सूरह जुहा के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है. इस में 11 आयते हैं।
- इस के आरंभ में “जुहा (दिन के उजाले) की शपथ ग्रहण करने के कारण इस का यह नाम रखा गया है। [
- आयत 1 से 2 तक में दिन और रात की गवाही प्रस्तुत कर के इस की ओर संकेत किया गया है कि इस संसार में अल्लाह ने जैसे उजाला और अंधेरा दोनों बनाये है इसी प्रकार परीक्षा के लिये दुश्ख और सुख भी बनाये है।
- आयत 3 में बताया गया है कि सत्य की राह में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जिस दुश्व का सामना कर रहे हैं उस से यह नहीं समझना चाहिये कि अल्लाह ने आप से खिश्व हो कर आप को छोड़ दिया है।
- आयत 4,5 में आप को सफलताओं की शुभसूचना दी गई है।
- आयत 6 से 8 तक में उन दुश्वों की चर्चा की गई है जिन से आप नबी होने से पहले जूझ रहे थे तो अल्लाह के उपकारों से आप की राहें खुली।
1 यह सूरह आरंभिक युग की है। भाष्य कारों ने लिखा है कि कुछ दिन के लिये नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर प्रकाशना (वह्मी) का उतरना रुक गया। जिस पर आप अति दुखित और चिन्तित हो गये कि कहीं मुझ से कोई दोष तो नहीं हो गया? इस पर आप को सांत्वना देने के लिये यह सूरह अवतीर्ण हुई। इस में सर्व प्रथम प्रकाशित दिन तथा रात्री की शपथ ले कर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को विश्वास दिलाया गया है कि आप के पालनहार ने न तो आप को छोड़ा है और न ही आप से अप्रसच हुआ है। इसी के साथ आप को यह शुभ सूचना भी दी गई है कि आगामी समय आप के लिये प्रथम समय से उत्तम होगा। यह भविष्य वाणी उस समय की गई जब इस के दूर दूर तक कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ रहे थे। सम्पूर्ण मक्का आप का विरोधी हो गया था। और अल्लाह के सिवा आप का कोई सहायक नहीं था। परन्तु मात्र इक्कीस वर्षों में पूरा मक्का इस्लाम का अनुयायी बन गया। और फिर पूरे अरब द्वीप में इस्लाम का ध्वजा लहराने लगा। और कुन की यह भविष्यवाणी शत प्रतिशत पूरी हुई जो कुन के अल्लाह का बचन होने का पमाण बन गई।
- आयत 9 से 11 तक में यह बताया गया है कि इन उपकारों के कारण आप का व्यवहार निर्बलों तथा अनाथों की सहायता एवं आवाह के उपकारों का स्वीकार तथा प्रदर्शन होना चाहिये।
सूरह अद-दुहा | Surah Duha in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَاللَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ ﴾ 2 ﴿
वल लैलि इजा सजा
और शपथ है रात्रि की, जब उसका सन्नाटा छा जाये!
مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ ﴾ 3 ﴿
मा वद दअका रब्बुका वमा क़ला
(हे नबी!) तेरे पालनहार ने तुझे न तो छोड़ा और ने ही विमुख हुआ।
وَلَلْآخِرَةُ خَيْرٌ لَّكَ مِنَ الْأُولَىٰ ﴾ 4 ﴿
वलल आखिरतु खैरुल लका मिनल ऊला
और निश्चय ही आगामी युग तेरे लिए प्रथम युग से उत्तम है।
وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰ ﴾ 5 ﴿
व लसौफ़ा युअ’तीका रब्बुका फतरदा
और तेरा पालनहार तुझे इतना देगा कि तू प्रसन्न हो जायेगा।
أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًا فَآوَىٰ ﴾ 6 ﴿
अलम यजिद्का यतीमन फआवा
क्या उसने तुझे अनाथ पाकर शरण नहीं दी?
وَوَجَدَكَ ضَالًّا فَهَدَىٰ ﴾ 7 ﴿
व वजदाका दाललन फ हदा
और तुझे पथ भूला हुआ पाया, तो सीधा मार्ग नहीं दिखाया?
وَوَجَدَكَ عَائِلًا فَأَغْنَىٰ ﴾ 8 ﴿
व वजदाका आ इलन फअग्ना
और निर्धन पाया, तो धनी नहीं कर दिया?
فَأَمَّا الْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ ﴾ 9 ﴿
फ अम्मल यतीमा फ़ला तक्हर
तो तुम अनाथ पर क्रोध न करना।[1] 1. (1-9) इन आयतों में अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फ़रमाया है कि तुम्हें यह चिन्ता कैसे हो गई है कि हम अप्रसन्न हो गये? हम ने तो तुम्हारे जन्म के दिन से निरन्तर तुम पर उपकार किये हैं। तुम अनाथ थे तो तुम्हारे पालन और रक्षा की व्यवस्था की। राह से अंजान थे तो राह दिखाई। निर्धन थे तो धनी बना दिया। यह बातें बता रही हैं कि तुम आरम्भ ही से हमारे प्रियवर हो और तुम पर हमारा उपकार निरन्तर है।
وَأَمَّا السَّائِلَ فَلَا تَنْهَرْ ﴾ 10 ﴿
व अम्मस सा इला फ़ला तन्हर
और माँगने वाले को न झिड़कना।
وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ ﴾ 11 ﴿
व अम्मा बि निअ’मति रब्बिका फ हददिस
और अपने पालनहार के उपकार का वर्णन करना।[1] 1. (10-11) इन अन्तिम आयतों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को बताया गया है कि हम ने तुम पर जो उपकार किये हैं उन के बदले में तुम अल्लाह की उत्पत्ति के साथ दया और उपकार करो यही हमारे उपकारों की कृतज्ञता होगी।