सूरह ग़ाशियह के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 26 आयतें हैं।
- इस की प्रथम आयत में ((अल गाशियह)) शब्द आने के कारण इस का यह नाम रखा गया है। जिस का अर्थ ऐसी आपदा है जो सब पर छा जाये
- इस की आयत 2 से 7 तक में उन का परिणाम बताया गया है जो प्रलय को नहीं मानते और 8 से 16 तक उन का परिणाम बताया गया है जो प्रलय के प्रति विश्वास रखते हैं।
- आयत 17 से 20 तक विश्व की उन निशानियों की ओर ध्यान दिलाया गया है जो अल्लाह के सामर्थ्य का प्रमाण है। और जिन पर विचार करने से कुन की बातों को समर्थन मिलता है कि अल्लाह प्रलय लाने तथा स्वर्ग और नरक का संसार बनाने की शक्ति रखता है और प्रतिफल का होना अनिवार्य है।
- आयत 21 से 26 तक नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सम्बोधित किया गया है कि आप का काम मात्र शिक्षा देना है किसी को बलपूर्वक सत्य मनवाना नहीं है। अतः जो आप की शिक्षा सुनने को तय्यार नहीं है उन्हें अल्लाह के हवाले करो। क्यों कि आखिर उन्हें अल्लाह ही की ओर जाना है, उस दिन वह उन से हिसाब ले लेगा।
सूरह अल-घाशिया | Surah Al Ghashiyah in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ ﴾ 1 ﴿
हल अताक हदीसुल ग़ाशियह
क्या तेरे पास पूरी सृष्टी पर छा जाने वाली (क्यामत) का समाचार आया?
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ خَاشِعَةٌ ﴾ 2 ﴿
वुजूहुय यौ मइजिन ख़ाशिअह
उस दिन कितने मूँह सहमे होंगे।
عَامِلَةٌ نَّاصِبَةٌ ﴾ 3 ﴿
आमिलतुन नासिबह
परिश्रम करते थके जा रहे होंगे।
تَصْلَىٰ نَارًا حَامِيَةً ﴾ 4 ﴿
तस्ला नारन हामियह
पर वे दहकती आग में जायेंगे।
تُسْقَىٰ مِنْ عَيْنٍ آنِيَةٍ ﴾ 5 ﴿
तुस्क़ा मिन ऐनिन आनियह
उन्हें खोलते सोते का जल पिलाया जायेगा।
لَّيْسَ لَهُمْ طَعَامٌ إِلَّا مِن ضَرِيعٍ ﴾ 6 ﴿
लैस लहुम तआमुन इल्ला मिन दरीअ
उनके लिए कटीली झाड़ के सिवा, कोई भोजन सामग्री नहीं होगी।
لَّا يُسْمِنُ وَلَا يُغْنِي مِن جُوعٍ ﴾ 7 ﴿
ला युस्मिनु वला युग्नी मिन जूअ
जो न मोटा करेगी और न भूख दूर करेगी।[1] 1. (1-7) इन आयतों में प्रथम संसारिक स्वार्थ में मग्न इन्सानों को एक प्रश्न द्वारा सावधान किया गया है कि उसे उस समय की सूचना है जब एक आपदा समस्त विश्व पर छा जायेगा? फिर इसी के साथ यह विवरण भी दिया गया है कि उस समय इन्सानों के दो भेद हो जायेंगे, और दोनों के प्रतिफल भी भिन्न होंगेः एक नरक में तथा दूसरा स्वर्ग में जायेगा। तीसरी आयत में "नासिबह" का शब्द आया है जिस का अर्थ है, थक कर चूर हो जाना, अर्थात काफ़िरों को क़्यामत के दिन इतनी कड़ी यातना दी जायेगी कि उन की दशा बहुत ख़राब हो जायेगी। और वे थके-थके से दिखाई देंगे। इस का दूसरा अर्थ यह भी है कि उन्हों ने संसार में बहुत से कर्म किये होंगे परन्तु वह सत्य धर्म के अनुसार नहीं होंगे, इस लिये वे पूजा अर्चना और कड़ी तपस्या कर के भी नरक में जायेंगे, इस लिये कि सत्य आस्था के बिना कोई कर्म मान्य नहीं होगा।
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَّاعِمَةٌ ﴾ 8 ﴿
वुजूहुय यौम इजिन नाइमह
कितने मुख उस दिन निर्मल होंगे।
لِّسَعْيِهَا رَاضِيَةٌ ﴾ 9 ﴿
लि सअ’यिहा रादियह
अपने प्रयास से प्रसन्न होंगे।
فِي جَنَّةٍ عَالِيَةٍ ﴾ 10 ﴿
फ़ी जन्नतिन आलियह
ऊँचे स्वर्ग में होंगे।
لَّا تَسْمَعُ فِيهَا لَاغِيَةً ﴾ 11 ﴿
ला तसमउ फ़ीहा ला गियह
उसमें कोई बकवास नहीं सुनेंगे।
فِيهَا عَيْنٌ جَارِيَةٌ ﴾ 12 ﴿
फ़ीहा ऐनुन जारियह
उसमें बहता जल स्रोत होगा।
فِيهَا سُرُرٌ مَّرْفُوعَةٌ ﴾ 13 ﴿
फ़ीहा सुरुरुम मरफूअह
और उसमें ऊँचे-ऊँचे सिंहासन होंगे।
وَأَكْوَابٌ مَّوْضُوعَةٌ ﴾ 14 ﴿
व अक्वाबुम मौदूअह
उसमें बहुत सारे प्याले रखे होंगे।
وَنَمَارِقُ مَصْفُوفَةٌ ﴾ 15 ﴿
व नमारिक़ु मस फ़ूफ़ह
पंक्तियों में गलीचे लगे होंगे।
وَزَرَابِيُّ مَبْثُوثَةٌ ﴾ 16 ﴿
व ज़रा बिय्यु मब्सूसह
और मख़्मली क़ालीनें बिछी होंगी।[1] 1. (8-16) इन आयतों में जो इस संसार में सत्य आस्था के साथ क़ुर्आन आदेशानुसार जीवन व्यतीत कर रहे हैं परलोक में उन के सदा के सुख का दृश्य दिखाया गया है।
أَفَلَا يَنظُرُونَ إِلَى الْإِبِلِ كَيْفَ خُلِقَتْ ﴾ 17 ﴿
अफ़ला यन्ज़ुरूना इलल इबिलि कैफ़ा ख़ुलिक़त
क्या वह ऊँटों को नहीं देखते कि कैसे पैदा किये गये हैं?
