सूरह लैल के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 21 आयतें हैं।
- इस की प्रथम आयत में “लैल” अर्थात रात की शपथ ली गई है, जिस के कारण इस का यह नाम रखा गया है।
- आयत 1 से 4 तक में कुछ गवाहियों प्रस्तुत कर के इस बात का तर्क दिया गया है कि जब मनुष्य के प्रयासों तथा कर्मों में अन्तर है तो उन के प्रतिफल में भी अन्तर का होना आवश्यक है।
- आयत 5 से 11 तक में सत्कर्मों और दुष्कर्मों की कुछ विशेषताओं का वर्णन कर के बताया है कि सत्कर्म पुन् की राह पर ले जाते हैं और दुष्कर्म पाप की राह पर ले जाते हैं।
- आयत 12 से 14 तक में बताया गया है कि आवाह का काम सीधी राह दिखा देना है और उस ने तुम्हें उसे दिखा दिया। संसार तथा परलोक का वही मालिक है। उस ने बता दिया है कि परलोक में क्या होना है।
- अन्त में दुराचारियों के बुरे अन्त तथा सदाचारियों के अच्छे अन्त को बताया गया है।
सूरह अल लैल हिंदी में | Surah Al Lail in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰ ﴾ 1 ﴿
वल लैलि इज़ा यगशा
रात्रि की शपथ, जब छा जाये!
وَالنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّىٰ ﴾ 2 ﴿
वन नहारि इज़ा तजल्ला
तथा दिन की शपथ, जब उजाला हो जाये!
وَمَا خَلَقَ الذَّكَرَ وَالْأُنثَىٰ ﴾ 3 ﴿
वमा खलाकज़ ज़कारा वल उनसा
और उसकी शपथ जिसने नर और मदा पैदा किये!
إِنَّ سَعْيَكُمْ لَشَتَّىٰ ﴾ 4 ﴿
इन्ना सअ’यकुम लशत ता
वास्तव में, तुम्हारे प्रयास अलग-अलग हैं।[1] 1. (1-4) इन आयतों का भावार्थ यह है कि जिस प्रकार रात दिन तथा नर मादा (स्त्री-पुरुष) भिन्न हैं, और उन के लक्षण और प्रभाव भी भिन्न हैं, इसी प्रकार मानव जाति (इन्सान) के विश्वास, कर्म भी दो भिन्न प्रकार के हैं। और दोनों के प्रभाव और परिणाम भी विभिन्न हैं।
فَأَمَّا مَنْ أَعْطَىٰ وَاتَّقَىٰ ﴾ 5 ﴿
फ़ अम्मा मन अअ’ता वत तक़ा
फिर जिसने दान दिया और भक्ति का मार्ग अपनाया,
وَصَدَّقَ بِالْحُسْنَىٰ ﴾ 6 ﴿
वसद दक़ा बिल हुस्ना
और भली बात की पूष्टि करता रहा,
فَسَنُيَسِّرُهُ لِلْيُسْرَىٰ ﴾ 7 ﴿
फ़ सनुयस सिरुहू लिल युसरा
तो हम उसके लिए सरलता पैदा कर देंगे।
وَأَمَّا مَن بَخِلَ وَاسْتَغْنَىٰ ﴾ 8 ﴿
व अम्मा मम बखिला वस तग्ना
परन्तु, जिसने कंजूसी की और ध्यान नहीं दिया,
وَكَذَّبَ بِالْحُسْنَىٰ ﴾ 9 ﴿
व कज्ज़बा बिल हुस्ना
और भली बात को झुठला दिया।
فَسَنُيَسِّرُهُ لِلْعُسْرَىٰ ﴾ 10 ﴿
फ़ सनुयस सिरुहू लिल उसरा
तो हम उसके लिए कठिनाई को प्राप्त करना सरल कर देंगे।[1] 1. (5-10) इन आयतों में दोनों भिन्न कर्मों के प्रभाव का वर्णन है कि कोई अपना धन भलाई में लगाता है तथा अल्लाह से डरता है और भलाई को मानता है। सत्य आस्था, स्वभाव और सत्कर्म का पालन करता है। जिस का प्रभाव यह होता है कि अल्लाह उस के लिये सत्कर्मों का मार्ग सरल कर देता है। और उस में पाप करने तथा स्वार्थ के लिये अवैध धन अर्जन की भावना नहीं रह जाती। ऐसे व्यक्ति के लिये दोनों लोक में सुख है। दूसरा वह होता है जो धन का लोभी, तथा अल्लाह से निश्चिन्त होता है और भलाई को नहीं मानता। जिस का प्रभाव यह होता है कि उस का स्वभाव ऐसा बन जाता है कि उसे बुराई का मार्ग सरल लगने लगता है। तथा अपने स्वार्थ और मनोकामना की पूर्ति के लिये प्रयास करता है। फिर इस बात को इस वाक्य पर समाप्त कर दिया गया है कि धन के लिये वह जान देता है परन्तु वह उसे अपने साथ ले कर नहीं जायेगा। फिर वह उस के किस काम आयेगा?
