सूरह नबा के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है. इस में 40 आयते हैं।
- इस सूरह का नाम ((नबा)) है जिस का अर्थ हैः महत्व पूर्ण सूचना । जिस से अभिप्राय प्रलय तथा फिर से जीवित किये जाने की सूचना है। [1]
- इस की आयत 1 से 5 तक में उन को चेतावनी दी गई है जो व्यामत का उपहास करते है कि वह समय दूर नहीं जब वह आ जायेगी और वह आवाह के सामने उपस्थित होंगे।
- आयत 6 से 16 तक में अल्लाह की शक्ति की निशानियों बताई गई है। जो मरण के पश्चात् जीवन के होने का प्रमाण है और गवाही देती है
- 1 इस सूरह में प्रलय (क्यामत) तथा परलोक (आखिरत) के विश्वास पर बल दिया गया है। तथा इन पर विश्वास करने और न करने का परिणाम बताया गया है। मक्का के बासी इस की हँसी उड़ाते थे। कोई कहता कि यह हो ही नहीं सकता। किसी को संदेह था। किसी का विचार था कि यदि ऐसा हुआ तो भी हमारे देवी देवता हमारी अभिस्तावना कर देंगे, जैसा कि आगामी आयतों से विद्धित होता है।
“भारी सूचना” का अर्थः कुन द्वारा दी गई प्रलय और परलोक की सूचना है। प्रलय और परलोक पर विश्वास सत्य धर्म की मूल आस्था है। यदि प्रलय और परलोक पर विश्वास न हो तो धर्म का कोई महत्व नहीं रह जाता। क्योंकि जब कर्म का कोई फल ही न हो, और न कोई न्याय और प्रतिकार का दिन हो तो फिर सभी अपने स्वार्थ के लिये मनमानी करने के लिये आज़ाद होंगे, और अत्याचार तथा अन्याय के कारण पूरा मानव संसार नरक बन जायेगा।इन प्रश्नात्मक वाक्यों में प्रकृति द्वारा मानव जाति के प्रतिपालन जीवन रक्षा और सुख सुविधा की जिस व्यवस्था की चचर्चा की गई है उस पर विचार किया जाये तो इस का उत्तर यही होगा कि यह व्यवस्थापक के बिना नहीं हो सकती। और पूरी प्रकृति एक निर्धारित नियमानुसार काम कर रही है। तो जिस के लिये यह सब हो रहा है उस का भी कोई स्वाभाविक कर्तव्य अवश्य होगा जिस की पूछ होगी। जिस के लिये न्याय और प्रतिकार का दिन होना चाहिये जिस में सब को न्याय पूर्वक प्रतिकार दिया जाये। और जिस शक्ति ने यह सारी व्यवस्था की है उस दिन को निर्धारित करना भी उसी का काम है।कि प्रतिफल का दिन अनिवार्य है। - आयत 17 से 20 तक में बताया गया है कि प्रतिफल का दिन निश्चित समय पर होगा। उस दिन आकाश तथा धरती की व्यवस्था में भारी परिवर्तन हो जायेगा और सब मनुष्य अल्लाह के न्यायालय की ओर चल पड़ेंगे।
- आयत 21 से 36 तक में दुराचारियों के दुष्परिणाम तथा सदाचारियों के शुभपरिणाम को बताया है।
- अन्तिम आयतों में अल्लाह के न्यायालय में उपस्थिति का चित्र दिखाया गया है और यह बताया गया है कि सिफारिश के बल पर कोई जवाबदेही से नहीं बच सकेगा।
सूरह अल-नबा | Surah Naba in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
عَمَّ يَتَسَاءَلُونَ ﴾ 1 ﴿
अम्मा यतासा अ लून◌
वे आपस में किस विषय में प्रश्न कर रहे हैं?
