सूरह बनी इस्राईल के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है. इस में 111 आयतें है।
- इस की आयत (2-3 में बनी इस्राईल से संबंधित कुछ शिक्षाप्रद बातें सुना कर सावधान किया गया है। इसलिये इस का नाम सूरह (बनी इस्राइल ) रखा गया है। और इस की प्रथम आयत में इसान (मेअराज) का वर्णन हुआ है इसलिये इस का दूसरा नाम सूरह (इस्राअ) भी है।
- आयत 9 से 22 तक कुन का आमंत्रण प्रस्तुत किया गया है। और आयत 39 तक उन शिक्षाओं का वर्णन है जो मनुष्य के कर्मों को सजाती है और अल्लाह से उस का संबंध ढूढ़ करती हैं। और आयत 40 से 60 तक विरोधियों के संदेहों को दूर किया गया है।
- आयत 61 से 65 तक में शैतान इब्लीस के आदम (अलैहिस्सलाम) के सज्दे से इन्कार, और मनुष्य से बैर और उस को कुपथ करने के प्रयास का वर्णन किया गया है, जो आज भी लोगों को क़ुरआन से रोक रहा है। और उस से सावधान किया गया है।
- आयत 66 से 72 तक तौहीद तथा परलोक पर विश्वास की बातें प्रस्तुत करते हुये आयत 77 तक नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के विरोध की आँधियों में सत्य पर स्थित रहने के निर्देश दिये गये हैं।
- आयत 78 से 82 तक में नमाज़ की ताकीद, हिज्रत की ओर संकेत, तथा सत्य के प्रभुत्व की सूचना और अत्याचारियों के लिये चेतावनी है।
- आयत 83 से 100 तक में मनुष्य के कुकर्म पर पकड़ की गई है। तथा विरोधियों की आपत्तियों के उत्तर दिये गये है। फिर आयत 104 तक मूसा (अलैहिस्सलाम) के चमत्कारों की चर्चा और उस पर ईमान न लाने के कारण फिरऔन पर यातना के आ जाने का वर्णन है।
- आयत 105 से 111 तक यह निर्देश दिये गये है कि अल्लाह को कैसे पुकारा जाये, तथा उस की महिमा का वर्णन कैसे किया जाये।
मेअराज की घटनाः
यह अन्तिम नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विशेषता है कि हिज्रत से एक वर्ष पहले अल्लाह ने एक रात आप को मस्जिदे हराम (काअबा ) से मस्जिदे अक्सा तक, और फिर वहाँ से सातवें आकाश तक अपनी कुछ निशानियाँ दिखाने के लिये यात्रा कराई। फरिश्ते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बुराक» (एक जानवर का नाम, जिस पर बैठ कर आप ने यह यात्रा की थी) पर सवार किया और पहले मस्जिदे अक्सा (फिलस्तीन) ले गये वहाँ आप ने सब नबियों को नमाज़ पढ़ाई। फिर आकाश पर ले गये आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) प्रत्येक आकाश पर नबियों से मिलते हुये सातवें आकाश पर पहुंचे। स्वर्ग और नरक को देखा। इस के पश्चात् आप को ((सिद्रतुल मुन्तहा)) ले जाया गया। फिर ((बैतुल मामूर)) आप के सामने किया गया। उस के पश्चात् अल्लाह के समीप पहुँचाया गया। और अल्लाह ने आप को कुछ उपदेश दिये, और दिन-रात में पाँच समय की नमाज़ अनिवार्य की। (सहीह बुखारी-3207, मुस्लिम 164) (और देखियेः सूरह नज्म)
- जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सवेरे अपनी जाति (क़ौम ) को इस यात्रा की सूचना दी तो उन्हों ने आप का उपहास किया और आप से कहा कि बैतुल मक़्दिस की स्थिति बताओ। इस पर अल्लाह ने उसे आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने कर दिया, और आप ने आँखों से देख कर उन को उस की सब निशानिया बता दी। (देखियेः सहीह बुखारी-3437, मुस्लिम 172)
- आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जाते और आते हुये राह में उन के एक काफिले से मिलने की भी चर्चा की और उस के मक्का आने का समय और उस ऊँट का चिन्ह भी बता दिया जो सब से आगे था और यह सब वैसे ही हुआ जैसे आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बताया था। (सीरत इब्ने हिशाम-1/402-403)
सूरह अल इस्रा | Surah Al Isra in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
سُبْحَانَ الَّذِي أَسْرَىٰ بِعَبْدِهِ لَيْلًا مِّنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِي بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِيَهُ مِنْ آيَاتِنَا ۚ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ ﴾ 1 ﴿
सुब्हानल्लज़ी अस्रा बिअ़ब्दिही लैलम्-मिनल्- मस्जिदिल्-हरामि इलल् मस्जिदिल्-अक़्सल्लज़ी बारक्ना हौलहू लिनुरियहू मिन् आयातिना, इन्नहू हुवस्समी अुल्-बसीर
पवित्र है वह जिसने रात्रि के कुछ क्षण में अपने भक्त[1] को मस्जिदे ह़राम (मक्का) से मस्जिदे अक़्सा तक यात्रा कराई। जिसके चतुर्दिग हमने सम्पन्नता रखी है, ताकि उसे अपनी कुछ निशानियों का दर्शन कराएँ। वास्तव में, वह सब कुछ सुनने-जानने वाला है। 1. अर्थात मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को। इस आयत में उस सुप्रसिध्द सत्य की चर्चा की गई है जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से संबन्धित है। जिसे परिभाषिक रूप से "इस्राअ" कहा जाता है। जिस का अर्थ हैः रात की यात्रा। इस का सविस्तार विवरण ह़दीसों में किया गया है। भाष्यकारों के अनुसार हिजरत के कुछ पहले अल्लाह ने आप को रात्रि के कुछ भाग में मक्का से मस्जिदे अक्सा तक जो फ़िलस्तीन में है यात्रा कराई। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है कि जब मक्का के मिश्रणवादियों ने मुझे झुठलाया, तो मैं ह़िज्र में (जो काबा का एक भाग है) खड़ा हो गया। और अल्लाह ने बैतुल मक़्दिस को मेरे लिये खोल दिया। और मैं उन्हें उस की निशानियाँ देख कर बताने लगा। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीसः4710)
وَآتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَجَعَلْنَاهُ هُدًى لِّبَنِي إِسْرَائِيلَ أَلَّا تَتَّخِذُوا مِن دُونِي وَكِيلًا ﴾ 2 ﴿
व आतैना मूसल्-किता-ब व जअ़ल्नाहु हुदल् लि-बनी इस्राई-ल अल्ला तत्तख़िज़ू मिन् दूनी वकीला
और हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की और उसे बनी इस्राईल के लिए मार्गदर्शन का साधन बनाया कि मेरे सिवा किसी को कार्यसाधक[1] न बनाओ। 1. जिस पर निर्भर रहा जाये।
ذُرِّيَّةَ مَنْ حَمَلْنَا مَعَ نُوحٍ ۚ إِنَّهُ كَانَ عَبْدًا شَكُورًا ﴾ 3 ﴿
ज़ुर्रिय्य-त मन् हमल्ना म-अ़ नूहिन् इन्नहू का-न अब्दन् शकूरा
हे उनकी संतति जिन्हें हमने नूह़ के साथ (नौका) में सवार किया। वास्तव में, वह अति कृतज्ञ[1] भक्त था। 1. अतः हे सर्व मानव तुम भी अल्लाह के उपकार के अभारी बनो।
وَقَضَيْنَا إِلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ فِي الْكِتَابِ لَتُفْسِدُنَّ فِي الْأَرْضِ مَرَّتَيْنِ وَلَتَعْلُنَّ عُلُوًّا كَبِيرًا ﴾ 4 ﴿
व क़ज़ैना इला बनी इस्राईल फिल्-किताबि लतुफ्सिदुन्-न फिल्अर्ज़ि मर्रतैनि व ल-तअ्लुन्-न अलुव्वन् कबीरा
और हमने बनी इस्राईल को, उनकी पुस्तक में सूचित कर दिया था कि तुम इस[1] धरती में दो बार उपद्रव करोगे और बड़ा अत्याचार करोगे। 1. अर्थात बैतुल मक़्दिस में।
فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ أُولَاهُمَا بَعَثْنَا عَلَيْكُمْ عِبَادًا لَّنَا أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ فَجَاسُوا خِلَالَ الدِّيَارِ ۚ وَكَانَ وَعْدًا مَّفْعُولًا ﴾ 5 ﴿
फ़-इज़ा जा-अ वअ्दु ऊलाहुमा बअ़स्-ना अ़लैकुम् अिबादल्-लना उली बअ्सिन् शदीदिन् फ़जासू ख़िलालद् दियारि, व का-न वअ्दम्-मफ़अूला
तो जब प्रथम उपद्रव का समय आया, तो हमने तुमपर अपने प्रबल योध्दा भक्तों को भेज दिया, जो नगरों में घुस गये और इस वचन को पूरा होना ही[1] था। 1. इस से अभिप्रेत बाबिल के राजा बुख़्तनस्सर का आक्रमण है जो लग भग छः सौ वर्ष पूर्व मसीह़ हुआ। इस्राईलियों को बंदी बना कर इराक़ ले गया और बैतुल मुक़द्दस को तहस नहस कर दिया।
ثُمَّ رَدَدْنَا لَكُمُ الْكَرَّةَ عَلَيْهِمْ وَأَمْدَدْنَاكُم بِأَمْوَالٍ وَبَنِينَ وَجَعَلْنَاكُمْ أَكْثَرَ نَفِيرًا ﴾ 6 ﴿
सुम्-म रदद्-ना लकुमुल्कर्र-त अलैहिम् व अम्दद्-ना कुम् बिअम्वालिंव्-व बनी-न व जअ़ल्नाकुम् अक्स-र नफ़ीरा
फिर हमने उनपर तुम्हें पुनः प्रभुत्व दिया तथा धनों और पुत्रों द्वारा तुम्हारी सहायता की और तुम्हारी संख्या बहुत अधिक कर दी।
إِنْ أَحْسَنتُمْ أَحْسَنتُمْ لِأَنفُسِكُمْ ۖ وَإِنْ أَسَأْتُمْ فَلَهَا ۚ فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ الْآخِرَةِ لِيَسُوءُوا وُجُوهَكُمْ وَلِيَدْخُلُوا الْمَسْجِدَ كَمَا دَخَلُوهُ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَلِيُتَبِّرُوا مَا عَلَوْا تَتْبِيرًا ﴾ 7 ﴿
इन् अह्सन्तुम् अह्सन्तुम् लिअन्फुसिकुम, व इन् अ- सअ्तुम् फ़-लहा, फ़-इज़ा जा-अ वअ्दुल्-आख़िरति लि-यसूऊ वुजू- हकुम् व लियद्ख़ुलुल्-मस्जि-द कमा द-ख़लूहु अव्व-ल मर्रतिंव्-व लियुतब्बिरू मा अ़लौ तत्बीरा
