सूरह कसस के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 88 आयतें हैं।
इस सूरह का नाम इस की आयत नं 25 में आये हुये शब्द ((क़सस )) से लिया गया है। जिस का अर्थः वाक्य क्रम का वर्णन करना है। इस सूरह में मूसा (अलैहिस्सलाम) के जन्म, उन का अपने शत्रु के भवन मैं पालन-पोषण, फिर उन के मदयन जाने और दस वर्ष के पश्चात् अपने परिजनों के साथ अपने देश वापिस आने और राह में नबूवत और चमत्कार मिलने और फिरऔन तथा उस की जाति के ईमान न लाने के कारण अपनी सेना के साथ डुबो दिये जाने का पूरा विवरण है। जिस से यह बताया गया है कि अल्लाह जो कुछ करना चाहता है उस के संसाधन इस प्रकार बना देता है कि किसी को उस का ज्ञान भी नहीं होता। इसी प्रकार किसी को नबी बनाने के लिये आकाश और धरती में कोई एलान नहीं किया जाता। अतः यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) कैसे और कब नबी हो गये।
- इस में यह बताया गया है कि अल्लाह जिस से काम लेना चाहता है उसे किसी राज्य और सेना की सहायता की आवश्यक्ता नहीं होती और अन्ततः वही सफल होता है।
- इस में यह संकेत भी है कि सत्य के विरोधी चमत्कार की माँग तो करते हैं किन्तु वह चमत्कार देख कर भी ईमान नहीं लाते जैसा कि मूसा (अलैहिस्सलाम) की जाति ने किया और स्वयं अपना विनाश कर लिया
- यह पूरी सूरह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सत्य नबी होने का प्रमाण भी है क्यों कि हज़ारों वर्ष पुरानी मूसा (अलैहिस्सलाम) की पूरी स्थिति का विवरण इस प्रकार वही दे सकता है जिसे अल्लाह ने वह्यी द्वारा यह सब कुछ बताया हो।
- अन्यथा आप स्वयं निरक्षर थे और अरब में आप के पास ऐसे साधन भी नहीं थे जिस से आप यह सब कुछ जान सकें।
इस में मक्का के काफिरों को कुछ ईसाईयों के क़ुरआन पाक सुन कर ईमान लाने पर लज्जित किया गया है कि तुम ने अपने घर की बात नहीं मानी। - और इस के अन्त में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को दिलासा देते हुये सत्य पर स्थित रहने का निर्देश दिया गया है।
सूरह अल-कसस | Surah Al Qasas in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ الْمُبِينِ ﴾ 2 ﴿
तिल् क आयातुल किताबिल् – मुबीन
ये इस खुली पुस्तक की आयतें हैं।
نَتْلُو عَلَيْكَ مِن نَّبَإِ مُوسَىٰ وَفِرْعَوْنَ بِالْحَقِّ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴾ 3 ﴿
नत्लू अ़लै- क मिन् न बइ मूसा व फिरऔ-न बिल्हक्कि लिकौमिंय् – युअ्मिनून
हम आपके समक्ष सुना रहे हैं, मूसा तथा फ़िरऔन के कुछ समाचार, सत्य के साथ, उन लोगों के लिए, जो ईमान रखते हैं।
إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِي الْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًا يَسْتَضْعِفُ طَائِفَةً مِّنْهُمْ يُذَبِّحُ أَبْنَاءَهُمْ وَيَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ ۚ إِنَّهُ كَانَ مِنَ الْمُفْسِدِينَ ﴾ 4 ﴿
इन् – न फिरऔ-न अ़ला फिल्अर्जि व ज-अ-ल अह़्लहा शि-यअ़ंय् – यस्तजअिफु ताइ – फ़तम् मिन्हुम् युज़ब्बिहु अब्ना – अहुम् व यस्तह़्यी निसा – अहुम्, इन्नहू का-न मिनल् – मुफ़्सिदीन
वास्तव में, फ़िरऔन ने उपद्रव किया धरती में और कर दिया उसके निवासियों को कई गिरोह। वह निर्बल बना रहा था एक गिरोह को उनमें से, वध कर रहा था उनके पुत्रों को और जीवित रहने देता था उनकी स्त्रियों को। निश्चय वह उपद्रवियों में से था।
وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا فِي الْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ الْوَارِثِينَ ﴾ 5 ﴿
व नुरीदु अन् – नमुन्- न अलल्लज़ीनस्तुज़अिफू फिल्अर्जि व नज् अ – लहुम् अ – इम्मतंव्-व नज्अ़-लहुमुल्-वारिसीन
तथा हम चाहते थे कि उनपर दया करें, जो निर्बल बना दिये गये धरती में तथा बना दें उन्हीं को प्रमुख और बना दें उन्हीं को[1] उत्तराधिकारी। 1. अर्थात मिस्र देश का राज्य उन्हीं को प्रदान कर दें।
وَنُمَكِّنَ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَنُرِيَ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَجُنُودَهُمَا مِنْهُم مَّا كَانُوا يَحْذَرُونَ ﴾ 6 ﴿
व नुमक्कि – न लहुम् फिल् अर्जि व नुरि – य फिरऔं – न व हामा – न व जुनू – दहुमा मिन्हुम् मा कानू यहज़रून
तथा उन्हें शक्ति प्रदान कर दें और दिखा दें फ़िरऔन तथा हामान और उनकी सेनाओं को उनकी ओर से वह, जिससे वे डर रहे[1] थे। 1. अर्थात बनी इस्राईल के हाथों अपने राज्य के पतन से।
وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ أُمِّ مُوسَىٰ أَنْ أَرْضِعِيهِ ۖ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِي الْيَمِّ وَلَا تَخَافِي وَلَا تَحْزَنِي ۖ إِنَّا رَادُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 7 ﴿
व औहैना इला उम्मि मूसा अन् अरज़िईहि फ़-इज़ा खिफ्ति अ़लैहि फ़ अल्कीहि फ़िल्यम्मि व ला तख़ाफ़ी व ला तह्ज़नी इन्ना राद्दुहु इलैकि व जाअिलूहु मिनल् – मुर्सलीन
और हमने वह़्यी[1] की मूसा की माता की ओर कि उसे दूध पिलाती रह और जब तुझे उसपर भय हो, तो उसे सागर में डाल दे और भय न कर और न चिन्ता कर, निःसंदेह, हम वापस लायेंगे उसे तेरी ओर और बना देंगे उसे रसूलों में से। 1. जब मूसा का जन्म हुआ तो अल्लाह ने उन के माता के मन में यह बातें डाल दीं।
فَالْتَقَطَهُ آلُ فِرْعَوْنَ لِيَكُونَ لَهُمْ عَدُوًّا وَحَزَنًا ۗ إِنَّ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَجُنُودَهُمَا كَانُوا خَاطِئِينَ ﴾ 8 ﴿
फ़ल्त-क़-तहू आलु फिरऔ-न लि-यकू-न लहुम् अदुव्व्ं-व ह-ज़नन्, इन्-न फ़िरऔ-न व हामा-न व जुनू – दहुमा कानू ख़ातिईन
तो ले लिया उसे फ़िरऔन के कर्मचारियों ने,[1] ताकि वह बने उनके लिए शत्रु तथा दुःख का कारण। वास्तव में, फ़िरऔन तथा हामान और उनकी सेनाएँ दोषी थीं। 1. अर्थात उसे एक संदूक में रख कर सागर में डाल दिया जिसे फ़िरऔन की पत्नि ने निकाल कर उसे (मूसा को) अपना पुत्र बना लिया।
وَقَالَتِ امْرَأَتُ فِرْعَوْنَ قُرَّتُ عَيْنٍ لِّي وَلَكَ ۖ لَا تَقْتُلُوهُ عَسَىٰ أَن يَنفَعَنَا أَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴾ 9 ﴿
व क़ालतिम्-र-अतु फ़िरऔ़-न कुर्रतु ऐनिल्-ली व ल-क, ला तक्तुलूहु अ़सा अंय्यन्फ़-अ़ना औ नत्तखि-ज़हू व – लदंव् – व हुम्ला यश्अुरून
और फ़िरऔन की पत्नि ने कहाः ये मेरी तथा आपकी आँखों की ठण्डक है। इसे वध न कीजिये, संभव है हमें लाभ पहुँचाये या उसे हम पुत्र बना लें और वे समझ नहीं रहे थे।
وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَىٰ فَارِغًا ۖ إِن كَادَتْ لَتُبْدِي بِهِ لَوْلَا أَن رَّبَطْنَا عَلَىٰ قَلْبِهَا لِتَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 10 ﴿
