادَةَ ۚ وَمَن يَكْتُمْهَا فَإِنَّهُ آثِمٌ قَلْبُهُ ۗ وَاللَّـهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ ﴾ 283 ﴿

और यदि तुम यात्रा में रहो तथा लिखने के लिए किसी को न पाओ, तो धरोहर रख दो और यदि तुममें परस्पर एक-दूसरे पर भरोसा हो, (तो धरोहर की भी आवश्यक्ता नहीं,) जिसपर अमानत (उधार) है, वह उसे चुका दे तथा अल्लाह (अपने पालनहार) से डरे और साक्ष्य न छुपाओ और जो उसे छुपायेगा, उसका दिल पापी है तथा तुम जो करते हो, अल्लाह सब जानता है।

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لِّلَّـهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَإِن تُبْدُوا مَا فِي أَنفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُم بِهِ اللَّـهُ ۖ فَيَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّـهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ﴾ 284 ﴿

आकाशों तथा धरती में जो कुछ है, सब अल्लाह का है और जो तुम्हारे मन में है, उसे बोलो अथवा मन ही में रखो, अल्लाह तुमसे उसका ह़िसाब लेगा। फिर जिसे चाहे, क्षमा कर देगा और जिसे चाहे, दण्ड देगा और अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।

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آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّـهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ ۚ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ ﴾ 285 ﴿

रसूल उस चीज़ पर ईमान लाया, जो उसके लिए अल्लाह की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले उसपर ईमान लाये। वे सब अल्लाह तथा उसके फ़रिश्तों और उसकी सब पुस्तकों एवं रसूलों पर ईमान लाये। (वे कहते हैः) हम उसके रसूलों में से किसी के बीच अन्तर नहीं करते। हमने सुना और हम आज्ञाकारी हो गये। हे हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे और हमें तेरे ही पास[1] आना है। 1. इस आयत में सत्धर्म इस्लाम की आस्था तथा कर्म का सारांश बताया गया है।

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لَا يُكَلِّفُ اللَّـهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ ۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ۖ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۚ أَنتَ مَوْلَانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ ﴾ 286 ﴿

अल्लाह किसी प्राणी पर उसकी सकत से अधिक (दायित्व का) भार नहीं रखता। जो सदाचार करेगा, उसका लाभ उसी को मिलेगा और जो दुराचार करेगा, उसकी हानि भी उसी को होगी। हे हमारे पालनहार! यदि हम भूल चूक जायें, तो हमें न पकड़। हे हमारे पालनहार! हमारे ऊपर इतना बोझ न डाल, जितना हमसे पहले के लोगों पर डाला गया। हे हमारे पालनहार! हमारे पापों की अनदेखी कर दे, हमें क्षमा कर दे तथा हमपर दया कर। तू ही हमारा स्वामी है तथा काफ़िरों के विरुध्द हमारी सहायता कर।

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