सूरह हाक्का के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 52 आयतें हैं।
- इस का प्रथम शब्द ((अल हाक्का)) है जिस से यह नाम लिया गया है। और इस का अर्थ हैः वह घड़ी जिस का आना सच्च है। इस में प्रलय के अवश्य आने की सूचना दी गई है।
- आयत 4 से 12 तक उन जातियों की यातना द्वारा शिक्षा दी गई है जिन्होंने प्रलय का इन्कार किया तथा रसूलों को झुठलाया। फिर आयत 13 से 18 तक प्रलय का भ्यावः दृश्य दिखाया गया है।
- आयत 19 से 37 तक सदाचारियों तथा दुराचारियों का परिणाम बताया गया है। फिर काफिरों को संबोधित कर के उन पर कुन तथा रसूल की सच्चाई को उजागर किया गया है।
- अन्त में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अल्लाह की तस्बीह (पवित्रतागान) बयान करते रहने का आदेश दिया गया है।
सूरह अल-हाक्का | Surah Al Haqqah in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
مَا الْحَاقَّةُ ﴾ 2 ﴿
मल्- हाक़्क़ह्
वह क्या है, जिसका होना सच है?
وَمَا أَدْرَاكَ مَا الْحَاقَّةُ ﴾ 3 ﴿
व मा अद्रा-क मल्-हाक्कह्
तथा आप क्या जानें कि क्या है, जिसका होना सच है?
كَذَّبَتْ ثَمُودُ وَعَادٌ بِالْقَارِعَةِ ﴾ 4 ﴿
कज़्ज़बत् समूदु व आदुम् – बिल्- क़ारिअह्
झुठलाया समूद तथा आद (जाति) ने अचानक आ पड़ने वाली (प्रलय) को।
فَأَمَّا ثَمُودُ فَأُهْلِكُوا بِالطَّاغِيَةِ ﴾ 5 ﴿
फ- अम्मा समूदु फ – उह्-लिकू बित्ताग़ियह्
फिर समूद, तो वे ध्वस्त कर दिये गये अति कड़ी ध्वनि से।
وَأَمَّا عَادٌ فَأُهْلِكُوا بِرِيحٍ صَرْصَرٍ عَاتِيَةٍ ﴾ 6 ﴿
व अम्मा आदुन् फ़-उह्-लिकू बिरीहिन् सर्-सरिन् आतियह्
तथा आद, तो वे ध्वस्त कर दिये गये एक तेज़ शीतल आँधी से।
سَخَّرَهَا عَلَيْهِمْ سَبْعَ لَيَالٍ وَثَمَانِيَةَ أَيَّامٍ حُسُومًا فَتَرَى الْقَوْمَ فِيهَا صَرْعَىٰ كَأَنَّهُمْ أَعْجَازُ نَخْلٍ خَاوِيَةٍ ﴾ 7 ﴿
सख्ख़- रहा अलैहिम् सब् – अ लयालिंव्-व समानि-य-त अय्यामिन् हुसूमन् फ- तरल् – क़ौ-म फ़ीहा सर्आ क – अन्नहुम् अअजाजु नख़्लिन् ख़ावियह्
लगाये रखा उसे उनपर सात रातें और आठ दिन निरन्तर, तो आप देखते कि वे जाति उसमें ऐसे पछाड़ी हुई है, जैसे खजूर के खोखले तने।[1] 1. उन के भारी और लम्बे होने की उपमा खजूर के तने से दी गई है।
فَهَلْ تَرَىٰ لَهُم مِّن بَاقِيَةٍ ﴾ 8 ﴿
फ-हल् तरा लहुम् मिम् – बाक़ियहू
तो क्या आप देखते हैं कि उनमें कोई शेष रह गया है?
