सूरह ऑला के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 19 आयतें है।
- इस में अल्लाह के गुण ((आला)) अर्थात सर्वोच्च होने का वर्णन हुआ है इस लिये इस का यह नाम रखा गया है।
- इस में आयत 1 से 5 तक अल्लाह के पवित्रता के गान का आदेश देते हुये उस के गुणों का वर्णन किया गया है ताकि मनुष्य अल्लाह को पहचाने ।
- आयत 6 से 8 तक वह्यी को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की स्मरण-शक्ति में सुरक्षित किये जाने का विश्वास दिलाया गया है।
- आयत 9 से 15 तक में आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को शिक्षा देने का आदेश देकर बताया गया है कि किस प्रकार के लोग शिक्षा ग्रहण करेंगे और कौन नहीं करेंगे और दोनों का परिणाम क्या होगा।
- अन्त में बताया गया है कि परलोक की अपेक्षा संसार को प्रधानता देना ग़लत है जिस के कारण मनुष्य मार्गदर्शन से वंचित हो जाता है। फिर कहा गया है कि यही बात जो इस सूरह में बताई गई है पहले के ग्रन्थों में भी बताई गई है।
1 इस सूरह में तीन महत्वपूर्ण विषयों की ओर संकेत किया गया हैः
1- तौहीद (एकेश्वरवाद)
2- नवी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिये कुछ निर्देश।
3- परलोक (आखिरत)।
1- प्रथम आयत में तौहीद की शिक्षा को एक ही आयत में सीमित कर दिया गया है कि अल्लाह के नाम की पवित्रता का सुमरिण करो, जिस का अर्थ यह है कि उसे किसी पैसे नाम से याद न किया जाये जिस में किसी प्रकार का दोष अथवा किसी रचना से उसकी समानता का संशय हो। इसलिये कि संसार में जितनी भी गलत आस्थायें हैं सब की जड़ अल्लाह से संबन्धित कोई न कोई अशुद्ध और गलत विचार है जिस ने उस के लिये अवैध नाम का रूप धारण कर लिया है। आस्था का सुधार सर्व प्रथम है और अल्लाह को मात्र उन्हीं शुभनामों से याद किया जाये जो उस के लिये उचित हैं। (तर्जुमानुल कुर्जान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद)
- सहीह हदीस में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) दोनों ईद और जुमुआ में यह सूरह और सूरह ग़ाशिया पढ़ते थे। (सहीह मुस्लिमः 878)
सूरह अल-अला | Surah Al Ala in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى ﴾ 1 ﴿
सब बिहिसम रब्बिकल अ’अला
अपने सर्वोच्च प्रभु के नाम की पवित्रता का स्मरण करो।
الَّذِي خَلَقَ فَسَوَّىٰ ﴾ 2 ﴿
अल्लज़ी खलका फसव्वा
जिसने पैदा किया और ठीक-ठीक बनाया।
وَالَّذِي قَدَّرَ فَهَدَىٰ ﴾ 3 ﴿
वल्लज़ी क़द्दारा फ़-हदा
और जिसने अनुमान लगाकर निर्धारित किया, फिर सीधी राह दिखायी।
وَالَّذِي أَخْرَجَ الْمَرْعَىٰ ﴾ 4 ﴿
वल लज़ी अख़ रजल मरआ
और जिसने चारा उपजाया।[1] 1. (1-4) इन आयतों में जिस पालनहार ने अपने नाम की पवित्रता का वर्णन करने का आदेश दिया है उस का परिचय दिया गया है कि वह पालनहार है जिस ने सभी को पैदा किया, फिर उन को संतुलित किया, और उन के लिये एक विशेष प्रकार का अनुमान बनाया जिस की सीमा से नहीं निकल सकते, और उन के लिये उस कार्य को पूरा करने की राह दिखाई जिस के लिये उन्हें पैदा किया है।
فَجَعَلَهُ غُثَاءً أَحْوَىٰ ﴾ 5 ﴿
फजा अलहु गुसाअन अहवा
फिर उसे (सुखा कर) कूड़ा बना दिया।[1] 1. (4-5) इन आयतों में बताया गया है कि प्रत्येक कार्य अनुक्रम से धीरे धीरे होते हैं। धरती के पौधे धीरे धीरे गुंजान और हरे भरे होते हैं। ऐसे ही मानवीय योग्तायें भी धीरे धीरे पूरी होती हैं।
