सूरह फज्र के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 30 आयतें हैं।
- इस का आरंभ ((वल फज्र)) से होने के कारण इस को यह नाम दिया गया है।
- आयत 1 से 5 तक दिन-रात की प्राकृतिक स्थियों को प्रतिफल के दिन के प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। और आयत 6 से 14 तक कुछ बड़ी जातियों के शिक्षाप्रद परिणाम को इस के समर्थन में प्रस्तुत किया गया है कि इस विश्व का शासक सब के कर्मों को देख रहा है और एक दिन वह हिसाब अवश्य लेगा।
- आयत 15 से 20 तक में मनुष्य के साथ दुर्व्यवहारों तथा निर्बलों के अधिकार हनन पर कड़ी चेतावनी दी गई और बताया गया है कि ऐसा करने का कारण परलोक का अविश्वास है।
- अन्तिम आयतों में अल्लाह के न्यायालय का चित्र प्रस्तुत करते हुये विरोधियों तथा ईमान वालों का परिणाम बताया गया है।
सूरह अल-फज्र | Surah Fajr in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَالشَّفْعِ وَالْوَتْرِ ﴾ 3 ﴿
वश शफ़ इ वल वत्र
और जोड़े तथा अकेले की!
وَاللَّيْلِ إِذَا يَسْرِ ﴾ 4 ﴿
वल लैलि इज़ा यस्र
और रात्रि की जब जाने लगे!
هَلْ فِي ذَٰلِكَ قَسَمٌ لِّذِي حِجْرٍ ﴾ 5 ﴿
हल फ़ी ज़ालिका क़-समुल लिजी हिज्र
क्या उसमें किसी मतिमान (समझदार) के लिए कोई शपथ है?[1] 1. (1-5) इन आयतों में प्रथम परलोक के सुफल विष्यक चार संसारिक लक्षणों को साक्ष्य (गवाह) के रूप में परस्तुत किया गया है। जिस का अर्थ यह है कि कर्मों का फल सत्य है। रात तथा दिन का यह अनुक्रम जिस व्यवस्था के साथ चल रहा है उस से सिध्द होता है कि अल्लाह ही इसे चला रहा है। "दस रात्रियों" से अभिप्राय "ज़ुल ह़िज्जा" मास की प्रारम्भिक दस रातें हैं। सह़ीह़ ह़दीसों में इन की बड़ी प्रधानता बताई गई है।
أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ ﴾ 6 ﴿
अलम तरा कैफ़ा फ़-अला रब्बुका बिआद
क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने "आद" के सात क्या किया?
إِرَمَ ذَاتِ الْعِمَادِ ﴾ 7 ﴿
इर मज़ातिल इमाद
स्तम्भों वाले "इरम" के साथ?
الَّتِي لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِي الْبِلَادِ ﴾ 8 ﴿
अल्लती लम युख्लक़ मिस्लुहा फ़िल बिलाद
जिनके समान देशों में लोग नहीं पैदा किये गये।
وَثَمُودَ الَّذِينَ جَابُوا الصَّخْرَ بِالْوَادِ ﴾ 9 ﴿
व समूदल लज़ीना जाबुस सख़ रबिल वाद
तथा "समूद" के साथ जिन्होंने घाटियों मे चट्टानों को काट रखा था।
وَفِرْعَوْنَ ذِي الْأَوْتَادِ ﴾ 10 ﴿
वफ़िर औना ज़िल औताद
और मेखों वाले फ़िरऔन के साथ।
الَّذِينَ طَغَوْا فِي الْبِلَادِ ﴾ 11 ﴿
अल्लज़ीना तगौ फ़िल बिलाद
जिन्होंने नगरों में उपद्रव कर रखा था।
فَأَكْثَرُوا فِيهَا الْفَسَادَ ﴾ 12 ﴿
फ़अक्सरू फ़ीहल फ़साद
और नगरों में बड़ा उपद्रव फैला रखा था।
فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ ﴾ 13 ﴿
फ़ सब्बा अलैहिम रब्बुका सौत अज़ाब
फिर तेरे पालनहार ने उनपर दण्ड का कोड़ा बरसा दिया।
إِنَّ رَبَّكَ لَبِالْمِرْصَادِ ﴾ 14 ﴿
इन्ना रब्बका लबिल मिरसाद
वास्तव में, तेरा पालनहार घात में है।[1] 1. (6-14) इन आयतों में उन जातियों की चर्चा की गई है जिन्हों ने माया मोह में पड़ कर परलोक और प्रतिफल का इन्कार किया, और अपने नैतिक पतन के कारण धरती में उग्रवाद किया। "आद, इरम" से अभिप्रेत वह पूरानी जाती है जिसे क़ुर्आन तथा अरब में "आदे ऊला" (प्रथम आद) कहा गया है। यह वह प्राचीन जाति है जिस के पास हूद (अलैहिस्सलाम) को भेजा गया। और इन को "आदे इरम" इस लिये कहा गया है कि यह शामी वंशक्रम की उस शाखा से संबंधित थे जो इरम बिन शाम बिन नूह़ से चली आती थी। आयत संख्या 11 में इस का संकेत है कि उग्रवाद का उद्गम भौतिकवाद एवं सत्य विश्वास का इन्कार है जिसे वर्तमान युग में भी प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।
