सूरह अन-नस्र [110]

सूरह नस्र के संक्षिप्त विषय

यह सूरह मक्की है, इस में 3 आयतें हैं।

  • इस सूरह में ((नस)) शब्द आने के कारण, जिस का अर्थ सहायता है, इस का यह नाम रखा गया है।[1]

1. अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजियल्लाहु अन्हमा) से रिवायत है कि यह कुआन की अन्तिम सूरह है जो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतरी। इस सूरह में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भविष्य वाणी के रूप में बताया गया है कि जब इस्लाम की पूर्ण विजय हो जाये, और लोग समूहों के साथ इस्लाम में प्रवेश करने लगें तो आप अल्लाह की हम्द (प्रशंसा) और तस्बीह (पवित्रता का वर्णन) करने में लग जायें। और उस से क्षमा मांगते रहें।

  • इस की आयत 1 में अल्लाह की सहायता आने तथा मक्का की विजय की चर्चा है।
  • आयत 2 में लोगों के समूहों में इस्लाम लाने की चर्चा है।
  • आयत 3 में आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अल्लाह का यह प्रदान प्राप्त होने पर उस की और अधिक प्रशंसा तथा पवित्रता गान का निर्देश दिया गया है। हदीस में है कि इस तरह के उतरने के पश्चात् आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी नमाज़ (के रुकूअ और सजदे) में अधिक्तर ((सुब्हानका रब्बना व बिहम्दिका अल्लाहुम्मगफिर ली)) पढ़ा करते थे। (सहीह बुख़ारीः 4967, 4968)
Arabic Verse Transliteration

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

 

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम

إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّـهِ وَالْفَتْحُ

1

इजा जा अ नसरुल लाहि वल फतह

وَرَأَيْتَ النَّاسَ يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّـهِ أَفْوَاجًا

2

वर अयतन नास यद् खुलूना फ़ी दीनिल लाहि अफ्वाजा

فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُ ۚ إِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا

3

फसब्बिह बिहम्दि रब्बिका वस्तग फिरहु इन्नहु कान तव्वाबा

तर्जुमा (Translation)

1 ﴿ (हे नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं विजय आ जाये।

2 ﴿ और तुम लोगों को अल्लाह के धर्म में दल के दल प्रवेश करते देख लो।[1]
1. (1-2) इस में विजय का अर्थ वह निर्णायक विजय है जिस के बाद कोई शक्ति इस्लाम का सामना करने के योग्य नहीं रह जायेगी। और यह स्थिति सन् 8 (हिज्री) की है जब मक्का विजय हो गया। अरब के कोने कोने से प्रतिनिधि मंडल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सेवा में उपस्थित हो कर इस्लाम लाने लगे। और सन् 10 (हिज्री) में जब आप ‘ह़ज्जतुल वदाअ’ (अर्थात अन्तिम ह़ज्ज) के लिये गये तो उस समय पूरा अरब इस्लाम के अधीन आ चुका था और देश में कोई मुश्रिक (मूर्ति पूजक) नहीं रह गया था।

3 ﴿ तो अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करो और उससे क्षमा माँगो, निःसंदेह वह बड़ा क्षमी है।[1]
1. इस आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से कहा गया है कि इतना बड़ा काम आप ने अल्लाह की दया से पूरा किया है, इस के लिये उस की प्रशंसा और पवित्रता का वर्णन तथा उस की कृतज्ञता व्यक्त करें। इस में सभी के लिये यह शिक्षा है कि कोई पुण्य कार्य अल्लाह की दया के बिना नहीं होता। इस लिये उस पर घमंड नहीं करना चाहिये।

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