وَجَاءَ فِرْعَوْنُ وَمَن قَبْلَهُ وَالْمُؤْتَفِكَاتُ بِالْخَاطِئَةِ ﴾ 9 ﴿
व जा-अ फिर्औनु व मन् कुब्लहू वल्-मुस्तफ़िकातु बिल्- ख़ातिअह्
और किया यही पाप फ़िरऔन ने और जो उसके पूर्व थे तथा जिनकी बस्तियाँ औंधी कर दी गयीं।
فَعَصَوْا رَسُولَ رَبِّهِمْ فَأَخَذَهُمْ أَخْذَةً رَّابِيَةً ﴾ 10 ﴿
फ़ – अ़सौ रसू-ल रब्बिहिम् फ़-अ-ख़-ज़हुम् अख़्ज़-तर्-राबियह्
उन्होंने नहीं माना अपने पालनहार के रसूल को। अन्ततः, उसने पकड़ लिया उन्हें, कड़ी पकड़।
إِنَّا لَمَّا طَغَى الْمَاءُ حَمَلْنَاكُمْ فِي الْجَارِيَةِ ﴾ 11 ﴿
इन्ना लम्मा तग़ल्-मा- उ हमल्नाकुम् फिल्जारियह्
हमने, जब सीमा पार कर गया जल, तो तुम्हें सवार कर दिया नाव[1] में। 1. इस में नूह़ (अलैहिस्सलाम) के तूफ़ान की ओर संकेत है। और सभी मनुष्य उन की संतान हैं इस लिये यह दया सब पर हुई है।
لِنَجْعَلَهَا لَكُمْ تَذْكِرَةً وَتَعِيَهَا أُذُنٌ وَاعِيَةٌ ﴾ 12 ﴿
लिनज्- अ़-लहा लकुम् तज़्कि-रतंव्-व त इ-यहा उजुनुंव्-वायिह्
ताकि हम बना दें उसे तुम्हारे लिए एक शिक्षाप्रद यादगार और ताकि सुरक्षित रख लें इसे सुनने वाले कान।
فَإِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ نَفْخَةٌ وَاحِدَةٌ ﴾ 13 ﴿
फ़ -इज़ा नुफि-ख़ फ़िस्सूरि नफ़्ख़ तुंव्- वाहि-दतुन्
फिर जब फूँक दी जायेगी सूर (नरसिंघा) में एक फूँक।
وَحُمِلَتِ الْأَرْضُ وَالْجِبَالُ فَدُكَّتَا دَكَّةً وَاحِدَةً ﴾ 14 ﴿
व हुमि-लतिल्-अर्जु वल् जिबालु फ़-दुक्कता दक्क-तंव्- वाहि-दह्
और उठाया जायेगा धरती तथा पर्वतों को, तो दोनों चूर-चूर कर दिये जायेंगे[1] एक ही बार में। 1. दोखियेः सूरह ताहा, आयतः 20, आयतः103, 108)
فَيَوْمَئِذٍ وَقَعَتِ الْوَاقِعَةُ ﴾ 15 ﴿
फ़यौमइजिं व्- व- क़-अतिल्- वाक़िअह्
तो उसी दिन होनी हो जायेगी।
وَانشَقَّتِ السَّمَاءُ فَهِيَ يَوْمَئِذٍ وَاهِيَةٌ ﴾ 16 ﴿
वन्-शक़्कतिस्-समा-उ फ़हि-य यौ मइज़िंव्-वाहि-यतुं व्
तथा फट जायेगा आकाश, तो वह उस दिन क्षीण निर्बल हो जायेगा।
وَالْمَلَكُ عَلَىٰ أَرْجَائِهَا ۚ وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍ ثَمَانِيَةٌ ﴾ 17 ﴿
वल्- म-लकु अ़ला अर्जा- इहा, व यह्मिलु अर्-श रब्बि-क फ़ौक़हुम् यौमइ ज़िन् समानियह्
और फ़रिश्ते उसके किनारों पर होंगे तथा उठाये होंगे आपके पालनहार के अर्श (सिंहासन) को अपने ऊपर उस दिन, आठ फ़रिश्ते।
يَوْمَئِذٍ تُعْرَضُونَ لَا تَخْفَىٰ مِنكُمْ خَافِيَةٌ ﴾ 18 ﴿
यौमइज़िन् तुअरज़ू न ला तख़्फ़ा मिन्कुम् ख़ाफ़ियह्
उस दिन तुम अल्लाह के पास उपस्थित किये जाओगे, नहीं छुपा रह जायेगा तुममें से कोई।
فَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَيَقُولُ هَاؤُمُ اقْرَءُوا كِتَابِيَهْ ﴾ 19 ﴿
फ़- अम्मा मन् ऊति-य किताबहू बि-यमीनिही फ-यकूलु हाउ – मु क़्ऱऊ किताबियह्
फिर जिसे दिया जायेगा उसका कर्मपत्र दायें हाथ में, वह कहेगाः ये लो मेरा कर्मपत्र पढ़ो।
إِنِّي ظَنَنتُ أَنِّي مُلَاقٍ حِسَابِيَهْ ﴾ 20 ﴿
इन्नी ज़नन्तु अन्नी मुलाकिन् हिसाबियह्
