सूरह नाज़िआत के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है. इस में 46 आयतें हैं।
- इस का आरंभ ((अन्नाज़ियात )) शब्द से हुआ है। जिस का अर्थ हैः प्राण खींचने वाले फरिश्ते, इसी से इस का यह नाम रखा गया है।
- इस की आयत 1 से 14 तक में प्रतिफल के दिन पर गवाही प्रस्तुत की गई है। फिर क्यामत का चित्र दिखाते हुये उस का इन्कार करने वालों की आपत्ति की चर्चा की गई है।
- आयत 15 से 26 तक में फिरऔन के मूसा (अलैहिस्सलाम) की बात न मानने के शिक्षाप्रद परिणाम को बताया गया है जो प्रतिफल के होने का ऐतिहासिक प्रमाण है।
1 इस सूरह का विषय प्रलय तथा दोबारा उठाये जाने का वर्णन है। और इस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नबी न मानने के दुष्परिणाम से सावधान किया गया है। और फरिश्तों के कार्यों की चर्चा कर के यह विश्वास दिलाया गया है कि प्रलय अवश्य आयेगी, और दूसरा जीवन हो कर रहेगा। यही फरिश्ते अल्लाह के आदेश से इस विश्व की व्यवस्था को ध्वस्त कर देंगे। यह कार्य जिसे असंभव समझा जा रहा है अल्लाह के लिये अति सरल है। एक क्षण में वह संसार को विलय कर देगा और दूसरे क्षण में, सहसा दूसरे संसार में स्वंय को जीवित पाओगे।
फिर फिरऔन की कथा का वर्णन कर के नबियों (ईश दूतों) को न मानने का दुष्परिणाम बताया गया है जिस से शिक्षा लेनी चाहिये।
27 से 33 तक परलोक तथा दोबारा उठाये जाने का वर्णन है।
34 से 41 तक बताया गया है कि परलोक के स्थायी जीवन का निर्णय इस आधार पर होगा कि किस ने आज्ञा का उल्लंघन किया है। और माया मोह को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया, तथा किस ने अपने पालनहार के सामने खड़े होने का भय किया। और मनमानी करने से बचा। यह समय अवश्य आना है। अब जिस के जो मन में आये करे। जो इसी संसार को सब कुछ समझते थे यह अनुभव करेंगे कि वह संसार में मात्र पल भर ही रहे, उस समय समझ में आयेगा कि इस पल भर के सुख के लिये उस ने सदा के लिये अपने भविष्य का विनाश कर लिया। - आयत 34 से 41 तक में क्यामत के दिन अवैज्ञाकारियों की दुर्दशा और आज्ञाकारियों के उत्तम परिणाम को दिखाया गया है।
- अन्त में क्यामत के नकारने वालों का जवाब दिया गया है।
सूरह अन-नाज़िआ़त | Surah Naziat in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَالنَّازِعَاتِ غَرْقًا ﴾ 1 ﴿
वन्नाज़िआ़ति ग़रक़ंव्
शपथ है उन फ़रिश्तों की जो डूबकर (प्राण) निकालते हैं!