व अस्ब – ह फुआदु उम्मि मूसा फ़ारिगन्, इन् कादत् लतुब्दी बिही लौ ला अर्र-बत्ना अ़ला क़ल्बिहा लि-तकू न मिनल्-मुअ्मिनीन
और हो गया मूसा की माँ का दिल व्याकूल, समीप था कि वह उसका भेद खोल देती, यदि हम आश्वासन न देते उसके दिल को, ताकि वह हो जाये विश्वास करने वालों में।
وَقَالَتْ لِأُخْتِهِ قُصِّيهِ ۖ فَبَصُرَتْ بِهِ عَن جُنُبٍ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴾ 11 ﴿
व कालत् लिउख़्तिही कुस्सीहि फ – बसुरत् बिही अ़न् जुनुबिंव् – व हुम्ला यश्अुरून
तथा (मूसा की माँ ने) कहा उसकी बहन से कि तू इसके पीछे-पीछे जा। और उसने उसे दूर ही दूर से देखा और उन्हें इसका आभास तक न हुआ।
وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ الْمَرَاضِعَ مِن قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ أَهْلِ بَيْتٍ يَكْفُلُونَهُ لَكُمْ وَهُمْ لَهُ نَاصِحُونَ ﴾ 12 ﴿
व हर्रम्ना अ़लैहिल्- मराज़ि-अ मिन् क़ब्लु फ़क़ालत् हल् अदुल्लुकुम् अ़ला अहिल बैतिंय् – यक्फुलूनहू लकुम् व हुम् लहू नासिहून
और हमने अवैध (निषेध) कर दिया उस (मूसा) पर दाइयों को इससे[1] पूर्व। तो उस (की बहन) ने कहाः क्या मैं तुम्हें न बताऊँ ऐसा घराना, जो पालनपोषण करें इसका तुम्हारे लिए तथा वे उसके शुभचिनतक हों? 1. अर्थात उस की माता के पास आने से पूर्व।
فَرَدَدْنَاهُ إِلَىٰ أُمِّهِ كَيْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 13 ﴿
फ़- रदद्नाहु इला उम्मिही कै तकर्-र ऐनुहा व ला तह्ज़-न व लितअ्-ल-म अन् – न वअ्दल्लाहि हक़्कुंव् – व लाकिन् – न अक्स- रहुम्ला यअ्लमून
तो हमने फेर दिया उसे उसकी माँ की ओर, ताकि ठण्डी हो उसकी आँख और चिन्ता न करे और ताकि उसे विश्वास हो जाये कि अल्लाह का वचन सच है, परन्तु अधिक्तर लोग विश्वास नहीं रखते।
وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَىٰ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ ﴾ 14 ﴿
व लम्मा ब-ल-ग़ अशुद् – दहू वस्तवा आतैनाहु हुक्मंव् – व अिल्मन्, व कज़ालि- क नज्ज़िल् मुह्सिनीन
और जब वह अपनी युवावस्था को पहुँचा और उसका विकास पूरा हो गया, तो हमने उसे प्रबोध तथा ज्ञान दिया और इसी प्रकार, हम बदला देते हैं सदाचारियों को।
وَدَخَلَ الْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَٰذَا مِن شِيعَتِهِ وَهَٰذَا مِنْ عَدُوِّهِ ۖ فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِن شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ فَوَكَزَهُ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَٰذَا مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّهُ عَدُوٌّ مُّضِلٌّ مُّبِينٌ ﴾ 15 ﴿
व द – ख़लल् – मदी – न त अ़ला हीनि ग़फ़्लतिम् मिन् अह्लिहा फ़ व-ज- द फीहा रजुलैनि यक्ततिलानि, हाज़ा मिन् शी – अ़तिही व हाज़ा मिन् अ़दुव्विही फ़स्तग़ा सहुल्लज़ी मिन् शी – अ़तिही अलल्लज़ी मिन् अदुव्विही फ-व-क-ज़हू मूसा फ़- कज़ा अ़लैहि का – ल हाज़ा मिन् अ- मलिश् – शैतानि, इन्नहू अ़दुव्वुम् – मुज़िल्लुम् – मुबीन
और उसने प्रवेश किया नगर में उसके वासियों की अचेतना के समय और उसमें दो व्यक्तियों को लड़ते हुए पाया, ये उसके गिरोह से था और दूसरा उसके शत्रु में[1] से। तो पुकारा उसने, जो उसके गिरोह से था, उसके विरुध्द, जो उसके शत्रु में से था। जिसपर मूसा ने उसे घूँसा मारा और वह मर गया। मूसा ने कहाः ये शैतानी कर्म है। वास्तव में, वह शत्रु है खुला, कुपथ करने वाला। 1. अर्थात एक इस्राईली तथा दूसरा क़िब्ती फ़िरऔन की जाति से था।
قَالَ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ ﴾ 16 ﴿
का-ल रब्बि इन्नी ज़लम्तु नफ्सी फ़ग्फ़िर् ली फ़-ग़-फ़-र लहू, इन्नहू हुवल ग़फूरूर्रहीम
उसने कहाः हे मेरे पालनहार! मैंने अपने ऊपर अत्याचार कर लिया, तू मुझे क्षमा कर दे। फिर अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया। वास्तव में, वह क्षमाशील, अति दयावान् है।
قَالَ رَبِّ بِمَا أَنْعَمْتَ عَلَيَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًا لِّلْمُجْرِمِينَ ﴾ 17 ﴿
का-ल रब्बि बिमा अन् अम्-त अलय्-य फ-लन् अकू-न ज़हीरल्-लिल्मुज्रिमीन
उसने कहाः उसके कारण, जो तूने मुझपर पुरस्कार किया है, अब मैं कदापि अपराधियों का सहायक नहीं बनूँगा।
فَأَصْبَحَ فِي الْمَدِينَةِ خَائِفًا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا الَّذِي اسْتَنصَرَهُ بِالْأَمْسِ يَسْتَصْرِخُهُ ۚ قَالَ لَهُ مُوسَىٰ إِنَّكَ لَغَوِيٌّ مُّبِينٌ ﴾ 18 ﴿
फ- अस्ब ह फिल्मदी नति खाइफ़ंय्य तरक़्क़बु फ़ इज़ल् लजिस्तन्स – रहू बिल्अम्सि यस्तस्रिखुहू, का – ल लहू मूसा इन्न – क ल- ग़विय्युम् – मुबीन
फिर प्रातः वह नगर में डरता हुआ समाचार लेने गया, तो सहसा वही जिसने उससे कल सहायता माँगी थी, उसे पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहाः वास्तव में, तूही खुला कुपथ है।
فَلَمَّا أَنْ أَرَادَ أَن يَبْطِشَ بِالَّذِي هُوَ عَدُوٌّ لَّهُمَا قَالَ يَا مُوسَىٰ أَتُرِيدُ أَن تَقْتُلَنِي كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًا بِالْأَمْسِ ۖ إِن تُرِيدُ إِلَّا أَن تَكُونَ جَبَّارًا فِي الْأَرْضِ وَمَا تُرِيدُ أَن تَكُونَ مِنَ الْمُصْلِحِينَ ﴾ 19 ﴿
फ़- लम्मा अन् अरा- द अंय्यब्ति-श बिल्लज़ी हु – व अ़दुव्वुल् – लहुमा का-ल या मूसा अतुरीदु अन् तक्तु-लनी कमा क़तल्-त नफ़्सम्-बिलअम्सि इन् तुरीदु इल्ला अन्-तकू-न जब्बारन् फिल्अर्जि व मा तुरीदु अन् तकू-न मिनल्- मुस्लिहीन
फिर जब पकड़ना चाहा उसे, जो उन दोनों का शत्रु था, तो उसने कहाः हे मूसा! क्या तू मुझे मार देना चाहता है, जैसे मार दिया एक व्यक्ति को कल? तू तो चाहता है कि बड़ा उपद्रवी बनकर रहे इस धरती में और तू नहीं चाहता कि सुधार करने वालों में से हो।
وَجَاءَ رَجُلٌ مِّنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ يَسْعَىٰ قَالَ يَا مُوسَىٰ إِنَّ الْمَلَأَ يَأْتَمِرُونَ بِكَ لِيَقْتُلُوكَ فَاخْرُجْ إِنِّي لَكَ مِنَ النَّاصِحِينَ ﴾ 20 ﴿
व जा-अ रजुलुम् – मिन् अक्सल् मदी – नति यसआ, का-ल या मूसा इन्नल-म-ल-अ यअ्तमिरू-न बि-क लि- यक्तुलू-क फख़्रुज् इन्नी ल- क मिनन्नासिहीन
और आया एक पुरुष नगर के किनारे से दौड़ता हुआ, उसने कहाः हे मूसा! (राज्य के) प्रमुख प्रामर्श कर रहे हैं तेरे विषय में कि तुझे वध कर दें, अतः तू निकल जा। वास्तव में, मैं तेरे शुभचिन्तकों में से हूँ।
فَخَرَجَ مِنْهَا خَائِفًا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 21 ﴿
