सूरह अबस के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है. इस में 42 आयतें हैं।
- इस का आरंभ ((अब्सा )) शब्द से हुआ है जिस का अर्थ ((मुंह बसोरना)) है। इसी से इस सूरह का नाम रखा गया है।
- इस की आयत 1 से 10 तक में एक विशेष घटना की ओर संकेत कर के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ध्यान दिलाया गया है कि आप अभिमानियों तथा दुराग्रहियों के पीछे न पड़ें। उस पर ध्यान दें जो सत्य की खोज करता और अपना सुधार चाहता है।
- आयत 11 से 16 तक में कुर्बान की महिमा का वर्णन किया गया तथा बताया गया है कि जिस की ओर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बुला रहे है वह कितनी बड़ी चीज़ है। इस लिये जो इस का अपमान करेंगे वह स्वंय अपना ही बुरा करेंगे।
- आयत 17 से 23 तक में प्रलय के इन्कारियों को चेतावनी दी गई है। तथा फिर से जीवित किये जाने के प्रमाण अल्लाह के पालनहार होने से प्रस्तुत किये गये हैं।
1 यह सूरह मक्की है। भाष्य कारों ने इस के उतरने का कारण यह लिखा है कि एक बार ईशदूत (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मक्का के प्रमुखों को इस्लाम के विषय में समझा रहे थे कि एक अनुयायी अब्दुल्लाह बिन उम्मे मक्तूम (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने आ कर धार्मिक विषय में प्रश्न किया। आप उसे बुरा मान गये और मुँह फेर लिया। इस पर आप को साबधान किया गया कि धर्म में संसारिक मान मर्यादा का कोई महत्व नहीं, आप उसी पर प्रथम ध्यान दें जो सत्य को मानता तथा उस का पालन करता है। आप का दायित्व यह भी नहीं है कि किसी को सत्य मनवा दें। फिर कुरआन ऐसी चीज़ नहीं है जिसे विनय और खुशामद से प्रस्तुत किया जाये। बल्कि जो उस पर विचार करेगा तो स्वंय ही इस सत्य को पा लेगा। और जान लेगा कि जिस निराकार शक्ति ने सब कुछ किया है तो पूजा भी मात्र उसी की करें और उसी के कृतज्ञ हों। फिर यदि वह अपनी कृतध्नता पर अड़े रह गये तो एक दिन आयेगा जब यह मान मर्यादा और उन का कोई सहायक नहीं रह जायेगा और प्रत्येक के कर्मों का फल उस के सामने आ जायेगा। - अन्त में आयत 42 तक क्यामत का भ्यावह चित्र तथा सदाचारियों और दुराचारियों के अलग-अलग परिणाम बताये गये हैं।
सूरह अबसा | Surah Abasa in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
عَبَسَ وَتَوَلَّىٰ ﴾ 1 ﴿
अ़-ब-स व तवल्ला
(नबी ने) त्योरी चढ़ाई तथा मुँह फेर लिया।
أَن جَاءَهُ الْأَعْمَىٰ ﴾ 2 ﴿
अन् जा-अहुल् अअमा
इस कारण कि उसके पास एक अँधा आया।
وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُ يَزَّكَّىٰ ﴾ 3 ﴿
व मा युद्री-क ल अ़ल्लहू यज़्ज़क्का
और तुम क्या जानो शायद वह पवित्रता प्राप्त करे।
أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنفَعَهُ الذِّكْرَىٰ ﴾ 4 ﴿
औ यज़्ज़क्करु फ़-तन्फ़-अ़हुज़्ज़िक्रा
या नसीह़त ग्रहण करे, जो उसे लाभ देती।
أَمَّا مَنِ اسْتَغْنَىٰ ﴾ 5 ﴿
अम्मा मनिस्तग्ना
परन्तु, जो विमुख (निश्चिन्त) है।
فَأَنتَ لَهُ تَصَدَّىٰ ﴾ 6 ﴿
