सूरह मुज़्ज़म्मिल के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 20 आयतें है।
- इस सूरह के आरंभ में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अल मुज़्ज़म्मिल (चादर ओढ़ने वाला) कह कर संबोधित किया गया है। जो इस सूरह का यह नाम रखे जाने का कारण है।
- इस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को रात्री में नमाज़ पढ़ने का निर्देश दिया गया है। और इस का लाभ बताया गया है। और विरोधियों की बातों को सहन करने और उन के परिणाम को बताया गया है।
- मक्का के काफिरों को सावधान किया गया है कि जैसे फिरऔन की ओर हम ने रसूल भेजा वैसे ही तुम्हारी ओर रसूल भेजा है। तो उस का जो दुष्परिणाम हुआ उस से शिक्षा लो अन्यथा कुफ़ कर के परलोक की यातना से कैसे बच सकोगे?
- और इस सूरह के अन्त में, रात्री में नमाज़ का जो आदेश दिया गया था, उसे सरल कर दिया गया। इसी प्रकार लस में फर्ज़ (अनिवार्य) नमाज़ों के पालन तथा ज़कात देने के आदेश दिये गये हैं।
सूरह मुजम्मिल हिंदी में | Surah Muzzammil in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
يَا أَيُّهَا الْمُزَّمِّلُ ﴾ 1 ﴿
या अय्युहल मुज़ ज़ममिल
हे चादर ओढ़ने वाले!
قُمِ اللَّيْلَ إِلَّا قَلِيلًا ﴾ 2 ﴿
क़ुमिल लैला इल्ला क़लीला
खड़े रहो (नमाज़ में) रात्रि के समय, परन्तु कुछ[1] समय। 1. ह़दीस में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रात में इतनी नमाज़ पढ़ते थे कि आप के पैर सूज जाते थे। आप से कहा गयाः ऐसा क्यों करते हैं? जब कि अल्लाह ने आप के पहले और पिछले गुनाह क्षमा कर दिये हैं? आप ने कहाः क्या मैं उस का कृतज्ञ भक्त न बनूँ? (बुख़ारीः 1130, मुस्लिमः 2819)
نِّصْفَهُ أَوِ انقُصْ مِنْهُ قَلِيلًا ﴾ 3 ﴿
निस्फहू अविन क़ुस मिन्हु क़लीला
(अर्थात) आधी रात अथवा उससे कुछ कम।
أَوْ زِدْ عَلَيْهِ وَرَتِّلِ الْقُرْآنَ تَرْتِيلًا ﴾ 4 ﴿
अव्ज़िद अलैहि वरत तिलिल कुरआन तरतीला
या उससे कुछ अधिक और पढ़ो क़ुर्आन रुक-रुक कर।
إِنَّا سَنُلْقِي عَلَيْكَ قَوْلًا ثَقِيلًا ﴾ 5 ﴿
इन्ना सनुल्की अलैका कौलन सक़ीला
हम उतारेंगे (हे नबी!) आप पर एक भारी बात (क़ुर्आन)।
إِنَّ نَاشِئَةَ اللَّيْلِ هِيَ أَشَدُّ وَطْئًا وَأَقْوَمُ قِيلًا ﴾ 6 ﴿
इन्न नाशिअतल लैलि हिया अशद्दु वत अव वअक्वमु कीला
वास्तव में, रात में जो इबादत होती है, वह अधिक प्रभावी है (मन को) एकाग्र करने में तथा अधिक उचित है बात प्रार्थना के लिए।
إِنَّ لَكَ فِي النَّهَارِ سَبْحًا طَوِيلًا ﴾ 7 ﴿
इन्ना लका फिन नहारि सबहन तवीला
आपके लिए दिन में बहुत-से कार्य हैं।
وَاذْكُرِ اسْمَ رَبِّكَ وَتَبَتَّلْ إِلَيْهِ تَبْتِيلًا ﴾ 8 ﴿