وَإِلَى السَّمَاءِ كَيْفَ رُفِعَتْ ﴾ 18 ﴿
व इलस समाइ कैफ़ा रुफ़िअत
और आकाश को कि किस प्रकार ऊँचा किया गया?
وَإِلَى الْجِبَالِ كَيْفَ نُصِبَتْ ﴾ 19 ﴿
व इलल जिबालि कैफ़ा नुसिबत
और पर्वतों को कि कैसे गाड़े गये?
وَإِلَى الْأَرْضِ كَيْفَ سُطِحَتْ ﴾ 20 ﴿
व इलल अरदि कैफ़ा सुतिहत
तथा धरती को कि कैसे पसारी गयी?[1] 1. (17-20) इन आयतों में फिर विषय बदल कर एक प्रश्न किया जा रहा है कि जो क़ुर्आन की शिक्षा तथा प्रलोक की सूचना को नहीं मानते अपने सामने उन चीज़ों को नहीं देखते जो रात दिन उन के सामने आती रहती हैं, ऊँटों तथा पर्वतों और आकाश एवं धरती पर विचार क्यों नहीं करते कि क्या यह सब अपने आप पैदा हो गये हैं या इन का कोई रचयिता है? यह तो असंभव है कि रचना हो और रचयिता न हो। यदि मानते हैं किसी शक्ति ने इन को बनाया है जिस का कोई साझी नहीं तो उस के अकेले पूज्य होने और उस के फिर से पैदा करने की शक्ति और सामर्थ्य का क्यों इन्कार करते हैं? (तर्जुमानुल क़ुर्आन)
فَذَكِّرْ إِنَّمَا أَنتَ مُذَكِّرٌ ﴾ 21 ﴿
फ़ ज़क्किर इन्नमा अंता मुज़क्किर
अतः आप शिक्षा (नसीह़त) दें कि आप शिक्षा देने वाले हैं।
لَّسْتَ عَلَيْهِم بِمُصَيْطِرٍ ﴾ 22 ﴿
लस्ता अलैहिम बिमु सैतिर
आप उनपर अधिकारी नहीं हैं।
إِلَّا مَن تَوَلَّىٰ وَكَفَرَ ﴾ 23 ﴿
इल्ला मन तवल्ला व कफ़र
परन्तु, जो मुँह फेरेगा और नहीं मानेगा,
فَيُعَذِّبُهُ اللَّهُ الْعَذَابَ الْأَكْبَرَ ﴾ 24 ﴿
फ़ युअज्ज़िबुहुल लाहुल अज़ाबल अकबर
तो अल्लाह उसे भारी यातना देगा।
إِنَّ إِلَيْنَا إِيَابَهُمْ ﴾ 25 ﴿
इन्ना इलैना इयाबहुम
उन्हें हमारी ओर ही वापस आना है।
ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا حِسَابَهُم ﴾ 26 ﴿
सुम्मा इन्ना अलैना हिसाबहुम
फिर हमें ही उनका ह़िसाब लेना है।[1] 1. (21-26) इन आयतों का भावार्थ यह है कि क़ुर्आन किसी को बलपूर्वक मनवाने के लिये नहीं है, और न नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कर्तव्य है कि किसी को बलपूर्वक मनवायें। आप जिस से डरा रहे हैं यह मानें या न मानें वह खुली बात है। फिर भी जो नहीं सुनते उन को अल्लाह ही समझेगा। यह और इस जैसी क़ुर्आन की अनेक आयतें इस आरोप का खण्डन करती हैं के इस्लाम ने अपने मनवाने के लिये अस्त्र शस्त्र का प्रयोग किया है।