फ़-ख-र-ज मिन्हा ख़ाइफंय्-य तरक़्क़बु का-ल रब्बि नज्जिनी मिनल् कौमिज़्ज़ालिमीन *
फ़-ख-र-ज मिन्हा ख़ाइफंय्-य तरक़्क़बु का-ल रब्बि नज्जिनी मिनल् कौमिज़्ज़ालिमीन *
وَلَمَّا تَوَجَّهَ تِلْقَاءَ مَدْيَنَ قَالَ عَسَىٰ رَبِّي أَن يَهْدِيَنِي سَوَاءَ السَّبِيلِ ﴾ 22 ﴿
व लम्मा तवज्ज-ह तिल्का-अ मद्-य-न का-ल अ़सा रब्बी अंय्यह्दि-यनी सवा-अस्सबील
और जब वह जाने लगा मद्यन की ओर, तो उसने कहाः मूझे आशा है कि मेरा पालनहार मुझे दिखायेगा सीधा मार्ग।
وَلَمَّا وَرَدَ مَاءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةً مِّنَ النَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِن دُونِهِمُ امْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ ۖ قَالَ مَا خَطْبُكُمَا ۖ قَالَتَا لَا نَسْقِي حَتَّىٰ يُصْدِرَ الرِّعَاءُ ۖ وَأَبُونَا شَيْخٌ كَبِيرٌ ﴾ 23 ﴿
व लम्मा व-र-द मा-अ मद्-य-न व-ज-द अ़लैहि उम्म- तम् मिनन्नासि यस्कू – न, व व-ज द मिन् दूनिहिमुम् – र अतैनि तजूदनि का-ल मा ख़त्बुकुमा, का-लता ला नस्की हत्ता युस्दिर्र- रिआ़-उ, व अबूना शैखुन् कबीर
और जब उतरा मद्यन के पानी पर, तो पाया उसपर लोगों का एक समूह, जो (अपने पशुओं को) पानी पिला रहा था तथा पाया उसके पीछे दो स्त्रियों को (अपने पशुओं को) रोकती हुईं। उसने कहाः तुम्हारी समस्या क्या है? दोनों ने कहाः हम पानी नहीं पिलातीं, जब तक चरवाहे चले न जायें और हमारे पिता बहुत बूढ़े हैं।
فَسَقَىٰ لَهُمَا ثُمَّ تَوَلَّىٰ إِلَى الظِّلِّ فَقَالَ رَبِّ إِنِّي لِمَا أَنزَلْتَ إِلَيَّ مِنْ خَيْرٍ فَقِيرٌ ﴾ 24 ﴿
फ़-सका लहुमा सुम् – म तवल्ला इलज़्ज़िल्लि फ़का – ल रब्बि इन्नी लिमा अन्ज़ल् – त इलय् – य मिन् ख़ैरिन् फ़क़ीर
तो उसने पिला दिया दोनों के लिए। फिर चल दिया छाया की ओर और कहने लगाः हे मेरे पालनहार! तू, जोभी भलाई मुझपर उतार दे, मैं उसका आकांक्षी हूँ।
فَجَاءَتْهُ إِحْدَاهُمَا تَمْشِي عَلَى اسْتِحْيَاءٍ قَالَتْ إِنَّ أَبِي يَدْعُوكَ لِيَجْزِيَكَ أَجْرَ مَا سَقَيْتَ لَنَا ۚ فَلَمَّا جَاءَهُ وَقَصَّ عَلَيْهِ الْقَصَصَ قَالَ لَا تَخَفْ ۖ نَجَوْتَ مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 25 ﴿
फ़जा – अत्हु इह्दाहुमा तम्शी अ़-लस्तिह़्याइन् कालत् इन् – न अबी यद्-अू -क लि- यज्ज़ि-य-क अज्र मा सक़ै-त लना, फ़ लम्मा जा- अहू व क़स् – स अ़लैहिल्-क़-स-स क़ा-ल ला त – ख़फ् नजौ – त मिनल् कौमिज़्ज़ालिमीन
तो आई उसके पास दोनों में से एक स्त्री चलती हुई लज्जा के साथ, उसने कहाः मेरे पिता[1]आपको बुला रहे हैं। ताकि आपको उसका पारिश्रमिक दें, जो आपने पानी पिलाया है हमारे लिए। फिर जब (मूसा) उसके पास पहुँचा और पूरी कथा उसे सुनाई, तो उसने कहाः भय न कर। तू मुक्त हो गया अत्याचारी[2] जाति से। 1. व्याख्या कारों ने लिखा है कि वह आदरणीय शोऐब (अलैहिस्सलाम) थे जो मद्यन के नबी थे। (देखियेः इब्ने कसीर) 2. अर्थात फ़िरऔनियों से।
قَالَتْ إِحْدَاهُمَا يَا أَبَتِ اسْتَأْجِرْهُ ۖ إِنَّ خَيْرَ مَنِ اسْتَأْجَرْتَ الْقَوِيُّ الْأَمِينُ ﴾ 26 ﴿
कालत् इह्दाहुमाया अ- बतिस्तअ्जिरहु इन् – न ख़ै-र मनिस्तअ्जरतल् – क़विय्युल् – अमीन
कहा उन दोनों में से एक नेः हे पिता! आप इन्हें सेवक रख लें, सबसे उत्तम जिसे आपसेवक बनायें वही हो सकता है, जो प्रबल विश्वसनीय हो।
قَالَ إِنِّي أُرِيدُ أَنْ أُنكِحَكَ إِحْدَى ابْنَتَيَّ هَاتَيْنِ عَلَىٰ أَن تَأْجُرَنِي ثَمَانِيَ حِجَجٍ ۖ فَإِنْ أَتْمَمْتَ عَشْرًا فَمِنْ عِندِكَ ۖ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ ۚ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ ﴾ 27 ﴿
का – ल इन्नी उरीदु अन् उन्कि – ह क इह्दब् – नतय् – य हातैनि अ़ला अन् तअ्जु – रनी समानि य हि – जजिन् फ़- इन् अत्मम् – त अ़श्रन्फ़ – मिन् अिन्दि-क व मा उरीदु अन् अशुक् क अ़लै-क, स- तजिदुनी इन्शा-अल्लाहु मिनस्सालिहीन
उसने कहाः मैं चाहता हूँ कि विवाह दूँ तुम्हें अपनी इन दो पुत्रियों में से एक से, इसपर कि मेरी सेवा करोगे आठ वर्ष, फिर यदि तुम पूरा कर दो दस (वर्ष) तो ये तुम्हारी इच्छा है। मैं नहीं चाहता कि तुमपर बोझ डालूँ और तुम मुझे पाओगे यदि अल्लाह ने चाहा, तो सदाचारियों में से।
قَالَ ذَٰلِكَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ ۖ أَيَّمَا الْأَجَلَيْنِ قَضَيْتُ فَلَا عُدْوَانَ عَلَيَّ ۖ وَاللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌ ﴾ 28 ﴿
का-ल ज़ालि-क बैनी व बैन-क, अय्यमल् – अ जलैनि क़ज़ैतु फ़ला अुद्वा-न अ़लय्-य वल्लाहु अ़ला मा नकूलु वकील *
मूसा ने कहाः ये मेरे और आपके बीच (निश्चित) है। मैं दो में से जो भी अवधि पूरी कर दूँ, मुझपर कोई अत्याचार न हो और अल्लाह उसपर, जो हम कह रहे हैं निरीक्षक है।
فَلَمَّا قَضَىٰ مُوسَى الْأَجَلَ وَسَارَ بِأَهْلِهِ آنَسَ مِن جَانِبِ الطُّورِ نَارًا قَالَ لِأَهْلِهِ امْكُثُوا إِنِّي آنَسْتُ نَارًا لَّعَلِّي آتِيكُم مِّنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ جَذْوَةٍ مِّنَ النَّارِ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ ﴾ 29 ﴿
फ़- लम्मा क़ज़ा मूसल् अ-ज-ल-व सा-र बि-अह़्लिही आ-न-स मिन् जानिबित्- तूरि नारन् का- ल लि – अह़्लिहिम्कुसू इन्नी आनस्तु नारल् – लअ़ल्ली आतीकुम् मिन्हा बि-ख़-बरिन् औ जज़्वतिम् मिनन्नारि लअ़ल्लकुम् तस्तलून
फिर जब पूरी कर ली मूसा ने अवधि और चला अपने परिवार के साथ, तो उसने देखी तूर (पर्वत) की ओर एक अग्नि। उसने अपने परिवार से कहाः रुको मैंने देखी है एक अग्नि, संभव है तुम्हारे पास लाऊँ वहाँ से कोई समाचार अथवा कोई अंगार अग्नि का, ताकि तुम ताप लो।
فَلَمَّا أَتَاهَا نُودِيَ مِن شَاطِئِ الْوَادِ الْأَيْمَنِ فِي الْبُقْعَةِ الْمُبَارَكَةِ مِنَ الشَّجَرَةِ أَن يَا مُوسَىٰ إِنِّي أَنَا اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ ﴾ 30 ﴿
फ़- लम्मा अताहा नूदि – य मिन् शातिइल् – वादिल् – एमनि फ़िल् बुक् अ़तिल- मुबा-र कति मिनश्श-ज-रति अंय्यामूसा इन्नी अनल्लाहु रब्बुल -आ़लमीन
फिर जब वह वहाँ आया, तो पुकारा गया वादी के दायें किनारे से, शुभ क्षेत्र में वृक्ष सेः हे मूसा! निःसंदेह, मैं ही अल्लाह हूँ, सर्वलोक का पालनहार।
وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَآهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَانٌّ وَلَّىٰ مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَا مُوسَىٰ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ الْآمِنِينَ ﴾ 31 ﴿
