सूरह कलम के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 52 आयतें हैं।
- इस सूरह के आरंभ ही में कलम शब्द आया है। जिस से यह नाम लिया गया है। और इस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में बताया गया है कि आप का चरित्र क्या है। और जो आप के विरोधी आप को पागल कहते हैं वह कितने पतित (गिरे हुये) है।
- इस में शिक्षा के लिये एक बाग के स्वामियों का उदाहरण दिया गया है। जिन्होंने अल्लाह के कृतज्ञ न होने के कारण अपने बाग के फल खो दिये। फिर आज्ञाकारियों को स्वर्ग की शुभसूचना दी गई है। और विरोधियों के इस विचार का खण्डन किया गया है कि आज्ञाकारी और अपराधी बराबर हो जायेंगे।
- इस में बताया गया है कि आज जो अल्लाह को सज्दा करने से इन्कार करते हैं वह परलोक में भी उसे सज्दा नहीं कर सकेंगे।
- आयत 48 से 50 तक नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को काफिरों के विरोध पर सहन करने के निर्देश दिये गये हैं।
- अन्त में बताया गया है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह की बात बता रहे हैं, जो सब मनुष्यों के लिये सर्वया शिक्षा है, आप पागल नहीं है।
सूरह कलम | Surah Qalam in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
ن ۚ وَالْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ ﴾ 1 ﴿
नून् वल्क़-लमि व मा यस्तुरून
नून और शपथ है लेखनी (क़लम) की तथा उसकी[1] जिसे वो लिखते हैं। 1. अर्थात क़ुर्आन की। जिसे उतरने के साथ ही नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) लेखकों से लिखवाते थे। जैसे ही कोई सूरह या आयत उतरती, लेखक क़लम तथा चमड़ों और झिल्लियों के साथ उपस्थित हो जाते थे, ताकि पूरे संसार के मनुष्यों को क़र्आन अपने वास्तविक रूप में पहुँच सके। और सदा के लिये सुरक्षित हो जाये। क्योंकि अब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पश्चात् कोई नबी और कोई पुस्तक नहीं आयेगी। और प्रलय तक के लिये अब पूरे संसार के नबी आप ही हैं। और उन के मार्ग दर्शन के लिये क़ुर्आन ही एकमात्र धर्म पुस्तक है। इसी लिये इसे सुरक्षित कर दिया गया है। और यह विशेषता किसी भी आकाशीय ग्रन्थ को प्राप्त नहीं है। इस लिये अब मोक्ष के लिये अन्तिम नबी तथा अन्तिम धर्म ग्रन्थ क़ुर्आन पर ईमान लाना अनिवार्य है।
مَا أَنتَ بِنِعْمَةِ رَبِّكَ بِمَجْنُونٍ ﴾ 2 ﴿
मा अन्-त बिनिअ्-मति रब्बि-क बि- मज्-नून
नहीं है आप, अपने पालनहार के अनुग्रह से पागल।
وَإِنَّ لَكَ لَأَجْرًا غَيْرَ مَمْنُونٍ ﴾ 3 ﴿
व इन्-न ल-क ल-अज्रन् ग़ै-र ममनून
तथा निश्चय प्रतिफल (बदला) है आपके लिए अनन्त।
وَإِنَّكَ لَعَلَىٰ خُلُقٍ عَظِيمٍ ﴾ 4 ﴿
व इन्न-क ल-अ़ला ख़ुलुक़िन् अ़ज़ीम