मुझे विश्वास था कि मैं मिलने वाला हूँ अपने ह़िसाब से।
فَهُوَ فِي عِيشَةٍ رَّاضِيَةٍ ﴾ 21 ﴿
फहु-व फी ई-शतिर्-राज़ियह्
तो वह अपने मन चाहे सुख में होगा।
فِي جَنَّةٍ عَالِيَةٍ ﴾ 22 ﴿
फ़ी जन्नतिन् आलियह्
उच्च श्रेणी के स्वर्ग में।
قُطُوفُهَا دَانِيَةٌ ﴾ 23 ﴿
क़ुतूफुहा दानियह्
जिसके फलों के गुच्छे झुक रहे होंगे।
كُلُوا وَاشْرَبُوا هَنِيئًا بِمَا أَسْلَفْتُمْ فِي الْأَيَّامِ الْخَالِيَةِ ﴾ 24 ﴿
कुलू वश्रबू हनीअम्-बिमा अस्लफ़्तुम् फिल्-अय्यामिल्-ख़ालियह्
(उनसे कहा जायेगाः) खाओ तथा पियो आनन्द लेकर उसके बदले, जो तुमने किया है विगत दिनों (संसार) में।
وَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِشِمَالِهِ فَيَقُولُ يَا لَيْتَنِي لَمْ أُوتَ كِتَابِيَهْ ﴾ 25 ﴿
व अम्मा मन् ऊति-य किताबहू बिशिमालिही फ़-यक़ूलु या लैतनी लम् ऊ-त किताबियह्
और जिसे दिया जायेगा उसका कर्मपत्र उसके बायें हाथ में, तो वह कहेगाः हाय! मुझे मेरा कर्मपत्र दिया ही न जाता!
وَلَمْ أَدْرِ مَا حِسَابِيَهْ ﴾ 26 ﴿
व लम् अद्-रि मा हिसाबियह्
तथा मैं न जानता कि क्या है मेरा ह़िसाब!
يَا لَيْتَهَا كَانَتِ الْقَاضِيَةَ ﴾ 27 ﴿
या लैतहा कानतिल्-काज़ियह्
काश मेरी मौत ही निर्णायक[1] होती! 1. अर्थात उस के पश्चात् मैं फिर जीवित न किया जाता।
مَا أَغْنَىٰ عَنِّي مَالِيَهْ ﴾ 28 ﴿
मा अग्ना अन्नी मालियह्
नहीं काम आया मेरा धन।
هَلَكَ عَنِّي سُلْطَانِيَهْ ﴾ 29 ﴿
ह-ल- क अन्नी सुल्तानियह्
मुझसे समाप्त हो गया, मेरा प्रभुत्व।[1] 1. इस का दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि परलोक के इन्कार पर जितने तर्क दिया करता था आज सब निष्फल हो गये।
خُذُوهُ فَغُلُّوهُ ﴾ 30 ﴿
खुजूहु फ-गुल्लूहु
(आदेश होगा कि) उसे पकड़ो और उसके गले में तौक़ डाल दो।
ثُمَّ الْجَحِيمَ صَلُّوهُ ﴾ 31 ﴿
सुम्मल्-जही-म सल्लूहु
फिर नरक में उसे झोंक दो।
ثُمَّ فِي سِلْسِلَةٍ ذَرْعُهَا سَبْعُونَ ذِرَاعًا فَاسْلُكُوهُ ﴾ 32 ﴿
सुम्-म फी सिल्सि – लतिन् जर्-अुहा सब्अु-न ज़िराअ़न् फस्लुकूहु
फिर उसे एक जंजीर जिसकी लम्बाई सत्तर गज़ है, में जकड़ दो।
إِنَّهُ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِاللَّهِ الْعَظِيمِ ﴾ 33 ﴿
इन्नहू का न ला युअ्-मिनु बिल्लाहिल्-अज़ीम
वह ईमान नहीं रखता था महिमाशाली अल्लाह पर।
وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ ﴾ 34 ﴿
व ला यहुज्जु अला तआमिल्-मिस्कीन
और न प्रेरणा देता था दरिद्र को भोजन कराने की।
فَلَيْسَ لَهُ الْيَوْمَ هَاهُنَا حَمِيمٌ ﴾ 35 ﴿
फलै-स लहुल्-यौ म हाहुना हमीम
अतः, नहीं है उसका आज यहाँ कोई मित्र।
وَلَا طَعَامٌ إِلَّا مِنْ غِسْلِينٍ ﴾ 36 ﴿
व ला तआमुन् इल्ला मिनू गिस्लीन
और न कोई भोजन, पीप के सिवा।
لَّا يَأْكُلُهُ إِلَّا الْخَاطِئُونَ ﴾ 37 ﴿
ला यअकुलुहू इल्लल्-ख़ातिऊन
जिसे पापी ही खायेंगे।
فَلَا أُقْسِمُ بِمَا تُبْصِرُونَ ﴾ 38 ﴿
फ़ला उक्सिमु बिमा तुब्सिरून