व अन् अल्कि अ़सा-क, फ़-लम्मा रआहा तहतज़्ज़ु क-अन्नहा जान्नुंव् – वल्ला मुदबिरंव् – व लम् – यु- अ़क्किब्, या मूसा अक्बिल् व ला तख़फ्, इन्न – क मिनल् आमिनीन
और फेंक दो अपनी लाठी, फिर जब उसे देखा कि रेंग रही है, मानो वह कोई सर्प हो, तो भागने लगा पीठ फेरकर और पीछे फिरकर नहीं देखा। हे मूसा! आगे आ तथा भय न कर, वास्तव में, तू सुरक्षितों में से है।
اسْلُكْ يَدَكَ فِي جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ وَاضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ الرَّهْبِ ۖ فَذَانِكَ بُرْهَانَانِ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ ﴾ 32 ﴿
उस्लुक् य द – क फ़ी जैबि-क तख़्रुज् बैज़ा – अ मिन् गैरि सूइंव् – वज़्मुम् इलै-क जना-ह-क मिनर्रह्बि फ़ज़ानि-क बुरहानानि मिर्रब्बि – क इला फिरऔ-न व म-लइही, इन्नहुम् कानू कौमन् फ़ासिक़ीन
डाल अपना हाथ अपनी जेब में, वह निकलेगा उज्ज्वल होकर बिना किसी रोग के और चिमटा ले अपनी ओर अपनी भुजा, भय दूर करने के लिए, तो ये दो खुली निशानियाँ हैं तेरे पालनहार की ओर से फ़िरऔन तथा उसके प्रमुखों के लिए, वास्तव में, वह उल्लंघनकारी जाति हैं।
قَالَ رَبِّ إِنِّي قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًا فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ ﴾ 33 ﴿
का – ल रब्बि इन्नी क़तल्तु मिन्हुम् नफ़्सन् फ़ – अख़ाफु अंय्यक्तुलून
उसने कहाः मेरे पालनहार! मैंने वध किया है उनके एक व्यक्ति को। अतः, मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार देंगे।
وَأَخِي هَارُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّي لِسَانًا فَأَرْسِلْهُ مَعِيَ رِدْءًا يُصَدِّقُنِي ۖ إِنِّي أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ ﴾ 34 ﴿
व अख़ी हारूनु हु – व अफ़्सहु मिन्नी लिसानन् फ़ – अर्सिल्हु मअि – य रिद्अंय् – युसद्दिकुनी इन्नी अख़ाफु अंय्युकज़्ज़िबून
और मेरा भाई हारून मुझसे अधिक सुभाषी है, तू उसे भी भेज दे मेरे साथ सहायक बनाकर, ताकि वह मेरा समर्थन करे, मैं डरता हूँ कि वे मुझे झुठला देंगे।
قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَانًا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِآيَاتِنَا أَنتُمَا وَمَنِ اتَّبَعَكُمَا الْغَالِبُونَ ﴾ 35 ﴿
का-ल स-नशुद्दु अ़जु-द क बि-अखी-क व नज्अलु लकुमा सुल्तानन् फ़ला यसिलू-न इलैकुमा बिआयातिना अन्तुमा व मनित्त – ब – अ़कुमल्-ग़ालिबून
उसने कहाः हम तुझे बाहुबल प्रदान करेंगे तेरे भाई द्वारा और बनायेंगे तुम दोनों के लिए ऐसा प्रभाव कि वे तुम दोनों तक नहीं पहुँच सकेंगे अपनी निशानियों द्वारा, तुम दोनों तथा तुम्हारे अनुयायी ही ऊपर रहेंगे।
فَلَمَّا جَاءَهُم مُّوسَىٰ بِآيَاتِنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّفْتَرًى وَمَا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ ﴾ 36 ﴿
फ़ – लम्मा जा – अहुम् मूसा बिआयातिना बय्यिनातिन् क़ालू मा हाज़ा इल्ला सिहरुम् – मुफ्तरंव्-व मा समिअ्ना बिहाज़ा फ़ी आबाइनल्-अव्वलीन
फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली निशानियाँ लाया, तो उन्होंने कह दिया कि ये तो केवल घड़ा हुआ जादू है और हमने कभी नहीं सुनी ये बात अपने पूर्वजों के युग में।
وَقَالَ مُوسَىٰ رَبِّي أَعْلَمُ بِمَن جَاءَ بِالْهُدَىٰ مِنْ عِندِهِ وَمَن تَكُونُ لَهُ عَاقِبَةُ الدَّارِ ۖ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ ﴾ 37 ﴿
व का – ल मूसा रब्बी अअ्लमु बिमन् जा-अ बिल्हुदा मिन् अिन्दिही व मन् तकूनु लहू आ़कि बतुद् – दारि, इन्नहू ला युफ्लिहुज्ज़ालिमून
तथा मूसा ने कहाः मेरा पालनहार अधिक जानता है उसे, जो मार्गदर्शन लाया है उसके पास से और किसका अन्त अच्छा होना है? वास्तव में, अत्याचारी सफल नहीं होंगे।
وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ مَا عَلِمْتُ لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرِي فَأَوْقِدْ لِي يَا هَامَانُ عَلَى الطِّينِ فَاجْعَل لِّي صَرْحًا لَّعَلِّي أَطَّلِعُ إِلَىٰ إِلَٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّي لَأَظُنُّهُ مِنَ الْكَاذِبِينَ ﴾ 38 ﴿
व का-ल फ़िरऔनु या अय्युहल-म-ल उ मा अ़लिम्तु लकुम् मिन् इलाहिन् ग़ैरी फ़-औकिद् ली या हामानु अ़लत्तीनि फज्अ़ल्ली सरहल् – लअ़ल्ली अत्तलिअु इल्लललाहि मूसा व इन्नी ल-अजुन्नुहू मिनल् – काज़िबीन
तथा फ़िरऔन ने कहाः हे प्रमुखो! मैं नहीं जानता तुम्हारा कोई पूज्य अपने सिवा। तो हे हामान! ईंटें पकवाकर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना दे। संभव है, मैं झाँककर देख लूँ मूसा के पूज्य को और निश्चय मैं उसे समझता हूँ झूठों में से।
وَاسْتَكْبَرَ هُوَ وَجُنُودُهُ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ إِلَيْنَا لَا يُرْجَعُونَ ﴾ 39 ﴿
वस्तक्ब-र हु-व व जुनूदुहू फ़िल् – अर्ज़ि बिग़ैरिल् – हक्कि व ज़न्नू अन्नहुम् इलैना ला युरज्यून
तथा घमंड किया उसने तथा उसकी सेनाओं ने धरती में अवैध और उन्होंने समझा कि वह हमारी ओर वापस नहीं लाये जायेंगे।
فَأَخَذْنَاهُ وَجُنُودَهُ فَنَبَذْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِمِينَ ﴾ 40 ﴿
फ – अख़ज़्नाहु व जुनू – दहू फ़-नबज़्नाहुम् फ़िल्यम्मि फ़न्जुर् कै फ़ का-न आ़कि-बतुज़्ज़ालिमीन
तो हमने पकड़ लिया उसे और उसकी सेनाओं को, फिर फेंक दिया हमने उन्हें सागर में, तो देखो कि कैसा रहा अत्याचारियों का अन्त (परिणाम)।
وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يُنصَرُونَ ﴾ 41 ﴿
व जअ़ल्ना – हुम् अ इम्म तंय्यद्अू न इलन्नारि व यौमल् – कियामति ला युन्सरून
और हमने उन्हें बना दिया ऐसा अगवा, जो बुलाते हों नरक की ओर तथा प्रलय के दिन उनकी सहायता नहीं की जायेगी।
وَأَتْبَعْنَاهُمْ فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ هُم مِّنَ الْمَقْبُوحِينَ ﴾ 42 ﴿
व अत्बअ्नाहुम् फ़ी हाज़िहिद्दुन्या लय् – नतन् व यौमल् – कियामति हुम् मिनल् मक्बूहीन *
और हमने पीछे लगा दिया उनके संसार में धिक्कार को और प्रलय के दिन वे बड़ी दुर्दशा में होंगे।
وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ مِن بَعْدِ مَا أَهْلَكْنَا الْقُرُونَ الْأُولَىٰ بَصَائِرَ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَّعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴾ 43 ﴿
वल – कद् आतैना मूसल्-किता-ब मिम्-बअ्दि मा अह्लक्नल् – कुरूनल् – ऊला बसाइ र लिन्नासि व हुदंव् – व रह्म – तल् लअ़ल्लहुम् य तज़क्करून
और हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की इसके पश्चात् कि हमने विनाश कर दिया प्रथम समुदायों का, ज्ञान का साधन बनाकर लोगों के लिए तथा मार्गदर्शन और दया, ताकि वे शिक्षा लें।
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ الْغَرْبِيِّ إِذْ قَضَيْنَا إِلَىٰ مُوسَى الْأَمْرَ وَمَا كُنتَ مِنَ الشَّاهِدِينَ ﴾ 44 ﴿
व मा कुन् त बिजानिबिल् गरबिय्यि इज् क़ज़ैना इला मूसल् – अम् -र व मा कुन् त मिनश्शाहिदीन
और (हे नबी!) आप नहीं थे पश्चिमी दिशा में,[1] जब हमने पहुँचाया मूसा की ओर ये आदेश और आप नहीं थे उपस्थितों[2] में। 1. पश्चिमी दिशा से अभिप्राय तूर पर्वत का पश्चिमी भाग है जहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) को तौरात प्रदान की गई। 2. इन से अभिप्राय वह बनी इस्राईल हैं जिन से धर्मविधान प्रदान करते समय उस का पालन करने का वचन लिया गया था।
وَلَٰكِنَّا أَنشَأْنَا قُرُونًا فَتَطَاوَلَ عَلَيْهِمُ الْعُمُرُ ۚ وَمَا كُنتَ ثَاوِيًا فِي أَهْلِ مَدْيَنَ تَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا وَلَٰكِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ ﴾ 45 ﴿
व लाकिन्ना अन्शअ्ना कुरुनन् फ़-तता-व-ल अ़लैहिमुल्-अुमुरु व मा कुन् त सावि – यन् फी अह्लि मद्य-न तल्लू अ़लैहिम् आयातिना व लाकिन्ना कुन्ना मुर्सिलीन
परन्तु (आपके समय तक) हमने बहुत-से समुदायों को पैदा किया, फिर उनपर लम्बी अवधि बीत गयी तथा आप उपस्थित न थे मद्यन के वासियों में कि सुनाते उन्हें हमारी आयतें और परन्तु हमभी रसूलों को भेजने[1]वाले हैं। 1. भावार्थ यह कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हज़ारों पर्ष पहले के जो समाचार इस समय सुना रहे हैं जैसे आँखों से देखें हों वह अल्लाह की ओर से वह़्यी के कारण ही सुना रहे हैं जो आप के सच्चे नबी होने का प्रमाण है।
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ الطُّورِ إِذْ نَادَيْنَا وَلَٰكِن رَّحْمَةً مِّن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوْمًا مَّا أَتَاهُم مِّن نَّذِيرٍ مِّن قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴾ 46 ﴿
व मा कुन् – त बिजानिबित्तूरि इज् नादैना व लाकिर् – रह़्म – तम् मिर्रब्बि – क लितुन्ज़ि-र क़ौमम् मा अताहुम् मिन् नज़ीरिम् मिन् कब्लि-क लअ़ल्लहुम् य तज़क्करून
तथा नहीं थे आप तूर के अंचल में, जब हमने उसे पुकारा, परन्तु आपके पालनहार की दया है, ताकि आप सतर्क करें जिनके पास नहीं आया कोई सचेत करने वाला आपसे पूर्व, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।
وَلَوْلَا أَن تُصِيبَهُم مُّصِيبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَيَقُولُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 47 ﴿
व लौ ला अन् तुसी – बहुम् मुसीबतुम् बिमा क़द्दमत् ऐदीहिम् फ़- यकूलू रब्बना लौ ला अर्सल् त इलैना रसूलन् फ नत्तबि-अ़ आयाति-क व नकू-न मिनल्-मुअ्मिनीन
तथा यदि ये बात न होती कि उनपर कोई आपदा आ जाती उनके करतूतों के कारण, तो कहते कि हमारे पालनहार! तूने क्यों नहीं भेजा हमारे पास कोई रसूल कि हम पालन करते तेरी आयतों का और हो जाते ईमान वालों में से[1]। 1. अर्थात आप को उन की ओर रसूल बना कर इस लिए भेजा है ताकि प्रलय के दिन उन को यह कहने का अवसर न मिले कि हमारे पास कोई रसूल नहीं आया ताकि हम ईमान लाते।
فَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا لَوْلَا أُوتِيَ مِثْلَ مَا أُوتِيَ مُوسَىٰ ۚ أَوَلَمْ يَكْفُرُوا بِمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۖ قَالُوا سِحْرَانِ تَظَاهَرَا وَقَالُوا إِنَّا بِكُلٍّ كَافِرُونَ ﴾ 48 ﴿
फ़-लम्मा जा- अहुमुल् – हक़्कु मिन् अिन्दिना क़ालू लौ ला ऊति – य मिस् – ल मा ऊति य मूसा, अ-व लम् यक्फुरु बिमा ऊति – य मूसा मिन् क़ब्लु कालू सिहरानि तज़ा – हरा, व कालू इन्ना बिकुल्लिन् काफिरून
फिर जब आ गया उनके पास सत्य हमारे पास से, तो कह दिया कि क्यों नहीं दिया गया उसे वही, जो मूसा को (चमत्कार) दिया गया? तो क्या उन्होंने कुफ़्र (इन्कार) नहीं किया उसका, जो मूसा दिये गये इससे पूर्व? उन्होंने कहाः दो[1] जादूगर हैं, दोनो एक-दूसरे के सहायक हैं और कहाः हम किसी को नहीं मानते। 1. अर्थात मूसा (अलैहिस्सलाम) तथा उन के भाई हारून (अलैहिस्सलाम)। और भावार्थ यह है कि चमत्कारों की माँग, न मानने का बहाना है।
قُلْ فَأْتُوا بِكِتَابٍ مِّنْ عِندِ اللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَا أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ﴾ 49 ﴿
कुल फअ्तू बिकिताबिम् मिन् अिन्दिल्लाहि हु-व अह्दा मिन्हुमा अत्तबिअ्हु इन् कुन्तुम् सादिक़ीन
(हे नबी!) आप कह दें: तब तुम्हीं ले आओ कोई पुस्तक अल्लाह की ओर से, जो अधिक मार्गदर्शक हो इन दोनों[1] से, मैं चलूँगा उसपर, यदि तुम सच्चे हो। 1. अर्थात क़ुर्आन और तौरात से।<.small>
فَإِن لَّمْ يَسْتَجِيبُوا لَكَ فَاعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ اتَّبَعَ هَوَاهُ بِغَيْرِ هُدًى مِّنَ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ﴾ 50 ﴿
फ़-इल्लम् यस्तजीबू ल-क फ़अलम् अन्नमा यत्तबिअू-न अहवा-अहुम्, व मन् अज़ल्लु मिम्-मनित्त ब अ़ हवाहु बिग़ैरि हुदम्-मिनल्लाहि, इन्नल्ला-ह ला यह्दिल कौमज़्ज़ालिमीन *
फिर यदि वे पूरी न करें आपकी माँग, तो आप जान लें कि वे मनमानी कर रहे हैं और उससे अधिक कुपथ कौन है, जो अपनी मनमानी करे, अल्लाह की ओर से बिना किसी मार्गदर्शन के? वास्तव में, अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता है अत्याचारी लोगों को।
وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴾ 51 ﴿
व ल – क़द् वस्सल्ना लहुमुल्-क़ौ-ल लअ़ल्लहुम् य-तज़क्करून
और (हे नबी!) हमने निरन्तर पहुँचा दिया है उन्हें अपनी बात (क़ुर्आन), ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।
الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِن قَبْلِهِ هُم بِهِ يُؤْمِنُونَ ﴾ 52 ﴿
अल्लज़ी-न आतैनाहुमुल् – किता – ब मिन् कब्लिही हुम् बिही युअ्मिनून
जिन्हें हमने प्रदान की है पुस्तक[1]इस (क़ुर्आन) से पहले, वे[2] इसपर ईमान लाते हैं। 1. अर्थात तौरात तथा इंजील। 2. अर्थात उन में से जिन्हों ने अपनी मूल पुस्तक में परिवर्तन नहीं किया है।
وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ ﴾ 53 ﴿
व इज़ा युत्ला अ़लैहिम् कालू आमन्ना बिही इन्नहुल् – हक़्कु मिर्रब्बिना इन्ना कुन्ना मिन् क़ब्लिही मुस्लिमीन
तथा जब उन्हें सुनाया जाता है, तो कहते हैं: हम इस (क़ुर्आन) पर ईमान लाये, वास्तव में, ये सत्य है, हमारे पालनहार की ओर से, हम तो इसके (उतरने के) पहले ही से मुस्लिम हैं[1]. 1. अर्थात आज्ञाकारी तथा एकेश्वरवादी हैं।
أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ ﴾ 54 ﴿
उलाइ-क युअ्तौ-न अज्-रहुम् मर्रतैनि बिमा स – बरू व यदरऊ-न बिल्ह – स नतिस्- सय्यि-अ-त व मिम्मा रज़क़्नाहुम् युन्फ़िकून
यही दिये जायेंगे अपना बदला दुहरा,[1] अपने धैर्य के कारण और वे दूर करते हैं अच्छाई के द्वारा बुराई को और उसमें से, जो हमने उन्हें दिया है, दान करते हैं। 1. अपनी पुस्तक तथा क़ुर्आन दोनों पर ईमान लाने के कारण। (देखियेः सह़ीह़ बुख़ारीः97, मुस्लिमः154)
وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ ﴾ 55 ﴿
व इज़ा समिउल-ल़ग़्व अअराज़ू अन्हु व क़ालू लना आ'मालुना व लकुम आ'मालुकुम सलामुन अलैकुम ला नबतग़िल जाहिलीन
और जब वह सुनते हैं व्यर्थ बात, तो विमुख हो जाते हैं, उससे तथा कहते हैं: हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। सलाम है तुमपर, हम (उलझना) नहीं चाहते अज्ञानों से ।
إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ ﴾ 56 ﴿
इन्न-क ला तह्दी मन् अहबब् त व लाकिन्नल्ला ह यह्दी मंय्यशा-उ वहु-व अअ्लमू बिल्मुह्-तदीन
(हे नबी!) आप सुपथ नहीं दर्शा सकते, जिसे चाहें[1], परन्तु अल्लाह सुपथ दर्शाता है, जिसे चाहे और वह भली-भाँति जानता है सुपथ प्राप्त करने वालों को। 1. ह़दीस में वर्णित है कि जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के (काफ़िर) चाचा अबू तालिब के निधन का समय हुआ, तो आप उन के पास गये। उस समय उन के पास अबू जह्ल तथा अब्दुल्लाह बिन अबि उमय्या उपस्थित थे। आप ने कहाः चाचा ((ला इलाहा इल्लल्लाह)) कह दें ताकि मैं क़्यामत के दिन अल्लाह से आप की क्षमा के लिये शिफ़ारिश कर सकूँ। परन्तु दोनों के कहने पर उन्हों ने अस्वीकार कर दिया और उन का अन्त कुफ़्र पर हुआ। इसी विषय में यह आयत उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारी ह़दीस संख्याः4772)
وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 57 ﴿
व कालू इन् नत्तबिअिल् हुदा म-अ-क नु-तख़त्तफ् मिन् अरजिना, अ-व लम् नुमक्किल् लहुम् ह-रमन् आमिनंय्-युज्बा इलैहि स-मरातु कुल्लि शैइर्-रिज्क़म मिल्लदुन्ना व लाकिन्-न अक्स-रहुम् ला यअ्लमून
तथा उन्होंने कहाः यदि हम अनुसरण करें मार्गदर्शन का आपके साथ, तो अपनी धरती से उचक[1] लिए जायेंगे। क्या हमने निवास स्थान नहीं बनाया है भयरहित "ह़रम"[2] को उनके लिए, खिंचे चले आ रहे हैं जिसकी ओर प्रत्येक प्रकार के फल, जीविका स्वरूप, हमारे पास से? और परन्तु उनमें से अधिक्तर लोग नहीं जानते। 1. अर्थात हमारे विरोधी हम पर आक्रमण कर देंगे। 2. अर्थात मक्का नगर को।
وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّن بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ ﴾ 58 ﴿
व कम् अह़्लक्ना मिन् कर्-यतिम् बतिरत् मई-श-तहा फ़तिल्-क मसाकिनुहुम् लम् तुस्कम् मिम् – बअ्दिहिम् इल्ला क़लीलन्, व कुन्ना नह्नुल-वारिसीन
और हमने विनाश कर दिया बहुत-सी बस्तियों का, इतराने लगी जिनकी जीविका। तो ये हैं उनके घर, जो आबाद नहीं किये गये उनके पश्चात्, परन्तु बहुत थोड़े और हम ही उत्तराधिकारी रह गये।
وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ ﴾ 59 ﴿
व मा का-न रब्बु-क मुह़्लिकल् कुरा हत्ता यब् – अ़-स फ़ी उम्मिहा रसूलंय् – यत्लू अ़लैहिम् आयातिना व मा कुन्ना मुह़्लिकल् – कुरा इल्ला – व अह्लुहा ज़ालिमून
और नहीं है आपका पालनहार विनाश करने वाला बस्तियों को, जब तक उनके केंद्र में कोई रसूल नहीं भेजता, जो पढ़कर सुनायें उनके समक्ष हमारी आयतें और हम बस्तियों का विनाश करने वाले नहीं हैं, परन्तु जब उसके निवासी अत्याचारी हों।
وَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴾ 60 ﴿
व मा ऊतीतुम् मिन् शैइन् फ- मताअुल- हयातिद्दुन्या व जी- नतुहा व मा अिन्दल्लाहि ख़ैरुंव व अब्का, अ-फला तअ्किलून *
तथा जो कुछ तुम दिये गये हो, वह सांसारिक जीवन का सामान तथा उसकी शोभा है और जो अल्लाह के पास है उत्तम तथा स्थायी है, तो क्या तुम समझते नहीं हो?
أَفَمَن وَعَدْنَاهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَاقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَاهُ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْمُحْضَرِينَ ﴾ 61 ﴿
अ-फ़मंव्-वअ़द्नाहु वअ्दन् ह-सनन् फ़हु-व लाक़ीहि कमम्-मत्तअ्नाहु मताअल् – हयातिद्दुन्या सुम्-म हु-व यौमल्-कियामति मिनल- मुह्ज़रीन
तो क्या जिसे हमने वचन दिया है एक अच्छा वचन और वह पाने वाला हो उसे, उसके जैसा हो सकता है, जिसे हमने दे रखा है सांसारिक जीवन का सामान, फिर वह प्रलय के दिन उपस्थित किये लोगों में होगा[1]? 1. अर्थात दण्ड और यातना का अधिकारी होगा।
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ ﴾ 62 ﴿
व यौ-म युनादीहिम्फ़-यकूलु ऐ-न शु-रकाइ-यल्लज़ी-न कुन्तुम् तज्अुमून
और जिस दिन वह[1] उन्हें पुकारेगा, तो कहेगाः कहाँ हैं मेरे साझी, जिन्हें तुम समझ रहे थे? 1. अर्थात अल्लाह प्रलय के दिन पुकारेगा।
قَالَ الَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَغْوَيْنَا أَغْوَيْنَاهُمْ كَمَا غَوَيْنَا ۖ تَبَرَّأْنَا إِلَيْكَ ۖ مَا كَانُوا إِيَّانَا يَعْبُدُونَ ﴾ 63 ﴿
कालल्लज़ी – न हक्क़ अलैहिमुल-क़ौलु रब्बना हा – उलाइल्लज़ी न अ़ग्वैना अ़ग्वैनाहुम् कमा ग़वैना तबर्रअ्ना इलै-क मा कानू इय्याना अअ्बुदून
कहेंगे वे जिनपर सिध्द हो चुकी है ये बातः[1] हे हमारे पालनहार! यही हैं, जिन्हें हमने बहका दिया और हमने इन्हें बहकाया, जैसे हम बहके, हम उनसे अलग हो रहे हैं तेरे समक्ष, ये हमारी पूजा[2]नहीं कर रहे थे। 1. अर्थात दण्ड और यातना का अधिकारी होने की। 2. यह हमारे नहीं बल्कि अपने मन के पुजारी थे।
وَقِيلَ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُمْ وَرَأَوُا الْعَذَابَ ۚ لَوْ أَنَّهُمْ كَانُوا يَهْتَدُونَ ﴾ 64 ﴿
व कीलद्अू शु-रका-अकुम् फ़-दऔ़हुम् फ़-लम् यस्तजीबू लहुम् वर-अवुल्-अ़ज़ा-ब लौ अन्नहुम् कानू यह्तदून
तथा कहा जायेगाः पुकारो अपने साझियों को। तो वे पुकारेंगे और वे उन्हें उत्तर तक नहीं देंगे तथा वे यातना देख लेंगे, तो कामना करेंगे कि उन्होंने सुपथ अपनाया होता।
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ مَاذَا أَجَبْتُمُ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 65 ﴿
व यौ-म युनादीहिम् फ़-यकूलु माज़ा अ जब्तुमुल- मुर्सलीन
और वह (अल्लाह) उस दिन उन्हें पुकारेगा, फिर कहेगाः तुमने क्या उत्तर दिया रसूलों को?
