सूरह मुतफ्फिफीन के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 36 आयतें हैं।
- इस सूरह के आरंभ में ((मुतफ्फिफीन)) शब्द आया है। जिस का अर्थ हैः नापने-तौलने में कमी करने वाले, इसी से इस का नाम रखा गया है।
- आयत 1 से 6 तक में व्यवसायिक विषय में विश्वासघात को विनाशकारी कर्म बताया गया है।
- आयत 7 से 28 तक में बताया गया है कि कुकर्मियों के कर्म एक विशेष पंजी जिस का नाम ((सिज्जीन)) है, में लिखे हुये हैं और सदाचारियों के ((इल्लिय्यीन)) में, जिन के अनुसार उन का निर्णय किया जायेगा और दोनों का परिणाम बताया गया है।
- आयत 29 से अन्त तक ईमान वालों को दिलासा दी गई है कि विरोधियों के व्यंग से दुखी न हों आज वह तुम पर हँस रहे हैं कल तुम उन पर हँसोगे ।
सूरह अल-मुताफ्फिन | Surah Mutaffifin in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَيْلٌ لِّلْمُطَفِّفِينَ ﴾ 1 ﴿
वैलुल्-लिल्-मुतफ़्फ़िफीन
विनाश है डंडी मारने वालों का।
الَّذِينَ إِذَا اكْتَالُوا عَلَى النَّاسِ يَسْتَوْفُونَ ﴾ 2 ﴿
अल्लज़ी-न इज़क्तालू अलन्नासि यस्तौफून
जो लोगों से नाप कर लें, तो पूरा लेते हैं।
وَإِذَا كَالُوهُمْ أَو وَّزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَ ﴾ 3 ﴿
व इज़ा कालूहुम् अव्व-ज़नूहुम् युख़्सिरून
और जब उन्हें नाप या तोल कर देते हैं, तो कम देते हैं।
أَلَا يَظُنُّ أُولَٰئِكَ أَنَّهُم مَّبْعُوثُونَ ﴾ 4 ﴿
अला यजुन्नु उलाइ-क अन्नहुम् मब्अूसून
क्या वे नहीं सोचते कि फिर जीवित किये जायेंगे?
يَوْمَ يَقُومُ النَّاسُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 6 ﴿
यौ-म यकूमुन्नासु लिरब्बिल्-आ़लमीन
जिस दिन सभी, विश्व के पालनहार के सामने खड़े होंगे।[1] 1. (1-6) इस सूरह की प्रथम छः आयतों में इसी व्यवसायिक विश्वास घात पर पकड़ की गई है कि न्याय तो यह है कि अपने लिये अन्याय नहीं चाहते तो दूसरों के साथ न्याय करो। और इस रोग का निवारण अल्लाह के भय तथा परलोक पर विश्वास ही से हो सकता है। क्योंकि इस स्थिति में निक्षेप (अमानतदारी) एक नीति ही नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य होगा औ इस पर स्थित रहना लाभ तथा हानि पर निर्भर नहीं रहेगा।
كَلَّا إِنَّ كِتَابَ الْفُجَّارِ لَفِي سِجِّينٍ ﴾ 7 ﴿
कल्ला इन्-न किताबल्-फुज्जारि लफ़ी सिज्जी
कदापि ऐसा न करो, निश्चय बुरों का कर्म पत्र "सिज्जीन" में है।
وَمَا أَدْرَاكَ مَا سِجِّينٌ ﴾ 8 ﴿
व मा अद्रा-क मा सिज्जीन
और तुम क्या जानो कि "सिज्जीन" क्या है?
