सूरह जिन्न के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 28 आयतें हैं।
- इस में जिन्नों की बातें बताई गई है। इसलिये इस का यह नाम है। जिन्होंने कुन सुना और उस के सच्च होने की गवाही दी। फिर मक्का के मुश्श्रिकों को सावधान किया गया है।
- अन्त में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मुख से नबूवत के बारे में बातें उजागर की गई हैं। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को न मानने पर नरक की यातना से सूचित किया गया है।
सूरह अल-जिन्न | Surah Jinn in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
قُلْ أُوحِيَ إِلَيَّ أَنَّهُ اسْتَمَعَ نَفَرٌ مِّنَ الْجِنِّ فَقَالُوا إِنَّا سَمِعْنَا قُرْآنًا عَجَبًا ﴾ 1 ﴿
कुल् ऊहि-य इलय्-य् अन्नहुस्-त-म-अ़ न-फ़रुम् मिनल्-जिन्नि फ़का़लू इन्ना समिअ्ना कुरआनन् अ़-जबा
﴾ 1 ﴿ (हे नबी!) कहोः मेरी ओर वह़्यी (प्रकाश्ना[1]) की गयी है कि ध्यान से सुना जिन्नों के एक समूह ने। फिर कहा कि हमने सुना है एक विचित्र क़ुर्आन। 1. सूरह अह़्क़ाफ़ आयतः 29 में इस का वर्णन किया गया है। इस सूरह में यह बताया गया है कि जब जिन्नों ने क़ुर्आन सुना तो आप ने न जिन्नों को देखा और न आप को उस का ज्ञान हुआ। बल्कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को वह़्यी (प्रकाशना) द्वारा इस से सूचित किया गया।
يَهْدِي إِلَى الرُّشْدِ فَآمَنَّا بِهِ ۖ وَلَن نُّشْرِكَ بِرَبِّنَا أَحَدًا ﴾ 2 ﴿
यह्दी इलर्-रुश्दि फ़-आमन्ना बिही, व लन्-नुश्रि-क बिरब्बिना अ-हदा
जो दिखाता है सीधी राह, तो हम ईमान लाये उसपर और हम कदापि साझी नहीं बनायेंगे अपने पालनहार के साथ किसी को।
وَأَنَّهُ تَعَالَىٰ جَدُّ رَبِّنَا مَا اتَّخَذَ صَاحِبَةً وَلَا وَلَدًا ﴾ 3 ﴿
व अन्नहू तआ़ला जद्दु रब्बिना मत्त-ख़-ज़ साहि-बतंव्-व ला व-लदा
तथा निःसंदेह महान है हमारे पालनहार की महिमा, नहीं बनाई है उसने कोई संगिनी (पत्नी) और न कोई संतान।
وَأَنَّهُ كَانَ يَقُولُ سَفِيهُنَا عَلَى اللَّهِ شَطَطًا ﴾ 4 ﴿
व अन्नहू का-न यकूलु सफ़ीहुना अ़लल्लाहि श-तता
तथा निश्चय हम अज्ञान में कह रहे थे अल्लाह के संबंध में झूठी बातें।
وَأَنَّا ظَنَنَّا أَن لَّن تَقُولَ الْإِنسُ وَالْجِنُّ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا ﴾ 5 ﴿
व अन्ना ज़नन्ना अल्-लन् तकूलल्-इन्सु वल्जिन्नु अ़लल्लाहि कज़िबा
और ये कि हमने समझा कि मनुष्य तथा जिन्न नहीं बोल सकते अल्लाह पर कोई झूठ बात।
وَأَنَّهُ كَانَ رِجَالٌ مِّنَ الْإِنسِ يَعُوذُونَ بِرِجَالٍ مِّنَ الْجِنِّ فَزَادُوهُمْ رَهَقًا ﴾ 6 ﴿
व अन्नहू का-न रिजालुम् मिनल्-इन्सि यअूजू-न बिरिजालिम् मिनल्-जिन्नि फ़ज़ादूहुम् र-हका़
और वास्तविक्ता ये है कि मनुष्य में से कुछ लोग, शरण माँगते थे जिन्नों में से कुछ लोगों की, तो उन्होंने अधिक कर दिया उनके गर्व को।