فَعَمِيَتْ عَلَيْهِمُ الْأَنبَاءُ يَوْمَئِذٍ فَهُمْ لَا يَتَسَاءَلُونَ ﴾ 66 ﴿
फ़-अ़मियत् अ़लैहिमुल्-अम्बा-उ यौमइजिन् फ़हुम् ला य-तसाअलून
तो नहीं सूझेगा उन्हें कोई उत्तर उस दिन और न वह एक-दूसरे से प्रश्न कर सकेंगे।
فَأَمَّا مَن تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَعَسَىٰ أَن يَكُونَ مِنَ الْمُفْلِحِينَ ﴾ 67 ﴿
फ़- अम्मा मन् ता – ब व आम-न व अ़मि-ल सालिहन फ़-अ़सा अंय्यकू-न मिनल्-मुफ्लिहीन
फिर जिसने क्षमा माँग ली[1]तथा ईमान लाया और सदाचार किया, तो आशा कर सकता है कि वह सफल होने वालों में से होगा। 1. अर्थात संसार में से।
وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ وَيَخْتَارُ ۗ مَا كَانَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴾ 68 ﴿
व रब्बु – क यख़्लुकु मा यशा- उ व यख़्तारु, मा का-न लहुमुल् खि – य – रतु, सुब्हानल्लाहि व तआ़ला अ़म्मा युश्रिकून
और आपका पालनहार उत्पन्न करता है जो चाहे तथा निर्वाचित करता है। नहीं है उनके लिए कोई अधिकार, पवित्र है अल्लाह तथा उच्च है उनके साझी बनाने से।
وَرَبُّكَ يَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ ﴾ 69 ﴿
व रब्बु – क यअ्लमु मा तुकिन्नु सुदूरुहुम् व मा युअ़लिनून
और आपका पालनहार ही जानता है, जो छुपाते हैं उनके दिल तथा जो व्यक्त करते हैं।
وَهُوَ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ الْحَمْدُ فِي الْأُولَىٰ وَالْآخِرَةِ ۖ وَلَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴾ 70 ﴿
व हुवल्लाहु ला इला-ह इल्ला हु-व, लहुल-हम्दु फिल्-ऊला वल् – आख़िरति व लहुल् – हुक्मु व इलैहि तुर्जअून
तथा वही अल्लाह[1] है, कोई वन्दनीय (सत्य पूज्य) नहीं है उसके सिवा, उसी के लिए सब प्रशंसा है लोक तथा परलोक में तथा उसी के लिए शासन है और तुम उसी की ओर फेरे[2] जाओगो। 1. अर्थात जो उत्पत्ति करता तथा सब अधिकार और ज्ञान रखता है। 2.अर्थात ह़िसाब और प्रतिफल के लिये।
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ اللَّيْلَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِضِيَاءٍ ۖ أَفَلَا تَسْمَعُونَ ﴾ 71 ﴿
कुल अ-रऐतुम् इन् ज-अ़लल्लाहु अ़लैकुमुल्-लै-ल सर्-मदन् इला यौमिल् – क़ियामति मन् इलाहुन् ग़ैरुल्लाहि यअ्तीकुम् बिज़ियाइन्, अ-फ़ला तस्-मअून
(हे नबी!) आप कहियेः तुम बताओ कि यदि बना दे तुमपर रात्रि को निरन्तर क़्यामत के दिन तक, तो कौन पूज्य है अल्लाह कि सिवा, जो ले आये तुम्हारे पास प्रकाश? तो क्या तुम सुनते नहीं हो?
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ النَّهَارَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِلَيْلٍ تَسْكُنُونَ فِيهِ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ ﴾ 72 ﴿
कुल अ – रऐतुम् इन् ज- अ़लल्लाहु अ़लैकुमुन्नहा – र सर् – मदन् इला यौमिल् – कियामति मन् इलाहुन् ग़ैरुल्लाहि यअ्तीकुम् बिलैलिन् तस्कुनू – न फ़ीहि, अ-फ़ला तुब्सिरून
आप कहियेः तुम बताओ, यदि अल्लाह कर दे तुमपर दिन को निरन्तर क़्यामत के दिन तक, तो कौन पूज्य है अल्लाह के सिवा, जो ले आये तुम्हारे लिए रात्रि, जिसमें तुम शान्ति प्राप्त करो, तो क्या तुम देखते नहीं[1] हो? 1. अर्थात रात्रि तथा दिन के परिवर्तन को।
وَمِن رَّحْمَتِهِ جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴾ 73 ﴿
व मिर्रह्मतिही ज अ़-ल लकुमुल्लै-ल वन्नहा – र लितस्कुनू फ़ीहि व लि – तब्तगू मिन् फ़ज़्लिही व लअ़ल्लकुम् तश्कुरून
तथा अपनी दया ही से उसने बनाये हैं तुम्हारे लिए रात्रि तथा दिन, ताकि तुम शान्ति प्राप्त करो उसमें और ताकि तुम खोज करो उसके अनुग्रह (जीविका) की और ताकि तुम उसके कृतज्ञ बनो।
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ ﴾ 74 ﴿
व यौ-म युनादीहिम् फ़-यकूलु ऐ-न शु रकाइ-यल्लज़ी-न कुन्तुम् तज् अुमून
और अल्लाह, जिस दिन उन्हें पुकारेगा, तो कहेगाः कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम मेरा साझी समझ रहे थे?
وَنَزَعْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا فَقُلْنَا هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ فَعَلِمُوا أَنَّ الْحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ ﴾ 75 ﴿
व न – ज़अ्ना मिन् कुल्लि उम्मतिन् शहीदन् फ़ – कुल्ना हातू बुरहा – नकुम् फ़-अ़लिमू अन्नल् – हक्-क़ लिल्लाहि व ज़ल्-ल अ़न्हुम् मा कानू यफ़्तरून *
और हम निकाल लायेंगे प्रत्येक समुदाय से एक गवाह, फिर कहेंगेः लाओ अपने[1] तर्क? तो उन्हें ज्ञान हो जायेगा कि सत्य अल्लाह ही की ओर है और उनसे खो जायेंगी, जो बातें वे घड़ रहे थे। 1. अर्थात शिर्क के प्रमाण।
إِنَّ قَارُونَ كَانَ مِن قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ ۖ وَآتَيْنَاهُ مِنَ الْكُنُوزِ مَا إِنَّ مَفَاتِحَهُ لَتَنُوءُ بِالْعُصْبَةِ أُولِي الْقُوَّةِ إِذْ قَالَ لَهُ قَوْمُهُ لَا تَفْرَحْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْفَرِحِينَ ﴾ 76 ﴿
इन्न क़ारून काना मिन कौमि मूसा फबगा अ़लैहिम, वा आतैनाहु मिनल कुनूज़ि मा इन्ना मफ़ातिह़हु लतनूउ बिलउस्बति उलिलक़ुव्वह, इज़़ क़ाला लहु कौमहु ला तफरह, इन्नल्लाह ला युहिब्बुल फरिह़ीन।
क़ारून[1] था मूसा की जाति में से। फिर उसने अत्याचार किया उनपर और हमने उसे प्रदान किया इतने कोष कि उसकी कुंजियाँ भारी थीं एक शक्तिशाली समुदाय पर। जब कहा उससे उसकी जाति नेः मत इतरा, वास्तव में, अल्लाह प्रेम नहीं करता है इतराने वालों से। 1. यहाँ से धन के गर्व तथा उस के दुष्परिणाम का एक उदाहरण दिया जा रहा है कि क़ारून, मूसा (अलैहिस्सलाम) के युग का एक धनी व्यक्ति था।
وَابْتَغِ فِيمَا آتَاكَ اللَّهُ الدَّارَ الْآخِرَةَ ۖ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ الدُّنْيَا ۖ وَأَحْسِن كَمَا أَحْسَنَ اللَّهُ إِلَيْكَ ۖ وَلَا تَبْغِ الْفَسَادَ فِي الْأَرْضِ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِينَ ﴾ 77 ﴿
वब्तगि फीमा आताकल्लाहुद् -दारल्-आख़िर त व ला तन् – स नसी-ब-क मिनद् दुन्या व अह्सिन् कमा अह्स – नल्लाहु इलै – क व ला तब्गिल् – फ़सा – द फ़िल्अर्जि, इन्नल्ला – ह ला युहिब्बुल् – मुफ्सिदीन
तथा खोजकर उससे, जो दिया है अल्लाह ने तुझे आख़िरत (परलोक) का घर और मत भूल अपना सांसारिक भाग और उपकार कर, जैसे अल्लाह ने तुझपर उपकार किया है तथा मत खोज कर धरती में उपद्रव की, निश्चय अल्लाह प्रेम नहीं करता है उपद्रवियों से।
قَالَ إِنَّمَا أُوتِيتُهُ عَلَىٰ عِلْمٍ عِندِي ۚ أَوَلَمْ يَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ قَدْ أَهْلَكَ مِن قَبْلِهِ مِنَ الْقُرُونِ مَنْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُ قُوَّةً وَأَكْثَرُ جَمْعًا ۚ وَلَا يُسْأَلُ عَن ذُنُوبِهِمُ الْمُجْرِمُونَ ﴾ 78 ﴿