तथा निश्चय ही आप बड़े सुशील हैं।
فَسَتُبْصِرُ وَيُبْصِرُونَ ﴾ 5 ﴿
फ़-सतुब्सिरु व युब्सिरून
तो शीघ्र आप देख लेंगे तथा वे (काफ़िर भी) देख लेंगे।
بِأَييِّكُمُ الْمَفْتُونُ ﴾ 6 ﴿
बि-अय्यिकुमुल्-मफ़्तून
कि पागल कौन है।
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ ﴾ 7 ﴿
इन्-न रब्ब-क हु-व अअ्लमु बिमन् ज़ल्-ल अ़न् सबीलिही व हु-व अअ्लमु बिल्-मुह्तदीन
वास्तव में, आपका पालनहार ही अधिक जानता है उसे, जो कुपथ हो गया उसकी राह से और वही अधिक जानता है उन्हें, जो सीधी राह पर हैं।
فَلَا تُطِعِ الْمُكَذِّبِينَ ﴾ 8 ﴿
फ़ला तुतिअिल्-मुकज़्ज़िबीन
तो आप बात न मानें झुठलाने वालों की।
وَدُّوا لَوْ تُدْهِنُ فَيُدْهِنُونَ ﴾ 9 ﴿
वद्-दू लौ तुद्हिनु फ़युद्हिनून
वे चाहते हैं कि आप ढीले हो जायें, तो वे भी ढीले हो[1] जायें। 1. जब काफ़िर, इस्लाम के प्रभाव को रोकने में असफल हो गये तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को धमकी और लालच देने के पश्चात्, कुछ लो और कुछ दो की नीति पर आ गये। इस लिये कहा गया कि आप उन की बातों में न आयें। और परिणाम की प्रतीक्षा करें।
وَلَا تُطِعْ كُلَّ حَلَّافٍ مَّهِينٍ ﴾ 10 ﴿
व ला तुतिअ् कुल्-ल हल्लाफ़िम् – महीन
और बात न मानें[1] आप किसी अधिक शपथ लेने वाले, हीन व्यक्ति की। 1. इन आयतों में किसी विशेष काफ़िर की दशा का वर्णन नहीं बल्कि काफ़िरों के प्रमुखों के नैतिक पतन तथा कुविचारों और दुराचारों को बताया गया है जो लोगों को इस्लाम के विरुध्द उकसा रहे थे। तो फिर क्या इन की बात मानी जा सकती है?
هَمَّازٍ مَّشَّاءٍ بِنَمِيمٍ ﴾ 11 ﴿
हम्माज़िम्-मश्शाइम् बि-नमीम
जो व्यंग करने वाला, चुगलियाँ खाता फिरता है।
مَّنَّاعٍ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ ﴾ 12 ﴿
मन्नाअिल्-लिल्ख़ैरि मुअ्-तदिन् असीम
भलाई से रोकने वाला, अत्याचारी, बडा पापी है।
عُتُلٍّ بَعْدَ ذَٰلِكَ زَنِيمٍ ﴾ 13 ﴿
अुतुल्लिम् बअ्-द ज़ालि-क ज़नीम
घमंडी है और इसके पश्चात् कुवंश (वर्ण संकर) है।
أَن كَانَ ذَا مَالٍ وَبَنِينَ ﴾ 14 ﴿
अन् का-न ज़ा मालिंव्-व बनीन
इसलिए कि वह धन तथा पुत्रों वाला है।
إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا قَالَ أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 15 ﴿
इज़ा तुत्ला अ़लैहि आयातुना क़ा-ल असातीरुल्-अव्वलीन
जब पढ़ी जाती है उसपर हमारी आयतें, तो कहता हैः ये पूर्वजों की कल्पित कथायें हैं।
سَنَسِمُهُ عَلَى الْخُرْطُومِ ﴾ 16 ﴿
स-नसिमुहू अ़लल्-ख़ुर्-तूम
शीघ्र ही हम दाग़ लगा देंगे उसके सूंड[1] पर। 1. अर्थात नाक पर जिसे वह घमंड से ऊँची रखना चाहता है। और दाग़ लगाने का अर्थ अपमानित करना है।