وَالنَّاشِطَاتِ نَشْطًا ﴾ 2 ﴿
वन्नाशिताति नश्तंव्
और जो सरलता से (प्राण) निकालते हैं।
وَالسَّابِحَاتِ سَبْحًا ﴾ 3 ﴿
वस्साबिहाति सब्हन्
और जो तैरते रहते हैं।
فَالسَّابِقَاتِ سَبْقًا ﴾ 4 ﴿
फ़स्साबिक़ाति सब्क़न्
फिर जो आगे निकल जाते हैं।
فَالْمُدَبِّرَاتِ أَمْرًا ﴾ 5 ﴿
फ़ल्मुदब्बिराति अम्रा
फिर जो कार्य की व्यवस्था करते हैं।[1] 1. (1-5) यहाँ से बताया गया है कि प्रलय का आरंभ भारी भूकम्प से होगा और दूसरे ही क्षण सब जीवित हो कर धरती के ऊपर होंगे।
يَوْمَ تَرْجُفُ الرَّاجِفَةُ ﴾ 6 ﴿
यौ – म तर्जुफर्राजि – फ़तु
जिस दिन धरती काँपेगी।
تَتْبَعُهَا الرَّادِفَةُ ﴾ 7 ﴿
तत्बअुहर् – रादिफ़ह्
जिसके पीछे ही दूसरी कम्प आ जायेगी।
قُلُوبٌ يَوْمَئِذٍ وَاجِفَةٌ ﴾ 8 ﴿
कुलूबुंय् – यौमइज़िंव् – वाजि – फ़तुन्
उस दिन बहुत-से दिल धड़क रहे होंगे।
أَبْصَارُهَا خَاشِعَةٌ ﴾ 9 ﴿
अब्सारुहा ख़ाशिअ़ह्
उनकी आँखें झुकी होंगी।
يَقُولُونَ أَإِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِي الْحَافِرَةِ ﴾ 10 ﴿
यकूलू – न अ- इन्ना ल – मरदूदू- न फिल् – हाफ़िरह्
वे कहते हैं कि क्या हम फिर पहली स्थिति में लाये जायेंगे?
أَإِذَا كُنَّا عِظَامًا نَّخِرَةً ﴾ 11 ﴿
अ- इज़ा कुन्ना अिजा़मन् – नखिरह्
जब हम (भुरभुरी) (खोखली) अस्थियाँ (हड्डियाँ) हो जायेंगे।
قَالُوا تِلْكَ إِذًا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌ ﴾ 12 ﴿
का़लू तिल् – क इज़न् कर्रतुन् ख़ासिरह
उन्होंने कहाः तब तो इस वापसी में क्षति है।
فَإِنَّمَا هِيَ زَجْرَةٌ وَاحِدَةٌ ﴾ 13 ﴿
फ़ – इन्नमा हि – य ज़ज् – रतुंव – वाहि दतुन्
बस वह एक झिड़की होगी।
فَإِذَا هُم بِالسَّاهِرَةِ ﴾ 14 ﴿
फ़ – इज़ा हुम् बिस्साहिरह्
तब वे अकस्मात धरती के ऊपर होंगे।
هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ مُوسَىٰ ﴾ 15 ﴿
हल् अता – क हदीसु मूसा
(हे नबी!) क्या तुम्हें मूसा का समाचार पहुँचा?[1] 1. (6-15) इन आयतों में प्रलय दिवस का चित्र पेश किया गया है। और काफ़िरों की अवस्था बताई गई है कि वे उस दिन किस प्रकार अपने आप को एक खुले मैदान में पायेंगे।
إِذْ نَادَاهُ رَبُّهُ بِالْوَادِ الْمُقَدَّسِ طُوًى ﴾ 16 ﴿
इज् नादाहु रब्बुहू बिल्वादिला – मुक़द्दसि तुवा
जब पवित्र वादी 'तुवा' में उसे उसके पालनहार ने पुकारा।
اذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُ طَغَىٰ ﴾ 17 ﴿
इज़्हब् इला फ़िरऔ-न इन्नहू तग़ा
फ़िरऔन के पास जाओ, वह विद्रोही हो गया है।
فَقُلْ هَل لَّكَ إِلَىٰ أَن تَزَكَّىٰ ﴾ 18 ﴿
फ़कुल हल्-ल-क इला अन् तज़क्का
तथा उससे कहो कि क्या तुम पवित्र होना चाहोगे?
وَأَهْدِيَكَ إِلَىٰ رَبِّكَ فَتَخْشَىٰ ﴾ 19 ﴿
व अहदि-य-क इला रब्बि-क फ़-तख़्शा
और मैं तुम्हें तुम्हारे पालनहार की सीधी राह दिखाऊँ, तो तुम डरोगे?
