सूरह मआरिज के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 44 आयतें हैं।
- इस की आयत 3 में ((ज़िल मआरिज)) का शब्द आया है। उसी से यह नाम लिया गया है जिस का अर्थ हैः ऊँचाईयों वाला।
- इस में क्यामत (प्रलय) की यातना की जल्दी मचाने वालों को सूचित किया गया है कि वह यातना अपने समय पर अवश्य आ कर रहेगी। फिर प्रलय की दशा को बताया गया है कि वह कितनी भीषण घड़ी होगी।
- आयत 19 से 25 तक मनुष्य की साधारण कमज़ोरी का वर्णन करते हुये यह बताया गया है कि इसे इबादत (नमाज़) के द्वारा ही दूर किया जा सकता है जिस से वह गुण पैदा होते हैं जिन से मनुष्य स्वर्ग के योग्य होता है।
- अन्तिम आयतों में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का उपहास करने वालों और कुन सुनाने से आप को रोकने के लिये आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर पिल पड़ने वालों को कड़ी चेतावनी दी गई है।
सूरह अल-मारिज | Surah Al-Maarij
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ ﴾ 1 ﴿
स-अ-ल साइलुम्-बि-अ़ज़ाबिंव् – वाक़िअिल्
प्रश्न किया एक प्रश्न करने[1] वाले ने उस यातना के बारे में, जो आने वाली है। 1. कहा जाता है नज़्र पुत्र ह़ारिस अथवा अबू जह्ल ने यह माँग की थी कि "हे अल्लाह! यदि यह सत्य है तेरी ओर से तू हम पर आकाश से पत्थर बरसा दे।" (देखियेः सूरह अन्फाल, आयतः 32)
لِّلْكَافِرِينَ لَيْسَ لَهُ دَافِعٌ ﴾ 2 ﴿
लिल्-काफ़िरी-न लै-स लहू दाफ़िअुम्
काफ़िरों पर। नहीं है जिसे कोई दूर करने वाला।
مِّنَ اللَّهِ ذِي الْمَعَارِجِ ﴾ 3 ﴿
मिनल्लाहि जिल्-मआ़रिज
अल्लाह ऊँचाईयों वाले की ओर से।
تَعْرُجُ الْمَلَائِكَةُ وَالرُّوحُ إِلَيْهِ فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ ﴾ 4 ﴿
त़अ् रुजुल् मलाइ – कतु वर्रूहु इलैहि फी यौमिन् का-न मिक्दारुहू ख़म्सी – न अल्-फ स-नतिन्
चढ़ते हैं फ़रिश्ते तथा रूह़[1] जिसकी ओर, एक दिन में, जिसका माप पचास हज़ार वर्ष है। 1. रूह़ से अभिप्राय फ़रिश्ता जिब्रील (अलैहिस्सलाम) है।
فَاصْبِرْ صَبْرًا جَمِيلًا ﴾ 5 ﴿
फ़स्बिर सब्रन् जमीला
अतः, (हे नबी!) आप सहन[1] करें अच्छे प्रकार से। 1. अर्थात संसार में सत्य को स्वीकार करने से।
إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُ بَعِيدًا ﴾ 6 ﴿
इन्नहुम् यरौनहू बईदंव्
वे समझते हैं उसे दूर।
وَنَرَاهُ قَرِيبًا ﴾ 7 ﴿
व नराहु क़रीबा
और हम देख रहे हैं उसे समीप।
يَوْمَ تَكُونُ السَّمَاءُ كَالْمُهْلِ ﴾ 8 ﴿
यौ – म तकूनुस्समा – उ कल्मुहिल
जिस दिन हो जायेगा आकाश पिघली हुई धातु के समान।
وَتَكُونُ الْجِبَالُ كَالْعِهْنِ ﴾ 9 ﴿
व तकूनुल्-जिबालु कल्अिह्नि
तथा हो जायेंगे पर्वत, रंगारंग धुने हुए ऊन के समान।[1] 1. देखियेः सूरह क़ारिआ।
وَلَا يَسْأَلُ حَمِيمٌ حَمِيمًا ﴾ 10 ﴿
व ला यस् अलु हमीमुन् हमीमंय्
और नहीं पूछेगा कोई मित्र किसी मित्र को।
يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ يَوَدُّ الْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِي مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍ بِبَنِيهِ ﴾ 11 ﴿
युबस्सरू-नहुम्, य-वद्दुल्-मुज्-रिमु लौ यफ़्तदी मिन् अज़ाबि यौमिइज़िम् बि-बनीहि
(जबकि) वे उन्हें दिखाये जायेंगे। कामना करेगा पापी कि दण्ड के रूप में दे दे, उस दिन की यातना के, अपने पुत्रों को।
وَصَاحِبَتِهِ وَأَخِيهِ ﴾ 12 ﴿
व साहि-बतिही व अखीहि
तथा अपनी पत्नी और अपने भाई को।
وَفَصِيلَتِهِ الَّتِي تُؤْوِيهِ ﴾ 13 ﴿
व फ़सी – लतिहिल्लती तुअ् वीहि
तथा अपने समीपवर्ती परिवार को, जो उसे शरण देता था।
وَمَن فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا ثُمَّ يُنجِيهِ ﴾ 14 ﴿
व मन् फिल्अर्ज़ि जमींअन् सुम्-म युन्जीहि
और जो धरती में है, सभी[1] को, फिर वह उसे यातना से बचा ले। 1. ह़दीस में है कि जिस नारकी को सब से सरल यातना दी जायेगी, उस से अल्लाह कहेगाः क्या धरती का सब कुछ तुम्हें मिल जाये तो उसे इस के दण्ड में दे दोगे? वह कहेगाः हाँ। अल्लाह कहेगाः तुम आदम की पीठ में थे, तो मैं ने तुम से इस से सरल की माँग की थी कि मेरा किसी को साझी न बनाना तो तुमने इन्कार किया और शिर्क किया। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6557, सह़ीह़ मुस्लिमः 2805)
كَلَّا ۖ إِنَّهَا لَظَىٰ ﴾ 15 ﴿
कल्ला, इन्नहा लज़ा
कदापि (ऐसा) नहीं (होगा)।
نَزَّاعَةً لِّلشَّوَىٰ ﴾ 16 ﴿
नज़्ज़ा-अ़तल्- लिश्शवा
वह अग्नि की ज्वाला होगी।
تَدْعُو مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ ﴾ 17 ﴿
तद्अू मन् अद्-ब-र व त-वल्ला
खाल उधेड़ने वाली।
وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰ ﴾ 18 ﴿
व ज-म-अ़ फ़औआ़
वह पुकारेगी उसे, जिसने पीछा दिखाया[1] तथा मुँह फेरा। 1. अर्थात सत्य से।
إِنَّ الْإِنسَانَ خُلِقَ هَلُوعًا ﴾ 19 ﴿
इन्नल्-इन्सा-न खुलि-क़ हलूआ
तथा (धन) एकत्र किया, फिर सौंत कर रखा।
إِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ جَزُوعًا ﴾ 20 ﴿
इज़ा मस्सहुश्शर्रु ज़ज़ूआ
वास्तव में, मनुष्य अत्यंत कच्चे दिल का पैदा किया गया है।
وَإِذَا مَسَّهُ الْخَيْرُ مَنُوعًا ﴾ 21 ﴿
व इज़ा मस्सहुल्-ख़ैरु मनूआ
जब उसे पहुँचता है दुःख, तो उद्विग्न हो जाता है।
إِلَّا الْمُصَلِّينَ ﴾ 22 ﴿
इल्लल्-मुसल्लीन
और जब उसे धन मिलता है, तो कंजूसी करने लगता है।
الَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَائِمُونَ ﴾ 23 ﴿
अल्लज़ी – न हुम् अ़ला सलातिहिम् दा-इमून
परन्तु, जो नमाज़ी हैं।
وَالَّذِينَ فِي أَمْوَالِهِمْ حَقٌّ مَّعْلُومٌ ﴾ 24 ﴿
वल्लज़ी-न फ़ी अम्वालिहिम् हक्कुम्- मअ्लूम
जो अनपी नमाज़ का सदा पालन[1] करते हैं। 1. अर्थात बड़ी पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हों।
لِّلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ ﴾ 25 ﴿
लिस्सा-इलि वल्-महरूम