عَنِ النَّبَإِ الْعَظِيمِ ﴾ 2 ﴿
अनिन नबाअिल अज़ीम◌
बहुत बड़ी सूचना के विषय में।
الَّذِي هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ ﴾ 3 ﴿
अल्लज़ी हुम फीहि मुख्तलिफून◌
जिसमें मतभेद कर रहे हैं।
كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ﴾ 4 ﴿
कल्ला सा यअ ल मून◌
निश्चय वे जान लेंगे।
ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ﴾ 5 ﴿
सुम्मा कल्ला सा यअ ल मून◌
फिर निश्चय वे जान लेंगे।[1] 1. (1-5) इन आयतों में उन को धिक्कारा गया है, जो प्रलय की हँसी उड़ाते हैं। जैसे उन के लिये प्रलय की सूचना किसी गंभीर चिन्ता के योग्य नहीं। परन्तु वह दिन दूर नहीं जब प्रलय उन के आगे आ जायेगी और वे विश्व विधाता के सामने उत्तरदायित्व के लिये उपस्थित होंगे।
أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ مِهَادًا ﴾ 6 ﴿
अलम यज अलिल अर्दा मिहादा◌
क्या हमने धरती को पालना नहीं बनाया?
وَخَلَقْنَاكُمْ أَزْوَاجًا ﴾ 8 ﴿
व् खलक़ ना कुम अज़ वाजा◌
तथा तुम्हें जोड़े-जोड़े पैदा किया।
وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًا ﴾ 9 ﴿
वजा अलना नौ म कुम सुबाता◌
तथा तुम्हारी निद्रा को स्थिरता (आराम) बनाया।
وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ لِبَاسًا ﴾ 10 ﴿
वजा अल्नल लै ल लिबासा◌
और रात को वस्त्र बनाया।
وَجَعَلْنَا النَّهَارَ مَعَاشًا ﴾ 11 ﴿
वजा अल्नन नहा र म आशा◌
और दिन को कमाने के लिए बनाया।
وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًا شِدَادًا ﴾ 12 ﴿
वबा नैइ ना फौ क़ कुम सब अन शिदादा◌
तथा हमने तुम्हारे ऊपर सात दृढ़ आकाश बनाये।
وَجَعَلْنَا سِرَاجًا وَهَّاجًا ﴾ 13 ﴿
वजा अलना सिरजौं वह्हाजा◌
और एक दमकता दीप (सूर्य) बनाया।
وَأَنزَلْنَا مِنَ الْمُعْصِرَاتِ مَاءً ثَجَّاجًا ﴾ 14 ﴿
व अन्जलना मिनल मु अ सिराति मा अन सज्जाजा◌
और बादलों से मूसलाधार वर्षा की।
لِّنُخْرِجَ بِهِ حَبًّا وَنَبَاتًا ﴾ 15 ﴿
लिनुखरिज़ा बिही हब्बऔ व नबाता◌
ताकि उससे अन्न और वनस्पति उपजायें।
وَجَنَّاتٍ أَلْفَافًا ﴾ 16 ﴿
व जन्नातिन अल्फाफा◌
और घने-घने बाग़।[1] 1. (6-16) इन आयतों में अल्लाह की शक्ति प्रतिपालन (रूबूबिय्यत) और प्रज्ञा के लक्षण दर्शाये गये हैं जो यह साक्ष्य देते हैं कि प्रतिकार (बदले) का दिन आवश्यक है, क्योंकि जिस के लिये इतनी बड़ी व्यवस्था की गई हो और उसे कर्मों के अधिकार भी दिये गये हों तो उस के कर्मों का पुरस्कार या दण्ड तो मिलना ही चाहिये।
إِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ كَانَ مِيقَاتًا ﴾ 17 ﴿
इन्ना यौमल फसलि का न मी क़ाता◌
निश्चय निर्णय (फ़ैसले) का दिन निश्चित है।
يَوْمَ يُنفَخُ فِي الصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًا ﴾ 18 ﴿
यौमा युन् फखु फिस सूरि फतअ तूना अफ् वाजा◌
जिस दिन सूर में फूँका जायेगा। फिर तुम दलों ही दलों में चले आओगे।
وَفُتِحَتِ السَّمَاءُ فَكَانَتْ أَبْوَابًا ﴾ 19 ﴿