إِنَّا بَلَوْنَاهُمْ كَمَا بَلَوْنَا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ ﴾ 17 ﴿
इन्ना बलौनाहुम् कमा बलौना अस्हाबल्-जन्नति इज़् अक़्समू ल- यस्रिमुन्नहा मुस्बिहीन
निःसंदेह, हमने उन्हें परीक्षा में डाला[1] है, जिस प्रकार बाग़ वालों को परीक्षा में डाला था। जब उन्होंने शपथ ली कि अवश्य तोड़ लेंगे उसके फल भोर होते ही। 1. अर्थात मक्का वालों को। इस लिये यदि वह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान लायेंगे तो उन पर सफलता की राह खुलेगी। अन्यथा संसार और परलोक दोनों की यातना के भागी होंगे।
وَلَا يَسْتَثْنُونَ ﴾ 18 ﴿
व ला यस्तस्नून
और इन् शा अल्लाह (यदि अल्लाह ने चाहा) नहीं कहा।
فَطَافَ عَلَيْهَا طَائِفٌ مِّن رَّبِّكَ وَهُمْ نَائِمُونَ ﴾ 19 ﴿
फ़ता-फ़ अ़लैहा ता-इफ़ुम्-मिर्रब्बि-क व हुम् ना- इमून
तो फिर गया उस बाग़ पर एक कुचक्र, आपके पालनहार की ओर से और वे सोये हुए थे।
فَأَصْبَحَتْ كَالصَّرِيمِ ﴾ 20 ﴿
फ – अस् – बहत् कस्सरीम
तो वह हो गया जैसे उजाड़ खेती हो।
فَتَنَادَوْا مُصْبِحِينَ ﴾ 21 ﴿
फ़-तनादौ मुस्बिहीन
अब वे एक-दूसरे को पुकारने लगे भोर होते हीः
أَنِ اغْدُوا عَلَىٰ حَرْثِكُمْ إِن كُنتُمْ صَارِمِينَ ﴾ 22 ﴿
अनिग़्दू अ़ला हर्सिकुम् इन् कुन्तुम् सारिमीन
कि तड़के चलो अपनी खेती पर, यदि फल तोड़ने हैं।
فَانطَلَقُوا وَهُمْ يَتَخَافَتُونَ ﴾ 23 ﴿
फ़न्त-लक़ू व हुम् य-तख़ा-फ़तून
फिर वे चल दिये आपस में चुपके-चुपके बातें करते हुए।
أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا الْيَوْمَ عَلَيْكُم مِّسْكِينٌ ﴾ 24 ﴿
अल्-ला यद्खुलन्न- हल्यौ – म अ़लैकुम् – मिस्कीन
कि कदापि न आने पाये उस (बाग़) के भीतर आज तुम्हारे पास कोई निर्धन।[1] 1. ताकि उन्हें कुछ दान न करना पड़े।
وَغَدَوْا عَلَىٰ حَرْدٍ قَادِرِينَ ﴾ 25 ﴿
व ग़दौ अ़ला हर्दिन् क़ादिरीन
और प्रातः ही पहुँच गये कि वे फल तोड़ सकेंगे।
فَلَمَّا رَأَوْهَا قَالُوا إِنَّا لَضَالُّونَ ﴾ 26 ﴿
फ़-लम्मा रऔहा क़ालू इन्ना ल-ज़ाल्लून
फिर जब उसे देखा तो कहाः निश्चय हम राह भूल गये।
بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ ﴾ 27 ﴿
बलू नह्नु मह्-रूमून
बल्कि हम वंचित हो[1] गये। 1. पहले तो सोचा कि राह भूल गये हैं। किन्तु फिर देखा कि बाग़ तो उन्हीं का है तो कहा कि यह तो ऐसा उजाड़ हो गया है कि अब कुछ तोड़ने के लिये रह ही नहीं गया है। वास्तव में यह हमारा दुर्भाग्य है।
قَالَ أَوْسَطُهُمْ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ لَوْلَا تُسَبِّحُونَ ﴾ 28 ﴿
क़ा-ल औसतुहुम् अलम् अक़ुल्-लकुम् लौ ला तुसब्बिहून
तो उनमें से बिचले भाई ने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम (अल्लाह की) पवित्रता का वर्णन क्यों नहीं करते?