فَأَرَاهُ الْآيَةَ الْكُبْرَىٰ ﴾ 20 ﴿
फ-अराहुल आ-यतल्-कुब्रा
फिर उसे सबसे बड़ा चिन्ह (चमत्कार) दिखाया।
فَكَذَّبَ وَعَصَىٰ ﴾ 21 ﴿
फ़-कज़्ज़-ब व अ़सा
तो उसने उसे झुठला दिया और बात न मानी।
ثُمَّ أَدْبَرَ يَسْعَىٰ ﴾ 22 ﴿
सुम्-म अदब-र यस्आ
फिर प्रयास करने लगा।
فَحَشَرَ فَنَادَىٰ ﴾ 23 ﴿
फ़-ह-श-र ,फ़नादा
फिर लोगों को एकत्र किया, फिर पुकारा।
فَقَالَ أَنَا رَبُّكُمُ الْأَعْلَىٰ ﴾ 24 ﴿
फ़का-ल अ-न रब्बुकुमुल्-अअ्ला
और कहाः मैं तुम्हारा परम पालनहार हूँ।
فَأَخَذَهُ اللَّهُ نَكَالَ الْآخِرَةِ وَالْأُولَىٰ ﴾ 25 ﴿
फ़-अ-ख़ ज़हुल्लाहु नकालल् आखिरति वल्-ऊला
तो अल्लाह ने उसे संसार तथा परलोक की यातना में घेर लिया।
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَعِبْرَةً لِّمَن يَخْشَىٰ ﴾ 26 ﴿
इन्-न फ़ी ज़ालि-क ल-अिब्-रतल् लिमंय्यख़्शा
वास्तव में, इसमें उसके लिए शिक्षा है, जो डरता है।
أَأَنتُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَمِ السَّمَاءُ ۚ بَنَاهَا ﴾ 27 ﴿
अ-अन्तुम् अशद्दु ख़ल्क़न् अमिस्समा-उ बनाहा
क्या तुम्हें पैदा करना कठिन है अथवा आकाश को, जिसे उसने बनाया।[1] 1. (16-27) यहाँ से प्रलय के होने और पुनः जीवित करने के तर्क आकाश तथा धरती की रचना से दिये जा रहे हैं कि जिस शक्ति ने यह सब बनाया और तुम्हारे जीवन रक्षा की व्यवस्था की है, प्रलय करना और फिर सब को जीवित करना उस के लिये असंभव कैसे हो सकता है? तुम स्वयं विचार कर के निर्णय करो।
رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوَّاهَا ﴾ 28 ﴿
र-फ़-अ़ सम्कहा फ़-सव्वाहा
उसकी छत ऊँची की और चौरस किया।
وَأَغْطَشَ لَيْلَهَا وَأَخْرَجَ ضُحَاهَا ﴾ 29 ﴿
व अगत-श लैलहा व अख्र-ज जुहाहा
और उसकी रात को अंधेरी तथा दिन को उजाला किया।
وَالْأَرْضَ بَعْدَ ذَٰلِكَ دَحَاهَا ﴾ 30 ﴿
वल्अर्-ज़ ब-द ज़ालि-क दहाहा
और इसके बाद धरती को फैलाया।
أَخْرَجَ مِنْهَا مَاءَهَا وَمَرْعَاهَا ﴾ 31 ﴿
अख्र-ज मिन्हा मा-अहा व मरआ़हा
और उससे पानी और चारा निकाला।
وَالْجِبَالَ أَرْسَاهَا ﴾ 32 ﴿
वल्-जिबा-ल अर्साहा
और पर्वतों को गाड़ दिया।
مَتَاعًا لَّكُمْ وَلِأَنْعَامِكُمْ ﴾ 33 ﴿
मताअ़ल्-लकुम् व लि-अन्आ़मिकुम
तुम्हारे तथा तुम्हारे पशुओं के लाभ के लिए।
فَإِذَا جَاءَتِ الطَّامَّةُ الْكُبْرَىٰ ﴾ 34 ﴿
फ़-इज़ा जा-अतित्-ताम्मतुल्-कुब्रा
तो जब प्रलय आयेगी।[1] 1. (28-34) 'बड़ी आपदा' प्रलय को कहा गया है जो उस की घोर स्थिति का चित्रण है।
يَوْمَ يَتَذَكَّرُ الْإِنسَانُ مَا سَعَىٰ ﴾ 35 ﴿
यौ-म य-तज़क्करुल्-इन्सानु मा सआ़