سَنُقْرِئُكَ فَلَا تَنسَىٰ ﴾ 6 ﴿
सनुक़ रिउका फला तन्सा
(हे नबी!) हम तुम्हें ऐसा पढ़ायेंगे कि भूलोगे नहीं।
إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ ۚ إِنَّهُ يَعْلَمُ الْجَهْرَ وَمَا يَخْفَىٰ ﴾ 7 ﴿
इल्ला माशा अल्लाह, इन्नहू यअ’लमुल जहरा वमा यख्फा
परन्तु, जिसे अल्लाह चाहे। निश्चय ही वह सभी खुली तथा छिपी बातों को जानता है।
وَنُيَسِّرُكَ لِلْيُسْرَىٰ ﴾ 8 ﴿
व नुयस्सिरुका लिल युसरा
और हम तुम्हें सरल मार्ग का साहस देंगे।[1] 1. (6-8) इन में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह निर्देश दिया गया है कि इस की चिन्ता न करें कि क़ुर्आन मुझे कैसे याद होगा, इसे याद कराना हमारा काम है, और इस का सुरक्षित रहना हमारी दया से होगा। और यह उस की दया और रक्षा है कि इस मानव संसार में किसी धार्मिक ग्रन्थ के संबंध में यह दावा नहीं किया जा सकता कि वह सुरक्षित है, यह गर्व केवल क़ुर्आन को ही प्राप्त है।
فَذَكِّرْ إِن نَّفَعَتِ الذِّكْرَىٰ ﴾ 9 ﴿
फ़ ज़क्किर इन् नफ़ा अतिज़ ज़िकरा
तो आप धर्म की शिक्षा देते रहें। अगर शिक्षा लाभदायक हो।
سَيَذَّكَّرُ مَن يَخْشَىٰ ﴾ 10 ﴿
सयज़ ज़क करू मै यख़शा
डरने वाला ही शिक्षा ग्रहण करेगा।
وَيَتَجَنَّبُهَا الْأَشْقَى ﴾ 11 ﴿
व यतजन्न बुहल अश्का
और दुर्भाग्य उससे दूर रहेगा।
الَّذِي يَصْلَى النَّارَ الْكُبْرَىٰ ﴾ 12 ﴿
अल्लज़ी यस्लन नारल कुबरा
जो भीषण अग्नि में जायेगा।
ثُمَّ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ ﴾ 13 ﴿
सुम्म ला यमूतु फ़ीहा वला यहया
फिर उसमें न मरेगा, न जीवित रहेगा।[1] 1. (9-13) इन में बताया गया है कि आप को मात्र इस का प्रचार प्रसार करना है। और इस की सरल राह यह है कि जो सुने और मानने को लिये तैयार हो उसे शिक्षा दी जाये। किसी के पीछे पड़ने की आवश्यक्ता नहीं है। जो हत्भागे हैं वही नहीं सुनेंगे और नरक की यातना के रूप में अपना दुष्परिणाम देखेंगे।
قَدْ أَفْلَحَ مَن تَزَكَّىٰ ﴾ 14 ﴿
क़द अफ्लहा मन तज़क्का
वह सफल हो गया, जिसने अपना शुध्दिकरण किया।
وَذَكَرَ اسْمَ رَبِّهِ فَصَلَّىٰ ﴾ 15 ﴿
व ज़करस्म रब्बिही फ़सल्ला
तथा अपने पालनहार के नाम का स्मरण किया और नमाज़ पढ़ी।[1] 1. (14-15) इन आयतों में कहा गया है कि सफलता मात्र उन के लिये है जो आस्था, स्वभाव तथा कर्म की पवित्रता को अपनायें, और नमाज़ अदा करते रहें।
بَلْ تُؤْثِرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا ﴾ 16 ﴿
बल तुअ’सिरूनल हयातद दुनिया
बल्कि तुम लोग तो सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हो।
وَالْآخِرَةُ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ﴾ 17 ﴿
वल आखिरतु खैरुव वअब्क़ा
जबकि आख़िरत का जीवन ही उत्त्म और स्थायी है।
إِنَّ هَٰذَا لَفِي الصُّحُفِ الْأُولَىٰ ﴾ 18 ﴿
इन्न हाज़ा लफ़िस सुहुफ़िल ऊला
यही बात, प्रथम ग्रन्थों में है।
صُحُفِ إِبْرَاهِيمَ وَمُوسَىٰ ﴾ 19 ﴿
सुहुफि इब्राहीमा व मूसा
(अर्थात) इब्राहीम तथा मूसा के ग्रन्थों में।[1] 1. (16-19) इन आयतों का भावार्थ यह है कि वास्तव में रोग यह है कि काफ़िरों को सांसारिक स्वार्थ के कारण नबी की बातें अच्छी नहीं लगतीं। जब कि परलोक ही स्थायी है। और यही सभी आदि ग्रन्थों की शिक्षा है।