फ़-अन्-त लहू तसद्दा
तुम उनकी ओर ध्यान दे रहे हो।
وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ ﴾ 7 ﴿
व मा अ़लै-क अ़ल्ला यज़्ज़क्का
जबकि तुमपर कोई दोष नहीं, यदि वह पवित्रता ग्रहण न करे।
وَأَمَّا مَن جَاءَكَ يَسْعَىٰ ﴾ 8 ﴿
व अम्मा मन् जा-अ-क यसआ़
तथा जो तुम्हारे पास दौड़ता आया।
فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ ﴾ 10 ﴿
फ़-अन्-त अ़न्हु त-लह्हा
तुम उसकी ओर ध्यान नहीं देते।[1] 1. (1-10) भावार्थ यह है कि सत्य के प्रचारक का यह कर्तव्य है कि जो सत्य की खोज में हो भले ही वह दरिद्र हो उसी के सुधार पर ध्यान दे। और जो अभिमान के कारण सत्य की परवाह नहीं करते उन के पीछे समय न गवायें। आप का यह दायित्व भी नहीं है कि उन्हें अपनी बात मनवा दें।
كَلَّا إِنَّهَا تَذْكِرَةٌ ﴾ 11 ﴿
कल्ला इन्नहा तज्कि-रतुन्
कदापि ये न करो, ये (अर्थात क़ुर्आन) एक स्मृति (याद दहानी) है।
فَمَن شَاءَ ذَكَرَهُ ﴾ 12 ﴿
फ़-मन् शा-अज़-करह्
अतः, जो चाहे स्मरण (याद) करे।
فِي صُحُفٍ مُّكَرَّمَةٍ ﴾ 13 ﴿
फ़ी सुहुफ़िम्-मुकर्र-मतिम्
माननीय शास्त्रों में है।
مَّرْفُوعَةٍ مُّطَهَّرَةٍ ﴾ 14 ﴿
मरफू-अ़तिम् मुतह्ह-रतिम्
जो ऊँचे तथा पवित्र हैं।
بِأَيْدِي سَفَرَةٍ ﴾ 15 ﴿
बिऐदी स-फ़-रतिन्
ऐसे लेखकों (फ़रिश्तों) के हाथों में है।
كِرَامٍ بَرَرَةٍ ﴾ 16 ﴿
किरामिम् ब-र-रह्
जो सम्मानित और आदरणीय हैं।[1] 1. (11-16) इन में क़ुर्आन की महानता को बताया गया है कि यह एक स्मृति (याद दहानी) है। किसी पर थोपने के लिये नहीं आया है। बल्कि वह तो फ़रिश्तों के हाथों में स्वर्ग में एक पवित्र शास्त्र के अन्दर सूरक्षित है। और वहीं से वह (क़ुर्आन) इस संसार में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा जा रहा है।
قُتِلَ الْإِنسَانُ مَا أَكْفَرَهُ ﴾ 17 ﴿
कुतिलल्-इन्सानु मा अक्-फ़रह्
इन्सान मारा जाये, वह कितना कृतघ्न (नाशुक्रा) है।
مِنْ أَيِّ شَيْءٍ خَلَقَهُ ﴾ 18 ﴿
मिन् अय्यि शैइन् ख़-लक़ह्
उसे किस वस्तु से (अल्लाह) ने पैदा किया?
مِن نُّطْفَةٍ خَلَقَهُ فَقَدَّرَهُ ﴾ 19 ﴿
मिन् नुत्फ़तिन् , ख़-ल-क़हू फ़-क़द्द-रहू
उसे वीर्य से पैदा किया, फिर उसका भाग्य बनाया।
ثُمَّ السَّبِيلَ يَسَّرَهُ ﴾ 20 ﴿
सुम्मस्सबी-ल यस्स-रहू
फिर उसके लिए मार्ग सरल किया।
ثُمَّ أَمَاتَهُ فَأَقْبَرَهُ ﴾ 21 ﴿
सुम्-म अमातहू फ़-अक़्ब-रहू
फिर मौत दी, फिर समाधि में डाल दिया।
ثُمَّ إِذَا شَاءَ أَنشَرَهُ ﴾ 22 ﴿
सुम्-म इज़ा शा-अ अन्श-रह्
फिर जब चाहेगा, उसे जीवित कर लेगा।
كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَا أَمَرَهُ ﴾ 23 ﴿
कल्ला लम्मा यक्ज़ि मा अ-मरह्
वस्तुतः, उसने उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया।[1] 1. (17-23) तक विश्वासहीनों पर धिक्कार है कि यदि वह अपने अस्तित्व पर विचार करें कि हम ने कितनी तुच्छ वीर्य की बूँद से उस की रचना की तथा अपनी दया से उसे चेतना और समझ दी। परन्तु इन सब उपकारों को भूल कर कृतघ्न बना हुआ है, और पूजा उपासना अन्य की करता है।