का – ल इन्नमा ऊतीतुहू अ़ला अिल्मिन् अिन्दी, अ – व लम् यअ्लम् अन्नल्ला – ह कद् अह़्ल – क मिन् क़ब्लिही मिनल्- कुरूनि मन् हु-व अशद्दु मिन्हु कुव्वतंव् – व अक्सरु जम्अ्न्, व ला युस्अलु अन् जुनूबिहिमुल् मुज्रिमून
उसने कहाः मैं तो उसे दिया गया हूँ बस अपने ज्ञान के कारण। क्या उसे ये ज्ञान नहीं हुआ कि अल्लाह ने विनाश किया है उससे पहले बहुत-से समुदायों को, जो उससे अधिक थे धन तथा समूह में और प्रश्न नहीं किया जाता[1] अपने पापों के संबन्ध में अपराधियों से। 1. अर्थात विनाश के समय।
فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِ فِي زِينَتِهِ ۖ قَالَ الَّذِينَ يُرِيدُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا يَا لَيْتَ لَنَا مِثْلَ مَا أُوتِيَ قَارُونُ إِنَّهُ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٍ ﴾ 79 ﴿
फ़-ख़-र-ज अ़ला क़ौमिही फ़ी जी – नतिही, क़ालल्लज़ी न युरीदूनल् – हयातद्दुन्या यालै – त लना मिस् – ल मा ऊति – य कारूनु इन्नहू लजू हज्जिन् अ़ज़ीम
एक दिन, वह निकला अपनी जाति पर, अपनी शोभा में, तो कहा उन लोगों ने, जो चाहते थे सांसारिक जीवनः क्या ही अच्छा होता कि हमारे लिए (भी) उसी के समान (धन-धान्य) होता, जो दिया गया है क़ारून को! वास्तव में, वह बड़ा सौभाग्यशाली है।
وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ اللَّهِ خَيْرٌ لِّمَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا وَلَا يُلَقَّاهَا إِلَّا الصَّابِرُونَ ﴾ 80 ﴿
व कालल्लज़ी – न ऊतुल् – अिल्- म वैलकुम् सवाबुल्लाहि ख़ैरुल् – लिमन् आम-न व अ़मि-ल सालिहन् व ला युलक़्क़ाहा इल्लस्साबिरून
तथा उन्होंने कहा जिन्हें ज्ञान दिया गयाः तुम्हारा बुरा हो! अल्लाह का प्रतिकार उसके लिए उत्तम है, जो ईमान लाये तथा सदाचार करे और ये सोच, धैर्यवानों ही को मिलती है।
فَخَسَفْنَا بِهِ وَبِدَارِهِ الْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُ مِن فِئَةٍ يَنصُرُونَهُ مِن دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُنتَصِرِينَ ﴾ 81 ﴿
फ़- ख़सपना बिही व बिदारिहिल् अर् ज़ फ़मा का-न लहू मिन् फ़ि – अतिंय् – यन्सुरूनहू मिन् दूनिल्लाहि, व मा का – न मिनल्- मुन्तसिरीन
तथा हमने धंसा दिया उसके तथा उसके घर सहित, धरती को, तो नहीं रह गया उसका कोई समुदाय, जो सहायता करे उसकी अल्लाह के आगे और न वह स्वयं अपनी सहायता कर सका।
وَأَصْبَحَ الَّذِينَ تَمَنَّوْا مَكَانَهُ بِالْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَا أَن مَّنَّ اللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ ﴾ 82 ﴿
वअसबहल्लज़ीना तमन्नौ मकानहु बिल-अम्सि यक़ूलूना वइकअन्नल्लाह यबसुतुर-रिज़्क़ लि मन यशा-उ मिन इबादिहि व यक़्दिर, लौला अन्न मन्नल्लाहु अलैना लखसफा बिना, वइकअन्नहु ला युफलिहुल-काफिरून.
और जो कामना कर रहे थे उसके स्थान की कल, कहन लगेः क्या तुम देखते नहीं कि अल्लाह अधिक कर देता है जीविका, जिसके लिए चाहता हो अपने दासों में से और नापकर देता है (जिसे चाहता है)। यदि हमपर उपकार न होता अल्लाह का, तो हमें भी धंसा देता। क्या तुम देखते नहीं कि काफ़िर (कृतघ्न) सफल नहीं होते?
تِلْكَ الدَّارُ الْآخِرَةُ نَجْعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوًّا فِي الْأَرْضِ وَلَا فَسَادًا ۚ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ ﴾ 83 ﴿
तिल्कद् – दारुल् – आखि- रतु नज् अ़लुहा लिल्लज़ी – न ला युरीदू – न अुलुव्वन् फ़िलअर्जि व ला फ़सादन् वल -आ़कि-बतु लिल्-मुत्तक़ीन
ये परलोक का घर (स्वर्ग) है, हम उसे विशेष कर देंगे उनके लिए, जो नहीं चाहते बड़ाई करना धरती में और न उपद्रव करना और अच्छा परिणाम अज्ञाकारियों[1] के लिए है। 1. इस में संकेत है कि धरती में गर्व तथा उपद्रव का मूलाधार अल्लाह की अवैज्ञा है।
مَن جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ خَيْرٌ مِّنْهَا ۖ وَمَن جَاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَى الَّذِينَ عَمِلُوا السَّيِّئَاتِ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 84 ﴿
मन् जा – अ बिल्ह – स नति फ़ – लहू ख़ैरुम् – मिन्हा व मन् जा – अ बिस्सय्यि – अति फ़ला युज्ज़ल्लज़ी-न अ़मिलुस्सय्यि आति इल्ला मा कानू यअ्मलून
जो भलाई लायेगा, उसके लिए उससे उत्म (भलाई) है और जो बुराई लायेगा, तो नहीं बदला दिये जायेंगे वे, जिन्होंने बुराईयाँ की हैं, परन्तु वही जो वे करते रहे।
إِنَّ الَّذِي فَرَضَ عَلَيْكَ الْقُرْآنَ لَرَادُّكَ إِلَىٰ مَعَادٍ ۚ قُل رَّبِّي أَعْلَمُ مَن جَاءَ بِالْهُدَىٰ وَمَنْ هُوَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ﴾ 85 ﴿
इन्नल्लजी फ़-र-ज़ अ़लैकल् कुरआ-न ल-राद्दु-क इला मआ़दिन्, कुर्रब्बी अअ्लमु मन् जा-अ बिल्हुदा व मन् हु-व फ़ी ज़लालिम् – मुबीन
और (हे नबी!) जिसने आपपर क़ुर्आन उतारा है, वह आपको लौटाने वाला है आपके नगर (मक्का) की[1] ओर। आप कह दें कि मेरा पालनहर भली-भाँति जानने वाला है कि कौन मार्गदरशन लाया है और कौन खुले कुपथ में है? 1. अर्थात आप जिस शहर मक्का से निकाले गये हैं उसे विजय कर लेंगे। और यह भविष्यवाणी सन् 8 हिजरी में पूरी हुई। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4773)
وَمَا كُنتَ تَرْجُو أَن يُلْقَىٰ إِلَيْكَ الْكِتَابُ إِلَّا رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ ظَهِيرًا لِّلْكَافِرِينَ ﴾ 86 ﴿
व मा कुन्-त तरजू अंय्युल्का इलैकल्-किताबु इल्ला रह्म-तम् मिर्रब्बि-क फला तकूनन्-न ज़हीरल् लिल्-काफ़िरीन
और आप आशा नहीं रखते थे कि अवतरित की जायेगी आपकी ओर ये पुस्तक[1], परन्तु ये दया है, आपके पालनहार की ओर से, अतः आप कदापि न हों सहायक, काफ़िरों के। 1. अर्थात क़ुर्आन पाक।
وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنْ آيَاتِ اللَّهِ بَعْدَ إِذْ أُنزِلَتْ إِلَيْكَ ۖ وَادْعُ إِلَىٰ رَبِّكَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ﴾ 87 ﴿
व ला यसुद्दुन्न-क अ़न् आयातिल्लाहि बस्-द इज् उन्ज़िलत् इलै-क वद्अु इला रब्बि-क व ला तकूनन्-न मिनल्-मुश्रिकीन
और वह आपको न रोकें अल्लाह की आयतों से, इसके पश्चात् कि उतार दी गई आपकी ओर और आप बुलाते रहें अपने पालनहार की ओर और कदापि आप न हों मुश्रिकों में से।
وَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۘ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ كُلُّ شَيْءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجْهَهُ ۚ لَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴾ 88 ﴿
व ला तद्अु मअ़ल्लाहि इलाहन् आ-ख़-र • ला इला-ह इल्ला हु-व, कुल्लु शैइन् हालिकुन् इल्ला वज्-हहू, लहुल्-हुक्मु व इलैहि तुर्जअून *
और आप न पुकारें किसी अन्य पूज्य को अल्लाह के साथ, नहीं है कोई वंदनीय (सत्य पूज्य) उस (अल्लाह) के सिवा। प्रत्येक वस्तु नाशवान है सिवाय उसके स्वरूप के। उसी का शासन है और उसी की ओर तुमसब फेरे[1]जाओगे। 1. अर्थात प्रयलय के दिन ह़िसाब तथा अपने कर्मों का फल पाने के लिये।