यदि तुम भला करोगे, तो अपने लिए और यदि बुरा करोगे, तो अपने लिए। फिर जब दूसरे उपद्रव का समय आया ताकि (शत्रु) तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें और मस्जिद (अक़्सा) में वैसे ही प्रवेश कर जायेँ, जैसे प्रथम बार प्रवेश कर गये और ताकि जो भी उनके हाथ आये, उसे पूर्णता नाश[1] कर दे। 1. जब बनी इस्राईल पुनः पापाचारी बन गये, तो रोम के राजा क़ैसर ने लग भग सन् 70 ई◦ में बैतुल् मक़्दिस पर आक्रमण कर के उन की दुर्गत बना दी। और उन की पुस्तक तौरात का नाश कर दिया और एक बड़ी संख्या को बंदी बना लिया। यह सब उन के कुकर्म के कारण हुआ।
عَسَىٰ رَبُّكُمْ أَن يَرْحَمَكُمْ ۚ وَإِنْ عُدتُّمْ عُدْنَا ۘ وَجَعَلْنَا جَهَنَّمَ لِلْكَافِرِينَ حَصِيرًا ﴾ 8 ﴿
अ़सा रब्बुकुम् अंय्यर्ह-मकुम् व इन् अुत्तुम् उद्-ना • व जअ़ल्ना जहन्न-म लिल्काफ़िरी-न हसीरा
संभव है कि तुम्हारा पालनहार तुमपर दया करे और यदि तुम प्रथम स्थिति पर आ गये, तो हमभी फिर[1]आयेंगे और हमने नरक को काफ़िरों के लिए कारावास बना दिया है। 1. अर्थात संसारिक दण्ड देने के लिये।
إِنَّ هَٰذَا الْقُرْآنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ وَيُبَشِّرُ الْمُؤْمِنِينَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ الصَّالِحَاتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْرًا كَبِيرًا ﴾ 9 ﴿
इन्-न हाज़ल्क़ुरआ-न यह्दी लिल्लती हि-य अक़्वमु व युबश्शिरूल्-मुअ्मिनीनल्लज़ी-न यअ्मलूनस्सालिहाति अन्-न लहुम् अज्रन् कबीरा
वास्तव में, ये क़ुर्आन वह डगर दिखाता है, जो सबसे सीधी है और उन ईमान वालों को शुभ सूचना देता है, जो सदाचार करते हैं कि उन्हीं के लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है।
وَأَنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا ﴾ 10 ﴿
व अन्नल्लज़ी-न ला युअ्मिनू-न बिल्आख़िरति अअ्तद्-ना लहुम् अ़ज़ाबन अलीमा*
और जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं लाते, हमने उनके लिए दुःखदायी यातना तैयार कर रखी है।
وَيَدْعُ الْإِنسَانُ بِالشَّرِّ دُعَاءَهُ بِالْخَيْرِ ۖ وَكَانَ الْإِنسَانُ عَجُولًا ﴾ 11 ﴿
व यद्अुल-इन्सानु बिश्शर्रि दुआ़-अहू बिल्ख़ैरि, व कानल्-इन्सानु अ़जूला
और मनुष्य (क्षुब्ध होकर) अभिशाप करने लगता[1] है, जैसे भलाई के लिए प्रार्थना करता है और मनुष्य बड़ा ही उतावला है। 1. अर्थात स्वयं को और अपने घराने को शापने लगता है।
وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ آيَتَيْنِ ۖ فَمَحَوْنَا آيَةَ اللَّيْلِ وَجَعَلْنَا آيَةَ النَّهَارِ مُبْصِرَةً لِّتَبْتَغُوا فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ ۚ وَكُلَّ شَيْءٍ فَصَّلْنَاهُ تَفْصِيلًا ﴾ 12 ﴿
व जअ़ल्नल्लै-ल वन्नहा-र आयतैनि फ़-महौना आयतल्लैलि व जअ़ल्ना आयतन्नहारि मुब्सि-रतल्- लितब्तग़ू फ़ज़्लम् मिर्रब्बिकुम् व लितअ्-लमू अ़-ददस्सिनी-न वल्-हिसा-ब, व कुल्-ल शैइन् फ़स्सल्नाहु तफ़्सीला
और हमने रात्री तथा दिवस को दो प्रतीक बनाया, फिर रात्री के प्रतीक को हमने अन्धकार बनाया तथा दिवस के प्रतीक को प्रकाशयुक्त, ताकि तुम अपने पालनहार के अनुग्रह की (जीविका) की खोज करो और वर्षों तथा ह़िसाब की गिनती जानो तथा हमने प्रत्येक चीज़ का सविस्तार वर्णन कर दिया।
وَكُلَّ إِنسَانٍ أَلْزَمْنَاهُ طَائِرَهُ فِي عُنُقِهِ ۖ وَنُخْرِجُ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ كِتَابًا يَلْقَاهُ مَنشُورًا ﴾ 13 ﴿
व कुल्-ल इन्सानिन् अल्ज़म्-नाहु ताइ-रहू फी अुनुक़िही, व नुख़्रिजु लहू यौमल्-क़ियामति किताबंय्-यल्क़ाहु मन्शूरा
और प्रत्येक मनुष्य के कर्मपत्र को हमने उसके गले का हार बना दिया है और हम उसके लिए प्रलय के दिन एक कर्मलेख निकालेंगे, जिसे वह खुला हुआ पायेगा।
اقْرَأْ كِتَابَكَ كَفَىٰ بِنَفْسِكَ الْيَوْمَ عَلَيْكَ حَسِيبًا ﴾ 14 ﴿
इक़रअ् किता-ब क, कफ़ा बिनफ्सिकल्-यौ-म अ़लै-क हसीबा
अपना कर्मलेख पढ़ लो, आज तू स्वयं अपना ह़िसाब लेने के लिए पर्याप्त है।
مَّنِ اهْتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهْتَدِي لِنَفْسِهِ ۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۗ وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّىٰ نَبْعَثَ رَسُولًا ﴾ 15 ﴿
मनिह्तदा फ़-इन्नमा यह्तदी लिनफ़्सिही व मन् ज़ल-ल फ़-इन्नमा यज़िल्लु अ़लैहा, व ला तज़िरू वाज़ि-रतुंव् -विज़्-र उख्रा, व मा कुन्ना मुअ़ज़्ज़िबी-न हत्ता नब्अ़ स रसूला
जिसने सीधी राह अपनायी, उसने अपने ही लिए सीधी राह अपनायी और जो सीधी राह से विचलित हो गया, उसका (दुष्परिणाम) उसीपर है और कोई दूसरे का बोझ (अपने ऊपर) नहीं लादेगा[1] और हम यातना देने वाले नहीं हैं, जब तक कि कोई रसूल न भेजें[1]। 1. आयत का भावार्थ यह है कि जो सदाचार करता है, वह किसी पर उपकार नहीं करता। बल्कि उस का लाभ उसी को मिलना है। और जो दुराचार करता है, उस का दण्ड भी उसी को भोगना है। 2. ताकि वे यह बहाना न कर सकें कि हम ने सीधी राह को जाना ही नहीं था।
وَإِذَا أَرَدْنَا أَن نُّهْلِكَ قَرْيَةً أَمَرْنَا مُتْرَفِيهَا فَفَسَقُوا فِيهَا فَحَقَّ عَلَيْهَا الْقَوْلُ فَدَمَّرْنَاهَا تَدْمِيرًا ﴾ 16 ﴿
व इज़ा अरद्-ना अन्नुह़्लि-क क़र्यतन् अमर्ना मुत्-रफ़ीहा फ़-फ़-सक़ू फ़ीहा फ़-हक़् क़ अ़लैहल्क़ौ लु फ़-दम्मरनाहा तदमीरा
और जब हम किसी बस्ती का विनाश करना चाहते हैं, तो उसके सम्पन्न लोगों को आदेश[1] देते हैं, फिर वे उसमें उपद्व करने लगते[1]हैं, तो उसपर यातना की बात सिध्द हो जाती है और हम उसका पूर्णता उनसूलन कर देते हैं। 1. अर्थात आज्ञा पालन का। 2. अर्थात हमारी आज्ञा का। आयत का भावार्थ यह है कि समाज के सम्पन्न लोगों का दुष्कर्म, अत्याचार और अवैज्ञा पूरी बस्ती के विनाश का कारण बन जाती है।
وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِنَ الْقُرُونِ مِن بَعْدِ نُوحٍ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ بِذُنُوبِ عِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا ﴾ 17 ﴿
व कम् अह़्लक्ना मिनल्क़ुरूनि मिम्-बअ्दि नूहिन्, व कफ़ा बिरब्बि-क बिज़ुनूबि अिबादिही ख़बीरम्-बसीरा
और हमने बहुत-सी जातियों का नूह़ के पश्चात् विनाश किया है और आपका पालनहार अपने दासों के पापों से सूचित होने-देखने को बहुत है।
مَّن كَانَ يُرِيدُ الْعَاجِلَةَ عَجَّلْنَا لَهُ فِيهَا مَا نَشَاءُ لِمَن نُّرِيدُ ثُمَّ جَعَلْنَا لَهُ جَهَنَّمَ يَصْلَاهَا مَذْمُومًا مَّدْحُورًا ﴾ 18 ﴿
मन् का-न युरीदुल-आ़जि-ल त अ़ज्जल्ना लहू फ़ीहा मा नशा-उ लिमन् नुरीदु सुम्म जअ़ल्ना लहू जहन्न-म, यस्लाहा मज़्मूमम् मद्हूरा
जो संसार ही चाहता हो, हम उसे यहीं दे देते हैं, जो हम चाहते हैं, जिसके लिए चाहते हैं। फिर हम उसका परिणाम (परलोक में) नरक बना देते हैं, जिसमें वह निंदित-तिरस्कृत होकर प्रवेश करेगा।
وَمَنْ أَرَادَ الْآخِرَةَ وَسَعَىٰ لَهَا سَعْيَهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَٰئِكَ كَانَ سَعْيُهُم مَّشْكُورًا ﴾ 19 ﴿
व मन् अरादल्-आख़िर-त व सआ़ लहा सअ्-यहा व हु-व मुअ्मिनुन् फ़-उलाइ-क का-न सअ्युहुम् मश्कूरा
तथा जो परलोक चाहता हो और उसके लिए प्रयास करता हो और वह एकेश्वरवादी हो, तो वही हैं, जिनके प्रयास का आदर सम्मान किया जायेगा।
كُلًّا نُّمِدُّ هَٰؤُلَاءِ وَهَٰؤُلَاءِ مِنْ عَطَاءِ رَبِّكَ ۚ وَمَا كَانَ عَطَاءُ رَبِّكَ مَحْظُورًا ﴾ 20 ﴿
कुल्लन-नुमिद्दु हाउला-इ व हाउला-इ मिन् अ़ता-इ रब्बि-क, व मा का-न अ़ता-उ रब्बि-क मह्ज़ूरा
हम प्रत्येक की सहायता करते हैं, इनकी भी और उनकी भी और आपके पालनहार का प्रदान (किसी से) निषेधित (रोका हुआ) नहीं[1] है। 1. अर्थात अल्लाह संसार में सभी को जीविका प्रदान करता है।
انظُرْ كَيْفَ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ وَلَلْآخِرَةُ أَكْبَرُ دَرَجَاتٍ وَأَكْبَرُ تَفْضِيلًا ﴾ 21 ﴿
उन्ज़ुर् कै-फ़ फ़ज़्ज़ल्ना बअ्-ज़हुम् अ़ला बअ्ज़िन्, व लल्आख़िरतु अक्बरू द-रजातिंव्-व अक्बरू तफ़्ज़ीला
आप विचार करें कि कैसे हमने (संसार में) उनमें से कुछ को कुछ पर प्रधानता दी है और निश्चय परलोक के पद और प्रधानता और भी अधिक होगी।
لَّا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًا مَّخْذُولًا ﴾ 22 ﴿
ला तज्अ़ल् मअ़ल्लाहि इलाहन् आ-ख-र फ़-तक़अु-द मज़्मूमम्-मख़्ज़ूला *
(हे मानव!) अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना, अन्यथा बुरा और असहाय होकर रह जायेगा।
وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا ۚ إِمَّا يَبْلُغَنَّ عِندَكَ الْكِبَرَ أَحَدُهُمَا أَوْ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُل لَّهُمَا أُفٍّ وَلَا تَنْهَرْهُمَا وَقُل لَّهُمَا قَوْلًا كَرِيمًا ﴾ 23 ﴿
व क़ज़ा रब्बु-क अल्ला तअ्बुदू इल्ला इय्याहु व बिल्-वालिदैनि इह्सानन्, इम्मा यब्लु ग़न्-न अिन्द-कल् कि-ब-र अ-हदुहुमा औ किलाहुमा फ़ला तक़ुल्-लहुमा उफ्फिंव्-व ला तन्हर्-हुमा व क़ुल्-लहुमा क़ौलन् करीमा
और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो तथा माता-पिता के साथ उपकार करो, यदि तेरे पास दोनों में से एक वृध्दावस्था को पहुँच जाये अथवा दोनों, तो उन्हें उफ़ तक न कहो और न झिड़को और उनसे सादर बात बोलो।