वज कुरिस्मा रब्बिका व तबत तल इलैहि तब्तीला
और स्मरण (याद) करें अपने पालनहार के नाम की और सबसे अलग होकर उसी के हो जायें।
رَّبُّ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ فَاتَّخِذْهُ وَكِيلًا ﴾ 9 ﴿
रब्बुल मशरिकि वल मगरिबि ला इलाहा इल्ला हुवा फत तखिज्हू वकीला
वह पूर्व तथा पश्चिम का पालनहार है। नहीं है कोई पूज्य (वंदनीय) उसके सिवा, अतः, उसी को अपना करता-धरता बना लें।
وَاصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَاهْجُرْهُمْ هَجْرًا جَمِيلًا ﴾ 10 ﴿
वसबिर अला मा यकूलूना वह्जुर हुम हजरन जमीला
और सहन करें उन बातों को, जो वे बना रहे हैं[1] और अलग हो जायें उनसे सुशीलता के साथ। 1. अर्थात आप के तथा सत्धर्म के विरुध्द।
وَذَرْنِي وَالْمُكَذِّبِينَ أُولِي النَّعْمَةِ وَمَهِّلْهُمْ قَلِيلًا ﴾ 11 ﴿
वज़रनी वल मुकज्ज़िबीना उलिन नअ,मति वमह हिल्हुम क़लीला
तथा छोड़ दें मुझे तथा झुठलाने वाले सुखी (सम्पन्न) लोगों को और उन्हें अवसर दें कुछ देर।
إِنَّ لَدَيْنَا أَنكَالًا وَجَحِيمًا ﴾ 12 ﴿
इन्ना लदैना अन्कालव वजहीमा
वस्तुतः, हमारे पास (उनके लिए) बहुत-सी बेड़ियाँ तथा दहकती अग्नि है।
وَطَعَامًا ذَا غُصَّةٍ وَعَذَابًا أَلِيمًا ﴾ 13 ﴿
व तआमन ज़ा गुस्सतिव व अज़ाबन अलीमा
और भोजन, जो गले में फंस जाये और दुःखदायी यातना है।
يَوْمَ تَرْجُفُ الْأَرْضُ وَالْجِبَالُ وَكَانَتِ الْجِبَالُ كَثِيبًا مَّهِيلًا ﴾ 14 ﴿
यौमा तरजुफुल अरजु वल जिबालु व कानतिल जिबालु कसीबम महीला
जिस दिन काँपेगी धरती और पर्वत तथा हो जायेंगे पर्वत, भुरभुरे रेत के ढेर।
إِنَّا أَرْسَلْنَا إِلَيْكُمْ رَسُولًا شَاهِدًا عَلَيْكُمْ كَمَا أَرْسَلْنَا إِلَىٰ فِرْعَوْنَ رَسُولًا ﴾ 15 ﴿
इन्ना अरसलना इलैकुम रसूला शाहिदन अलैकुम कमा अरसलना इला फ़िरऔना रसूला
हमने भेजा है तुम्हारी ओर एक रसूल[1] तुमपर गवाह (साक्षी) बनाकर, जैसे फ़िरऔन की ओर एक रसूल (मूसा) को। 1. अर्थात मूह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को। गवाह होने के अर्थ के लिये देखियेः सूरह बक़रह, आयतः 143, तथा सूरह ह़ज्ज, आयतः 78। इस में चेतावनी है कि यदि तुमने अवैज्ञा की तो तुम्हारी दशा भी फ़िरऔन जैसी होगी।
فَعَصَىٰ فِرْعَوْنُ الرَّسُولَ فَأَخَذْنَاهُ أَخْذًا وَبِيلًا ﴾ 16 ﴿
फ़असा फ़िरऔनुर रसूला फ़अख्ज्नाहू अख्ज़व वबीला
तो अवज्ञा की फ़िरऔन ने उस रसूल की और हमने पकड़ लिया उसे कड़ी पकड़।
فَكَيْفَ تَتَّقُونَ إِن كَفَرْتُمْ يَوْمًا يَجْعَلُ الْوِلْدَانَ شِيبًا ﴾ 17 ﴿
फ़कैफ़ा तत तकूना इन कफरतुम यौमय यजअलुल विल्दाना शीबा
तो कैसे बचोगे, यदि कुफ़्र किया तुमने उस दिन से, जो बना देगा बच्चों को (शोक के कारण) बूढ़ा?