وَأَنَّهُمْ ظَنُّوا كَمَا ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَبْعَثَ اللَّهُ أَحَدًا ﴾ 7 ﴿
व अन्नहुम् ज़न्नू कमा ज़नन्तुम् अल्लंय् – यब् – अ़सल्लाहु अ – हदा
और ये कि मनुष्यों ने भी वही समझा, जो तुमने अनुमान लगाया कि कभी अल्लाह फिर जीवित नहीं करेगा, किसी को।
وَأَنَّا لَمَسْنَا السَّمَاءَ فَوَجَدْنَاهَا مُلِئَتْ حَرَسًا شَدِيدًا وَشُهُبًا ﴾ 8 ﴿
व अन्ना ल – मस् नस्समा – अ फ़ – वजद्नाहा मुलिअत् ह – रसन् शदीदंव् – व शुहुबा
तथा हमने स्पर्श किया आकाश को, तो पाया कि भर दिया गया है प्रहरियों तथा उल्काओं से।
وَأَنَّا كُنَّا نَقْعُدُ مِنْهَا مَقَاعِدَ لِلسَّمْعِ ۖ فَمَن يَسْتَمِعِ الْآنَ يَجِدْ لَهُ شِهَابًا رَّصَدًا ﴾ 9 ﴿
व अन्ना कुन्ना नक़अु़दु मिन्हा मकाअिद लिस्सम्अि, फ़-मंय्यस्तमिअिल्-आ-न यजिद् लहू शिहाबर्-र-सदा
और ये कि हम बैठते थे उस (आकाश) में सुन-गुन लेने के स्थानों में और जो अब सुनने का प्रयास करेगा, वह पायेगा अपने लिए एक उल्का घात में लगा हुआ।
وَأَنَّا لَا نَدْرِي أَشَرٌّ أُرِيدَ بِمَن فِي الْأَرْضِ أَمْ أَرَادَ بِهِمْ رَبُّهُمْ رَشَدًا ﴾ 10 ﴿
व अन्ना ला नद्री अ-शर्रुन् उरी-द बिमन् फिल्अर्ज़ि अम् अरा-द बिहिम् रब्बुहुम् र-शदा
और ये कि हम नहीं समझ पाते कि क्या किसी बुराई का इरादा किया गया धरती वालों के साथ या इरादा किया है, उनके साथ उनके पालनहार ने सीधी राह पर लाने का?
وَأَنَّا مِنَّا الصَّالِحُونَ وَمِنَّا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ كُنَّا طَرَائِقَ قِدَدًا ﴾ 11 ﴿
व अन्ना मिन्नस्सालिहू-न व मिन्ना दू-न ज़ालि-क कुन्ना तराइ-क़ कि़-ददा
और हममें से कुछ सदाचारी हैं और हममें से कुछ इसके विपरीत हैं। हम विभिन्न प्रकारों में विभाजित हैं।
وَأَنَّا ظَنَنَّا أَن لَّن نُّعْجِزَ اللَّهَ فِي الْأَرْضِ وَلَن نُّعْجِزَهُ هَرَبًا ﴾ 12 ﴿
व अन्ना ज़नन्ना अल्-लन् नुअ्जिज़ल्ला-ह फिल्अर्ज़ि व लन् नुअ्जि-ज़हू ह-रबा
तथा हमें विश्वास हो गया है कि हम कदापि विवश नहीं कर सकते अल्लाह को धरती में और न विवश कर सकते हैं उसे भागकर।
وَأَنَّا لَمَّا سَمِعْنَا الْهُدَىٰ آمَنَّا بِهِ ۖ فَمَن يُؤْمِن بِرَبِّهِ فَلَا يَخَافُ بَخْسًا وَلَا رَهَقًا ﴾ 13 ﴿
व अन्ना लम्मा समिअ्नल्-हुदा आमन्ना बिही, फ़- मय्युअ्मिम् बिरब्बिही फ़ला यख़ाफु बख़्संव्-व ला र- हक़ा
तथा जब हमने सुनी मार्गदर्शन की बात, तो उसपर ईमान ले आये, अब जो भी ईमान लायेगा अपने पालनहार पर, तो नहीं भय होगा उसे अधिकार हनन का और न किसी अत्याचार का।
وَأَنَّا مِنَّا الْمُسْلِمُونَ وَمِنَّا الْقَاسِطُونَ ۖ فَمَنْ أَسْلَمَ فَأُولَٰئِكَ تَحَرَّوْا رَشَدًا ﴾ 14 ﴿
व अन्ना मिन्नल्-मुस्लिमू-न व मिन्नल्-का़सितू-न, फ़- मन् अस्ल-म फ़-उलाइ-क त-हररौ र-शदा
और ये कि हममें से कुछ मुस्लिम (आज्ञाकारी) हैं और कुछ अत्याचारी हैं। तो जो आज्ञाकारी हो गये, तो उन्होंने खोज ली सीधी राह।
وَأَمَّا الْقَاسِطُونَ فَكَانُوا لِجَهَنَّمَ حَطَبًا ﴾ 15 ﴿
