सूरह मुर्सलात के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 50 आयतें है।
- इस की आयत 1 में मुर्सलात (हवाओं) की शपथ ली गई है। इसलिये इस का नाम सूरह मुर्सलात है। इस में झक्कड़ को प्रलय के समर्थन में प्रस्तुत किया गया है। फिर प्रलय का भ्यावः चित्र दिखाया गया है।
- आयत 16 से 28 तक प्रतिफल के दिन के होने के प्रमाण प्रस्तुत करते हुये उस पर सोच-विचार का आमंत्रण दिया गया है।
- इस में क्यामत के झुठलाने वालों को उस दिन जिस दुर्दशा का सामना होगा उस का चित्रण किया गया है। और आयत 41 से 44 तक सदाचारियों के सुफल का चित्रण किया गया है।
- अन्त में झुठलाने वालों की अपराधिक नीति पर कड़ी चेतावनी दी गई है।
- अब्दुल्लाह बिन मसूऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि हम मिना की वादी में थे। और सूरह मुर्सलात उतरी। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसे पढ़ रहे थे और हम उसे आप से सीख रहे थे। (सहीह बुखारीः 4930, 4931)
सूरह अल-मुर्सलत | Surah Mursalat in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا ﴾ 1 ﴿
वल मुर्सलाती उर्फा
शपथ है भेजी हुई निरन्तर धीमी वायुओं की!
فَالْعَاصِفَاتِ عَصْفًا ﴾ 2 ﴿
फल आसिफाती अस्फा
फिर झक्कड़ वाली हवाओं की!
وَالنَّاشِرَاتِ نَشْرًا ﴾ 3 ﴿
वन नाशिराती नश्फा
और बादलों को फैलाने वालियों की![1] 1. अर्थात जो हवायें अल्लाह के आदेशानुसार बादलों को फैलाती हैं।
فَالْفَارِقَاتِ فَرْقًا ﴾ 4 ﴿
फल फारिक़ाति फरक़ा
फिर अन्तर करने[1] वालों की! 1. अर्थात सत्योसत्य तथा वैध और अवैध के बीच अन्तर करने के लिये आदेश लाते हैं।
فَالْمُلْقِيَاتِ ذِكْرًا ﴾ 5 ﴿
फल मुल्कियाती ज़िकरा
फिर पहुँचाने वालों की वह़्यी (प्रकाशना[1]) को! 1. अर्थात जो वह़्यी (प्रकाशना) ग्रहण कर के उसे रसूलों तक पहुँचाते हैं।
عُذْرًا أَوْ نُذْرًا ﴾ 6 ﴿
उजरन औ नुजरा
क्षमा के लिए अथवा चेतावनी[1] के लिए! 1. अर्थात ईमान लाने वालों के लिये क्षमा का वचन तथा काफ़िरों के लिये यातना की सूचना लाते हैं।
إِنَّمَا تُوعَدُونَ لَوَاقِعٌ ﴾ 7 ﴿
इन्नमा तू अदूना लौ किअ्
निश्चय जिसका वचन तुम्हें दिया जा रहा है, वह अवश्य आनी है।
فَإِذَا النُّجُومُ طُمِسَتْ ﴾ 8 ﴿
फ इजन नुजूमु तुमिसत
फिर जब तारे धुमिल हो जायेंगे।
وَإِذَا السَّمَاءُ فُرِجَتْ ﴾ 9 ﴿
व इजस समाऊ फुरिजत
तथा जब आकाश खोल दिया जायेगा।
وَإِذَا الْجِبَالُ نُسِفَتْ ﴾ 10 ﴿
व इजल जिबालू नुसिफत
तथा जब पर्वत चूर-चूर करके उड़ा दिये जायेंगे।
وَإِذَا الرُّسُلُ أُقِّتَتْ ﴾ 11 ﴿
व इज़र रुसुलु उक्कितत
और जब रसूलों का एक समय निर्धारित किया जायेगा।[1] 1. उन के तथा उन के समुदायों के बीच निर्णय करने के लिये। और रसूल गवाही देंगे।
لِأَيِّ يَوْمٍ أُجِّلَتْ ﴾ 12 ﴿
लि अइ इ यौमिन उज्जिलत
किस दिन के लिए इसे निलम्बित रखा गया है?