और जिनके धनों में निश्चित भाग है, याचक (माँगने वाला) तथा वंचित[1] का। 1. अर्थात जो न माँगने के कारण वंचित रह जाता है।
وَالَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ الدِّينِ ﴾ 26 ﴿
वल्लज़ी-न युसद्दिक़ू-न बियौमिद्- दीन
तथा जो सत्य मानते हैं प्रतिकार (प्रलय) के दिन को।
وَالَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ ﴾ 27 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् मिन् अज़ाबि रब्बिहिम् मुश् फिक़ून
तथा जो अपने पालनहार की यातना से डरते हैं।
إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍ ﴾ 28 ﴿
इन्-न अज़ा-ब रब्बिहिम् ग़ैरु मअ्मून
वास्तव में, आपके पालनहार की यातना निर्भय रहने योग्य नहीं है।
وَالَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَ ﴾ 29 ﴿
वल्लज़ी – न हुम् लिफ़ुरुजिहिम् हाफ़िज़ून
तथा जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैं।
إِلَّا عَلَىٰ أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ ﴾ 30 ﴿
इल्ला अला अज़वाजिहिम् औ मा म-लकत् ऐमानुहुम् फ-इन्नहुम् गैरु मलूमीन
सिवाय अपनी पत्नियों और अपने स्वामित्व में आये दासियों[1] के, तो वही निन्दित नहीं हैं। 1. इस्लाम में उसी दासी से संभोग उचित है जिसे सेनापति ने ग़नीमत (परिहार) के दूसरे धनों के समान किसी मुजाहिद के स्वामित्व में दे दिया हो। इस से पूर्व किसी बंदी स्त्री से संभोग पाप तथा व्यभिचार है। और उस से संभोग भी उस समय वैध है जब उसे एक बार मासिक धर्म आ जाये। अथवा गर्भवती हो तो प्रसव के पश्चात् ही संभोग किया जा सकता है। इसी प्रकार जिस के स्वामित्व में आई हो उस के सिवा और कोई उस से संभोग नहीं कर सकता।
فَمَنِ ابْتَغَىٰ وَرَاءَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْعَادُونَ ﴾ 31 ﴿
फ-मनिब्तग़ा वरा-अ ज़ालि-क फ-उलाइ – क हुमुल्-आदून
और जो चाहे इसके अतिरिक्त, तो वही सीमा का उल्लंघन करने वाले हैं।
وَالَّذِينَ هُمْ لِأَمَانَاتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَاعُونَ ﴾ 32 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् लि-अमानातिहिम् व अहिदहिम् राज़ून
और जो अपनी अमानतों तथा अपने वचन का पालन करते हैं।
وَالَّذِينَ هُم بِشَهَادَاتِهِمْ قَائِمُونَ ﴾ 33 ﴿
वल्लज़ी – न हुम् बि-शहादातिहिम् का-इमून
और जो अपने साक्ष्यों (गवाहियों) पर स्थित रहने वाले हैं।
وَالَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ ﴾ 34 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् अला सलातिहिम् युहाफ़िज़ून
तथा जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं।
أُولَٰئِكَ فِي جَنَّاتٍ مُّكْرَمُونَ ﴾ 35 ﴿
उलाइ – क फ़ी जन्नातिम्-मुक्रमून
वही स्वर्गों में सम्मानित होंगे।
فَمَالِ الَّذِينَ كَفَرُوا قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ ﴾ 36 ﴿
फ़मालिल्लज़ी-न क-फरू कि-ब-ल- क मुहितईन
तो क्या हो गया है उनकाफ़िरों को कि आपकी ओर दौड़े चले आ रहे हैं?