व अम्मल्-कासितू-न फ़कानू लि-जहन्न-म ह-तबा
तथा जो अत्याचारी हैं, तो वे नरक के ईंधन हो गये।
وَأَن لَّوِ اسْتَقَامُوا عَلَى الطَّرِيقَةِ لَأَسْقَيْنَاهُم مَّاءً غَدَقًا ﴾ 16 ﴿
व अल्-लविस्तका़मू अ़लत्तरी-क़ति ल-अस्कै़नाहुम् माअन् ग़-दका
और ये कि यदि वे स्थित रहते सीधी राह ( अर्थात इस्लाम) पर, तो हम सींचते उन्हें भरपूर जल से।
لِّنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَمَن يُعْرِضْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِ يَسْلُكْهُ عَذَابًا صَعَدًا ﴾ 17 ﴿
लिनफ्ति-नहुम् फ़ीहि, व मंय्युअ्रिज् अ़न् जिक्रि रब्बिही यस्लुक्हु अ़जा़बन् स-अ़दा
ताकि उनकी परीक्षा लें इसमें, और जो विमुख होगा अपने पालनहार के स्मरण (याद) से, तो उसे उसका पालनहार ग्रस्त करेगा कड़ी यातना में।
وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا ﴾ 18 ﴿
व अन्नल्-मसाजि-द लिल्लाहि फ़ला तद्अू मअ़ल्लाहि अ-हदा
और ये कि मस्जिदें[1] अल्लाह के लिए हैं। अतः, मत पुकारो अल्लाह के साथ किसी को। 1. मस्जिद का अर्थ सज्दा करने का स्थान है। भावार्थ यह है कि अल्लाह के सिवा किसी अन्य की इबादत तथा उस के सिवा किसी से प्रार्थना तथा विनय करना अवैध है।
وَأَنَّهُ لَمَّا قَامَ عَبْدُ اللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا ﴾ 19 ﴿
व अन्नहू लम्मा का-म अ़ब्दुल्लाहि यद्अूहु कादू यकूनू- न अ़लैहि लि-बदा
और ये कि जब खड़ा हुआ अल्लाह का भक्त[1] उसे पुकारता हुआ, तो समीप था कि वे लोग उसपर पिल पड़ते। 1. अल्लाह के भक्त से अभिप्राय मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं। तथा भावार्थ यह है कि जिन्न तथा मनुष्य मिल कर क़ुर्आन तथा इस्लाम की राह से रोकना चाहते हैं।
قُلْ إِنَّمَا أَدْعُو رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا ﴾ 20 ﴿
कुल इन्नमा अद्अू रब्बी व ला उश्रिकु बिही अ-हदा
आप कह दें कि मैं तो केवल अपने पालनहार को पुकारता हूँ और साझी नहीं बनाता उसका किसी अन्य को।
قُلْ إِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا ﴾ 21 ﴿
कुल् इन्नी ला अम्लिकु लकुम् ज़ररंव्-व ला र-शदा
आप कह दें कि मैं अधिकार नहीं रखता तुम्हारे लिए किसी हानि का, न सीधी राह पर लगा देने का।
قُلْ إِنِّي لَن يُجِيرَنِي مِنَ اللَّهِ أَحَدٌ وَلَنْ أَجِدَ مِن دُونِهِ مُلْتَحَدًا ﴾ 22 ﴿
कुल इन्नी लंय्युजी-रनी मिनल्लाहि अ-हदुंव्-व लन् अजि-द मिन् दूनिही मुल्त-हदा
आप कह दें कि मुझे कदापि नहीं बचा सकेगा अल्लाह से कोई[1] और न मैं पा सकूँगा उसके सिवा कोई शरणगार (बचने का स्थान)। 1. अर्थात यदि मैं उस की अवैज्ञा करूँ और वह मुझे यातना देना चाहे।
إِلَّا بَلَاغًا مِّنَ اللَّهِ وَرِسَالَاتِهِ ۚ وَمَن يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ﴾ 23 ﴿
इल्ला बलाग़म् मिनल्लाहि व रिसालातिही , व मंय्यअ्सिल्ला-ह व रसूलहू फ़-इन्-न लहू ना-र जहन्न- म ख़ालिदी-न फ़ीहा अ-बदा