السَّمَاءُ مُنفَطِرٌ بِهِ ۚ كَانَ وَعْدُهُ مَفْعُولًا ﴾ 18 ﴿
अस समाउ मुन्फतिरुम बिह कान वअदुहू मफ़ऊला
आकाश फट जायेगा उस दिन। उसका वचन पूरा होकर रहेगा।
إِنَّ هَٰذِهِ تَذْكِرَةٌ ۖ فَمَن شَاءَ اتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِ سَبِيلًا ﴾ 19 ﴿
इन्ना हाज़िही तज्किरह फ़मन शाअत तखज़ा इला रब्बिही सबीला
वास्तव में, ये (आयतें) एक शिक्षा हैं। तो जो चाहे, अपने पालनहार की ओर राह बना ले।[1] 1. अर्थात इन आयतों का पालन कर के अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त कर ले।
إِنَّ رَبَّكَ يَعْلَمُ أَنَّكَ تَقُومُ أَدْنَىٰ مِن ثُلُثَيِ اللَّيْلِ وَنِصْفَهُ وَثُلُثَهُ وَطَائِفَةٌ مِّنَ الَّذِينَ مَعَكَ ۚ وَاللَّهُ يُقَدِّرُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ ۚ عَلِمَ أَن لَّن تُحْصُوهُ فَتَابَ عَلَيْكُمْ ۖ فَاقْرَءُوا مَا تَيَسَّرَ مِنَ الْقُرْآنِ ۚ عَلِمَ أَن سَيَكُونُ مِنكُم مَّرْضَىٰ ۙ وَآخَرُونَ يَضْرِبُونَ فِي الْأَرْضِ يَبْتَغُونَ مِن فَضْلِ اللَّهِ ۙ وَآخَرُونَ يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۖ فَاقْرَءُوا مَا تَيَسَّرَ مِنْهُ ۚ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَقْرِضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِندَ اللَّهِ هُوَ خَيْرًا وَأَعْظَمَ أَجْرًا ۚ وَاسْتَغْفِرُوا اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴾ 20 ﴿
इन्ना रब्बका यअलमु अन्नका तकूमु अदना मिन सुलुसयिल लैलि व निस्फहू व सुलुसहू व ताइफतुम मिनल लज़ीना मअक वल्लाहु युक़द्दिरुल लैला वन नहार अलिमा अल लन तुह्सूहू फताबा अलैकुम फकरऊ मा तयस सरा मिनल कुरआन अलिमा अन सयकूनु मिन्कुम मरजा व आखरूना यजरिबूना फ़िल अरज़ि यब्तगूना मिन फजलिल लाहि व आख़रूना युकातिलूना फ़ी सबीलिल लाहि फकरऊ मा तयस सरा मिनहु व अक़ीमुस सलाता व आतुज़ ज़काता व अकरिजुल लाहा करजन हसना वमा तुक़ददिमू लि अन्फुसिकुम मिन खैरिन तजिदूहू इन्दल लाहि हुवा खैरव व अ’अज़मा अजरा वस ताग्फिरुल लाह इन्नल लाहा गफूरुर रहीम
निःसंदेह, आपका पालनहार जानता है कि आप खड़े होते हैं (तहुज्जुद की नमाज़ के लिए) दो तिहाई रात्रि के लग-भग तथा आधी रात और तिहाई रात तथा एक समूह उन लोगों का, जो आपके साथ हैं और अल्लाह ही ह़िसाब रखता है रात तथा दिन का। वह जानता है कि तुम पूरी रात नमाज़ के लिए खड़े नहीं हो सकोगे, अतः, उसने दया कर दी तुमपर। तो पढ़ो जितना सरल हो क़ुर्आन में से।[1] वह जानता है कि तुममें कुछ रोगी होंगे और कुछ दुसरे यात्रा करेंगे धरती में खोज करते हुए अल्लाह के अनुग्रह (जीविका) की और कुछ दूसरे युध्द करेंगे अल्लाह की राह में, अतः, पढ़ो जितना सरल हो उसमें से तथा स्थापना करो नमाज़ की, ज़कात देते रहो और ऋण दो अल्लाह को अच्छा ऋण[2] तथा जो भी आगे भेजोगे भलाई में से, तो उसे अल्लाह के पास पाओगे। वही उत्तम और उसका बहुत बड़ा प्रतिफल होगा और क्षमा माँगते रहो अल्लाह से, वास्तव में वह अति क्षमाशील, दयावान् है। 1. क़ुर्आन पढ़ने से अभिप्राय तहज्जुद की नमाज़ है। और अर्थ यह है कि रात्रि में जितनी नमाज़ हो सके पढ़ लो। ह़दीस में है कि भक्त अल्लाह के सब से समीप अन्तिम रात्रि में होता है। तो तुम यदि हो सके कि उस समय अल्लाह को याद करो तो याद करो। (तिर्मिज़ीः 3579, यह ह़दीस सह़ीह़ है।) 2. अच्छे ऋण से अभिप्राय अपने उचित साधन से अर्जित किये हुये धन को अल्लाह की प्रसन्नता के लिये उस के मार्ग में ख़र्च करना है। इसी को अल्लाह अपने ऊपर ऋण क़रार देता है। जिस का बदला वह सात सौ गुना तक बल्कि उस से भी अधिक प्रदान करेगा। (देखियेः सूरह बक़रा, आयतः 261)