सूरह मुद्दस्सिर के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 56 आयतें हैं।
- इस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ((अल मुद्दस्सिर)) कह कर संबोधित किया गया है। अर्थात चादर ओढ़ने वाले। इस लिये इस को यह नाम दिया गया है। और आप को सावधान करने का निर्देश देते हुये अच्छे स्वभाव तथा शुभकर्म की शिक्षा दी गई है।
- आयत 11 से 31 तक कुरैश के प्रमुखों को जो इस्लाम का विरोध कर रहे थे नरक की यातना की धमकी दी गई है। तथा 32 से 48 तक परलोक के बारे में चेतावनी है।
- अन्त में कुर्थान के शिक्षा होने को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि बात दिल में उतर जाये।
सूरह अल्-मुद्दस्सिर | Surah Mudassir in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
يَا أَيُّهَا الْمُدَّثِّرُ ﴾ 1 ﴿
या अय्युहल मुदस्सिर
हे चादर ओढ़ने[1] वाले! 1. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर प्रथम वह़्यी के पश्चात् कुछ दिनों तक वह़्यी नहीं आई। फिर एक बार आप जा रहे थे कि आकाश से एक आवाज़ सुनी। ऊपर देखा तो वही फ़रिश्ता जो आप के पास 'ह़िरा' गुफ़ा में आया था आकाश तथा धरती के बीच एक कुर्सी पर विराजमान था। जिस से आप डर गये। और धरती पर गिर गये। फिर घर आये और अपनी पत्नी से कहाः मुझे चादर ओढ़ा दो, मुझे चादर ओढ़ा दो। उस ने चादर ओढ़ा दी। और अल्लाह ने यह सूरह उतारी। फिर निरन्तर वह़्यी आने लगी। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4925, 4926, सह़ीह़ मुस्लिमः 161) प्रथम वह़्यी से आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नबी बनाया गया। और अब आप पर धर्म के प्रचार का भार रख दिया गया। इन आयतों में आप के माध्यम से मुसलमानों को पवित्र रहने के निर्देश दिये गये हैं।
وَرَبَّكَ فَكَبِّرْ ﴾ 3 ﴿
व रब्बका फ कब्बिर
तथा अपने पालनहार की महिमा का वर्णन करो।
وَثِيَابَكَ فَطَهِّرْ ﴾ 4 ﴿
व सियाबका फ तह्हिर
तथा अपने कपड़ों को पवित्र रखो।
وَالرُّجْزَ فَاهْجُرْ ﴾ 5 ﴿
वर् रुज्ज़ा फह्जुर
और मलीनता को त्याग दो।
وَلَا تَمْنُن تَسْتَكْثِرُ ﴾ 6 ﴿
वला तम्नून तस्तक्सिर
तथा उपकार न करो इसलिए कि उसके द्वारा अधिक लो।
وَلِرَبِّكَ فَاصْبِرْ ﴾ 7 ﴿
व लिरब्बिका फस्बिर
और अपने पालनहार ही के लिए सहन करो।
فَإِذَا نُقِرَ فِي النَّاقُورِ ﴾ 8 ﴿
फ इज़ा नुकिरा फिन नाकूर
फिर जब फूँका जायेगा[1] नरसिंघा में। 1. अर्थात प्रलय के दिन।
فَذَٰلِكَ يَوْمَئِذٍ يَوْمٌ عَسِيرٌ ﴾ 9 ﴿
फ ज़ालिका यौमा इज़िन यौमुं असीर
तो उस दिन अति भीषण दिन होगा।
عَلَى الْكَافِرِينَ غَيْرُ يَسِيرٍ ﴾ 10 ﴿
अलल काफिरीना गैरु यसीर
काफ़िरों पर सरल न होगा।
ذَرْنِي وَمَنْ خَلَقْتُ وَحِيدًا ﴾ 11 ﴿
ज़रनी व मन खलक़तु वहीदा
आप छोड़ दें मुझे और उसे, जिसे मैंने पैदा किया अकेला।
وَجَعَلْتُ لَهُ مَالًا مَّمْدُودًا ﴾ 12 ﴿
व जअलतु लहु मालन ममदूदा
फिर दे दिया उसे अत्यधिक धन।
وَبَنِينَ شُهُودًا ﴾ 13 ﴿
व बनीना शुहूदा
