सूरह अल-फलक़

सूरह फलक के संक्षिप्त विषय

यह सूरह मक्की है, इस में 5 आयतें हैं।

  • इस की प्रथम आयत में ((फ़लक़ )) शब्द आने के कारण, जिस का अर्थ भोर है, इस का यह नाम रखा गया है।
  • सूरह “फलक” और सूरह “नास” को मिला कर “मुअव्वजतैन” कहा जाता है।
    जब यह दोनों सूरतें उतरी तो नबी सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम ने फरमायाः आज की रात्री में मुझ पर कुछ ऐसी आयतें उतरी हैं जिन के समान मैं ने कभी नहीं देखी। (मुस्लिमः 814)
  • इसी प्रकार इब्ने आबिस जहनी (रजियल्लाह अन्ह) से आप ने फरमाया कि: मैं तुम्हें उत्तम यंत्र न बताऊँ जिस के द्वारा शरण (पनाह) मांगी जाती है। और आप ने यह दोनों सूरतें बतायीं, और कहा कि यह “मुअव्वज़तैन” अर्थात शरण मांगने के लिये दो सूरतें हैं। (देखियेः सहीह नसई: 5020)
  • जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर जादू किया गया जिस का प्रभाव यह हुआ कि आप घुलते जा रहे थे, किसी काम को सोचते कि कर लिया है, और किया नहीं होता था, किसी वस्तु को देखा है जब कि देखा नहीं होता था। परन्तु जादू का यह प्रभाव आप के व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित था। एक दिन नबी (सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम) अपनी पत्नी “आइशा” (रजियल्लाह अन्हा) के पास थे कि सो गये, और जागे तो उन को बताया की दो व्यक्ति (फरिश्ते) मेरे पास आये, एक सिराहने की ओर था. और दसरा पैताने की ओर एक ने पूछाः इन्हें क्या हुआ है। दूसरे ने उत्तर दियाः इन पर जादू हआ है| उस ने पछाः किस ने किया है। उत्तर दियाः “लबीद बिन आसम” ने पूछा: किस वस्तु में किया है। उत्तर दियाः कंघी, बाल और नर खजूर के खोशे में। पूछाः वह कहाँ है। उत्तर दियाः बनी रैक के कुवें की तह में पत्थर के नीचे है। इस के बाद आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अली, अम्मार और जुबैर (रजियल्लाहु अन्हुम) को भेजा, फिर आप भी वहाँ आ गये, पानी निकाला गया, फिर जादू जिस में कंघी के दाँतों और बालों के साथ एक ताँत में ग्यारह गाँठ लगी हुई थीं। और मोम का एक पुतला था जिस में सुईयाँ चुभोई हुई थीं। आदर्णीय जिबील (अलैहिस्सलाम) ने आ कर बताया किः आप “मुअव्वज़तैन” पढ़ें। और जैसे जैसे आप पढ़ते जा रहे थे उसी के साथ एक एक गाँठ खुलती और पुतले से एक एक सुई निकलती जा रही थी, और अन्त के साथ ही आप जादू से इस प्रकार निकल गये जैसे कोई बंधा हुआ खुल जाता है।
  • इस की आयत 1 में यह शिक्षा दी गई है कि शरण उस से मांगो जिस के पालनहार होने की निशानी तुम रात दिन देख रहे हो।
  • आयत 2 से 5 तक में यह बताया गया है कि किन चीज़ों की बुराई से शरण मांगनी चाहिये।
  • हदीस में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा कि इस रात मुझ पर कुछ ऐसी आयतें अवतरित हुई हैं जिन के समान आयतें कभी नहीं देखी गईं। वह यह सूरह, और इस के पश्चात् की सूरह है। (सहीह मुस्लिमः 814)
Arabic Verse
Transliteration
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﴾ 1 ﴿ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ

कुल अऊजु बिरब्बिल फलक

(हे नबी!) कहो कि मैं भोर के पालनहार की शरण लेता हूँ।

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﴾ 2 ﴿ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ

मिन शर रिमा ख़लक़

हर उसकी बुराई से, जिसे उसने पैदा किया।

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﴾ 3 ﴿ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ

वामिन शर रिग़ासिकिन इज़ा वकब

तथा रात्रि की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाये।[1] 1. (1-3) इन में संबोधित तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को किया गया है, परन्तु आप के माध्यम से पूरे मुसलमानों के लिये संबोधन है। शरण माँगने के लिये तीन बातें ज़रूरी हैं: (1) शरण माँगाना। (2) जो शरण माँगता हो। (3) जिस के भय से शरण माँगी जाती हो और अपने को उस से बचाने के लिये दूसरे की सुरक्षा और शरण में जाना चाहता हो। फिर शरण वही माँगता है जो यह सोचता है कि वह स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता। और अपनी रक्षा के लिये वह ऐसे व्यक्ति या अस्तित्व की शरण लेता है जिस के बारे में उस का विश्वास होता है कि वह उस की रक्षा कर सकता है। अब स्वभाविक नियमानुसार इस संसार में सुरक्षा किसी वस्तु या व्यक्ति से प्राप्त की जाती है जैसे धूप से बचने के लिये पेड़ या भवन आदि की। परन्तु एक खतरा वह भी होता है जिस से रक्षा के लिये किसी अनदेखी शक्ति से शरण माँगी जाती है जो इस विश्व पर राज करती है। और वह उस की रक्षा अवश्य कर सकती है। यही दूसरे प्रकार की शरण है जो इन जो इन दोनों सूरतों में अभिप्रेत है। और क़ुर्आन में जहाँ भी अल्लाह की शरण लेने की चर्चा है उस का अर्थ यही विशेष प्रकार की शरण है। और यह तौह़ीद पर विश्वास का अंश है। ऐसे ही शरण के लिये विश्वासहीन देवी देवताओं इत्यादि को पुकारना शिर्क और घोर पापा है।

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﴾ 4 ﴿ وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ

वमिन शर रिन नफ़फ़ासाति फ़िल उक़द

तथा गाँठ लगाकर उनमें फूँकने वालियों की बुराई से।

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﴾ 5 ﴿ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَِ

वमिन शर रिहासिदिन इज़ा हसद

तथा द्वेष करने वाले की बुराई से, जब वह द्वेष करे।[1] 1. (4-5) इन दोनों आयतों में जादू और डाह की बुराई से अल्लाह की शरण में आने की शिक्षा दी गई है। और डाह ऐसा रोग है जो किसी व्यक्ति को दूसरों को हानि पहुँचाने के लिये तैयार कर देता है। और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर भी जादू डाह के कारण ही किया गया था। यहाँ ज्ञातव्य है कि इस्लाम ने जादू को अधर्म कहा है जिस से इन्सान के परलोक का विनाश हो जाता है।

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