وَاخْفِضْ لَهُمَا جَنَاحَ الذُّلِّ مِنَ الرَّحْمَةِ وَقُل رَّبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا ﴾ 24 ﴿
वख़्फिज़् लहुमा जनाहज़्ज़ुल्लि मिनर्रह्-मति व क़ुर्रब्बिर्हम्हुमा कमा रब्बयानी सग़ीरा
और उनके लिए विनम्रता का बाज़ू दया से झुका[1] दो और प्रार्थना करोः हे मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन दोनों ने बाल्यावस्था में, मेरा लालन-पालन किया है। 1. अर्थात उन के साथ विनम्रता और दया का व्यवहार करो।
رَّبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَا فِي نُفُوسِكُمْ ۚ إِن تَكُونُوا صَالِحِينَ فَإِنَّهُ كَانَ لِلْأَوَّابِينَ غَفُورًا ﴾ 25 ﴿
रब्बुकुम् अअ्लमु बिमा फी नुफूसिकुम्, इन् तकूनू सालिही-न फ़-इन्नहू का-न लिल्-अव्वाबी-न ग़फूरा
तुम्हारा पालनहार अधिक जानता है, जो कुछ तुम्हारी अन्तरात्माओं (मन) में है। यदि तुम सदाचारी रहे, तो वह अपनी ओर ध्यानमग्न रहने वालों के लिए अति क्षमावान् है।
وَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا ﴾ 26 ﴿
व आति ज़ल्क़ुर्बा हक़्क़हू वल्-मिस्की-न वब्-नस्सबीलि व ला तु बज़्ज़िर तब्ज़ीरा
और समीपवर्तियों को उनका स्वत्व (हिस्सा) दो तथा दरिद्र और यात्री को और अपव्यय[1] न करो। 1. अर्थात अपरिमित और दुष्कर्म में ख़र्च न करो।
إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ ۖ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا ﴾ 27 ﴿
इन्नल्-मु बज़्ज़िरी-न कानू इख़्वानश् शयातीनि, व कानश्शैतानु लिरब्बिही कफूरा
वास्तव में, अपव्ययी शैतान के भाई हैं और शैतान अपने पालनहार का अति कृतघ्न है।
وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ مِّن رَّبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُل لَّهُمْ قَوْلًا مَّيْسُورًا ﴾ 28 ﴿
व इम्मा तुअ्-रिज़न्-न अन्हुमुब्तिग़ा-अ रह़्मतिम्-मिर्रब्बि-क तरजूहा फ़क़ुल-लहुम् क़ौलम्-मैसूरा
और यदि आप उनसे विमुख हों, अपने पालनहार की दया की खोज के लिए जिसकी आशा रखते हों, तो उनसे सरल[1] बात बोलें। 1. अर्थात उन्हें सरलता से समझा दें कि अभी कुछ नहीं है। जैसे ही कुछ आया तुम्हें अवश्य दूँगा।
وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَّحْسُورًا ﴾ 29 ﴿
व ला तज्अ़ल् य-द-क म़ग़्लू-लतन् इला अुनुक़ि-क व ला तब्सुत्हा कुल्लल्बस्ति फ़-तक़अु-द मलूमम्-मह्सूरा
और अपना हाथ अपनी गर्दन से न बाँध[1] लो और न उसे पूरा खोल दो कि निन्दित, विवश होकर रह जाओ। 1. हाथ बाँधने और खोलने का अर्थ है, कृपण तथा अपव्यय करना। इस में व्यय और दान में संतुलन रखने की शिक्षा दी गयी है।
إِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا ﴾ 30 ﴿
इन्-न रब्ब-क यब्सुतुर्रिज़्-क़ लिमंय्यशा-उ व यक़्दिरू, इन्नहू का-न बिअिबादिही ख़बीरम्-बसीरा *
वास्तव में, आपका पालनहार ही विस्तृत कर देता है जीविका को जिसके लिए चाहता है, तथा संकीर्ण कर देता है। वास्तव में, वही अपने दासों (बंदों) से अति सूचित[1]देखने वाला[2]है। 1. अर्थात वह सब की दशा और कौन किस के योग्य है देखता और जानता है। 2. ह़दीस में है शिर्क के बाद सब से बड़ा पाप अपनी संतान को खिलाने के भय से मार डालना है। (बुख़ारीः4477, मुस्लिमः 86)
وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَاقٍ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَإِيَّاكُمْ ۚ إِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْئًا كَبِيرًا ﴾ 31 ﴿
व ला तक़्तुलू औलादकुम् ख़श्य-त इम्लाक़िन्, नह़्नु नरज़ुक़ुहुम् व इय्याकुम्, इन्-न क़त्लहुम् का-न ख़ित् अन् कबीरा
और अपनी संतान को निर्धन हो जाने के भय से वध न करो, हम उन्हें तथा तुम्हें जीविका प्रदान करेंगे, वास्तव में, उन्हें वध करना महा पाप है।
وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَىٰ ۖ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا ﴾ 32 ﴿
व ला तक़्र्बुज्ज़िना इन्नहू का-न फ़ाहि-शतन्, व सा-अ सबीला
और व्यभिचार के समीप भी न जाओ, वास्तव में, वह निर्लज्जा तथा बुरी रीति है।
وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِف فِّي الْقَتْلِ ۖ إِنَّهُ كَانَ مَنصُورًا ﴾ 33 ﴿
व ला तक़्तुलुन्-नफ़्सल्लती हर्रमल्लाहु इल्ला बिल्हक़्क़ि, व मन् क़ुति-ल मज़्लूमन् फ़-क़द् जअ़ल्ना लि-वलिय्यिही सुल्तानन् फ़ला युस्रिफ्-फ़िल्क़त्लि, इन्नहू का-न मन्सूरा
और किसी प्राण को जिसे अल्लाह ने ह़राम (अवैध) किया है, वध न करो, परन्तु धर्म विधान[1] के अनुसार और जो अत्याचार से वध (निहत) किया गया, हमने उसके उत्तराधिकारी को अधिकार[2] प्रदान किया है। अतः वह वध करने में अतिक्रमण[1][3] न करे, वास्तव में, उसे सहायता दी गयी है। 1. अर्थात प्रतिहत्या में अथवा विवाहित होते हुये व्यभिचार के कारण, अथवा इस्लाम से फिर जाने के कारण। 2. अधिकार का अर्थ यह है कि वह इस के आधार पर हत्दण्ड की माँग कर सकता है, अथवा वध या अर्थदण्ड लेने या क्षमा कर देने का अधिकारी है। 3. अर्थात एक के बदले दो को या दूसरे की हत्या न करे।
وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُ ۚ وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا ﴾ 34 ﴿
व ला तक़्र्बू मालल् यतीमि इल्ला बिल्लती हि-य अह्सनु हत्ता यब्लु-ग़ अशुद्दहू, व औफू बिल्अ़ह्दि, इन्नल्-अ़ह्-द का-न मस्ऊला
और अनाथ के धन के समीप भी न जाओ, परन्तु ऐसी रीति से, जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुँच जाये और वचन पूरा करो, वास्तव में, वचन के विषय में प्रश्न किया जायेगा।
وَأَوْفُوا الْكَيْلَ إِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَقِيمِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا ﴾ 35 ﴿
व औफुल्कै ल इज़ा किल्तुम् व ज़िनू बिल-क़िस्तासिल्-मुस्तक़ीमि, ज़ालि-क ख़ैरूंव्-व अह्सनु तअ्वीला
और पूरा नापकर दो, जब नापो और सह़ीह़ तराजू से तोलो। ये अधिक अच्छा और इसका परिणाम उत्तम है।
وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ ۚ إِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ أُولَٰئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْئُولًا ﴾ 36 ﴿
व ला तक़्फु मा लै-स ल-क बिही अिल्मुन्, इन्नस्सम्-अ वल्ब स-र वल्फुआ-द कुल्लू उलाइ-क का-न अ़न्हु मस्ऊला
और ऐसी बात के पीछे न पड़ो, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान न हो, निश्चय कान तथा आँख और दिल, इन सबके बारे में (प्रलय के दिन) प्रश्न किया जायेगा[1]। 1. अल्लाह, प्रलय के दिन इन को बोलने की शक्ति देगा। और वह उस के विरुध्द साक्ष्य देंगे। ( देखियेः सूरह ह़ा-मीम-सज्दा, आयतः20-21)
وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّكَ لَن تَخْرِقَ الْأَرْضَ وَلَن تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا ﴾ 37 ﴿
व ला तम्शि फ़िल्अर्ज़ि म रहन्, इन्न-क लन् तख़्रिक़ल्-अर्ज़ व लन् तब्लुग़ल्-जिबा-ल तूला
और धरती में अकड़कर न चलो, वास्तव में, न तुम धरती को फाड़ सकोगे और न लम्बाई में पर्वतों तक पहुँच सकोगे।
كُلُّ ذَٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِندَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا ﴾ 38 ﴿
कुल्लु ज़ालि-क का-न सय्यिउहू अिन्-द रब्बि-क मक्रूहा
ये सब बातें हैं। इनमें बुरी बात आपके पालनहार को अप्रिय हैं।
ذَٰلِكَ مِمَّا أَوْحَىٰ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتُلْقَىٰ فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدْحُورًا ﴾ 39 ﴿
ज़ालि-क मिम्मा औहा इलै-क रब्बु-क मिनल् हिक्मति, व ला तज्अ़ल् मअ़ल्लाहि इलाहन् आख़-र फ़-तुल्क़ा फ़ी जहन्न-म मलूमम्-मदहूरा
ये तत्वदर्शिता की वो बातें हैं, जिनकी वह़्यी (प्रकाशना) आपकी ओर आपके पालनहार ने की है और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना लेना, अन्यथा नरक में निन्दित तिरस्कृत करके फेंक दिये जाओगे।
أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُم بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا ﴾ 40 ﴿
अ-फ़अस्फाकुम् रब्बुकुम् बिल्बनी-न वत्त-ख-ज़ मिनल्-मलाइ-कति इनासन, इन्नकुम् ल-तक़ूलू-न क़ौलन् अ़ज़ीमा *
क्या तुम्हारे पालनहार ने तुम्हें पुत्र प्रदान करने के लिए विशेष कर लिया है और स्वयं फ़रिश्तों को पुत्रियाँ बना लिया है? वास्तव में, तुम बहुत बड़ी बात कह रहे हो[1]। 1. इस आयत में उन अरबों का खण्डन किया गया है जो फ़रिश्तों को अल्लाह की पुत्री कहते थे। जब कि स्वयं पुत्रियों के जन्म से उदास हो जाते थे। और कभी ऐसा भी हुआ कि उन्हें जीवित गाड़ दिया जाता था। तो बताओ यह कहाँ का न्याय है कि अपने लिये पुत्रियों को अप्रिय समझते हो और अल्लाह के लिये पुत्रियाँ बना रखे हो?