وَمَا يُغْنِي عَنْهُ مَالُهُ إِذَا تَرَدَّىٰ ﴾ 11 ﴿
वमा युग्नी अन्हु मालुहू इज़ा तरददा
और जब वह गढ़े में गिरेगा, तो उसका धन उसके काम नहीं आयेगा।
إِنَّ عَلَيْنَا لَلْهُدَىٰ ﴾ 12 ﴿
इन्ना अलैना लल हुदा
हमारा कर्तव्य इतना ही है कि हम सीधा मार्ग दिखा दें।
وَإِنَّ لَنَا لَلْآخِرَةَ وَالْأُولَىٰ ﴾ 13 ﴿
व इन्ना लना लल आखिरता वल ऊला
जबकि आलोक-परलोक हमारे ही हाथ में है।
فَأَنذَرْتُكُمْ نَارًا تَلَظَّىٰ ﴾ 14 ﴿
फ़ अनज़र तुकुम नारन तलज्ज़ा
मैंने तुम्हें भड़कती आग से सावधान कर दिया है।[1] 1. (11-14) इन आयतों में मानव जाति (इन्सान) को सावधान किया गया है कि अल्लाह का, दया और न्याय के कारण मात्र यह दायित्व था कि सत्य मार्ग दिखा दे। और क़ुर्आन द्वारा उस ने अपना यह दायित्व पूरा कर दिया। किसी को सत्य मार्ग पर लगा देना उस का दायित्व नहीं है। अब इस सीधी राह को अपनाओगे तो तुम्हारा ही भला होगा। अन्यथा याद रखो कि संसार और परलोक दोनों ही अल्लाह के अधिकार में हैं। न यहाँ कोई तुम्हें बचा सकता है, और न वहाँ कोई तुम्हारा सहायतक होगा।
لَا يَصْلَاهَا إِلَّا الْأَشْقَى ﴾ 15 ﴿
ला यस्लाहा इल्लल अश्का
जिसमें केवल बड़ा हत्भागा ही जायेगा।
الَّذِي كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ ﴾ 16 ﴿
अल लज़ी कज्ज़बा व तवल्ला
जिसने झुठला दिया तथा (सत्य से) मुँह फेर लिया।
وَسَيُجَنَّبُهَا الْأَتْقَى ﴾ 17 ﴿
व सयुजन्नबुहल अतक़ा
परन्तु, संयमी (सदाचारी) उससे बचा लिया जायेगा।
الَّذِي يُؤْتِي مَالَهُ يَتَزَكَّىٰ ﴾ 18 ﴿
अल्लज़ी युअ’ती मा लहू यतज़क्का
जो अपना धन, दान करता है, ताकि पवित्र हो जाये।
وَمَا لِأَحَدٍ عِندَهُ مِن نِّعْمَةٍ تُجْزَىٰ ﴾ 19 ﴿
वमा लि अहदिन इन्दहू मिन निअ’मतिन तुज्ज़ा
उसपर किसी का कोई उपकार नहीं, जिसे उतारा जा रहा है।
إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ رَبِّهِ الْأَعْلَىٰ ﴾ 20 ﴿
इल्लब तिगाअ वज्हि रब्बिहिल अअ’ला
वह तो केवल अपने परम पालनहार की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए है।
وَلَسَوْفَ يَرْضَىٰ ﴾ 21 ﴿
व लसौफ़ा यरदा
निःसंदेह, वह प्रसन्न हो जायेगा।[1] 1. (15-21) इन आयतों में यह वर्णन किया गया है कि कौन से कुकर्मी नरक में पड़ेंगे और कौन सुकर्मी उस से सुरक्षित रखे जायेंगे। और उन्हें क्या फल मिलेगा। आयत संख्या 10 के बारे में यह बात याद रखने की है कि अल्लाह ने सभी वस्तुओं और कर्मों का अपने नियमानुसार स्वभाविक प्रभाव रखा है। और क़ुर्आन इसी लिये सभी कर्मों के स्वभाविक प्रभाव और फल को अल्लाह से जोड़ता है। और यूँ कहता है कि अल्लाह ने उस के लिये बुराई की राह सरल कर दी। कभी कहता है कि उन के दिलों पर मुहर लगा दी, जिस का अर्थ यह होता है कि यह अल्लाह के बनाये हुये नियमों के विरोध का स्वभाविक फल है। (देखियेः उम्मुल किताब, मौलाना आज़ाद)