और पुत्र उपस्थित रहने[1] वाले। 1. जो उस की सेवा में उपस्थित रहते हैं। कहा गया है कि इस से अभिप्राय वलीद पुत्र मुग़ीरह है जिस के दस पुत्र थे।
وَمَهَّدتُّ لَهُ تَمْهِيدًا ﴾ 14 ﴿
व मह्हद्तुम लहु तम्हीदा
और दिया मैंने उसे प्रत्येक प्रकार का संसाधन।
ثُمَّ يَطْمَعُ أَنْ أَزِيدَ ﴾ 15 ﴿
सुम्मा यतमउ अन् अज़ीद
फिर भी वह लोभ रखता है कि उसे और अधिक दूँ।
كَلَّا ۖ إِنَّهُ كَانَ لِآيَاتِنَا عَنِيدًا ﴾ 16 ﴿
कल्ला इन्नहु काना लि आयातिना अनीदा
कदापि नहीं। वह हमारी आयतों का विरोधी है।
سَأُرْهِقُهُ صَعُودًا ﴾ 17 ﴿
सा उर हिकुहु सऊदा
मैं उसे चढ़ाऊँगा कड़ी[1] चढ़ाई। 1. अर्थात कड़ी यातना दूँगा। (इब्ने कसीर)
إِنَّهُ فَكَّرَ وَقَدَّرَ ﴾ 18 ﴿
इन्नहु फक्करा व क़द्दर
उसने विचार किया और अनुमान लगाया।[1] 1. क़ुर्आन के संबंध में प्रश्न किया गया तो वह सोचने लगा कि कौन सी बात बनाये, और उस के बारे में क्या कहे? (इब्ने कसीर)
فَقُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَ ﴾ 19 ﴿
फ क़ुतिला कैफा क़द्दर
वह मारा जाये! फिर उसने कैसा अनुमान लगाया?
ثُمَّ قُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَ ﴾ 20 ﴿
सुम्मा क़ुतिला कैफा क़द्दर
फिर (उसपर अल्लाह की) मार! उसने कैसा अनुमान लगाया?
ثُمَّ عَبَسَ وَبَسَرَ ﴾ 22 ﴿
सुम्मा अबासा व बसर
फिर माथे पर बल दिया और मुँह बिदोरा।
ثُمَّ أَدْبَرَ وَاسْتَكْبَرَ ﴾ 23 ﴿
सुम्मा अदबरा वस्तकबर
फिर (सत्य से) पीछे फिरा और घमंड किया।
فَقَالَ إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ يُؤْثَرُ ﴾ 24 ﴿
फ काला इन हाज़ा इल्ला सिहरुयी युअ् सर
और बोला कि ये तो पहले से चला आ रहा है, एक जादू है।[1] 1. अर्थात मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यह किसी से सीख लिया है। कहा जाता है कि वलीद पुत्र मुग़ीरह ने अबू जह्ल से कहा था कि लोगों में क़ुर्आन के जादू होने का प्रचार किया जाये।
إِنْ هَٰذَا إِلَّا قَوْلُ الْبَشَرِ ﴾ 25 ﴿
इन हाज़ा इल्ला कौलुल बशर
ये तो बस मनुष्य[1] का कथन है। 1. अर्थात अल्लाह की वाणी नहीं है।
سَأُصْلِيهِ سَقَرَ ﴾ 26 ﴿
स उस्लीही सक़र
मैं उसे शीघ्र ही नरक में झोंक दूँगा।
وَمَا أَدْرَاكَ مَا سَقَرُ ﴾ 27 ﴿
वमा अदराका मा सक़र
और आप क्या जानें कि नरक क्या है।
لَا تُبْقِي وَلَا تَذَرُ ﴾ 28 ﴿
ला तुब्की वला तज़र
न शेष रखेगी और न छोड़ेगी।
لَوَّاحَةٌ لِّلْبَشَرِ ﴾ 29 ﴿
लौ वाहतुल् लिल बशर
वह खाल झुलसा देने वाली।
عَلَيْهَا تِسْعَةَ عَشَرَ ﴾ 30 ﴿
अलैहा तिस्अता अशर
नियुक्त हैं उनपर उन्नीस (रक्षख फ़रिश्ते)।
وَمَا جَعَلْنَا أَصْحَابَ النَّارِ إِلَّا مَلَائِكَةً ۙ وَمَا جَعَلْنَا عِدَّتَهُمْ إِلَّا فِتْنَةً لِّلَّذِينَ كَفَرُوا لِيَسْتَيْقِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَيَزْدَادَ الَّذِينَ آمَنُوا إِيمَانًا ۙ وَلَا يَرْتَابَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَالْمُؤْمِنُونَ ۙ وَلِيَقُولَ الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ وَالْكَافِرُونَ مَاذَا أَرَادَ اللَّهُ بِهَٰذَا مَثَلًا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ اللَّهُ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَمَا يَعْلَمُ جُنُودَ رَبِّكَ إِلَّا هُوَ ۚ وَمَا هِيَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْبَشَرِ ﴾ 31 ﴿