परन्तु, पहुँचा सकता हूँ अल्लाह का आदेश तथा उसका उपदेश और जो अवज्ञा करेगा अल्लाह तथा उसके रसूल की, तो वास्तव में उसी के लिए नरक की अग्नि है, जिसमें वह नित्य सदावासी होगा।
حَتَّىٰ إِذَا رَأَوْا مَا يُوعَدُونَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ أَضْعَفُ نَاصِرًا وَأَقَلُّ عَدَدًا ﴾ 24 ﴿
हत्ता इज़ा रऔ मा यू-अ़दू-न फ़-सयअ्लमू-न मन् अज़अ़फु नासिरंव्-व अक़ल्लु अ़-ददा
यहाँ तक कि जब वे देख लेंगे, जिसका उन्हें वचन दिया जाता है, तो उन्हें विश्वास हो जायेगा कि किसके सहायक निर्बल और किसकी संख्या कम है।
قُلْ إِنْ أَدْرِي أَقَرِيبٌ مَّا تُوعَدُونَ أَمْ يَجْعَلُ لَهُ رَبِّي أَمَدًا ﴾ 25 ﴿
कुल् इन् अद्री अ-क़रीबुम्-मा तू-अ़दू-न अम् यज्अ़लु लहू रब्बी अ-मदा
आप कह दें कि मैं नहीं जानता कि समीप है, जिसका वचन तुम्हें दिया जा रहा है अथाव बनायेगा मेरा पालनहार उसके लिए कोई अवधि?
عَالِمُ الْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَىٰ غَيْبِهِ أَحَدًا ﴾ 26 ﴿
आ़लिमुल्-गै़बि फ़ला युज्हिरु अ़ला गै़बिही अ-हदा
वह ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञानी है, अतः, वह अवगत नहीं कराता है अपने परोक्ष पर किसी को।
إِلَّا مَنِ ارْتَضَىٰ مِن رَّسُولٍ فَإِنَّهُ يَسْلُكُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ رَصَدًا ﴾ 27 ﴿
इल्ला मनिर्तज़ा मिर्रसूलिन् फ़-इन्नहू यस्लुकु मिम्-बैनि यदैहि व मिन् ख़ल्फ़िही र-सदा
सिवाये रसूल के, जिसे उसने प्रिय बना लिया है, फिर वह लगा देता है उस वह़्यी के आगे तथा उसके पीछे रक्षक।[1] 1. अर्थात ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान तो अल्लाह ही को है। किन्तु यदि धर्म के विषय में कुछ परोक्ष की बातों की वह़्यी अपने किसी रसूल की ओर करता है तो फ़रिश्तों द्वारा उस की रक्षा की व्यवस्था भी करता है ताकि उस में कुछ मिलाया न जा सके। रसूल को जितना ग़ैब का ज्ञान दिया जाता है वह इस आयत से उजागर हो जाता है। फिर भी कुछ लोग आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पूरे ग़ैब का ज्ञानी मानते हैं। और आप को गुहारते और सब जगह उपस्थित कहते हैं। और तौह़ीद को आघात पहुँचा कर शिर्क करते हैं।
لِّيَعْلَمَ أَن قَدْ أَبْلَغُوا رِسَالَاتِ رَبِّهِمْ وَأَحَاطَ بِمَا لَدَيْهِمْ وَأَحْصَىٰ كُلَّ شَيْءٍ عَدَدًا ﴾ 28 ﴿
लियअ्ल-म अन् क़द् अब्लगू रिसालाति रब्बिहिम् व अहा-त बिमा लदैहिम् व अह्सा कुल्-ल शैइन् अ़-ददा
ताकि वह देख ले कि उन्होंने पहुँचा दिये हैं अपने पालनहार के उपदेश[1] और उसने घेर रखा है, जो कुछ उनके पास है और प्रत्येक वस्तु को गिन रखा है। 1. अर्थात वह रसूलों की दशा को जानता है। उस ने प्रत्येक चीज़ को गिन रखा है ताकि रसूलों के उपदेश पहुँचाने में कोई कमी और अधिक्ता न हो। इस लिये लोगों को रसूलों की बातें मान लेनी चाहिये।