उस दिन इन्सान अपना करतूत याद करेगा।[1] 1. (35) यह प्रलय का तीसरा चरण होगा जब कि वह सामने होगी। उस दिन प्रत्येक व्यक्ति को अपने संसारिक कर्म याद आयेंगे और कर्मानुसार जिस ने सत्य धर्म की शिक्षा का पालन किया होगा उसे स्वर्ग का सुख मिलेगा और जिस ने सत्य धर्म और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नकारा और मनमानी धर्म और कर्म किया होगा वह नरक का स्थायी दुःख भोगेगा।
وَبُرِّزَتِ الْجَحِيمُ لِمَن يَرَىٰ ﴾ 36 ﴿
व बुर्रि-ज़तिल्-जहीमु लिमंय्यरा
और देखने वाले के लिए नरक सामने कर दी जायेगी।
فَأَمَّا مَن طَغَىٰ ﴾ 37 ﴿
फ़-अम्मा मन् तग़ा
तो जिसने विद्रोह किया।
وَآثَرَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا ﴾ 38 ﴿
व आ-सरल् हयातदुन्या
और सांसारिक जीवन को प्राथमिक्ता दी।
فَإِنَّ الْجَحِيمَ هِيَ الْمَأْوَىٰ ﴾ 39 ﴿
फ़-इन्नल्-जही-म हि-यल्-मअ्वा
तो नरक ही उसका आवास होगी।
وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِ وَنَهَى النَّفْسَ عَنِ الْهَوَىٰ ﴾ 40 ﴿
व अम्मा मन् ख़ा-फ़ मका़-म रब्बिही व नहन्-नफ्-स अ़निल्-हवा
परन्तु, जो अपने पालनहार की महानता से डरा तथा अपने आपको मनमानी करने से रोका।
فَإِنَّ الْجَنَّةَ هِيَ الْمَأْوَىٰ ﴾ 41 ﴿
फ़-इन्नल् जन्न-त हि-यल्-मअ्वा
तो निश्चय ही उसका आवास स्वर्ग है।
يَسْأَلُونَكَ عَنِ السَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَاهَا ﴾ 42 ﴿
यस्अलू-न-क अ़निस्सा-अ़ति अय्या-न मुरसाहा
वे आपसे प्रश्न करते हैं कि वह समय कब आयेगा?[1]1. (42) काफ़िरों का यह प्रश्न समय जानने के लिये नहीं, बल्कि हंसी उड़ाने के लिये था।
فِيمَ أَنتَ مِن ذِكْرَاهَا ﴾ 43 ﴿
फ़ी-म अन्-त मिन् ज़िक्राहा
तुम उसकी चर्चा में क्यों पड़े हो?
إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَاهَا ﴾ 44 ﴿
इला रब्बि-क मुन्तहाहा
उसके होने के समय का ज्ञान तुम्हारे पालनहार के पास है।
إِنَّمَا أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَاهَا ﴾ 45 ﴿
इन्नमा अन्-त मुन्ज़िरु मंय्यख़्शाहा
तुम तो उसे सावधान करने के लिए हो, जो उससे डरता है।[1] 1. (45) इस आयत में कहा गया है कि (हे नबी!) सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आप का दायित्व मात्र उस दिन से सावधान करना है। धर्म बलपूर्वक मनवाने के लिये नहीं। जो नहीं मानेगा उसे स्वयं उस दिन समझ में आ जायेगा कि उस ने क्षण भर के संसारिक जीवन के स्वार्थ के लिये अपना स्थायी सुख खो दिया। और उस समय पछतावे का कुछ लाभ नहीं होगा।