वमा ज अल्ना अस्हाबन नारि इल्ला मलाअिकह, वमा ज अल्ना इद्दतहुम इल्ला फित्नत्ल लिल्लजीना कफरु, लि यस्ततैइक़िनल लज़ीना ऊतुल किताबा व यज़दादल लज़ीना आमनू ईमानौं वला यर्ताबल् लज़ीना ऊतुल किताबा वल मुअ्मिनून, व लियाकूलल लज़ीना फी कुलूबिहिम मरजों वल काफिरूना माज़ा अरादल्लाहु बिहाज़ा मसाला, कज़ालिका युज़िल्लुल्लाहू मइ् यशाउ व यहदी मइ यशाअ, वमा यअ्लमु जुनूदा रब्बिका इल्ला हू, वमा हिया इल्ला ज़िकरा लिल बशर
और हमने नरक के रक्षक फ़रिश्ते ही बनाये हैं और उनकी संख्या को काफ़िरों के लिए परीक्षा बना दिया गया है। ताकि विश्वास कर लें अह्ले[1] किताब और बढ़ें जो ईमान लाये हैं ईमान में और संदेह न करें जो पुस्तक दिये गये हैं और ईमान वाले और ताकि कहें वे जिनके दिलों में (द्विधा का) रोग है तथा काफ़िर[2] कि क्या तात्पर्य है अल्लाह का इस उदाहरण से? ऐसे ही कुपथ करता है अल्लाह जिसे चाहता है और संमार्ग दर्शाता है, जिसे चाहता है और नहीं जानता है आपके पालनहार की सेनाओं को उसके सिवा कोई और तथा नहीं है ये नरक की चर्चा, किन्तु मनुष्य की शिक्षा के लिए। 1. क्योंकि यहूदियों तथा ईसाईयों की पुस्तकों में भी नरक के अधिकारियों की यही संख्या बताई गई है। 2. जब क़ुरैश ने नरक के अधिकारियों की चर्चा सुनी तो अबू जह्ल ने कहाः हे क़ुरैश के समूह! क्या तुम में से दस-दस लोग, एक-एक फ़रिश्ते के लिये काफ़ी नहीं हैं? और एक व्यक्ति ने जिसे अपने बल पर बड़ा गर्व था कहा कि 17 को मैं अक्ला देख लूँगा। और तुम सब मिल कर दो को देख लेना। (इब्ने कसीर)
كَلَّا وَالْقَمَرِ ﴾ 32 ﴿
कल्ला वल क़मर
ऐसी बात नहीं, शपथ है चाँद की!
وَاللَّيْلِ إِذْ أَدْبَرَ ﴾ 33 ﴿
वल्लैली इज़ अदबर
तथा रात्रि की, जब व्यतीत होने लगे!
وَالصُّبْحِ إِذَا أَسْفَرَ ﴾ 34 ﴿
वस्सुबही इज़ा अस्फर
और प्रातः की, जब प्रकाशित हो जाये!
إِنَّهَا لَإِحْدَى الْكُبَرِ ﴾ 35 ﴿
इन्नहा ल इह्दल कुबर
वास्तव में, (नरक) एक[1] बहुत बड़ी चीज़ है। 1. अर्थात जैसे रात्री के पश्चात दिन होता है उसी प्रकार कर्मों का भी परिणाम सामने आना है। और दुष्कर्मों का परिणाम नरक है।
نَذِيرًا لِّلْبَشَرِ ﴾ 36 ﴿
नज़ीरल लिल बशर
डराने के लिए लोगों को।
لِمَن شَاءَ مِنكُمْ أَن يَتَقَدَّمَ أَوْ يَتَأَخَّرَ ﴾ 37 ﴿
लिमन शाआ मिन्कुम अइ य्ताकद्दमा औ यता अख्खर
उसके लिए तुममें से, जो चाहे[1] आगे होना अथवा पीछे रहना। 1. अर्थात आज्ञा पालन द्वारा अग्रसर हो जाये, अथवा अवैज्ञा कर के पीछे रह जाये।
كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ رَهِينَةٌ ﴾ 38 ﴿
कुल्लु नफ्सिम बिमा कसाबत रहीनह
प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के बदले में बंधक है।[1] 1. यदि सत्कर्म किया तो मुक्त हो जायेगा।