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ لِيَذَّكَّرُوا وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًا ﴾ 41 ﴿
व ल क़द् सर्रफ्ना फ़ी हाज़ल क़ुरआनि लि-यज़्ज़क्करू, व मा यज़ीदुहुम् इल्ला नुफूरा
और हमने विविध प्रकार से इस क़ुर्आन में (तथ्यों का) वर्णन कर दिया है, ताकि लोग शिक्षा ग्रहण करें, परन्तु उसने उनकी घृणा को और अधिक कर दिया।
قُل لَّوْ كَانَ مَعَهُ آلِهَةٌ كَمَا يَقُولُونَ إِذًا لَّابْتَغَوْا إِلَىٰ ذِي الْعَرْشِ سَبِيلًا ﴾ 42 ﴿
क़ुल् लौ का-न म-अ़हू आलि-हतुन् कमा यक़ूलू-न इज़ल्-लब्तग़ौ इला ज़िल-अर्शि सबीला
आप कह दें कि यदि अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य होते, जैसा कि वे (मिश्रणवादी) कहते हैं, तो वे अर्श (सिंहासन) के स्वामी (अल्लाह) की ओर अवश्य कोई राह[1] खोजते। 1. ताकि उस से संघर्ष कर के अपना प्रभुत्व स्थापित कर लें।
سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يَقُولُونَ عُلُوًّا كَبِيرًا ﴾ 43 ﴿
सुब्हानहू व तआ़ला अम्मा यक़ूलू-न अुलुव्वन् कबीरा
वह पवित्र और बहुत उच्च है, उन बातों से जिन्हें वे बनाते हैं।
تُسَبِّحُ لَهُ السَّمَاوَاتُ السَّبْعُ وَالْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ وَإِن مِّن شَيْءٍ إِلَّا يُسَبِّحُ بِحَمْدِهِ وَلَٰكِن لَّا تَفْقَهُونَ تَسْبِيحَهُمْ ۗ إِنَّهُ كَانَ حَلِيمًا غَفُورًا ﴾ 44 ﴿
तुसब्बिहु लहुस्समावातुस्सब् अु वल्अर्ज़ु व मन् फ़ीहिन्-न, व इम्-मिन् शैइन् इल्ला युसब्बिहु बिहम्दिही व लाकिल्-ला तफ़्क़हू-न तस्बी-हहुम्, इन्नहू का-न हलीमन् ग़फूरा
उसकी पवित्रता का वर्णन कर रहे हैं सातों आकाश तथा धरती और जो कुछ उनमें है और नहीं है कोई चीज़ परन्तु वह उसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन कर रही है, किन्तु तुम उनके पवित्रता गान को समझते नहीं हो। वास्तव में, वह अति सहिष्णु, क्षमाशील है।
وَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآنَ جَعَلْنَا بَيْنَكَ وَبَيْنَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ حِجَابًا مَّسْتُورًا ﴾ 45 ﴿
व इज़ा क़रअ्तल-क़ुरआ-न जअ़ल्ना बैन-क व बैनल्लज़ी-न ला युअ्मिनू-न बिल्-आख़िरति हिजाबम्-मस्तूरा
और जब आप क़ुर्आन पढ़ते हैं, तो हम आपके बीच और उनके बीच, जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं लाते, एक छुपा हुआ आवरण (पर्दा) बना देते[1] हैं। 1. अर्थात प्रलोक पर ईमान न लाने का यही स्वभाविक परिणाम है कि क़ुर्आन को समझने की योग्यता खो जाती है।
وَجَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِي آذَانِهِمْ وَقْرًا ۚ وَإِذَا ذَكَرْتَ رَبَّكَ فِي الْقُرْآنِ وَحْدَهُ وَلَّوْا عَلَىٰ أَدْبَارِهِمْ نُفُورًا ﴾ 46 ﴿
व जअ़ल्ना अ़ला क़ुलूबिहिम् अकिन्नतन् अय्यंफ़क़हूहु व फ़ी आज़ानिहिम् वक़्रन्, व इज़ा ज़कर् त रब्ब-क फ़िल्क़ुरआनि वह्दहू वल्लौ अ़ला अद्-बारिहिम् नुफूरा
तथा उनके दिलों पर ऐसे खोल चढ़ा देते हैं कि उस (क़ुर्आन) को न समझें और उनके कानों में बोझ और जब आप अपने अकेले पालनहार की चर्चा क़ुर्आन में करते हैं, तो वह घृणा से मुँह फेर लेते हैं।
نَّحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَسْتَمِعُونَ بِهِ إِذْ يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ وَإِذْ هُمْ نَجْوَىٰ إِذْ يَقُولُ الظَّالِمُونَ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلًا مَّسْحُورًا ﴾ 47 ﴿
नह्नु अअ्लमु बिमा यस्तमिअू-न बिही इज़् यस्तमिअू-न इलै-क व इज़् हुम् नज्वा इज़् यक़ूलुज़्ज़ालिमू-न इन् तत्तबिअू-न इल्ला रजुलम्-मस्हूरा
और हम उनके विचारों से भली-भाँति अवगत हैं, जब वे कान लगाकर आपकी बात सुनते हैं और जब वे आपस में कानाफूसी करते हैं, जब वे अत्याचारी कहते हैं कि तुम लोग तो बस एक जादू किये हुए व्यक्ति का अनुसरण[1] करते हो। 1. मक्का के काफ़िर छुप-छुप कर क़ुर्आन सुनते। फिर आपस में प्रामर्श करते कि इस का तोड़ किया हो? और जब किसी पर संदेह हो जाता कि वह क़ुर्आन से प्रभावित हो गया है तो उसे समझाते कि इस के चक्कर में क्या पड़े हो, इस पर किसी ने जादू कर दिया है। इस लिये बहकी-बहकी बातें कर रहा है।
انظُرْ كَيْفَ ضَرَبُوا لَكَ الْأَمْثَالَ فَضَلُّوا فَلَا يَسْتَطِيعُونَ سَبِيلًا ﴾ 48 ﴿
उन्ज़ुर् कै-फ़ ज़-रबू लकल्-अम्सा-ल फ़-ज़ल्लू फ़ला यस्ततीअू-न सबीला
सोचिए कि वे आपके लिए कैसे उदाहरण दे रहे हैं? अतः वे कुपथ हो गये, वे सीधी राह नहीं पा सकेंगे।
وَقَالُوا أَإِذَا كُنَّا عِظَامًا وَرُفَاتًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ خَلْقًا جَدِيدًا ﴾ 49 ﴿
व क़ालू अ-इज़ा कुन्ना अिज़ामंव्-व रूफ़ातन् अ-इन्ना लमब्अूसू न ख़ल्कन् जदीदा
और उन्होंने कहाः क्या हम, जब अस्थियाँ और चूर्ण-विचूर्ण हो जायेंगे तो क्या हम वास्तव में, नई उत्पत्ति में पुनः जीवित कर दिये[1] जायेंगे? 1. ऐसी बात वह परिहास अथवा इन्कार के कारण कहते थे।
قُلْ كُونُوا حِجَارَةً أَوْ حَدِيدًا ﴾ 50 ﴿
क़ुल कूनू हिजा रतन् औ हदीदा
आप कह दें कि पत्थर बन जाओ या लोहा।
أَوْ خَلْقًا مِّمَّا يَكْبُرُ فِي صُدُورِكُمْ ۚ فَسَيَقُولُونَ مَن يُعِيدُنَا ۖ قُلِ الَّذِي فَطَرَكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ ۚ فَسَيُنْغِضُونَ إِلَيْكَ رُءُوسَهُمْ وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هُوَ ۖ قُلْ عَسَىٰ أَن يَكُونَ قَرِيبًا ﴾ 51 ﴿
औ ख़ल्क़म्-मिम्मा यक्बुरू फ़ी सुदूरिकुम्, फ़-स यक़ू लू-न मंय्युईदुना, क़ुलिल्लज़ी फ़-त रकुम् अव्व-ल मर्रतिन्, फ़-सयुन्ग़िज़ू-न इलै-क रूऊ-सहुम् व यफ़ूलू-न मता हु-व, क़ुल अ़सा अंय्यकू-न क़रीबा
अथवा कोई उत्पत्ति, जो तुम्हारे मन में इससे बड़ी हो। फिर वे पूछते हैं कि कौन हमें पुनः जीवित करेगा? आप कह दें: वही, जिसने प्रथम चरण में तुम्हारी उत्पत्ति की है। फिर वे आपके आगे सिर हिलायेंगे[1] और कहेंगेः ऐसा कब होगा? आप कह दें कि संभवता वह समीप ही है। 1. अर्थात परिहास करते हुये आश्चर्य से सिर हिलायेंगे।
يَوْمَ يَدْعُوكُمْ فَتَسْتَجِيبُونَ بِحَمْدِهِ وَتَظُنُّونَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا ﴾ 52 ﴿
यौ-म यद्अूकुम् फ़-तस्तजीबू-न बिहम्दिही व तज़ुन्नू – न इल्लबिस्तुम् इल्ला क़लीला*
जिस दिन वह तुम्हें पुकारेगा, तो तुम उसकी प्रशंसा करते हुए स्वीकार कर लोगे[1] और ये सोचोगे कि तुम (संसार में) थोड़े ही समय रहे हो। 1. अर्थात अपनी क़ब्रों से पर्लय के दिन जीवित हो कर उपस्थित हो जाओगे।
وَقُل لِّعِبَادِي يَقُولُوا الَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ الشَّيْطَانَ يَنزَغُ بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّ الشَّيْطَانَ كَانَ لِلْإِنسَانِ عَدُوًّا مُّبِينًا ﴾ 53 ﴿
व क़ुल्-लिअिबादी यक़ूलुल्लती हि-य अह्सनु, इन्नश्शैता-न यन्ज़गु बैनहुम्, इन्नश्शैता-न का-न लिल्इन्सानि अ़दुव्वम्-मुबीना
और आप मेरे भक्तों से कह दें कि वह बात बोलें, जो उत्तम हो, वास्तव में, शैतान उनके बीच बिगाड़ उत्पन्न करना चाहता[1] है। निश्चय शैतान मनुष्य का खुला शत्रु है। 1. अर्थात कटु शब्दों द्वारा।
رَّبُّكُمْ أَعْلَمُ بِكُمْ ۖ إِن يَشَأْ يَرْحَمْكُمْ أَوْ إِن يَشَأْ يُعَذِّبْكُمْ ۚ وَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ وَكِيلًا ﴾ 54 ﴿
रब्बुकुम् अअ्लमु बिकुम्, इंय्यशअ् यरहम्कुम् औ इंय्यशअ् युअ़ज़्ज़िब्कुम्, व मा अर्सल्ना-क अ़लैहिम् वकीला
तुम्हारा पालनहार, तुमसे भली-भाँति अवगत है, यदि चाहे, तो तुमपर दया करे अथवा यदि चाहे, तो तुम्हें यातना दे और हमने आपको उनपर निरीक्षक बनाकर नहीं भेजा[1]है। 1. अर्थात आप का दायित्व केवल उपदेश पहूँचा देना है, वह तो स्वयं अल्लाह के समीप होने की आशा लगाये हुये हैं, कि कैसे उस तक पहूँचा जाये तो भला वे पूज्य कैसे हो सकते हैं?