قَالُوا سُبْحَانَ رَبِّنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ ﴾ 29 ﴿
क़ालू सुब्हान रब्बिना इन्ना कुन्ना ज़ालिमीन
वे कहने लगेः पवित्र है हमारा पालनहार! वास्तव में, हम ही अत्याचारी थे।
فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَلَاوَمُونَ ﴾ 30 ﴿
फ़- अ क़्ब-ल ब अ्ज़ुहुम् अ़ला ब अ्ज़िय्- य-तला-वमून
फिर सम्मुख हो गये, एक-दूसरे की निन्दा करते हुए।
قَالُوا يَا وَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا طَاغِينَ ﴾ 31 ﴿
क़ालू या वैलना इन्ना कुन्ना ताग़ीन
कहने लगेः हाय अफ़्सोस! हम ही विद्रोही थे।
عَسَىٰ رَبُّنَا أَن يُبْدِلَنَا خَيْرًا مِّنْهَا إِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا رَاغِبُونَ ﴾ 32 ﴿
अ़सा रब्बुना अ़य्युब्दि लना ख़ैरम्-मिन्हा इन्ना इला रब्बिना राग़िबून
संभव है हमारा पालनहार हमें बदले में प्रदान करे इससे उत्तम (बाग)। हम अपने पालनहार ही की ओर रूचि रखते हैं।
كَذَٰلِكَ الْعَذَابُ ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ ﴾ 33 ﴿
कजालिकल्- अ़ज़ाबु, व ल-अ़ज़ाबुल् – आख़िरति अक्बरु लौ कानू यअ्लमून
ऐसे ही यातना होती है और आख़िरत (परलोक) की यातना इससे भी बड़ी है। काश वे जानते!
إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ ﴾ 34 ﴿
इन्-न लिल्-मुत्तक़ी-न अिन्-द रब्बिहिम् जन्नातिन् – नईम
निःसंदेह, सदाचारियों के लिए उनके पालनहार के पास सुखों वाले स्वर्ग हैं।
أَفَنَجْعَلُ الْمُسْلِمِينَ كَالْمُجْرِمِينَ ﴾ 35 ﴿
अ-फ़-नज्-अ़लुल्-मुस्लिमी-न कल्- मुज्-रिमीन
क्या हम आज्ञाकारियों[1] को पापियों के समान कर देंगे? 1. मक्का के प्रमुख कहते थे कि यदि प्रलय हुई तो वहाँ भी हमें यही संसारिक सुख-सुविधा प्राप्त होगी। जिस का खण्डन इस आयत में किया जा रहा है। अभिप्राय यह है कि अल्लाह के यहाँ देर है परन्तु अंधेर नहीं है।
مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ ﴾ 36 ﴿
मा लकुम्, कै-फ़ तह्कुमून
तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसा निर्णय कर रहे हो?
أَمْ لَكُمْ كِتَابٌ فِيهِ تَدْرُسُونَ ﴾ 37 ﴿
अम् लकुम् किताबुन् फ़ीहि तद्रुसून
क्या तुम्हारे पास कोई पुस्तक है, जिसमें तुम पढ़ते हो?
إِنَّ لَكُمْ فِيهِ لَمَا تَخَيَّرُونَ ﴾ 38 ﴿
इन्-न लकुम् फ़ीहि लमा त-ख़य्यरून
कि तुम्हें वही मिलेगा, जो तुम चाहोगे?
