Surah Quraish [106] in hindi

सूरह कुरैश [106]

सूरह कुरैश के संक्षिप्त विषय

यह सूरह मक्की है, इस में 4 आयतें हैं।

  • इस में मक्का के कबीले ((कुरैश)) की चर्चा के कारण इस का यह नाम रखा गया है। [1]

1 इस सूरह के अर्थ को समझने के लिये यह जानना जरूरी है कि कुरैश जात नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पूर्वज कुसई पुत्र किलाब के युग में “हिजाज” में फैली हुई थी। उन्होंने सब को मक्का में एकत्र किया और अपनी सुनिती से एक राज्य की स्थापना की। और हाजियों की सेवा की ऐसी व्यवस्था की कि पूरी अरब जातियों और क्षेत्रों में उन का अच्छा प्रभाव पड़ा। कुसई के बाद उन के चार पुत्र में राज्य पद विभाजित हो गये। परन्तु उन में अब्द मनाफ का नाम अधिक प्रसिद्ध हुआ। और उन के चार पुत्रों में से नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दादा अब्दुल मुत्तलिब के पिता हाशिम ने सब से पहले यह सोचा किः अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भाग लिया जाये, जिस के कारण कुरैश का संबंध अनेक देशों और सभ्यताओं से हो गया। मक्का अरब द्वीप का व्यापारिक केंद्र बन गया। और अबरहा की पराजय ने कुरैश की मान मर्यादा और अधिक कर दी। इसलिये सरह के चार वाक्यों में रैश से मात्र इतना ही कहा गया है कि जब तुम इस घर (काबा) को मूर्तियों का नहीं अल्लाह का घर मानते हो कि वह अल्लाह ही है जिस ने इस घर के कारण शांती प्रदान की और तुम्हारे व्यापार को यह उन्नती दी, तथा तुम्हें भूखमरी से बचाया तो तुम्हें भी मात्र उसी की पूजा उपासना करनी चाहिये।

  • इस की आयत 1 से 3 तक में मक्का के वासी कुरैश के अपनी व्यापारिक यात्रा से प्रेम रखने के कारण जो यात्रा वह निर्भय और शान्त रह कर किया करते थे क्योंकि काबा के निवासी थे उन से कहा जा रहा है कि वह केवल इस घर के स्वामी अल्लाह ही की वंदना (उपासना) करें।
  • आयत 4 में इस का कारण बताया गया है कि यह जीविका और शान्ति जो तुम्हें प्राप्त है वह अल्लाह ही का प्रदान है। इस लिये तुम्हें उस का आभारी होना चाहिये और मात्र उसी की इबादत (वंदना) करनी चाहिये।
Arabic Verse
Transliteration
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بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम

अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।

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لِإِيلَافِ قُرَيْشٍ ﴾ 1 ﴿

लि ईलाफि कुरैश

क़ुरैश के स्वभाव बनाने के कारण।

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إِيلَافِهِمْ رِحْلَةَ الشِّتَاءِ وَالصَّيْفِ ﴾ 2 ﴿

इलाफिहिम रिहलतश शिताई वस सैफ

उनके जाड़े तथा गर्मी की यात्रा का स्वभाव बनाने के कारण।[1]
1. (1-2) गर्मी और जाड़े की यात्रा से अभिप्राय गर्मी के समय क़ुरैश की व्यपारिक यात्रा है जो शाम और फ़लस्तीन की ओर होती थी। और जाड़े के समय वे दक्षिण अरब की यात्रा करते थे जो गर्म क्षेत्र है।

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فَلْيَعْبُدُوا رَبَّ هَـٰذَا الْبَيْتِ ﴾ 3 ﴿

फल यअ’बुदू रब्बा हाज़ल बैत

उन्हें चाहिये कि इस घर (काबा) के प्रभु की पूजा करें।[1]
1. इस घर से अभिप्राय काबा है। अर्थ यह है कि यह सुविधा उन्हें इसी घर के कारण प्राप्त हुई। और वह स्वयं यह मानते हैं कि 360 मूर्तियाँ उन की रब नहीं हैं जिन की पूजा कर रहे हैं। उन का रब (पालनहार) वही है जिस ने उन को अबरहा के आक्रमण से बचाया। और उस युग में जब अरब की प्रत्येक दिशा में अशान्ति का राज्य था मात्र इसी घर के कारण इस नगर में शान्ति है। और तुम इसी घर के निवासी होने के कारण निश्चिन्त हो कर व्यापारिक यात्रायें कर रहे हो, और सुख सुविधा के साथ रहते हो। क्यों कि काबे के प्रबंधक और सेवक होने के कारण ही लोग क़ुरैश का आदर करते थे। तो उन्हें स्मरण कराया जा रहा है कि फिर तुम्हारा कर्तव्य है कि केवल उसी की उपासना करो।

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الَّذِي أَطْعَمَهُم مِّن جُوعٍ وَآمَنَهُم مِّنْ خَوْفٍ ﴾ 4 ﴿

अल्लज़ी अत अमहुम मिन जूअ व आमनहुम मिन खौफ

जिसने उन्हें भूख में खिलाया तथा डर से निडर कर दिया।

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