عَنِ الْيَمِينِ وَعَنِ الشِّمَالِ عِزِينَ ﴾ 37 ﴿
अनिल्-यमीनि व अनिश्शिमालि अिज़ीन
दायें तथा बायें समूहों में होकर।[1] 1. अर्थात जब आप क़ुर्आन सुनाते हैं तो उस का उपहास करने के लिये समूहों में हो कर आ जाते हैं। और इन का दावा यह है कि स्वर्ग में जायेंगे।
أَيَطْمَعُ كُلُّ امْرِئٍ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍ ﴾ 38 ﴿
अ-यत्मऊ कुल्लुरिइम् – मिन्हुम् अय्युख़-ल जन्नत नईम
क्या उनमें से प्रत्येक व्यक्ति लोभ (लालच) रखता है कि उसे प्रवेश दे दिया जायेगा सुख के स्वर्गों में?
كَلَّا ۖ إِنَّا خَلَقْنَاهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ ﴾ 39 ﴿
कल्ला, इन्ना ख़लक़्नाहुम् मिम्मा यअ्लमून
कदापि ऐसा न होगा, हमने उनकी उत्पत्ति उस चीज़ से की है, जिसे वे[1] जानते हैं। 1. अर्थात हीन जल (वीर्य) से। फिर भी घमण्ड करते हैं। तथा अल्लाह और उस के रसूल को नहीं मानते।
فَلَا أُقْسِمُ بِرَبِّ الْمَشَارِقِ وَالْمَغَارِبِ إِنَّا لَقَادِرُونَ ﴾ 40 ﴿
फला उक्सिमु बिरब्बिल्-मशारिक़ि वल्-मग़ारिबि इन्ना ल-क़ादिरून
तो मैं शपथ लेता हूँ पूर्वों (सूर्योदय के स्थानों) तथा पश्चिमों (सूर्यास्त के स्थानों) की, वास्तव में हम अवश्य सामर्थ्यवान हैं।
عَلَىٰ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ ﴾ 41 ﴿
अला अन् नुबद्दि – ल ख़ैरम् – मिन्हुम् व मा नह्नु बिमस्बूकीन
इस बात पर कि बदल दें उनसे उत्तम (उत्पत्ति) को तथा हम विवश नहीं हैं।
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتَّىٰ يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذِي يُوعَدُونَ ﴾ 42 ﴿
फ-ज़रहुम् यख़ूज़ू व यल् अबू हत्ता युलाक़ू यौमहुमुल्लज़ी यू- अदून
अतः, आप उन्हें झगड़ते तथा खेलते छोड़ दें, यहाँ तक कि वे मिल जायें अपने उस दिन से, जिसका उन्हें वचन दिया जा रहा है।
يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ الْأَجْدَاثِ سِرَاعًا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍ يُوفِضُونَ ﴾ 43 ﴿
यौ-म यख् रुजु न मिनल्-अज्दासि सिराअन् क- अन्नहुम् इला नुसुबिंय् – यूफिज़ून
जिस दिन वे निकलेंगे क़ब्रों (और समाधियों) से, दौड़ते हुए, जैसे वे अपनी मूर्तियों की ओर दौड़ रहे हों।[1] 1. या उन के थानों की ओर। क्योंकि संसार में वे सूर्योदय के समय बड़ी तीव्र गति से अपनी मूर्तियों की ओर दौड़ते थे।
خَاشِعَةً أَبْصَارُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ ۚ ذَٰلِكَ الْيَوْمُ الَّذِي كَانُوا يُوعَدُونَ ﴾ 44 ﴿
ख़ाशि-अतन् अब्सारुहुम् तर्-हक़ुहुम् ज़िल्लतुन्, ज़ालिकल् यौमुल्लज़ी कानू यू-अदून
जिस दिन वे निकलेंगे क़ब्रों (और समाधियों) से, दौड़ते हुए, जैसे वे अपनी मूर्तियों की ओर दौड़ रहे हों।[1] 1. या उन के थानों की ओर। क्योंकि संसार में वे सूर्योदय के समय बड़ी तीव्र गति से अपनी मूर्तियों की ओर दौड़ते थे।