وَرَبُّكَ أَعْلَمُ بِمَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ وَلَقَدْ فَضَّلْنَا بَعْضَ النَّبِيِّينَ عَلَىٰ بَعْضٍ ۖ وَآتَيْنَا دَاوُودَ زَبُورًا ﴾ 55 ﴿
व रब्बु-क अअ्लमु बिमन् फिस्समावाति वलअर्ज़ि, व ल-क़द् फ़ज़्ज़ल्ना बअ्ज़न्नबिय्यी-न अ़ला बअ्जिंव् व आतैना दावू-द ज़बूरा
(हे नबी!) आपका पालनहार भली-भाँति अवगत है उससे, जो आकाशों तथा धरती में है और हमने प्रधानता दी है कुछ नबियों को कुछ पर और हमने दावूद को ज़बूर (पुस्तक) प्रदान की।
قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِهِ فَلَا يَمْلِكُونَ كَشْفَ الضُّرِّ عَنكُمْ وَلَا تَحْوِيلًا ﴾ 56 ﴿
क़ुलिद्उल्लज़ी-न ज़अ़म्तुम् मिन् दूनिही फ़ला यम्लिकू-न कश्फ़ज़्ज़ुर्रि अन्कुम् व ला तह़्वीला
आप कह दें कि उन्हें पुकारो, जिन्हें उस (अल्लाह) के सिवा (पूज्य) समझते हो। न वे तुमसे दुःख दूर कर सकते और न (तुम्हारी दशा) बदल सकते हैं।
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ يَدْعُونَ يَبْتَغُونَ إِلَىٰ رَبِّهِمُ الْوَسِيلَةَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ وَيَرْجُونَ رَحْمَتَهُ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُ ۚ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحْذُورًا ﴾ 57 ﴿
उलाइ-कल्लज़ी-न यद्अू-न यब्तग़ू-न इला रब्बिहिमुल्-वसी-ल-त अय्युहुम् अक्ऱबु व यर्-जू-न रह़्म तहू व यख़ाफू-न अ़ज़ाबहू, इन्-न अज़ा-ब रब्बि-क का-न मह्ज़ूरा
वास्तव में, जिन्हें ये लोग[1] पुकारते हैं, वे स्वयं अपने पालनहार का सामीप्य प्राप्त करने का साधन[2] खोजते हैं कि कौन अधिक समीप है? और उसकी दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। वास्तव में, आपके पालनहार की यातना डरने योग्य है। 1. अर्थात मुश्रिक जिन नबियों, महापुरुषों और फ़रिश्तों को पुकारते हैं। 2. साधन से अभिप्रेत सत्कर्म और सदाचार है।
وَإِن مِّن قَرْيَةٍ إِلَّا نَحْنُ مُهْلِكُوهَا قَبْلَ يَوْمِ الْقِيَامَةِ أَوْ مُعَذِّبُوهَا عَذَابًا شَدِيدًا ۚ كَانَ ذَٰلِكَ فِي الْكِتَابِ مَسْطُورًا ﴾ 58 ﴿
व इम्-मिन् क़र्यतिन् इल्ला नह्नु मुह़्लिकूहा क़ब्-ल यौमिल्-क़ियामति औ मुअ़ज़्ज़िबूहा अ़ज़ाबन् शदीदन्, का-न ज़ालि-क फ़िल्किताबि मस्तूराव इम्-मिन् क़र्यतिन् इल्ला नह्नु मुह़्लिकूहा क़ब्-ल यौमिल्-क़ियामति औ मुअ़ज़्ज़िबूहा अ़ज़ाबन् शदीदन्, का-न ज़ालि-क फ़िल्किताबि मस्तूरा
और कोई (अत्याचारी) बस्ती नहीं है, परन्तु हम उसे प्रलय के दिन से पहले ध्वस्त करने वाले या कड़ी यातना देने वाले हैं। ये (अल्लाह के) लेख में अंकित है।
وَمَا مَنَعَنَا أَن نُّرْسِلَ بِالْآيَاتِ إِلَّا أَن كَذَّبَ بِهَا الْأَوَّلُونَ ۚ وَآتَيْنَا ثَمُودَ النَّاقَةَ مُبْصِرَةً فَظَلَمُوا بِهَا ۚ وَمَا نُرْسِلُ بِالْآيَاتِ إِلَّا تَخْوِيفًا ﴾ 59 ﴿
व मा-म-न अ़ना अन्नुर्सि-ल बिल्आयाति इल्ला अन् कज़्ज़-ब बिहल्-अव्वलू-न, व आतैना समूदन्ना-क़-त मुब्सि-रतन् फ़-ज़-लमू बिहा, व मा नुर्सिलु बिल्आयाति इल्ला तख़्वीफ़ा
और हमें नहीं रोका इससे कि हम निशानियाँ भेजें, किन्तु इस बात ने कि विगत लोगों ने उन्हें झुठला[1] दिया और हमने समूद को ऊँटनी का खुला चमत्कार दिया, तो उन्होंने उसपर अत्याचार किया और हम चमत्कार डराने के लिए ही भेजते हैं। 1. अर्थात चमत्कार की माँग करने पर चमत्कार इस नहीं भेजा जाता कि उस के पश्चात् न मानने पर यातना का आना अनिवार्य हो जाता है, जैसा कि भाष्यकारों ने लिखा है।
وَإِذْ قُلْنَا لَكَ إِنَّ رَبَّكَ أَحَاطَ بِالنَّاسِ ۚ وَمَا جَعَلْنَا الرُّؤْيَا الَّتِي أَرَيْنَاكَ إِلَّا فِتْنَةً لِّلنَّاسِ وَالشَّجَرَةَ الْمَلْعُونَةَ فِي الْقُرْآنِ ۚ وَنُخَوِّفُهُمْ فَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا طُغْيَانًا كَبِيرًا ﴾ 60 ﴿
व इज़् क़ुल्ना ल-क इन्-न रब्ब-क अहा-त बिन्नासि, व मा जअ़ल्नर्रूअ्यल्लती अरैना-क इल्ला फित् न-तल्-लिन्नासि वश्श-ज-रतल्-मल्अू न-त फ़िल्क़ुरआनि, व नुख़व्विफुहुम्, फ़मा यज़ीदुहुम् इल्ला तुग़्यानन् कबीरा*
और (हे नबी!) याद करो, जब हमने आपसे कह दिया था कि आपके पालनहार ने लोगों को अपने नियंत्रण में ले रखा है और ये जो कुछ हमने आपको दिखाया,[1] उसको और उस वृक्ष को जिसपर क़ुर्आन में धिक्कार की गयी है, हमने लोगों के लिए एक परीक्षा बना दिया[1] है और हम उन्हें चेतावनी पर चेतावनी दे रहे हैं, फिर भी ये उनकी अवज्ञा को ही अधिक करती जा रही है। 1. इस से संकेत "मेअराज" की ओर है। और यहाँ "रु-या" शब्द का अर्थ स्वप्न नहीं बल्कि आँखों से देखना है। और धिक्कारे हुये वृक्ष से अभिप्राय ज़क़्क़ूम (थोहड़) का वृक्ष है। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीसः4716) 2. अर्थात काफ़िरों के लिये जिन्हों ने कहा कि यह कैसे हो सकता है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक ही रात में बैतुल मक़्दिस पहुँच जायें फिर वहाँ से आकाश की सैर कर के वापिस मक्का भी आ जायें।
وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ قَالَ أَأَسْجُدُ لِمَنْ خَلَقْتَ طِينًا ﴾ 61 ﴿
व इज़् क़ुल्ना लिल्मलाइ कतिस्जुदू लिआद-म फ़-स जदू इल्ला इब्ली-स, क़ा-ल अ-अस्जुदु लिमन् ख़लक़्-त तीना
और (याद करो), जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया। उसने कहाः क्या मैं उसे सज्दा करूँ, जिसे तूने गारे से उत्पन्न किया है?
قَالَ أَرَأَيْتَكَ هَٰذَا الَّذِي كَرَّمْتَ عَلَيَّ لَئِنْ أَخَّرْتَنِ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ لَأَحْتَنِكَنَّ ذُرِّيَّتَهُ إِلَّا قَلِيلًا ﴾ 62 ﴿
क़ा-ल अ-रऐ-त-क हाज़ल्लज़ी कर्रम्-त अ़लय्-य, ल-इन् अख़्ख़र्तनि इला यौमिल-क़ियामति ल- अह्तनिकन्-न ज़ुर्रिय्य-तहू इल्ला क़लीला
(तथा) उसने कहाः तू बता, क्या यही है, जिसे तूने मुझपर प्रधानता दी है? यदि तूने मुझे प्रलय के दिन तक अवसर दिया, तो मैं उसकी संतति को अपने नियंत्रण में कर लूँगा[1]कुछ के सिवा। 1. अर्थात कुपथ कर दूँगा।
قَالَ اذْهَبْ فَمَن تَبِعَكَ مِنْهُمْ فَإِنَّ جَهَنَّمَ جَزَاؤُكُمْ جَزَاءً مَّوْفُورًا ﴾ 63 ﴿
क़ालज़्हब् फ़-मन् तबि-अ-क मिन्हुम् फ़-इन्-न जहन्न-म जज़ाउकुम् जज़ाअम्-मौफूरा
अल्लाह ने कहाः "चले जाओ", जो उनमें से तेरा अनुसरण करेगा, तो निश्चय नरक तुमसबका प्रतिकार (बदला) है, भरपूर बदला।
وَاسْتَفْزِزْ مَنِ اسْتَطَعْتَ مِنْهُم بِصَوْتِكَ وَأَجْلِبْ عَلَيْهِم بِخَيْلِكَ وَرَجِلِكَ وَشَارِكْهُمْ فِي الْأَمْوَالِ وَالْأَوْلَادِ وَعِدْهُمْ ۚ وَمَا يَعِدُهُمُ الشَّيْطَانُ إِلَّا غُرُورًا ﴾ 64 ﴿
वस्तफ्ज़िज़् मनिस्त-तअ्-त मिन्हुम् बिसौति-क व अज्लिब् अ़लैहिम् बिख़ैलि-क व रजिलि-क व शारिक्हुम फिल् अम्वालि वल्-औलादि व अिदहुम, व मा यअिदुहुमुश्-शैतानु इल्ला ग़ुरूरा
तू उनमें से जिसे हो सके, अपनी ध्वनि[1] से बहका ले और उनपर अपनी सवार और पैदल (सेना) चढ़ा[2] ले और उनका (उनके) धनों और संतानों में साझी बन[3] जा तथा उन्हें (मिथ्या) वचन दे और शैतान उन्हें धोखे के सिवा (कोई) वचन नहीं देता। 1. अर्थात गाने और बजाने द्वारा। 2. अर्थात अपने जिन्न और मनुष्य सहायकों द्वारा उन्हें बहकाने का उपाय कर ले। 3. अर्थात अवैध धन अर्जित करने और व्यभिचार की प्रेरणा दे।
إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ ۚ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ وَكِيلًا ﴾ 65 ﴿
इन्-न अिबादी लै-स ल-क अलैहिम् सुल्तानुन्, व कफा बिरब्बि-क वकीला
वास्तव में, जो मेरे भक्त हैं, उनपर तेरा कोई वश नहीं चल सकता और आपके पालनहार का सहायक होना ये बहुत है।
رَّبُّكُمُ الَّذِي يُزْجِي لَكُمُ الْفُلْكَ فِي الْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا ﴾ 66 ﴿
रब्बुकुमुल्लज़ी युज़्जी लकुमुल फुल्-क फिलबह्-रि लितब्तग़ू मिन् फ़ज्लिही, इन्नहू का-न बिकुम् रहीमा
तुम्हारा पालनहार तो वह है, जो तुम्हारे लिए सागर में नौका चलाता है, ताकि तुम उसकी जीविका की खोज करो, वास्तव में, वह तुम्हारे लिए अति दयावान् है।
وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ كَفُورًا ﴾ 67 ﴿
व इज़ा मस्सकुमुज़्ज़ुर्रु फ़िल्बह्-रि ज़ल्-ल मन् तद्अू -न इल्ला इय्याहु, फ़-लम्मा नज्जाकुम् इलल्-बर्रि अअ्-रज़्तुम्, व कानल्-इन्सानु कफूरा
