सूरह मुनाफिकून के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मदनी है, इस में 11 आयतें हैं।
- इस का नाम इस की प्रथम आयत से लिया गया है।
- इस में मुनाफ़िकों के उस दुर्व्यवहार का वर्णन है जो उन्होंने इस्लाम के विरोध में अपना रखा था जिस के कारण वह अक्षम्य अपराध के दोषी बन गये ।
- आयत 9 से 11 तक में ईमान वालों को संबोधित कर के अल्लाह का स्मरण (याद) करने तथा उस की राह में दान करने पर बल दिया गया है। जिस से निफाक (द्विधा) के रोग का पता भी लगता है। और उसे दूर करने का उपाय भी सामने आ जाता है।
- हदीस में है कि मुनाफिक के लक्षण तीन हैः जब वह बात करे तो झूठ बोले। और जब वादा करे तो मुकर जाये। और जब उस के पास अमानत रखी जाये तो उस में ख्यानत (विश्वासघात) करे। (सहीह बुखारीः 33, सहीह मुस्लिमः 59)
- दूसरी हदीस में एक चौथा लक्षण यह बताया गया है कि जब वह झगड़ा करे तो गाली दे। (सहीह बुखारीः 34, तथा सहीह मुस्लिमः 58)
सूरह अल-मुनाफिकुन | Surah Munafiqun in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
إِذَا جَاءَكَ الْمُنَافِقُونَ قَالُوا نَشْهَدُ إِنَّكَ لَرَسُولُ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّكَ لَرَسُولُهُ وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّ الْمُنَافِقِينَ لَكَاذِبُونَ ﴾ 1 ﴿
इज़ा जा-अ-कल मुनाफ़िक़ूना क़ा-लू नश्हदु इन्नका ल रसूलुल्लाह, वल्लाहु यअ्लमु इन्नका ल रसूलुह, वल्लाहु यश्हदु इन्नल मुनाफिक़ी-न ल काज़िबून
जब आते हैं आपके पास मुनाफ़िक़, तो कहते हैं कि हम साक्ष्य (गवाही) देते हैं कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं तथा अल्लाह जानता है कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं और अल्लाह गवाही देता है कि मुनाफ़िक़ निश्चय झूठे[1] हैं। 1. आदरणीय ज़ैद पुत्र अर्क़म (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि एक युध्द में मैं ने (मुनाफ़िक़ों के प्रमुख) अब्दुल्लाह पुत्र उबय्य को कहते हुये सना कि उन पर ख़र्च न करो जो अल्लाह के रसूल के पास हैं। यहाँ तक कि वह बिखर जायें आप के आस-पास से। और यदि हम मदीना वापिस गये तो हम सम्मानित उस से अपमानित (इस से अभिप्राय वह मुसलमानों को ले रहे थे।) को अवश्य निकाल देंगे। मैं ने अपने चाचा को यह बात बता दी। और उन्हों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बता दी। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अब्दुल्लाह पुत्र उबय्य को बुलाया। उस ने और उस के साथियों ने शपथ ले ली कि उन्होंने यह बात नहीं कही है। इस कारण आप ने मुझे (अर्थातः ज़ैद पुत्र अर्क़म) झुठा समझ लिया। जिस पर मुझे बड़ा शोक हुआ। और मैं घर में रहने लगा। फिर अल्लाह ने यह सूरह उतारी तो आप ने मुझे बुला कर सुनायी। और कहा कि हे ज़ैद! अल्लाह ने तुम्हें सच्चा सिध्द कर दिया है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4900)
اتَّخَذُوا أَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۚ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 2 ﴿
इत्तख्ज़ू अये मानहुम जुन्नतन फ सद्दु अन सबीलिल्लाह, इन्नहुम् सा-अ मा कानू यअ्मलून