فَلْيَنظُرِ الْإِنسَانُ إِلَىٰ طَعَامِهِ ﴾ 24 ﴿
फ़ल्यन्जुरिल्-इन्सानु इला ताआ़मिही
इन्सान अपने भोजन की ओर ध्यान दे।
أَنَّا صَبَبْنَا الْمَاءَ صَبًّا ﴾ 25 ﴿
अन्ना स-बब्नल्-मा-अ सब्बा
हमने मूसलाधार वर्षा की।
ثُمَّ شَقَقْنَا الْأَرْضَ شَقًّا ﴾ 26 ﴿
सुम्-म शक़फ़्नल्-अर-ज़ शक़्का़
फिर धरती को चीरा फाड़ा।
فَأَنبَتْنَا فِيهَا حَبًّا ﴾ 27 ﴿
फ़-अम्बत्ना फ़ीहा हब्बंव्
फिर उससे अन्न उगाया।
وَعِنَبًا وَقَضْبًا ﴾ 28 ﴿
व अि-नबंव्-व क़ज़्बंव
तथा अंगूर और तरकारियाँ।
وَزَيْتُونًا وَنَخْلًا ﴾ 29 ﴿
व जैतूनंव्-व नख़्लंव्
तथा ज़ैतून एवं खजूर।
وَفَاكِهَةً وَأَبًّا ﴾ 31 ﴿
व फ़ाकि-हतंव्-व अब्बम्
एवं फल तथा वनस्पतियाँ।
مَّتَاعًا لَّكُمْ وَلِأَنْعَامِكُمْ ﴾ 32 ﴿
मताअ़ल्-लकुम् व लि-अन्आ़मिकुम्
तुम्हारे तथा तुम्हारे पशुओं के लिए।[1] 1. (24-32) इन आयतों में इन्सान के जीवन साधनों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अल्लाह की अपार दया की परिचायक हैं। अतः जब सारी व्यवस्था वही करता है तो फिर उस के इन उपकारों पर इन्सान के लिये उचित था कि उसी की बात माने और उसी के आदेशों का पालन करे जो क़ुर्आन के माध्यम से अन्तिम नबी मूह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म) द्वारा परस्तुत किया जा रहा है। (दावतुल क़ुर्आन)
فَإِذَا جَاءَتِ الصَّاخَّةُ ﴾ 33 ﴿
फ़-इज़ा जा-अतिस्साख़्ख़हू
तो जब कान फाड़ देने वाली (प्रलय) आ जायेगी।
يَوْمَ يَفِرُّ الْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ ﴾ 34 ﴿
यौ-म यफ़िर्रुल्-मरउ मिन् अख़ीहि
उस दिन इन्सान अपने भाई से भागेगा।
وَأُمِّهِ وَأَبِيهِ ﴾ 35 ﴿
व उम्मिही व अबीहि
तथा अपने माता और पिता से।
وَصَاحِبَتِهِ وَبَنِيهِ ﴾ 36 ﴿
व साहि-बतिही व बनीह्
एवं अपनी पत्नी तथा अपने पुत्रों से।
لِكُلِّ امْرِئٍ مِّنْهُمْ يَوْمَئِذٍ شَأْنٌ يُغْنِيهِ ﴾ 37 ﴿
लि-कुल्लिम्-रिइम् मिन्हुम् यौमइज़िन् शअनुंय्-युग्नीह
प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन अपनी पड़ी होगी।
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ مُّسْفِرَةٌ ﴾ 38 ﴿
वुजूहुंय्-यौमइज़िम् मुस्फ़ि-रतुन्
उस दिन बहुत से चेहरे उज्ज्वल होंगे।
ضَاحِكَةٌ مُّسْتَبْشِرَةٌ ﴾ 39 ﴿
ज़ाहि-कतुम् मुस्तब्शि-रतुन्
हंसते एवं प्रसन्न होंगे।
وَوُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌ ﴾ 40 ﴿
व वुजूहुंय् यौमइज़िन् अ़लैहा ग़-ब-रतुन्
तथा बहुत-से चेहरों पर धूल पड़ी होगी।
تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ ﴾ 41 ﴿
तर्-हकुहा क़-तरह्
उनपर कालिमा छाई होगी।
أُولَٰئِكَ هُمُ الْكَفَرَةُ الْفَجَرَةُ ﴾ 42 ﴿
उलाइ-क हुमुल्क-फ़-रतुल् फ़-जरह्
वही काफ़िर और कुकर्मी लोग हैं।[1] 1. (33-42) इन आयतों का भावार्थ यह है कि संसार में किसी पर कोई आपदा आती है तो उस के अपने लोग उस की सहायता और रक्षा करते हैं। परन्तु प्रलय के दिन सब को अपनी अपनी पड़ी होगी और उस के कर्म ही उस की रक्षा करेंगे।