كِتَابٌ مَّرْقُومٌ ﴾ 9 ﴿
किताबुम्-मरकूम
वह लिखित महान पुस्तक है।
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴾ 10 ﴿
वैलुंय्यौमइज़िल्-लिल् मुकज़्ज़िबीन
उस दिन झुठलाने वालों के लिए विनाश है।
الَّذِينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ الدِّينِ ﴾ 11 ﴿
अल्लज़ी-न युकज़्ज़िबू-न बियौमिद्दीन
जो प्रतिकार (बदले) के दिन को झुठलाते हैं।
وَمَا يُكَذِّبُ بِهِ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ ﴾ 12 ﴿
व मा युकज़्ज़िबु बिही इल्ला कुल्लु मुअ्-तदिन् असीम
तथा उसे वही झुठलाता है, जो महा अत्याचारी और पापी है।
إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا قَالَ أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 13 ﴿
इज़ा तुत्ला अ़लैहि आयातुना का़-ल असातीरुल- अव्वलीन
जब उनके सामने हमारी आयतों का अध्ययन किया जाता है, तो कहते हैं: पूर्वजों की कल्पित कथायें हैं।
كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِم مَّا كَانُوا يَكْسِبُونَ ﴾ 14 ﴿
कल्ला बल्-रा-न अ़ला कुलूबिहिम्-मा कानू यक्सिबून
सुनो! उनके दिलों पर कुकर्मों के कारण लोहमल लग गया है।
كَلَّا إِنَّهُمْ عَن رَّبِّهِمْ يَوْمَئِذٍ لَّمَحْجُوبُونَ ﴾ 15 ﴿
कल्ला इन्नहुम् अर्रब्बिहिम् यौमइज़िल-लमह्जूबून
निश्चय वे उस दिन अपने पालनहार (के दर्शन) से रोक दिये जायेंगे।
ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُو الْجَحِيمِ ﴾ 16 ﴿
सुम्-म इन्नहुम् लसालुल-जहीम
फिर वे नरक में जायेंगे।
ثُمَّ يُقَالُ هَٰذَا الَّذِي كُنتُم بِهِ تُكَذِّبُونَ ﴾ 17 ﴿
सुम्म युका़लु हाज़ल्लज़ी कुन्तुम् बिही तुकज़्ज़िबून
फिर कहा जायेगा कि यही है, जिसे तुम मिथ्या मानते थे।[1] 1. (7-17) इन आयतों में कुकर्मियों के दुषपरिणाम का विवरण दिया गया है। तथा यह बताया गया है कि उन के कुकर्म पहले ही से अपराध पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं। तथा वे परलोक में कड़ी यातना का सामना करेंगे। और नरक में झोंक दिये जायेंगे। "सिज्जीन" से अभिप्राय, एक जगह है जहाँ पर काफ़िरों, अत्याचारियों और मुश्रिकों के कुकर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। दिलों का लोहमल, पापों की कालिमा को कहा गया है। पाप अन्तरात्मा को अन्धकार बना देते हैं तो सत्य को स्वीकार करने की स्वभाविक योग्यता खो देते हैं।
كَلَّا إِنَّ كِتَابَ الْأَبْرَارِ لَفِي عِلِّيِّينَ ﴾ 18 ﴿
कल्ला इन्-न किताबल्-अबरारि लफ़ी अिल्लिय्यीन
सच ये है कि सदाचारियों के कर्म पत्र "इल्लिय्यीन" में हैं।
وَمَا أَدْرَاكَ مَا عِلِّيُّونَ ﴾ 19 ﴿
व मा अद्रा-क मा अ़िल्लिय्यून
और तुम क्या जानो कि "इल्लिय्यीन" क्या है?
يَشْهَدُهُ الْمُقَرَّبُونَ ﴾ 21 ﴿
यश्-हदुहुल्-मुक़र्रबून
जिसके पास समीपवर्ती (फरिश्ते) उपस्थित रहते हैं।
إِنَّ الْأَبْرَارَ لَفِي نَعِيمٍ ﴾ 22 ﴿
इन्नल्-अब्रा-र लफ़ी नअ़ीम
निशचय, सदाचारी आनन्द में होंगे।
عَلَى الْأَرَائِكِ يَنظُرُونَ ﴾ 23 ﴿
अ़लल् अरा-इकि यन्जुरून
सिंहासनों के ऊपर बैठकर सब कुछ देख रहे होंगे।
﴾ تَعْرِفُ فِي وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ النَّعِيمِ ﴾ 24 ﴿
तअ्रिफु फ़ी वुजूहिहिम् नज्-रतन्-नअ़ीम
तुम उनके मुखों से आनंद के चिन्ह अनुभव करोगे।
يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍ مَّخْتُومٍ ﴾ 25 ﴿
युस्कौ-न मिर्रहीकिम्-मख़्तूम
उन्हें मुहर लगी शुध्द मदिरा पिलाई जायेगी।
خِتَامُهُ مِسْكٌ ۚ وَفِي ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ الْمُتَنَافِسُونَ ﴾ 26 ﴿
खितामुहू मिस्क, व फ़ी ज़ालि-क फ़ल्य-तनाफ़सिल – मु-तनाफ़िसून
ये मुहर कस्तूरी की होगी। तो इसकी अभिलाषा करने वालों को इसकी अभिलाषा करनी चाहिये।
وَمِزَاجُهُ مِن تَسْنِيمٍ ﴾ 27 ﴿
व मिज़ाजुहू मिन् तस्नीम
उसमें तसनीम मिली होगी।
عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا الْمُقَرَّبُونَ ﴾ 28 ﴿
अनंय्-यश्रबु बिहल-मुकर्रबून
वह एक स्रोत है, जिससे अल्लाह के समीपवर्ती पियेंगे।[1] 1. (18-28) इन आयतों में बताया गया है कि सदाचारियों के कर्म ऊँचे पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं जो फ़रिश्तों के पास सुरक्षित हैं। और वे स्वर्ग में सुख के साथ रहेंगे। "इल्लिय्यीन" से अभिप्राय, जन्नत में एक जगह है। जहाँ पर नेक लोगों के कर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। वहाँ पर समीपवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।
إِنَّ الَّذِينَ أَجْرَمُوا كَانُوا مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا يَضْحَكُونَ ﴾ 29 ﴿
इन्नल्लज़ी-न अज्रमू कानू मिनल्लज़ी-न आमनू यज्- हकून
पापी (संसार में) ईमान लाने वालों पर हंसते थे।
وَإِذَا مَرُّوا بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ ﴾ 30 ﴿
व इज़ा मररू बिहिम् य-तगा़-मजून
और जब उनके पास से गुज़रते, तो आँखें मिचकाते थे।
وَإِذَا انقَلَبُوا إِلَىٰ أَهْلِهِمُ انقَلَبُوا فَكِهِينَ ﴾ 31 ﴿
व इज़न्-क़-लबू इला अह़्लिहिमुन्क-लबू फ़किहीन
और जब अपने परिवार में वापस जाते, तो आनंद लेते हुए वापस होते थे।
وَإِذَا رَأَوْهُمْ قَالُوا إِنَّ هَٰؤُلَاءِ لَضَالُّونَ ﴾ 32 ﴿
व इज़ा रऔहुम् का़लू इन्-न हा-उला-इ लज़ाल्लून
और जब उन्हें (मोमिनों को) देखते, तो कहते थेः यही भटके हुए लोग हैं।
وَمَا أُرْسِلُوا عَلَيْهِمْ حَافِظِينَ ﴾ 33 ﴿
व मा उर्सिलू अ़लैहिम् हाफ़िज़ीन
जबकि वे उनके निरीक्षक बनाकर नहीं भेजे गये थे।
فَالْيَوْمَ الَّذِينَ آمَنُوا مِنَ الْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ ﴾ 34 ﴿
फल्यौ मल्लज़ी-न आमनू मिनल्-कुफ़्फारि यज़्हकून
तो जो ईमान लाये, आज काफ़िरों पर हंस रहे हैं।
عَلَى الْأَرَائِكِ يَنظُرُونَ ﴾ 35 ﴿
अ़लल्-अरा-इकि यन्जुरून
सिंहासनों के ऊपर से उन्हें देख रहे हैं।
هَلْ ثُوِّبَ الْكُفَّارُ مَا كَانُوا يَفْعَلُونَ ﴾ 36 ﴿
हल् सुव्विबल-कुफ़्फारु मा कानू यफ़अलून
क्या काफ़िरों (विश्वास हीनों) को उनका बदला दे दिया गया?[1] 1. (29-36) इन आयतों में बताया गया है कि परलोक में कर्मों का फल दिया जायेगा तो संसारिक परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। संसार में तो सब के लिये अल्लाह की दया है, परन्तु न्याय के दिन जो अपने सुख सुविधा पर गर्व करते थे और जिन निर्धन मुसलमानों को देख कर आँखें मारते थे, वहाँ पर वही उन के दुष्परिणाम को देख कर प्रसन्न होंगे। अंतिम आयत में विश्वास हीनों के दुष्परिणाम को उन का कर्म कहा गया है। जिस में यह संकेत है कि सुफल और कुफल स्वयं इन्सान के अपने कर्मों का स्वभाविक प्रभाव होगा।