أَمْ لَكُمْ أَيْمَانٌ عَلَيْنَا بَالِغَةٌ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ ۙ إِنَّ لَكُمْ لَمَا تَحْكُمُونَ ﴾ 39 ﴿
अम् लकुम् ऐमानुन् अ़लैना बालि-ग़तुन् इला यौमिल्-क़ियामति इन्-न लकुम् लमा तह्कुमून
या तुमने हमसे शपथें ले रखी हैं, जो प्रलय तक चली जायेंगी कि तुम्हें वही मिलेगा जिसका तुम निर्णय करोगे?
سَلْهُمْ أَيُّهُم بِذَٰلِكَ زَعِيمٌ ﴾ 40 ﴿
सल्हुम् अय्युहुम् बिज़ालि-क ज़ईम
आप उनसे पूछिये कि उनमें कौन इसकी ज़मानत लेता है?
أَمْ لَهُمْ شُرَكَاءُ فَلْيَأْتُوا بِشُرَكَائِهِمْ إِن كَانُوا صَادِقِينَ ﴾ 41 ﴿
अम् लहुम् शु-रका-उ फ़ल्यअ्तू बिशु-रका-इहिम् इन् कानू सादिक़ीन
क्या उनके कुछ साझी हैं? फिर तो वे अपने साझियों को लायें,[1] यदि वे सच्चे हैं। 1. ताकि वह उन्हें अच्छा स्थान दिला दें।
يَوْمَ يُكْشَفُ عَن سَاقٍ وَيُدْعَوْنَ إِلَى السُّجُودِ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ ﴾ 42 ﴿
यौ-म युक्शफ़ु अ़न् साकिंव् व युद्-औ़-न इलस्सुजूदि फ़ला यस्ततीऊन
जिस दिन पिंडली खोल दी जायेगी और वह बुलाये जायेंगे सज्दा करने के लिए, तो (सज्दा) नहीं कर सकेंगे।[1] 1. ह़दीस में है कि प्रलय के दिन अल्लाह अपनी पिंडली खोलेगा तो प्रत्येक मोमिन पुरुष तथा स्त्री सज्दे में गिर जायेंगे। हाँ वह शेष रह जायेंगे जो दिखावे और नाम के लिये (संसार में) सज्दे किया करते थे। वह सज्दा करना चाहेंगे परन्तु उन की रीढ़ की हड्डी तख्त के समान बन जायेगी। जिस के कारण उन के लिये सज्दा करना असंभव हो जायेगा। (बुख़ारीः 4919)
خَاشِعَةً أَبْصَارُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ ۖ وَقَدْ كَانُوا يُدْعَوْنَ إِلَى السُّجُودِ وَهُمْ سَالِمُونَ ﴾ 43 ﴿
ख़ाशि-अ़तन् अब्सारुहुम् तर्-हक़ुहुम् ज़िल्लतुन्, व क़द् कानू युद्औ – न इलस्सुजूदि व हुम् सालिमून
उनकी आँखें झुकी होंगी और उनपर अपमान छाया होगा। वे (संसार में) सज्दा करने के लिए बुलाये जाते रहे जबकि वे स्वस्थ थे।
فَذَرْنِي وَمَن يُكَذِّبُ بِهَٰذَا الْحَدِيثِ ۖ سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 44 ﴿
फ-ज़र्नी व मंय्युकज्ज़िबु बिहाज़ल्-हदीसि, स-नस्तद्-रिजुहुम् मिन् हैसु ला यअ्लमून
अतः, आप छोड़ दें मुझे तथा उन्हें, जो झुठला रहे हैं इस बात (क़ुर्आन) को, हम उन्हें धीरे-धीरे खींच लायेंगे,[1] इस प्रकार कि उन्हें ज्ञान भी नहीं होगा। 1. अर्थात उन के बुरे परिणाम की ओर।
وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ ﴾ 45 ﴿
व उम्ली लहुम्, इन्-न कैदी मतीन
तथा हम उन्हें अवसर दे रहे हैं।[1] वस्तुतः, हमारा उपाय सुदृढ़ है। 1. अर्थात् संसारिक सुख-सुविधा में मग्न रखेंगे। फिर अन्ततः वह यातना में ग्रस्त हो जायेंगे।
أَمْ تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍ مُّثْقَلُونَ ﴾ 46 ﴿
अम् तस् – अलुहुम् अज्रन् फ़हुम् मिम्-म़ग्-रमिम् मुस्क़लून
तो क्या आप माँग कर रहे हैं किसी पारिश्रमिक[1] की, तो वे बोझ से दबे जा रहे हैं। 1. अर्थात धर्म के प्रचार पर।
أَمْ عِندَهُمُ الْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ ﴾ 47 ﴿
अम् ज़िन्दहुमुल् – ग़ैबु फ़हुम् यक्तुबून
या उनके पास ग़ैब का ज्ञान है, जिसे वे लिख[1] रहे हैं? 1. या ''लौह़े मह़फ़ूज़'' (सुरक्षित पुस्तक) उन के अधिकार में है इस लिये आप का आज्ञा पालन नहीं करते और उसी से ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं?
فَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تَكُن كَصَاحِبِ الْحُوتِ إِذْ نَادَىٰ وَهُوَ مَكْظُومٌ ﴾ 48 ﴿
फ़स्बिर् लिहुक्मि रब्बि-क व ला तकुन् क- साहिबिल्-हूति इज़् नादा व हु-व मक्ज़ूम
तो आप धैर्य रखें अपने पालनहार के निर्णय तक और न हो जायें मछली वाले के समान।[1] जब उसने पुकारा और वह शोकपूर्ण था। 1. इस से अभिप्राय यूनुस (अलैहिस्सलाम) हैं जिन को मछली ने निगल लिया था। (देखियेः सूरह साफ़्फ़ात, आयतः139)
لَّوْلَا أَن تَدَارَكَهُ نِعْمَةٌ مِّن رَّبِّهِ لَنُبِذَ بِالْعَرَاءِ وَهُوَ مَذْمُومٌ ﴾ 49 ﴿
लौ ला अन् तदा-र-कहू निअ्मतुम्- मिर्रब्बिही लनुबि-ज़ बिल् अरा-इ व हु-व मज़्मूम
और यदि न पा लेती उसे उसके पालनहार की दया, तो वह फेंक दिया जाता बंजर में और वह बुरी दशा में होता।
فَاجْتَبَاهُ رَبُّهُ فَجَعَلَهُ مِنَ الصَّالِحِينَ ﴾ 50 ﴿
फ़ज्तबाहु रब्बुहू फ़-ज-अ-लहू मिनस्सालिहीन
फिर चुन लिया उसे उसके पालनहार ने और बना दिया उसे सदाचारियों में से।
وَإِن يَكَادُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَيُزْلِقُونَكَ بِأَبْصَارِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا الذِّكْرَ وَيَقُولُونَ إِنَّهُ لَمَجْنُونٌ ﴾ 51 ﴿
व इंयू – यकादुल्लज़ी-न क- फ़रू ल – युज़्लिक़ून – क बि- अब्सारिहिम् लम्मा समिउज़्ज़िक्-र व यक़ूलू-न इन्नहू ल-मज्नून
और ऐसा लगता है कि जो काफ़िपर हो गये, वे अवश्य फिसला देंगे आपको अपनी आँखों से (घूर कर) जब वे सुनते हों क़ुर्आन को तथा कहते हैं कि वह अवशय् पागल है।
وَمَا هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَالَمِينَ ﴾ 52 ﴿
व मा हु-व इल्ला ज़िक्रूल्- लिल्-आलमीन
जबकि ये क़ुर्आन तो बस एक[1] शिक्षा है, पूरे संसार वासियों के लिए। 1. इस में यह बताया गया है कि क़ुर्आन केवल अरबों के लिये नहीं, संसार के सभी देशों और जातियों की शिक्षा के लिये उतरा है।