और जब सागर में तुमपर कोई आपदा आ पड़ती है, तो अल्लाह के सिवा जिन्हें तुम पुकारते हो, खो देते (भूल जाते) हो[1] और जब तुम्हें बचाकर थल तक पहुँचा देता है, तो मुख फेर लेते हो और मनुष्य है ही अति कृतघ्न। 1. अर्थात ऐसी दशा में केवल अल्लाह याद आता है और उसी से सहायता माँगते हो, किन्तु जब सागर से निकल जाते हो तो फिर उन्हीं देवी देवताऔं की वंदना करने लगते हो।
أَفَأَمِنتُمْ أَن يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ الْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ وَكِيلًا ﴾ 68 ﴿
अ-फ़-अमिन्तुम् अंय्यख़्सि-फ़ बिकुम् जानिबल्-बर्रि औ युर्सि-ल अ़लैकुम् हासिबऩ सुम्-म ला तजिदू लकुम् वकीला
क्या तुम निर्भय हो गये हो कि अल्लाह तुम्हें थल (धरती) ही में धंसा दे अथवा तुमपर फथरीली आँधी भेज दे? फिर तुम अपना कोई रक्षक न पाओ।
أَمْ أَمِنتُمْ أَن يُعِيدَكُمْ فِيهِ تَارَةً أُخْرَىٰ فَيُرْسِلَ عَلَيْكُمْ قَاصِفًا مِّنَ الرِّيحِ فَيُغْرِقَكُم بِمَا كَفَرْتُمْ ۙ ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِ تَبِيعًا ﴾ 69 ﴿
अम् अमिन्तुम् अंय्युई-दकुम् फ़ीहि ता रतन उख़्रा फयुर्-सि-ल अ़लैकुम् क़ासिफ़म्-मिनर् रीहि फयुग़्रि क़कुम् बिमा कफर्तुम्, सुम्-म ला तजिदू लकुम् अ़लैना बिही तबीआ
या तुम निर्भय हो गये हो कि फिर उस (सागर) में तुम्हें दूसरी बार ले जाये, फिर तुमपर वायु का प्रचण्ड झोंका भेज दे, फिर तुम्हें डुबा दे, उस कुफ़्र के बदले, जो तुमने किया है। फिर तुम अपने लिए उसे नहीं पाओगे, जो हमपर इसका दोष[1] धरे। 1. और हम से बदले की माँग कर सके।
وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ وَحَمَلْنَاهُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَرَزَقْنَاهُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَىٰ كَثِيرٍ مِّمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِيلًا ﴾ 70 ﴿
व ल-क़द् कर्रम्ना बनी आद-म व हमल्नाहुम् फ़िल्बर्रि वल्बह्-रि व रज़क़्नाहुम् मिनत्तय्यिबाति व फज़्ज़ल्नाहुम् अ़ला कसीरिम्-मिम्मन् ख़लक़्ना तफ़्ज़ीला *
और हमने बनी आदम (मानव) को प्रधानता दी और उन्हें थल और जल में सवार[1] किया और उन्हें स्वच्छ चीज़ों से जीविका प्रदान की और हमने उन्हें बहुत-सी उन चीज़ों पर प्रधानता दी, जिनकी हमने उत्पत्ति की है। 1. अर्थात सवारी के साधन दिये।
يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ ۖ فَمَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَأُولَٰئِكَ يَقْرَءُونَ كِتَابَهُمْ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا ﴾ 71 ﴿
यौ-म नद्अू कुल्-ल उनासिम् बि- इमामिहिम्, फ़ मन् ऊति य किताबहू बियमीनिही फ़-उलाइ-क यक़्रऊ-न किताबहुम् व ला युज़्लमू-न फतीला
जिस दिन हम, सब लोगों को उनके अग्रणी के साथ बुलायेंगे, तो जिनका कर्मलेख उनके सीधे हाथ में दिया जायेगा, तो वही अपना कर्मलेख पढ़ेंगे और उनपर धागे बराबर भी अत्याचार नहीं किया जायेगा।
وَمَن كَانَ فِي هَٰذِهِ أَعْمَىٰ فَهُوَ فِي الْآخِرَةِ أَعْمَىٰ وَأَضَلُّ سَبِيلًا ﴾ 72 ﴿
व मन् का-न फ़ी हाज़िही अअ्मा फहु-व फिल्आख़िरति अअ्मा व अज़ल्लु सबीला
और जो इस (संसार) में अंधा[1] रह गया, तो वह आख़िरत (परलोक) में भी अन्धा और अधिक कुपथ होगा। 1. अर्थात सत्य से अन्धा।
وَإِن كَادُوا لَيَفْتِنُونَكَ عَنِ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ لِتَفْتَرِيَ عَلَيْنَا غَيْرَهُ ۖ وَإِذًا لَّاتَّخَذُوكَ خَلِيلًا ﴾ 73 ﴿
व इन् कादू लयफ्तिनू-न-क अ़निल्लज़ी औहैना इलै-क लितफ़्तरि-य अ़लैना ग़ैरहू, व इज़ल् लत्त-ख़ज़ू-क ख़लीला
और (हे नबी!) वह (काफ़िर) समीप था कि आपको उस वह़्यी से फेर दें, जो हमने आपकी ओर भेजी है, ताकि आप हमारे ऊपर अपनी ओर से कोई दूसरी बात घड़ लें और उस समय वे आपको अवश्य अपना मित्र बना लेते।
وَلَوْلَا أَن ثَبَّتْنَاكَ لَقَدْ كِدتَّ تَرْكَنُ إِلَيْهِمْ شَيْئًا قَلِيلًا ﴾ 74 ﴿
व लौ ला अन् सब्बत्-ना-क ल-क़द् कित्-त तर्-कनु इलैहिम् शैअन् क़लीला
और यदि हम आपको सुदृढ़ न रखते, तो आप उनकी ओर कुछ न कुछ झुक जाते।
إِذًا لَّأَذَقْنَاكَ ضِعْفَ الْحَيَاةِ وَضِعْفَ الْمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيْنَا نَصِيرًا ﴾ 75 ﴿
इज़ल् ल-अज़क़्ना-क ज़िअ्फल्-हयाति व ज़िअ्फ़ल्-ममाति सुम्-म ला तजिदु ल-क अ़लैना नसीरा
तब हम आपको जीवन की दुगुनी तथा मरण की दोहरी यातना चखाते। फिर आप अपने लिए हमारे ऊपर कोई सहायक न पाते।
وَإِن كَادُوا لَيَسْتَفِزُّونَكَ مِنَ الْأَرْضِ لِيُخْرِجُوكَ مِنْهَا ۖ وَإِذًا لَّا يَلْبَثُونَ خِلَافَكَ إِلَّا قَلِيلًا ﴾ 76 ﴿
व इन् कादू लयस्तफिज़्जू-न-क मिनल्अर्ज़ि लियुख़्रिजू-क मिन्हा व इज़ल्-ला यल्बसू-न ख़िलाफ़-क इल्ला क़लीला
और समीप है कि वे आपको इस धरती (मक्का) से विचला दें, ताकि आपको उससे निकाल दें, तब व आपके पश्चात् कुछ ही दिन रह सकेंगे।
سُنَّةَ مَن قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِن رُّسُلِنَا ۖ وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا ﴾ 77 ﴿
सुन्न-त मन् क़द् अरसल्ना क़ब्ल-क मिर्रूसुलिना व ला तजिदु लिसुन्नतिना तह़्वीला *
ये[1] उसके लिए नियम रहा है, जिसे हमने आपसे पहले अपने रसूलों में से भेजा है और आप हमारे नियम में कोई परिवर्तन नहीं पायेंगे। 1. अर्थात रसूल को निकालने पर यातना देने का हमारा नियम रहा है।
أَقِمِ الصَّلَاةَ لِدُلُوكِ الشَّمْسِ إِلَىٰ غَسَقِ اللَّيْلِ وَقُرْآنَ الْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا ﴾ 78 ﴿
अक़िमिस्सला-त लिदुलूकिश्शम्सि इला ग़-सक़िल्लैलि व क़ुरआनल्-फ़ज्रि, इन्-न क़ुरआनल-फ़ज्रि का-न मशहूदा
आप नमाज़ की स्थापना करें, सूर्यास्त से रात के अन्धेरे[1]तक तथा प्रातः (फ़ज्र के समय) क़ुर्आन पढ़िये। वास्तव में, प्रातः क़ुर्आन पढ़ना उपस्थिति का समय[2] है। 1. अर्थात ज़ुहर, अस्र और मग्रिब तथा इशा की नमाज़। 2. अर्थात फ़ज्र की नमाज़ के समय रात और दिन के फ़रिश्ते एकत्र तथा उपस्थित रहते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः359, सह़ीह़ मुस्लिमः 632)
وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَّكَ عَسَىٰ أَن يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَّحْمُودًا ﴾ 79 ﴿
व मिनल्लैलि फ़-तहज्जद् बिही नाफ़ि-लतल् ल-क, अ़सा अंय्यब्अ-स-क रब्बु-क मक़ामम्-मह़्मूदा
तथा आप रात के कुछ समय जागिए, फिर "तह़जुद[1]" पढ़िये। ये आपके लिए अधिक (नफ़्ल) है। संभव है आपका पालनहार आपको "मक़ामे मह़मूद[2]" प्रदान कर दे। 1. तहज्जुद का अर्थ है रात के अन्तिम भाग में नमाज़ पढ़ना। 2. "मक़ामे मह़मूद" का अर्थ है प्रशंसा योग्य स्थान। और इस से अभिप्राय वह स्थान है जहाँ से आप प्रलय के दिन शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करेंगे।
وَقُل رَّبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَل لِّي مِن لَّدُنكَ سُلْطَانًا نَّصِيرًا ﴾ 80 ﴿
व क़ुर्रब्बि अद्ख़िल्नी मुद्ख़-ल सिद्किंव्-व अख़्रिज्-नी मुख़्र-ज सिद्किंव्-वज्अ़ल्-ली मिल्लदुन्-क सुल्तानन् नसीरा
और प्रार्थना करें कि मेरे पालनहार! मुझे प्रवेश[1] दे सत्य के साथ, निकाल सत्य के साथ तथा मेरे लिए अपनी ओर से सहायक प्रभुत्व बना दे। 1. अर्थात मदीना में, मक्का से निकाल कर।
وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ ۚ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا ﴾ 81 ﴿
व क़ुल जाअल्-हक़्क़ु व ज़-हक़ल्-बातिलु, इन्नल-बाति-ल का-न ज़हूक़ा
तथा कहिए कि सत्य आ गया और असत्य ध्वस्त-निरस्त हो गया, वास्तव में, असत्य को धवस्त-निरस्त होना ही है[1]। 1. अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का (की विजय के दिन) उस में प्रवेश किया तो काबा के आस पास तीन सौ साठ मुर्तियाँ थीं। और आप के हाथ में एक छड़ी थी, जिस से उन को मार रहे थे। और आप यही आयत पढ़ते जो रहे थे। (सह़ीह़ बुख़ारीः4720, मुस्लिमः1781)
وَنُنَزِّلُ مِنَ الْقُرْآنِ مَا هُوَ شِفَاءٌ وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ ۙ وَلَا يَزِيدُ الظَّالِمِينَ إِلَّا خَسَارًا ﴾ 82 ﴿
व नुनज़्ज़िलु मिनल्-क़ुरआनि मा हु-व शिफाउंव्-व रह़्मतुल् लिल मुअ्मिनी-न, व ला यज़ीदुज़्ज़ालिमी-न इल्ला ख़सारा
और हम क़ुर्आन में से वह चीज़ उतार रहे हैं, जो आरोग्य तथा दया है, ईमान वालों के लिए और वह अत्याचारियों की क्षति को ही अधिक करता है।
وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ ۖ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ كَانَ يَئُوسًا ﴾ 83 ﴿
व इज़ा अन्अ़म्-ना अलल्-इन्सानि अअ्-र-ज़ व नआ बिजानिबिही, व इज़ा मस्सहुश्शर्रु का-न यऊसा
और जब हम मानव पर उपकार करते हैं, तो मुख फेर लेता है और दूर हो जाता[1] है तथा जब उसे दुःख पहुँचता है, तो निराश हो जाता है।
قُلْ كُلٌّ يَعْمَلُ عَلَىٰ شَاكِلَتِهِ فَرَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَنْ هُوَ أَهْدَىٰ سَبِيلًا ﴾ 84 ﴿
क़ुल कुल्लुंय्य अ्मलु अ़ला शाकि-लतिही, फ़रब्बुकुम् अअ़लमु बिमन् हु-व अह्दा सबीला *
आप कह दें कि प्रत्येक अपनी आस्था के अनुसार कर्म कर रहा है, तो आपका पालनहार ही भली-भाँति जान रहा है कि कौन अधिक सीधी डगर पर है।
وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الرُّوحِ ۖ قُلِ الرُّوحُ مِنْ أَمْرِ رَبِّي وَمَا أُوتِيتُم مِّنَ الْعِلْمِ إِلَّا قَلِيلًا ﴾ 85 ﴿
व यस्अलून-क अनिर्रुहि, क़ुलिर्रुहु मिन् अम्रि रब्बी व मा ऊतीतुम् मिनल्-अिल्मि इल्ला क़लीला
(हे नबी!) लोग आपसे रूह़[1] के विषय में पूछते हैं, आप कह दें: रूह़ मेरे पालनहार के आदेश से है और तुम्हें जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत थोड़ा है। 1. "रूह़" का अर्थ आत्मा है, जो हर प्राणी के जीवन का मूल है। किन्तु उस की वास्तविक्ता क्या है? यह कोई नहीं जानता। क्यों कि मनुष्य के पास जो ज्ञान है वह बहुत कम है।
وَلَئِن شِئْنَا لَنَذْهَبَنَّ بِالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ بِهِ عَلَيْنَا وَكِيلًا ﴾ 86 ﴿
व ल-इन् शिअ्ना लनज़्ह-बन्-न बिल्लज़ी औहैना इलै-क सुम्-म ला तजिदु ल-क बिही अ़लैना वकीला
और यदि हम चाहें, तो वह सब कुछ ले जायें, जो आपकी ओर हमने वह़्यी किया है, फिर आप हमपर अपना कोई सहायक नहीं पायेंगे।
إِلَّا رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّ فَضْلَهُ كَانَ عَلَيْكَ كَبِيرًا ﴾ 87 ﴿
इल्ला रह़्म-तम् मिर्रब्बि-क, इन्-न फज़्लहू का-न अलै-क कबीरा
किन्तु आपके पालनहार की दया के कारण (ये आपको प्राप्त है)। वास्तव में, उसका प्रदान आपपर बहुत बड़ा है।
قُل لَّئِنِ اجْتَمَعَتِ الْإِنسُ وَالْجِنُّ عَلَىٰ أَن يَأْتُوا بِمِثْلِ هَٰذَا الْقُرْآنِ لَا يَأْتُونَ بِمِثْلِهِ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَهِيرًا ﴾ 88 ﴿
क़ुल् ल-इनिज्त म अ़तिल इन्सु वल्जिन्नु अ़ला अंय्यअ्तू बिमिस्लि हाज़ल्-क़ुरआनि ला यअ्तू-न बिमिस्लिही व लौ का-न बअ्ज़ुहुम् लिबअ्ज़िन ज़हीरा
आप कह दें: यदि सब मनुष्य तथा जिन्न इसपर एकत्र हो जायें कि इस क़ुर्आन के समान ले आयेंगे, तो इसके समान नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के समर्थक ही क्यों न हो जायें!
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا لِلنَّاسِ فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ مِن كُلِّ مَثَلٍ فَأَبَىٰ أَكْثَرُ النَّاسِ إِلَّا كُفُورًا ﴾ 89 ﴿
व ल-क़द् सर्रफ़्ना लिन्नासि फ़ी हाज़ल्-क़ुरआनि मिन् कुल्लि म-सलिन्, फ़-अबा अक्सरून्नासि इल्ला कुफूरा
और हमने लोगों के लिए इस क़ुर्आन में प्रत्येक उदाहरण विविध शैली में वर्णित किया है, फिर भी अधिक्तर लोगों ने कुफ़्र के सिवा अस्वीकार ही किया है।
وَقَالُوا لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ تَفْجُرَ لَنَا مِنَ الْأَرْضِ يَنبُوعًا ﴾ 90 ﴿
व क़ालू लन् नुअ्मि-न ल-क हत्ता तफ़्जु-र लना मिनल्- अर्ज़ि यम्बूआ
और उन्होंने कहाः हम आपपर कदापि ईमान नहीं लायेंगे, यहाँ तक कि आप हमारे लिए धरती से एक चश्मा प्रवाहित कर दें।
أَوْ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَعِنَبٍ فَتُفَجِّرَ الْأَنْهَارَ خِلَالَهَا تَفْجِيرًا ﴾ 91 ﴿
औ तकू-न ल-क जन्नतुम् मिन् नख़ीलिंव्-व अि-नबिन् फ़तुफ़ज्जिरल्-अन्हा-र ख़िलालहा तफ़्जीरा
अथवा आपके लिए खजूर अथवा अंगूर का कोई बाग़ हो, फिर उसके बीच आप नहरें प्रवाहित कर दें।
أَوْ تُسْقِطَ السَّمَاءَ كَمَا زَعَمْتَ عَلَيْنَا كِسَفًا أَوْ تَأْتِيَ بِاللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ قَبِيلًا ﴾ 92 ﴿
औ तुस्क़ितस्समा अ कमा ज़अ़म्-त अ़लैना कि सफ़न् औ तअ्ति-य बिल्लाहि वल्मलाइ कति क़बीला
अथवा हमपर आकाश को जैसा आपका विचार है, खण्ड-खण्ड करके गिरा दें या अल्लाह और फ़रिश्तों को साक्षात हमारे सामने ले आयें।963
أَوْ يَكُونَ لَكَ بَيْتٌ مِّن زُخْرُفٍ أَوْ تَرْقَىٰ فِي السَّمَاءِ وَلَن نُّؤْمِنَ لِرُقِيِّكَ حَتَّىٰ تُنَزِّلَ عَلَيْنَا كِتَابًا نَّقْرَؤُهُ ۗ قُلْ سُبْحَانَ رَبِّي هَلْ كُنتُ إِلَّا بَشَرًا رَّسُولًا ﴾ 93 ﴿
औ यकू-न ल-क बैतुम्-मिन् जुख़्रुफिन् औ तरक़ा फिस्समा-इ, व लन् नुअ्मि-न लिरूक़िय्यि-क हत्ता तुनज्ज़ि-ल अ़लैना किताबन् नक़्रउहू, क़ुल सुब्हा-न रब्बी हल् कुन्तु इल्ला ब-शरर्-रसूला *
अथवा आपके लिए सोने का एक घर हो जाये अथवा आकाश में चढ़ जायें और हम आपके चढ़ने का भी कदापि विश्वास नहीं करेंगे, यहाँ तक की हमपर एक पुस्तक उतार लायें, जिसे हम पढ़ें। आप कह दें कि मेरा पालनहार पवित्र है, मैंतो बस एक रसूल (संदेशवाहक) मनुष्य[1] हूँ। 1. अर्थात मैं अपने पालनहार की वह़्यी का अनुसरण करता हूँ। और यह सब चीज़ें अल्लाह के बस में हैं। यदि वह चाहे तो एक क्षण में सब कुछ कर सकता है किन्तु मैं तो तुम्हारे जैसा एक मनुष्य हूँ। मुझे केवल रसूल बना कर भेजा गया है, ताकि तुम्हें अल्लाह का संदेश सुनाऊँ। रहा चमत्कार तो वह अल्लाह के हाथ में है। जिसे चाहे दिखा सकता है। फिर क्या तुम चमत्कार देख कर ईमान लाओगे? यदि ऐसा होता तो तुम कभी के ईमान ला चुके होते, क्योंकि क़ुर्आन से बड़ा क्या चमत्कार हो सकता है?
وَمَا مَنَعَ النَّاسَ أَن يُؤْمِنُوا إِذْ جَاءَهُمُ الْهُدَىٰ إِلَّا أَن قَالُوا أَبَعَثَ اللَّهُ بَشَرًا رَّسُولًا ﴾ 94 ﴿
व मा म-न अ़न्ना-स अंय्युअ्मिनू इज़् जा-अहुमुल्-हुदा इल्ला अन् क़ालू अ-ब-अ़सल्लाहु ब-शरर्रसूला
और नहीं रोका लोगों को कि वे ईमान लायें, जब उनके पास मार्गदर्शन[1] आ गया, परन्तु इसने कि उन्होंने कहाः क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है? 1. अर्थात रसूल तथा पुस्तकें संमार्ग दर्शाने के लिये।
قُل لَّوْ كَانَ فِي الْأَرْضِ مَلَائِكَةٌ يَمْشُونَ مُطْمَئِنِّينَ لَنَزَّلْنَا عَلَيْهِم مِّنَ السَّمَاءِ مَلَكًا رَّسُولًا ﴾ 95 ﴿
क़ुल् लौ का-न फ़िल् अर्ज़ि मलाइ कतुंय्यम्शू-न मुत्मइन्नी-न लनज़्ज़ल्ना अ़लैहिम् मिनस्समा-इ म-लकर्रसूला
(हे नबी!) आप कह दें कि यदि धरती में फ़रिश्ते निश्चिन्त होकर चलते-फिरते होते, तो हम अवश्य उनपर आकाश से कोई फ़रिश्ता रसूल बनाकर उतारते।
قُلْ كَفَىٰ بِاللَّهِ شَهِيدًا بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا ﴾ 96 ﴿
क़ुल कफ़ा बिल्लाहि शहीदम्-बैनी व बैनकुम्, इन्नहू का-न बिअिबादिही ख़बीरम्-बसीरा
आप कह दें कि मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह का साक्ष्य[1]बहुत है। वास्तव में, वह अपने दासों (बन्दों) से सूचित, सबको देखने वाला है। 1. अर्थात मेरे रसूल होने का साक्षी अल्लाह है।
وَمَن يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِ ۖ وَمَن يُضْلِلْ فَلَن تَجِدَ لَهُمْ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِهِ ۖ وَنَحْشُرُهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ عُمْيًا وَبُكْمًا وَصُمًّا ۖ مَّأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ ۖ كُلَّمَا خَبَتْ زِدْنَاهُمْ سَعِيرًا ﴾ 97 ﴿
व मंय्यह्दिल्लाहु फहुवल्-मुह्तदि, व मंय्युज़्लिल् फ़-लन् तजि-द लहुम् औलिया-अ मिन् दूनिही, व नह्शुरूहुम् यौमल्-क़ियामति अ़ला वुजूहिहिम् अुम्यंव्-व बुक्मंव्-व सुम्मन्, मअ्वाहुम् जहन्नमु, कुल्लमा ख़बत् ज़िद्-ना-हुम् सईरा•
जिसे अल्लाह सुपथ दिखा दे, वही सुपथगामी है और जिसे कुपथ कर दे, तो आप कदापि नहीं पायेंगे, उनके लिए उसके सिवा कोई सहायक और हम उन्हें एकत्र करेंगे प्रलय के दिन उनके मुखों के बल, अंधे, गूँगे और बहरे बनाकर और उनका स्थान नरक है, जबभी वह बुझने लगेगी, तो हम उसे और भड़का देंगे।
ذَٰلِكَ جَزَاؤُهُم بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا وَقَالُوا أَإِذَا كُنَّا عِظَامًا وَرُفَاتًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ خَلْقًا جَدِيدًا ﴾ 98 ﴿