जब आते हैं आपके पास मुनाफ़िक़, तो कहते हैं कि हम साक्ष्य (गवाही) देते हैं कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं तथा अल्लाह जानता है कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं और अल्लाह गवाही देता है कि मुनाफ़िक़ निश्चय झूठे[1] हैं। 1. आदरणीय ज़ैद पुत्र अर्क़म (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि एक युध्द में मैं ने (मुनाफ़िक़ों के प्रमुख) अब्दुल्लाह पुत्र उबय्य को कहते हुये सना कि उन पर ख़र्च न करो जो अल्लाह के रसूल के पास हैं। यहाँ तक कि वह बिखर जायें आप के आस-पास से। और यदि हम मदीना वापिस गये तो हम सम्मानित उस से अपमानित (इस से अभिप्राय वह मुसलमानों को ले रहे थे।) को अवश्य निकाल देंगे। मैं ने अपने चाचा को यह बात बता दी। और उन्हों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बता दी। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अब्दुल्लाह पुत्र उबय्य को बुलाया। उस ने और उस के साथियों ने शपथ ले ली कि उन्होंने यह बात नहीं कही है। इस कारण आप ने मुझे (अर्थातः ज़ैद पुत्र अर्क़म) झुठा समझ लिया। जिस पर मुझे बड़ा शोक हुआ। और मैं घर में रहने लगा। फिर अल्लाह ने यह सूरह उतारी तो आप ने मुझे बुला कर सुनायी। और कहा कि हे ज़ैद! अल्लाह ने तुम्हें सच्चा सिध्द कर दिया है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4900)
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا فَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ ﴾ 3 ﴿
ज़ालिका बि अन्नहुम् आ मनू सुम्मा कफरू फ तुबिअ अला क़ुलू बिहिम् फ़हुम् ला यफक़हून
ये सब कुछ इस कारण है कि वे ईमान लाये, फिर कुफ़्र कर गये, तो मुहर लगा दी अल्लाह ने उनके दिलों पर, अतः, वे समझते नहीं।
وَإِذَا رَأَيْتَهُمْ تُعْجِبُكَ أَجْسَامُهُمْ ۖ وَإِن يَقُولُوا تَسْمَعْ لِقَوْلِهِمْ ۖ كَأَنَّهُمْ خُشُبٌ مُّسَنَّدَةٌ ۖ يَحْسَبُونَ كُلَّ صَيْحَةٍ عَلَيْهِمْ ۚ هُمُ الْعَدُوُّ فَاحْذَرْهُمْ ۚ قَاتَلَهُمُ اللَّهُ ۖ أَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ ﴾ 4 ﴿
व इज़ा र अैतहुम् तुअ्जिबुका अज्सामुहुम्, व इय्य्कूलू तस्मअ् लि क़ौलिहिम्, क अन्नहुम् ख़ुशुबुम् मुसन्नदह्, यह्सबूना कुल्ला सैहतिन अलैहिम्, हुमुल् अदूवु फ़ह् ज़र्हुम्, क़ा-त-ल हुमुल्लाहु अन्ना युअ्फ़कून
और यदि आप उन्हें देखें, तो आपको भा जायें उनके शरीर और यदि वे बात करें, तो आप सुनने लगें उनकी बात, जैसे कि वे लकड़ियाँ हों दीवार के सहारे लगायी[1] हुईं। वे प्रत्येक कड़ी ध्वनि को अपने विरुध्द[2] समझते हैं। वही शत्रु हैं, आप उनसे सावधान रहें। अल्लाह उन्हें नाश करे, वे किधर फिरे जा रहे हैं! 1. जो देखने में सुन्दर परन्तु निर्बोध होती हैं। 2. अर्थात प्रत्येक समय उन्हें धड़का लगा रहता है कि उन के अपराध खुल न जायें।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا يَسْتَغْفِرْ لَكُمْ رَسُولُ اللَّهِ لَوَّوْا رُءُوسَهُمْ وَرَأَيْتَهُمْ يَصُدُّونَ وَهُم مُّسْتَكْبِرُونَ ﴾ 5 ﴿
व इज़ा क़ी-ल लहुम् तआलौ यस्तग्फिर लकुम् रसूलुल्लाहि लौ वौ रु-ऊसहुम् व-र अैतहुम् य-सुद्दूना व हुम् मुस्तक्बिरून
जब उनसे कहा जाता है कि आओ, ताकि क्षमा की प्रार्थना करें तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल, तो मोड़ लेते हैं अपने सिर तथा आप उन्हें देखते हैं कि वे रुक जाते हैं अभिमान (घमंड) करते हुए।
سَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَسْتَغْفَرْتَ لَهُمْ أَمْ لَمْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ لَن يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ ﴾ 6 ﴿
सबा उन अलैहिम् अस्तग़्फिरता लहुम् अम्लम् क़ौ-मल् फ़ासिक़ीन
हे नबी! उनके समीप समान है कि आप क्षमा की प्रार्थना करें उनके लिए अथवा क्षमा की प्रार्थना न करें उनके लिए। कदापि नहीं क्षमा करेगा अल्लाह उन्हें। वास्तव में अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता है अवज्ञाकारियों को।