व फुतिहतिस् समाउ फ कानत अब् वाबा◌
और आकाश खोल दिया जायेगा, तो उसमें द्वार ही द्वार हो जायेंगे।
وَسُيِّرَتِ الْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا ﴾ 20 ﴿
व सुय्यीरतिल जिबालु फ कानत सराबा◌
और पर्वत चला दिये जायेंगे, तो वे मरिचिका बन जायेंगे।[1] 1. (17-20) इन आयतों में बताया जा रहा है कि निर्णय का दिन अपने निश्चित समय पर आकर रहेगा, उस दिन आकाश तथा धरती में एक बड़ी उथल पुथल होगी। इस के लिये सूर में एक फूँक मारने की देर है। फिर जिस की सूचना दी जा रही है तुम्हारे सामने आ जायेगी। तुम्हारे मानने या न मानने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। और सब अपना ह़िसाब देने के लिये अल्लाह के न्यायालय की ओर चल पड़ेंगे।
إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًا ﴾ 21 ﴿
इन्ना जहान्नमा कानत मिर सादा◌
वास्तव में, नरक घात में है।
لِّلطَّاغِينَ مَآبًا ﴾ 22 ﴿
लित् त्वागीना म आबा◌
जो दुराचारियों का स्थान है।
لَّابِثِينَ فِيهَا أَحْقَابًا ﴾ 23 ﴿
ला बिसीना फी हा अह क़ाबा◌
जिसमें वे असंख्य वर्षों तक रहेंगे।
لَّا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًا وَلَا شَرَابًا ﴾ 24 ﴿
ला यजू कूना फीहा बरदौं वला शराबा◌
उसमें ठणडी तथा पेय (पीने की चीज़) नहीं चखेंगे।
إِلَّا حَمِيمًا وَغَسَّاقًا ﴾ 25 ﴿
इल्ला हमीमौओं व गस्साक़ा◌
सिवाये गर्म पानी और पीप रक्त के।
جَزَاءً وِفَاقًا ﴾ 26 ﴿
जजा औं वि फाक़ा◌
ये पूरा-पूरा प्रतिफल है।
إِنَّهُمْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ حِسَابًا ﴾ 27 ﴿
इन्नहुम कानू ला यर्जूना हिसाबा◌
निःसंदेह वे ह़िसाब की आशा नहीं रखते थे।
وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا كِذَّابًا ﴾ 28 ﴿
व कज्ज़बू बि आयातिना किज़्ज़ाबा◌
तथा वे हमारी आयतों को झुठलाते थे।
وَكُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ كِتَابًا ﴾ 29 ﴿
व कुल्ला शैइन अह सैइनाहू किताबा◌
और हमने सब विषय लिखकर सुरक्षित कर लिये हैं।
فَذُوقُوا فَلَن نَّزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا ﴾ 30 ﴿
फ ज़ूकू फ लन नजी’दकुम इल्ला अजाबा
तो चखो, हम तुम्हारी यातना अधिक ही करते रहेंगे।[1] 1. (21-30) इन आयतों में बताया गया है कि जो ह़िसाब की आशा नहीं रखते और हमारी आयतों को नहीं मानते हम ने उन के एक एक कर्तूत को गिन कर अपने यहाँ लिख रखा है। और उन की ख़बर लेने के लिये नरक घात लगाये तैयार है, जहाँ उन के कुकर्मों का भरपूर बदला दिया जायेगा।
إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا ﴾ 31 ﴿
इन्ना लिल मुत्तकीना मफाज़ा◌
वास्तव में, जो डरते हैं उन्हीं के लिए सफलता है।
حَدَائِقَ وَأَعْنَابًا ﴾ 32 ﴿
हदाइका व अअ् नाबा◌
बाग़ तथा अँगूर हैं।
وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًا ﴾ 33 ﴿
व कवाइबा अतराबा◌
और नवयुवति कुमारियाँ।
لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا وَلَا كِذَّابًا ﴾ 35 ﴿
ला यस मऊना फीहा लग वौ वला किज़्ज़ाबा◌
उसमें बकवास और मिथ्या बातें नहीं सुनेंगे।
جَزَاءً مِّن رَّبِّكَ عَطَاءً حِسَابًا ﴾ 36 ﴿
जज़ाअम मिर् रब्बिका अता अन हिसाबा◌
ये तुम्हारे पालनहार की ओर से भरपूर पुरस्कार है।
رَّبِّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا الرَّحْمَٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًا ﴾ 37 ﴿
रब्बिस् समावाती वल अर्दी वमा बै’नहुमर् रहमानि ला यम्लिकूना मिन्हु खिताबा◌
जो आकाश, धरती तथा जो उनके बीच है, सबका अति करुणामय पालनहार है। जिससे बात करने का वे साहस नहीं कर सकेंगे।
يَوْمَ يَقُومُ الرُّوحُ وَالْمَلَائِكَةُ صَفًّا ۖ لَّا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرَّحْمَٰنُ وَقَالَ صَوَابًا ﴾ 38 ﴿
यौमा यकूमुर् रुहु वल् मलाइकतु सफ्फा, ला यता कल्लामूना इल्ला मन अजि न लहुर् रहमानु व क़ाला सवाबा◌
जिस दिन रूह़ (जिब्रील) तथा फ़रिश्ते पंक्तियों में खड़े होंगे, वही बात कर सकेगा जिसे रहमान (अल्लाह) आज्ञा देगा और सह़ीह़ बात करेगा।
ذَٰلِكَ الْيَوْمُ الْحَقُّ ۖ فَمَن شَاءَ اتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِ مَآبًا ﴾ 39 ﴿
ज़ालिकल यौमुल हक्क़, फ मन शा’अत् त ख ज इला रब्बिही म आबा◌
वह दिन निःसंदेह होना ही है। अतः जो चाहे अपने पालनहार की ओर (जाने का) ठिकाना बना ले।[1] 1. (37-39) इन आयतों में अल्लाह के न्यायालय में उपस्थिति (ह़ाज़िरी) का चित्र दिखाया गया है। और जो इस भ्रम में पड़े हैं कि उन के देवी देवता आदि अभिस्तावना करेंगे उन को सावधान किया गया है कि उस दिन कोई बिना उस की आज्ञा के मुँह नहीं खोलेगा और अल्लाह की आज्ञा से अभिस्तावना भी करेगा तो उसी के लिये जो संसार में सत्य वचन "ला इलाहा इल्लल्लाह" को मानता हो। अल्लाह के द्रोही और सत्य के विरोधी किसी अभिस्तावना के योग्य नगीं होंगे।
إِنَّا أَنذَرْنَاكُمْ عَذَابًا قَرِيبًا يَوْمَ يَنظُرُ الْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ الْكَافِرُ يَا لَيْتَنِي كُنتُ تُرَابًا ﴾ 40 ﴿
इन्ना अंज़र ना कुम अज़ाबन क़रीब, यौ म यंजुरुल मर उ मा कद् दमत यदाहु व यकूलुल् काफिरु या लैतनी कुन्तु तुराबा◌
हमने तुम्हें समीप यातना से सावधान कर दिया, जिस दिन इन्सान अपना करतूत देखेगा और काफ़िर (विश्वासहीन) कहेगा कि काश मैं मिट्टी हो जाता![1] 1. (40) बात को इस चेतावनी पर समाप्त किया गया है कि जिस दिन के आने की सूचना दी जा रही है, उस का आना सत्य है, उसे दूर न समझो। अब जिस का दिल चाहे इसे मान कर अपने पालनहार की ओर मार्ग बना ले। परन्तु इस चेतावनी के होते जो इन्कार करेगा उस का किया धरा सामने आयेगा तो पछता-पछता कर यह कामना करेगा कि मैं संसार में पैदा ही न होता। उस समय इस संसार के बारे में उस का यह विचार होगा जिस के प्रेम में आज वह परलोक से अंधा बना हुआ है।