सूरह बुरूज के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 22 आयतें हैं।
- इस की प्रथम आयतों में बुर्जी (राशि चक्र) वाले आकाश की शपथ ली गई है। जिस से इस का यह नाम रखा गया है। (1)
- आयत 1 से 3 तक प्रतिफल के दिन के होने का दावा किया गया है।
- आयत 4 से 11 तक उन को धमकी दी गई है जो मुसलमानों पर केवल इस लिये अत्याचार करते हैं कि वह एक अल्लाह पर ईमान लाये है। और जो इस अत्याचार के होते ईमान पर स्थित रहें उन्हें स्वर्ग की शुभसूचना दी गई है। फिर आयत 16 तक अत्याचारियों को सूचित किया गया है कि अल्लाह की पकड़ कड़ी है। साथ ही अल्लाह के उन गुणों का वर्णन किया गया है जिन से भय पैदा होता है और क्षमा मांगने की प्रेरणा मिलती है।
- आयत 17 से 20 तक अत्याचारियों की शिक्षाप्रद यातना की ओर संकेत है और यह चेताबनी है कि विरोधी आवाह के घेरे में है।
- अन्त में कुर्जीन को एक ऊँची पुस्तक बताया है जिस का स्रोत पवित्र तथा सुरक्षित है और जिस की कोई बात असत्य नहीं हो सकती।
1 यह सूरह मक्का के उस युग में उतरी जब मुसलमानों को घोर यातनायें दे कर इस्लाम से फेरने का प्रयास जोरों पर था। ऐसी परिस्थितियों में एक ओर तो मुसलमानों को दिलासा दिया जा रहा है, और दूसरी और काफिरों को सावधान किया जा रहा है। और इस के लिये “अस्हावे उखुदुद” (खाईयों बालों) की कथा का वर्णन किया जा रहा है।
दक्षिणी अरब में नजरान, जहाँ ईसाई रहते थे, को बड़ा महत्व प्राप्त था। यह एक व्यवसायिक केन्द्र था। तथा सामाजिक कारणों से जू-नवास यमन के यहूदी सम्राट ने उस पर आक्रमण कर दिया। और आग से भरे गड़ों में नर नारियों तथा बच्चों को फिकवा दिया जिस के बदले 525 ई० में हब्शा के ईसाईयों ने यमन पर अक्रमण कर के जू-नवास” तथा उस के हिम्यरी राज्य का अन्त कर दिया। इस की पुष्टि “गुराव” के शिला लेख से होती है जो वर्तमान में अवशेषज्ञों को मिला है। (तर्जुमानुल कुन)
सूरह अल-बुरूज | Surah Buruj in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْبُرُوجِ ﴾ 1 ﴿
वस समाइ ज़ातिल बुरूज
शपथ है बुर्जों वाले आकाश की!
وَالْيَوْمِ الْمَوْعُودِ ﴾ 2 ﴿
वल यौमिल मौऊद
शपश है उस दिन की, जिसका वचन दिया गया!
وَشَاهِدٍ وَمَشْهُودٍ ﴾ 3 ﴿
वशा हिदिव व मशहूद
शपथ है साक्षी की और जिसपर साक्ष्य देगा!