هُمُ الَّذِينَ يَقُولُونَ لَا تُنفِقُوا عَلَىٰ مَنْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ حَتَّىٰ يَنفَضُّوا ۗ وَلِلَّهِ خَزَائِنُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَٰكِنَّ الْمُنَافِقِينَ لَا يَفْقَهُونَ ﴾ 7 ﴿
हुमुल् लज़ीना यकूलूना ला तुन्फिक़ू अला मन् इन्दा रसूलिल्लाहि हत्ता यंफज्जू, व लिल्लाहि ख़ज़ाइनुस समाबाति वल् अर्ज़ी वला किन्नल् मुनाफ़िक़ीना ला यफ़्क़हून
यही वो लोग हैं, जो कहते हैं कि मत ख़र्च करो उनपर, जो अल्लाह के रसूल के पास रहते हैं, ताकि वे बिखर जायें। जबकि अल्लाह ही के अधिकार में हैं आकाशों तथा धरती के सभी कोष (ख़ज़ाने)। परन्तु मुनाफ़िक़ समझते नहीं हैं।
يَقُولُونَ لَئِن رَّجَعْنَا إِلَى الْمَدِينَةِ لَيُخْرِجَنَّ الْأَعَزُّ مِنْهَا الْأَذَلَّ ۚ وَلِلَّهِ الْعِزَّةُ وَلِرَسُولِهِ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَلَٰكِنَّ الْمُنَافِقِينَ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 8 ﴿
यक़ूलूना लअिर्रा जअ्ना इलल् मदीनती ला युख्रिजन्नल् अ अज्ज़ु मिन्हल् अ ज़ल्, व लिल्लाहिल् अ़िज़्ज़तु व लि रसूलिही व लिल मुअ्मिनीना व-ला किन्नल् मुनाफ़िकी़ना ला यअ्लमून
वे कहते हैं कि यदि हम वापस पहुँच गये मदीना तक, तो निकाल[1] देगा सम्मानित उससे अपमानित को। जबकि अल्लाह ही के लिए सम्मान हैं एवं उसके रसूल तथा ईमान वालों के लिए। परन्तु मुनाफ़िक़ जानते नहीं। 1. सम्मानितः मुनाफ़िक़ों के मुख्या अब्दुल्लाह पुत्र उबय्य ने स्वयं को तथा अपमानितः रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहा था।
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُلْهِكُمْ أَمْوَالُكُمْ وَلَا أَوْلَادُكُمْ عَن ذِكْرِ اللَّهِ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ ﴾ 9 ﴿
या अय्युहल् लज़ीना आमनु ला तुल्हिकुम् अम्वालुकुम् व-ला औलादुकुम् अ़न् ज़िक्रिल्लाह, व मइ यफ़्अल् ज़ालिका फ़ उलाइका हुमुल् ख़ासिरून
हे ईमान वालो! तुम्हें अचेत न करें तुम्हारे धन तथा तुम्हारी संतान अल्लाह के स्मर्ण (याद) से और जो ऐसा करेंगे, वही क्षति ग्रस्त हैं।
وَأَنفِقُوا مِن مَّا رَزَقْنَاكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ فَيَقُولَ رَبِّ لَوْلَا أَخَّرْتَنِي إِلَىٰ أَجَلٍ قَرِيبٍ فَأَصَّدَّقَ وَأَكُن مِّنَ الصَّالِحِينَ ﴾ 10 ﴿
व अन्फ़िक़ू मिम्मा रज़क्नाकुम् मिन् क़ब्लि अइ याति-य अ-ह-द-कुमुल् मौतु फ़-य-क़ू-ल रब्बि लौला अख्खर् तनी इला अ-ज-लिन् क़रीब, फ़ अस्सद्द्क़ व अकुम् मिनस् सालिहीन
तथा दान करो उसमें से, जो प्रदान किया है हमने तुम्हें, इससे पूर्व कि आ जाये तुममें से किसी के मरण का[1] समय, तो कहे कि मेरे पालनहार! क्यों नहीं अवसर दे दिया मुझे कुछ समय का। ताकि मैं दान करता तथा सदाचारियों में हो जाता। 1. ह़दीस में है कि मनुष्य का वास्तविक धन वही है जिस को वह इस संसार में दान कर जाये। और जिसे वह छोड़ जाये तो वह उस का नहीं बल्कि उस के वारिस का धन है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6442)
وَلَن يُؤَخِّرَ اللَّهُ نَفْسًا إِذَا جَاءَ أَجَلُهَا ۚ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ ﴾ 11 ﴿
व लइ युअख्खिरल्लाहु नफ्सन इज़ा जा-अ अ-ज-लुहा, वल्लाहु ख़बीरूम् बिमा तअ्मलून
और कदापि अल्लाह अवसर नहीं देता किसी प्राणी को, जब आ जाये उसका निर्धारित समय और अल्लाह भली-भाँति सूचित है उससे, जो कुछ तुम कर रहे हो।