ज़ालि-क जज़ा-उहुम् बिअन्नहुम् क-फ़रू बिआयातिना व क़ालू अ-इज़ा कुन्ना अिज़ामंव्व रूफ़ातन् अ-इन्ना लमब्अूसू-न ख़ल्क़न् जदीदा
यही उनका प्रतिकार (बदला) है, इसलिए कि उन्होंने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र किया और कहाः क्या जब हम अस्थियाँ और चूर-चूर हो जायेंगे, तो नई उत्पत्ति में पुणः जीवित किये जायेंगे[1]? 1. अर्थात ऐसा होना संभव नहीं है कि जब हमारी हड्डियाँ सड़ गल जायें तो हम फिर उठाये जायेंगे।
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ قَادِرٌ عَلَىٰ أَن يَخْلُقَ مِثْلَهُمْ وَجَعَلَ لَهُمْ أَجَلًا لَّا رَيْبَ فِيهِ فَأَبَى الظَّالِمُونَ إِلَّا كُفُورًا ﴾ 99 ﴿
अ-व लम् यरौ अन्नल्लाहल्लज़ी ख़लक़स्समावाति वल्अर्ज़ क़ादिरून् अला अंय्यख़्लु-क़ मिस्लहुम् व ज-अ-ल लहुम् अ जलल्-ला रै-ब फ़ीहि, फ़-अबज़्ज़ालिमू – न इल्ला कुफूरा
क्या वे विचार नहीं करते कि जिस अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति की है, वह समर्थ है इस बात पर कि उनके जैसी उत्पत्ति कर दे[1]? तथा उसने उनके लिए एक निर्धारित अवधि बनायी है, जिसमें कोई संदेह नहीं। फिर भी अत्याचारियों ने कुफ़्र के सिवा अस्वीकार ही किया। 1. अर्थात जिस ने आकाश तथा धरती की उत्पत्ति की उस के लिये मनुष्य को दोबारा उठाना अधिक सरल है, किन्तु वह समझते नहीं हैं।
قُل لَّوْ أَنتُمْ تَمْلِكُونَ خَزَائِنَ رَحْمَةِ رَبِّي إِذًا لَّأَمْسَكْتُمْ خَشْيَةَ الْإِنفَاقِ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ قَتُورًا ﴾ 100 ﴿
क़ुल् लौ अन्तुम् तम्लिकू न ख़ज़ाइ-न रह्-मति रब्बी इज़ल् ल-अम्सक्तुम् ख़श्य-तल इन्फ़ाक़ि, व कानल्-इन्सानु क़तूरा *
आप कह दें कि यदि तुमही स्वामी होते, अपने पालनहार की दया के कोषों के, तबतो तुम खर्च हो जाने के भय से (अपने ही पास) रोक रखते और मनुष्य बड़ा ही कंजूस है।
وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَىٰ تِسْعَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۖ فَاسْأَلْ بَنِي إِسْرَائِيلَ إِذْ جَاءَهُمْ فَقَالَ لَهُ فِرْعَوْنُ إِنِّي لَأَظُنُّكَ يَا مُوسَىٰ مَسْحُورًا ﴾ 101 ﴿
व ल-क़द् आतैना मूसा तिस्-अ आयातिम्-बय्यिनातिन् फ़स् अल् बनी इस्राई-ल इज़् जा-अहुम् फ़क़ा-ल लहू फिरऔनु इन्नी ल-अज़ुन्नु-क या मूसा मस्हूराव ल-क़द् आतैना मूसा तिस्-अ आयातिम्-बय्यिनातिन् फ़स् अल् बनी इस्राई-ल इज़् जा-अहुम् फ़क़ा-ल लहू फिरऔनु इन्नी ल-अज़ुन्नु-क या मूसा मस्हूरा
और हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दीं[1], अतः बनी इस्राईल से आप पूछ लें, जब वह (मूसा) उनके पास आया, तो फ़िर्औन ने उससे कहाः हे मूसा! मैं समझता हूँ कि तुझपर जादू कर दिया गया है। 1.वह नौ निशानियाँ निम्नलिखित थीं: हाथ की चमक, लाठी, अकाल, तूफ़ान, टिड्डी, जूयें, मेंढक, खून और सागर का दो भाग हो जाना।
قَالَ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا أَنزَلَ هَٰؤُلَاءِ إِلَّا رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ بَصَائِرَ وَإِنِّي لَأَظُنُّكَ يَا فِرْعَوْنُ مَثْبُورًا ﴾ 102 ﴿
क़ा-ल लक़द् अलिम् त मा अन्ज़-ल हाउला-इ इल्ला रब्बुस्समावाति वलअर्ज़ि बसाइ-र, व इन्नी ल-अज़ुन्नु-क या फिरऔ़नु मस्बूरा
उस (मूसा) ने उत्तर दियाः तुझे विश्वास है कि इन्हें आकाशों तथा धरती के पालनहार ही ने सोच-विचार करने के लिए उतारा है और हे फ़िर्औन! मैं तुम्हें निश्चय ध्वस्त समझता हूँ।
فَأَرَادَ أَن يَسْتَفِزَّهُم مِّنَ الْأَرْضِ فَأَغْرَقْنَاهُ وَمَن مَّعَهُ جَمِيعًا ﴾ 103 ﴿
फ़-अरा-द अंय्यस्तफिज़्ज़हुम् मिनल्-अर्ज़ि फ़-अग़्रक्नाहु व मम्म अ़हू जमीआ
अन्तताः उसने निश्चय किया कि उन[1] को धरती से[2] उखाड़ फेंके, तो हमने उसे और उसके सब साथियों को डुबो दिया। 1. अर्थात बनी इस्राईल को। 2. अर्थात मिस्र से।
وَقُلْنَا مِن بَعْدِهِ لِبَنِي إِسْرَائِيلَ اسْكُنُوا الْأَرْضَ فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ الْآخِرَةِ جِئْنَا بِكُمْ لَفِيفًا ﴾ 104 ﴿
व क़ुल्ना मिम्-बअ्दिही लि-बनी इस्राईलस्कुनुल् अर्-ज़ फ़-इज़ा जा-अ वअ्दुल-आख़िरति जिअ्ना बिकुम् लफ़ीफ़ा
और हमने उसके पश्चात् बनी इस्राईल से कहाः तुम इस धरती में बस जाओ और जब आख़िरत के वचन का समय आयेगा, तो हम तुम्हें एकत्र कर लायेंगे।
وَبِالْحَقِّ أَنزَلْنَاهُ وَبِالْحَقِّ نَزَلَ ۗ وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا مُبَشِّرًا وَنَذِيرًا ﴾ 105 ﴿
व बिल्हक़्क़ि अन्ज़ल्नाहु व बिल्हक़्क़ि न ज़-ल, व मा अर्सल्ना-क इल्ला मुबश्शिरंव्-व नज़ीरा
और हमने सत्य के साथ ही इस (क़ुर्आन) को उतारा है तथा ये सत्य के साथ ही उतरा है और हमने आपको बस शुभ सूचना देने तथा सावधान करने वाला बनाकर भेजा है।
وَقُرْآنًا فَرَقْنَاهُ لِتَقْرَأَهُ عَلَى النَّاسِ عَلَىٰ مُكْثٍ وَنَزَّلْنَاهُ تَنزِيلًا ﴾ 106 ﴿
व क़ुरआनन् फ़रक़्नाहु लितक़्र-अहू अ़लन्नासि अ़ला मुक्सिंव्-व नज़्ज़ल्नाहु तन्ज़ीला
और इस क़ुर्आन को हमने थोड़ा-थोड़ा करके उतारा है, ताकि आप लोगों को इसे रुक-रुक कर सुनायें और हमने इसे क्रमशः[1]उतारा है। 1. अर्थात तेईस वर्ष की अवधि में।
قُلْ آمِنُوا بِهِ أَوْ لَا تُؤْمِنُوا ۚ إِنَّ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ مِن قَبْلِهِ إِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ يَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ سُجَّدًا ﴾ 107 ﴿
क़ुल आमिनू बिही औ ला तुअ्मिनू, इन्नल्लज़ी-न ऊतुल्-अिल्-म मिन् क़ब्लिही इज़ा युत्ला अ़लैहिम् यख़िर्रू-न लिल्अज़्कानि सुज्जदा
आप कह दें कि तुम इसपर ईमान लाओ अथवा न लाओ, वास्तव में, जिन्हें इससे पहले ज्ञान दिया[1] गया है, जब उन्हें ये सुनाया जाता है, तो वह मुँह के बल सज्दे में गिर जाते हैं। 1. अर्थात वह विद्वान जिन को कुर्आन से पहले की पुस्तकों का ज्ञान है।
وَيَقُولُونَ سُبْحَانَ رَبِّنَا إِن كَانَ وَعْدُ رَبِّنَا لَمَفْعُولًا ﴾ 108 ﴿
व यक़ूलू-न सुब्हा-न रब्बिना इन् का-न वअ्दु रब्बिना ल मफ्अूला
और कहते हैं: पवित्र है हमारा पालनहार! निश्चय हमारे पालनहार का वचन पूरा होकर रहा।
وَيَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ يَبْكُونَ وَيَزِيدُهُمْ خُشُوعًا ۩ ﴾ 109 ﴿
व यखिर्रू-न लिल्अज़्क़ानि यब्कू-न व यज़ीदुहुम् खुशूआ *सज़्दा*
और वह मुँह के बल रोते हुए गिर जाते हैं और वह उनकी विनय को अधिक कर देता है।
قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَٰنَ ۖ أَيًّا مَّا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا ﴾ 110 ﴿
क़ुलिद्अुल्ला-ह अविद् उर्रह्-मा-न, अय्यम् मा तद्अू फ़-लहुल् अस्माउल्-हुस्-ना, व ला तज्हर् बि-सलाति-क व ला तुख़ाफ़ित् बिहा वब्तग़ि बै-न ज़ालि-क सबीला
हे नबी! आप कह दें कि (अल्लाह) कहकर पुकारो अथवा (रह़मान) कहकर पुकारो, जिस नाम से भी पुकारो, उसके सभी नाम शुभ[1] हैं और (हे नबी!) नमाज़ में स्वर न तो ऊँचा करो और न उसे नीचा करो और इन दोनों के बीच की राह[2] अपनाओ। 1. अरब में "अल्लाह" शब्द प्रचलित था, मगर "रह़मान" प्रचलित न था। इस लिये, वह इस नाम पर आपत्ति करते थे। यह आयत इसी का उत्तर है। 2. ह़दीस में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (आरंभिक युग में) मक्का में छुप कर रहते थे। और जब अपने साथियों को ऊँचे स्वर में नमाज़ पढ़ाते थे तो मुश्रिक उसे सुन कर क़ुर्आन को तथा जिस ने क़ुर्आन उतारा है, और जो उसे लाया है, सब को गालियाँ देते थे। अतः अल्लाह ने अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह आदेश दिया। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4722)
وَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًا وَلَمْ يَكُن لَّهُ شَرِيكٌ فِي الْمُلْكِ وَلَمْ يَكُن لَّهُ وَلِيٌّ مِّنَ الذُّلِّ ۖ وَكَبِّرْهُ تَكْبِيرًا ﴾ 111 ﴿
व क़ुलिल्-हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी लम् यत्तख़िज़् वलदंव्-व लम् यकुल्-लहू शरीकुन् फ़िल्मुल्कि व लम् यकुल्लहू वलिय्युम्मिनज़्ज़ुल्लि व कब्बिरहु तक्बीरा*
तथा कहो कि सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसके कोई संतान नहीं और न राज्य में उसका कोई साझी है और न अपमान से बचाने के लिए उसका कोई समर्थक है और आप उसकी महिमा का वर्णन करें।