وَمَا أَدْرَاكَ مَا يَوْمُ الْفَصْلِ ﴾ 14 ﴿
वमा अदरा क मा यौमुल फस् ल
आप क्या जानें कि क्या है वह निर्णय का दिन?
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 15 ﴿
वैलुयि यौमाइजिल लिल्मुकज्जिबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
أَلَمْ نُهْلِكِ الْأَوَّلِينَ ﴾ 16 ﴿
अलम नुह लिकिल औलीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
ثُمَّ نُتْبِعُهُمُ الْآخِرِينَ ﴾ 17 ﴿
सुम्मा नुत्बि उहुमुल आखिरीन
फिर पीछे लगा[1] देंगे उनके पिछलों को। 1. अर्थात उन्हीं के समान यातना ग्रस्त कर देंगे।
كَذَٰلِكَ نَفْعَلُ بِالْمُجْرِمِينَ ﴾ 18 ﴿
कजालिका नफ़ अलु बिल मुजरिमीन
इसी प्रकार, हम करते हैं अपराधियों के साथ।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 19 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
أَلَمْ نَخْلُقكُّم مِّن مَّاءٍ مَّهِينٍ ﴾ 20 ﴿
अलम नख्लुक्कुम मिम् मा इम महीन
क्या हमने पैदा नहीं किया है तुम्हें तुच्छ जल (वीर्य) से?
فَجَعَلْنَاهُ فِي قَرَارٍ مَّكِينٍ ﴾ 21 ﴿
फजा अल्नाहु फी क़रारिम मकीन
फिर हमने रख दिया उसे एक सुदृढ़ स्थान (गर्भाशय) में।
إِلَىٰ قَدَرٍ مَّعْلُومٍ ﴾ 22 ﴿
इला क द रिम मअ् लूम
एक निश्चित अवधि तक।[1] 1. अर्थात गर्भ की अवधि तक।
فَقَدَرْنَا فَنِعْمَ الْقَادِرُونَ ﴾ 23 ﴿
फ कदरना फनिमअ् मल क़ादिरून
तो हमने सामर्थ्य[1] रखा, अतः हम अच्छा सामर्थ्य रखने वाले हैं। 1. अर्थात उसे पैदा करने पर।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 24 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ كِفَاتًا ﴾ 25 ﴿
अलम नज् अलिल अरजा किफाता
क्या हमने नहीं बनाया धरती को समेटकर[1] रखने वाली? 1. अर्थात जब तक लोग जीवित रहते हैं तो उस के ऊपर रहते तथा बसते हैं। और मरण के पश्चात उसी में चले जाते हैं।
أَحْيَاءً وَأَمْوَاتًا ﴾ 26 ﴿
अह् या औं व अम्वाता
जीवित तथा मुर्दों को।
وَجَعَلْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ شَامِخَاتٍ وَأَسْقَيْنَاكُم مَّاءً فُرَاتًا ﴾ 27 ﴿
व जअलना फीहा रवासिया शामि खातिन व अस् कैनाकुम मा अन फुरता
तथा बना दिये हमने उसमें बहुत-से ऊँचे पर्वत और पिलाया हमने तुम्हें मीठा जल।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 28 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
انطَلِقُوا إِلَىٰ مَا كُنتُم بِهِ تُكَذِّبُونَ ﴾ 29 ﴿
इन् त्वालिकू इला मा कुंतुम बिही तुकज्जिबून
(कहा जायेगाः) चलो उस (नरक) की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे।
انطَلِقُوا إِلَىٰ ظِلٍّ ذِي ثَلَاثِ شُعَبٍ ﴾ 30 ﴿
इन् त्वालिकू इला जिल्लिन ज़ी सलासी शुअब
चलो ऐसी छाया[1] की ओर जो तीन शाखाओं वाली है। 1. छाया से अभिप्राय, नरक के धुवें की छाया है। जो तीन दिशाओं में फैला होगा।
لَّا ظَلِيلٍ وَلَا يُغْنِي مِنَ اللَّهَبِ ﴾ 31 ﴿
ला ज़लीलिऔं वला युगनी मिनल लहब
जो न छाया देगी और न ज्वाला से बचायेगी।
إِنَّهَا تَرْمِي بِشَرَرٍ كَالْقَصْرِ ﴾ 32 ﴿
इन्नहा तर्मी बि शरारिन कल क़स्र