فَأَمَّا الْإِنسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ ﴾ 15 ﴿
फ़ अम्मल इंसानु इज़ा मब तलाहु रब्बुहू फ़अक र-महु वनअ अमह, फ़ यक़ूलु रब्बी अकरमन
परन्तु, जब इन्सान की उसका पालनहार परीक्षा लेता है और उसे सम्मान और धन देता है, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मेरा सम्मान किया।
وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ ﴾ 16 ﴿
वअम्मा इज़ा मब तलाहु फ़ क़दरा अलैहि रिज्हक़, फ़ यक़ूलु रब्बी अहानन
परन्तु, जब उसकी परीक्षा लेने के लिए उसकी जीविका संकीर्ण (कम) कर देता है, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मेरा अपमान किया।
كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ ﴾ 17 ﴿
कल्ला बल ला तुक रिमूनल यतीम
ऐसा नहीं, बल्कि तुम अनाथ का आदर नहीं करते।
وَلَا تَحَاضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ ﴾ 18 ﴿
वला तहाददूना अला तआमिल मिस्कीन
तथा ग़रीब को खाना खिलाने के लिए एक-दूसरे को नहीं उभारते।
وَتَأْكُلُونَ التُّرَاثَ أَكْلًا لَّمًّا ﴾ 19 ﴿
वतअ’ कुलूनत तुरास अक लल लममा
और मीरास (मृतक सम्पत्ति) के धन को समेट-समेट कर खा जाते हो।
وَتُحِبُّونَ الْمَالَ حُبًّا جَمًّا ﴾ 20 ﴿
वतुहिब बूनल मा-ल हुब्बन जममा
और धन से बड़ा मोह रखते हो।[1] 1. (15-20) इन आयतों में समाज की साधारण नैतिक स्थिति की परीक्षा (जायज़ा) ली गई, और भौतिकवादी विचार की आलोचना की गई है जो मात्र सांसारिक धन और मान मर्य़ादा को सम्मान तथा अपमान का पैमाना समझता है और यह भूल गया है कि न धनी होना कोई पुरस्कार है और न निर्धन होना कोई दण्ड है। अल्लाह दोनों स्थितियों में मानव जाति (इन्सान) की परीक्षा ले रहा है। फिर यह बात किसी के बस में हो तो दूसरे का धन भी हड़प कर जाये, क्या ऐसा करना कुकर्म नहीं जिस का ह़िसाब लिया जाये?
كَلَّا إِذَا دُكَّتِ الْأَرْضُ دَكًّا دَكًّا ﴾ 21 ﴿
कल्ला इज़ा दुक्कतिल अरदु दक्कन दक्का
सावधान! जब धरती खण्ड-खण्ड कर दी जायेगी।
وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا ﴾ 22 ﴿
व जाअ रब्बुका वल म-लकु सफ्फन सफ्फा
और तेरा पालनहार स्वयं पदार्वण करेगा और फ़रिश्ते पंक्तियों में होंगे।
وَجِيءَ يَوْمَئِذٍ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ الْإِنسَانُ وَأَنَّىٰ لَهُ الذِّكْرَىٰ ﴾ 23 ﴿
वजीअ यौमइज़िम बि जहन्नम, यौ मइजिय यता ज़क्करुल इंसानु व अन्ना लहुज़ ज़िकरा
और उस दिन नरक लायी जायेगी, उस दिन इन्सान सावधान हो जायेगा, किन्तु सावधानी लाभ-दायक न होगी।
يَقُولُ يَا لَيْتَنِي قَدَّمْتُ لِحَيَاتِي ﴾ 24 ﴿
यक़ूलु या लैतनी क़द दम्तु लि हयाती
वह कामना करेगा के काश! अपने सदा कि जीवन के लिए कर्म किये होते।
فَيَوْمَئِذٍ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُ أَحَدٌ ﴾ 25 ﴿
फ़यौ मइज़िल ला युअज्ज़िबू अज़ाबहू अहद
उस दिन (अल्लाह) के दण्ड के समान कोई दण्ड नहीं होगा।
وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُ أَحَدٌ ﴾ 26 ﴿
वला यूसिकु वसा क़हू अहद
और न उसके जैसी जकड़ कोई जकड़ेगा।[1] 1. (21-26) इन आयतों मे बताया गया है कि धन पूजने और उस से परलोक न बनाने का दुष्परिणाम नरक की घोर यातना के रूप में सामने आयेगा तब भौतिकवादी कुकर्मियों की समझ में आयेगा कि क़ुर्आन को न मान कर बड़ी भूल हुई और हाथ मलेंगे।
يَا أَيَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَئِنَّةُ ﴾ 27 ﴿
या अय्यतुहन नफ्सुल मुत मइन्नह
हे शान्त आत्मा!
ارْجِعِي إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةً مَّرْضِيَّةً ﴾ 28 ﴿
इरजिई इला रब्बिकि रादियतम मर दिय्यह
अपने पालनहार की ओर चल, तू उससे प्रसन्न, और वह तुझ से प्रसन्न।
فَادْخُلِي فِي عِبَادِي ﴾ 29 ﴿
फ़दखुली फ़ी इबादी
तू मेरे भक्तों में प्रवेश कर जा।