إِلَّا أَصْحَابَ الْيَمِينِ ﴾ 39 ﴿
इल्ला अस्हाबल यमीन
दाहिने वालों के सिवा।
فِي جَنَّاتٍ يَتَسَاءَلُونَ ﴾ 40 ﴿
फी जन्नात, यतासा अलून
वे स्वर्गों में होंगे। वे प्रश्न करेंगे।
مَا سَلَكَكُمْ فِي سَقَرَ ﴾ 42 ﴿
मा सलाककुम फी सकर
तुम्हें क्या चीज़ ले गयी नरक में।
قَالُوا لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلِّينَ ﴾ 43 ﴿
कालू लम नकु मिनल मुसल्लीन
वे कहेंगेः हम नहीं थे नमाज़ियों में से।
وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ ﴾ 44 ﴿
वलम नकु नुतइमुल मिस्कीन
और नहीं भोजन कराते थे निर्धन को।
وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ ﴾ 45 ﴿
व कुन्ना नखुजु मअल खाइजीन
तथा कुरेद करते थे कुरेद करने वालों के साथ।
وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ ﴾ 46 ﴿
व कुन्ना नुकज्ज़िबू बि यौमिद्दीन
और हम झुठलाया करते थे प्रतिफल के दिन (प्रलय) को।
حَتَّىٰ أَتَانَا الْيَقِينُ ﴾ 47 ﴿
हत्ता अतानल यकीन
यहाँ तक कि हमारी मौत आ गई।
فَمَا تَنفَعُهُمْ شَفَاعَةُ الشَّافِعِينَ ﴾ 48 ﴿
फ़मा तन्फ़उहुम शफाअतुश शाफ़िईन
तो उन्हें लाभ नहीं देगी शिफ़ारिशियों (अभिस्तावकों) की शिफ़ारिश।[1] 1. अर्थात नबियों और फ़रिश्तों इत्यादि की। किन्तु जिस से अल्लाह प्रसन्न हो और उस के लिये सिफ़ारिश की अनुमति दे।
فَمَا لَهُمْ عَنِ التَّذْكِرَةِ مُعْرِضِينَ ﴾ 49 ﴿
फमा लहुम अनित् तज्किरति मुअ् रिजीन
तो उन्हें क्या हो गया है कि इस शिक्षा (क़ुर्आन) से मुँह फेर रहे हैं?
كَأَنَّهُمْ حُمُرٌ مُّسْتَنفِرَةٌ ﴾ 50 ﴿
क अन्नाहुम हुमुरुम मुस्तन्फिरह
मानो वे (जंगली) गधे हैं, बिदकाये हुए।
فَرَّتْ مِن قَسْوَرَةٍ ﴾ 51 ﴿
फ़र्रत मिन क़स्वरह
जो शिकारी से भागे हैं।
بَلْ يُرِيدُ كُلُّ امْرِئٍ مِّنْهُمْ أَن يُؤْتَىٰ صُحُفًا مُّنَشَّرَةً ﴾ 52 ﴿
बल युरीदु कुल्लुम रिइम मिन्हुम अयि युअ्ता सुहुफ़म मुनाश्शरह
बल्कि चाहता है प्रत्येक व्यक्ति उनमें से कि उसे खुली[1] पुस्तक दी जाये। 1. अर्थात वे चाहते हैं कि प्रत्येक के ऊपर वैसे ही पुस्तक उतारी जाये जैसे मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारी गई है। तब वे ईमान लायेंगे। (इब्ने कसीर)
كَلَّا ۖ بَل لَّا يَخَافُونَ الْآخِرَةَ ﴾ 53 ﴿
कल्ला, बल्ला याखाफूनल् आखिरह
कदापि ये नहीं (हो सकता) बल्कि वे आख़िरत (परलोक) से नहीं डरते हैं।
كَلَّا إِنَّهُ تَذْكِرَةٌ ﴾ 54 ﴿
कल्ला इन्नहू तज्किरह
निश्चय ये (क़ुर्आन) तो एक शिक्षा है।
فَمَن شَاءَ ذَكَرَهُ ﴾ 55 ﴿
फमन शा अ ज़ करह
अब जो चाहे, शिक्षा ग्रहण करे।
وَمَا يَذْكُرُونَ إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ ۚ هُوَ أَهْلُ التَّقْوَىٰ وَأَهْلُ الْمَغْفِرَةِ ﴾ 56 ﴿
वमा यज़्कुरूना इल्ला अइ यशाअल्लाहु, हुबा अह्लुत्तक़्बा व अह्लुल मग्फिरह
और वे शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते, परन्तु ये कि अल्लाह चाह ले। वही योग्य है कि उससे डरा जाये और योग्य है कि क्षमा कर दे।