तो मैं शपथ लेता हूँ उसकी, जो तुम देखते हो।
وَمَا لَا تُبْصِرُونَ ﴾ 39 ﴿
व मा ला तुब्सिरून
तथा जो तुम नहीं देखते हो।
إِنَّهُ لَقَوْلُ رَسُولٍ كَرِيمٍ ﴾ 40 ﴿
इन्नहू लक़ौलु रसूलिन् करीम
निःसंदेह, ये (क़ुर्आन) आदरणीय रसूल का कथन[1] है। 1. यहाँ आदरणीय रसूल से अभिप्राय मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं। तथा सूरह तक्वीर आयतः 19 में फ़रिश्ते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) जो वह़्यी लाते थे वह अभिप्राय हैं। यहाँ क़ुर्आन को आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन इस अर्थ में कहा गया है कि लोग उसे आप से सुन रहे थे। और इसी प्रकार आप जिब्रील (अलैहिस्सलाम) से सुन रहे थे। अन्यथा वास्तव में क़ुर्आन अल्लाह ही का कथन है जैसा कि आगामी आयतः 43 में आ रहा है।
وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍ ۚ قَلِيلًا مَّا تُؤْمِنُونَ ﴾ 41 ﴿
व मा हु-व बिक़ौलि शाअिर्, क़लीलम्-मा तुअ्-मिनून
और वह किसी कवि का कथन नहीं है। तुम लोग कम ही विश्वास करते हो।
وَلَا بِقَوْلِ كَاهِنٍ ۚ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ ﴾ 42 ﴿
व ला बिक़ौलि काहिन्, क़लीलम्-मा तज़क्करून
और न वह किसी ज्योतिषी का कथन है, तुम कम की शिक्षा ग्रहण करते हो।
تَنزِيلٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 43 ﴿
तन्ज़ीलुम् मिर्रब्बिल्-आलमीन
सर्वलोक के पालनहार का उतारा हुआ है।
وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ الْأَقَاوِيلِ ﴾ 44 ﴿
व लौ तक़व्व-ल अ़लैना बअ्-ज़ल्-अकावील
और यदि इसने (नबी ने) हमपर कोई बात बनाई[1] होती। 1. इस आयत का भावार्थ यह कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अपनी ओर से वह़्यी (प्रकाशना) में कुछ अधिक या कम करने का अधिकार नहीं है। यदि वह ऐसा करेंगे तो उन्हें कड़ी यातना दी जायेगी।
لَأَخَذْنَا مِنْهُ بِالْيَمِينِ ﴾ 45 ﴿
ल – अख़ज़्-ना मिन्हु बिल्यमीन
तो अवश्य हम पकड़ लेते उसका सीधा हाथ।
ثُمَّ لَقَطَعْنَا مِنْهُ الْوَتِينَ ﴾ 46 ﴿
सुम्-म ल-क़तअ्ना मिन्हुल्-वतीन
फिर अवश्य काट देते उसके गले की रग।
فَمَا مِنكُم مِّنْ أَحَدٍ عَنْهُ حَاجِزِينَ ﴾ 47 ﴿
फमा मिन्कुम्-मिन् अ-हदिन् अन्हु हाजिज़ीन
फिर तुममें से कोई (मुझे) उससे रोकने वाला न होता।
وَإِنَّهُ لَتَذْكِرَةٌ لِّلْمُتَّقِينَ ﴾ 48 ﴿
व इन्नहू ल-तज़्-कि-रतुल् लिल्-मुत्तक़ीन
निःसंदेह, ये एक शिक्षा है सदाचारियों के लिए।
وَإِنَّا لَنَعْلَمُ أَنَّ مِنكُم مُّكَذِّبِينَ ﴾ 49 ﴿
व इन्ना ल-नअलमु अन्-न मिन्कुम् मुकज़बीन
तथा वास्तव में हम जानते हैं कि तुममें कुछ झुठलाने वाले हैं।
وَإِنَّهُ لَحَسْرَةٌ عَلَى الْكَافِرِينَ ﴾ 50 ﴿
वइन्नहू ल-हस्-रतुन् अलल्-काफ़िरीन
और निश्चय ये पछतावे का कारण होगा काफ़िरों[1] के लिए। 1. अर्थात जो क़ुर्आन को नहीं मानते वह अन्ततः पछतायेंगे।
وَإِنَّهُ لَحَقُّ الْيَقِينِ ﴾ 51 ﴿
व इन्न्हू ल-हक्कुल्-यकीन
वस्तुतः, ये विश्वसनीय सत्य है।