قُتِلَ أَصْحَابُ الْأُخْدُودِ ﴾ 4 ﴿
क़ुतिला अस हाबुल उख्दूद
खाईयों वालों का नाश हो गया![1] 1. (1-4) इन में तीन चीज़ों की शपथ ली गई है। (1) बुर्जों वाले आकाश की। (2) प्रलय की, जिस का वचन दिया गया है। (3) प्रलय के भ्यावह दृश्य की और उस पूरी उत्पत्ति की जो उसे देखेगी। प्रथम शपथ इस बात की गवाही दे रही है जो शक्ति इस आकास के ग्रहों पर राज कर रही है उस की पकड़ से यह तुच्छ इन्सान बच कर कहाँ जा सकता है? दूसरी शपथ इस बात पर है कि संसार में इन्सान जो अत्याचार करना चाहे कर ले, परन्तु वह दिन अवश्य आना है जिस से उसे सावधान किया जा रहा है, जिस में सब के साथ न्याय किया जायेगा, और अत्याचारियों की पकड़ की जायेगी। तीसरी शपथ इस पर है कि जैसे इन अत्याचारियों ने विवश आस्तिकों के जलने का दृश्य देखा, इसी प्रकार प्रलय के दिन पूरी मानव जाति देखेगी कि उन की क्या दुर्गत है।
النَّارِ ذَاتِ الْوَقُودِ ﴾ 5 ﴿
अन्नारि ज़ातिल वक़ूद
जिनमें भड़कते हुए ईंधन की अग्नि थी।
إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌ ﴾ 6 ﴿
इज़ हुम अलैहा क़ुऊद
जबकि वे उनपर बैठे हुए थे।
وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِالْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌ ﴾ 7 ﴿
वहुम अला मा यफ़ अलूना बिल मुअ’मिनीना शुहूद
और वे ईमान वालों के साथ जो कर रहे थे, उसे देख रहे थे।
وَمَا نَقَمُوا مِنْهُمْ إِلَّا أَن يُؤْمِنُوا بِاللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ ﴾ 8 ﴿
वमा नक़मू मिन्हुम इल्ला अय युअ’मिनू बिल लाहिल अज़ीज़िल हमीद
और उनका दोष केवल यही था कि वे प्रभावी प्रशंसा किये अल्लाह के प्रति विश्वास किये हुए थे।
الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ ﴾ 9 ﴿
अल्लज़ी लहू मुल्कुस सामावति वल अर्द, वल लाहु अला कुल्लि शैइन शहीद
जो आकाशों तथा धरती के राज्य का स्वामी है और अल्लाह सब कुछ देख रहा है।
إِنَّ الَّذِينَ فَتَنُوا الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ الْحَرِيقِ ﴾ 10 ﴿
इन्नल लज़ीना फ़-तनुल मुअ’मिनीन वल मुअ’मिनाति सुम्म लम यतूबू फ़ लहुम अज़ाबू जहान्नमा व लहुम अजाबुल हरीक़
जिन्होंने ईमान लाने वाले नर नारियों को परीक्षा में डाला, फिर क्षमा याचना न की, उनके लिए नरक का दण्ड तथा भड़कती आग की यातना है।
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۚ ذَٰلِكَ الْفَوْزُ الْكَبِيرُ ﴾ 11 ﴿
इन्नल लज़ीना आमनू व अमिलुस सलिहाति लहुम जन्नातुन तजरी मिन तहतिहल अन्हार, ज़ालिकल फौज़ुल कबीर
वास्तव में, जो ईमान लाये और सदाचार बने, उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनके तले नहरें बह रही हैं और यही बड़ी सफलता है।[1] 1. (5-11) इन आयतों में जो आस्तिक सताये गये उन के लिये सहायता का वचन तथा यदि वे अपने विश्वास (ईमान) पर स्थित रहे तो उन के लिये स्वर्ग की शुभ सूचना और अत्याचारियों के लिये नरक की धमकी है जिन्होंने उन को सताया और फिर अल्लाह से क्षमा याचना आदि कर के सत्य को नहीं माना।
إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ ﴾ 12 ﴿
इन्ना बत्शा रब्बिका ल-शदीद
निश्चय तेरे पालनहार की पकड़ बहुत कड़ी है।
إِنَّهُ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ ﴾ 13 ﴿
इन्नहू हुवा युब्दिउ व युईद
वही पहले पैदा करता है और फिर दूसरी बार पैदा करेगा।
وَهُوَ الْغَفُورُ الْوَدُودُ ﴾ 14 ﴿
व हुवल ग़फूरुल वदूद
और वह अति क्षमा तथा प्रेम करने वाला है।
ذُو الْعَرْشِ الْمَجِيدُ ﴾ 15 ﴿
जुल अरशिल मजीद
वह सिंहासन का महान स्वामी है।
فَعَّالٌ لِّمَا يُرِيدُ ﴾ 16 ﴿
फ़अ आलुल लिमा युरीद
वह जो चाहे करता है।[1] 1. (12-16) इन आयतों में बताया गया है कि अल्लाह की पकड़ के साथ ही जो क्षमा याचना कर के उस पर ईमान लाये, उस के लिये क्षमा और दया का द्वार खुला हुआ है। क़ुर्आन ने इस कुविचार का खण्डन किया है कि अल्लाह, पापों को क्षमा नहीं कर सकता। क्योंकि इस से संसार पापों से भर जायेगा और कोई स्वार्थी पापा कर के क्षमा याचना कर लेगा फिर पाप करेगा। यह कुविचार उस समय सह़ीह़ हो सकता है जब अल्लाह को एक इन्सान मान लिया जाये, जो यह न जानता हो कि जो व्यक्ति क्षमा माँग रहा है उस के मन में क्या है? अल्लाह तो मर्मज्ञ है, वह जानता है कि किस के मन में क्या है? फिर "तौबा" इस का नाम नहीं कि मुख से इस शब्द को बोल दिया जाये। तौबा (पश्चानुताप) मन से पाप न करने के प्रयत्न का नाम है और इसे अल्लाह तआला जानता है कि किसा के मन में क्या है?
هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْجُنُودِ ﴾ 17 ﴿
हल अताका हदीसुल जुनूद
हे नबी! क्या तुम्हें सेनाओं की सूचना मिली?
فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ ﴾ 18 ﴿
फ़िरऔना व समूद
फ़िरऔन तथा समूद को।[1] 1. (17-18) इन में अतीत की कुछ अत्याचारी जातियों की ओर संकेत है, जिन का सविस्तार वर्णन क़ुर्आन की अनेक सूरतों में आया है। जिन्होंने आस्तिकों पर अत्याचार किये जैसे मक्का के क़ुरैश मुसलमानों पर कर रहे थे। जब कि उन को पता था कि पिछली जातियों के साथ क्या हुआ। परन्तु वे अपने परिणाम से निश्चेत थे।
بَلِ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي تَكْذِيبٍ ﴾ 19 ﴿
बलिल लज़ीना कफ़रू फ़ी तकज़ीब
बल्कि काफ़िर (विश्वासहीन) झुठलाने में लगे हुए हैं।
وَاللَّهُ مِن وَرَائِهِم مُّحِيطٌ ﴾ 20 ﴿
वल लाहु मिव वराइहिम मुहीत
और अल्लाह उन्हें हर ओर से घेरे हुए है।[1] 1. (19-20) इन दो आयतों में उन के दुर्भाग्य को बताया जा रहा है जो अपने प्रभुत्व के गर्व में क़ुर्आन को नहीं मानते। जब कि उसे माने बिना कोई उपाय नहीं, और वह अल्लाह के अधिकार के भीतर ही हैं।
بَلْ هُوَ قُرْآنٌ مَّجِيدٌ ﴾ 21 ﴿
बल हुवा क़ुरआनुम मजीद
बल्कि, वह गौरव वाला क़ुर्आन है।
فِي لَوْحٍ مَّحْفُوظٍ ﴾ 22 ﴿
फ़ी लौहिम महफूज़
जो लेखपत्र (लौह़े मह़फ़ूज़) में सुरक्षित है।[1] 1. (21-22) इन आयतों में बताया गया है कि यह क़ुर्आन कविता और ज्योतिष नहीं है जैसा कि वह सोचते हैं, यह श्रेष्ठ और उच्चतम अल्लाह का कथन है जिस का उद्गम "लौह़े मह़फ़ूज़" में सुरक्षित है।