वह (अग्नि) फेंकती होगी चिँगारियाँ भवन के समान।
كَأَنَّهُ جِمَالَتٌ صُفْرٌ ﴾ 33 ﴿
क अन्नहु जमालतुन सुफ्र
जैसे वह पीले ऊँट हों।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 34 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
هَٰذَا يَوْمُ لَا يَنطِقُونَ ﴾ 35 ﴿
हाजा यौमु ला यन त्विकून
ये वो दिन है कि वे बोल[1] नहीं सकेंगे। 1. अर्थात उन के विरुध्द ऐसे तर्क परस्तुत कर दिये जायेंगे कि वह अवाक रह जायेंगे।
وَلَا يُؤْذَنُ لَهُمْ فَيَعْتَذِرُونَ ﴾ 36 ﴿
वला युअ् जनु लहुम फ यअ् तजिरून
और न उन्हें अनुमति दी जायेगी कि वे बहाने बना सकें।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 37 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
هَٰذَا يَوْمُ الْفَصْلِ ۖ جَمَعْنَاكُمْ وَالْأَوَّلِينَ ﴾ 38 ﴿
हाजा यौमुल फसलि जमअ्’नाकुम वल अव्वलीन
ये निर्णय का दिन है, हमने एकत्र कर लिया है तुम्हें तथा पूर्व के लोगों को।
فَإِن كَانَ لَكُمْ كَيْدٌ فَكِيدُونِ ﴾ 39 ﴿
फ इन का न लकुम कैदुन फ कीदून
तो यदि तुम्हारे पास कोई चाल[1] हो, तो चल लो। 1. अर्थात मेरी पकड़ से बचने की।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 40 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي ظِلَالٍ وَعُيُونٍ ﴾ 41 ﴿
इन्नल मुत्तक़ीना फी जिलालिऔं व उयून
निःसंदेह, आज्ञाकारी उस दिन छाँव तथा जल स्रोतों में होंगे।
وَفَوَاكِهَ مِمَّا يَشْتَهُونَ ﴾ 42 ﴿
व फवाकिहा मिम्मा यश् तहून
तथा मन चाहे फलों में।
كُلُوا وَاشْرَبُوا هَنِيئًا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴾ 43 ﴿
कुलू वश’रबू हनी’ अम बिमा कुंतुम तअ्’मलून
खाओ तथा पिओ मनमानी उन कर्मों के बदले, जो तुम करते रहे।
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ ﴾ 44 ﴿
इन्ना कज़ालिका नज्ज़िल मुह्’सिनीन
हम इसी प्रकार प्रतिफल देते हैं।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 45 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
كُلُوا وَتَمَتَّعُوا قَلِيلًا إِنَّكُم مُّجْرِمُونَ ﴾ 46 ﴿
कुलू व तमत्’तऊ क़ुलीलन इन्नाकुम मुजरिमून
(हे झुठलाने वालो!) तुम खा लो तथा आनन्द ले लो कुछ[1] दिन। वास्तव में, तुम अपराधी हो। 1. अर्थात संसारिक जीवन में।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 47 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لَا يَرْكَعُونَ ﴾ 48 ﴿
व इज़ा क़ीला लहुमुर कऊ ला यर क ऊन
जब उनसे कहा जाता है कि (अल्लाह के समक्ष) झुको, तो झुकते नहीं।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 49 ﴿
वैलुयी यौमा इजिल लिल मुकज्ज़िबीन
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ ﴾ 50 ﴿
फ बि अय्यि हदीसिम बअ्’दहू युअ्मिनून
तो (अब) वे किस बात पर इस (क़ुर्आन) के पश्चात् ईमान[1] लायेंगे? 1. अर्थात जब अल्लाह की अन्तिम पुस्तक पर ईमान नहीं लाते तो फिर कोई दूसरी पुस्तक नहीं हो सकती जिस पर वह ईमान लायें। इसलिये कि अब और कोई पुस्तक आसमान से आने वाली नहीं है।