सूरह दुखान के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 59 आयतें हैं।
- इस की आयत 10 में आकाश से दुखान (धुवें) के निकलने की चर्चा है इसलिये इस का नाम सूरह दुखान है।
- इस की आरंभिक आयतों में कुन का महत्व बताया गया है। फिर आयत 7-8 में कुन उतारने वाले का परिचय कराया गया है।
- आयत 9 से 33 तक फिरऔन की जाति के विनाश और बनी इस्राईल की सफलता को एक ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है कि रसूल के विरोधियों का दुष्परिणाम कैसा हुआ। और उन के अनुयायी किस प्रकार सफल हुये ।
- आयत 34 से 57 तक दूसरे जीवन के इन्कार तथा उस का विश्वास कर के जीवन व्यतीत करने का अलग-अलग फल बताया गया है जो प्रलय के दिन सामने आयेगा।
- अन्तिम आयतों में उन को सावधान किया गया है जो कुन का आदर नहीं करते। अर्थात इस सूरह के आरंभिक विषय ही में इस का अन्त भी किया गया है।
- हदीस में है कि जब मक्कावासियों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कड़ा विरोध किया तो आप ने अल्लाह से दुआ की, कि यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के अकाल के समान इन पर भी सात वर्ष का अकाल भेज दे। और फिर उन पर ऐसा अकाल आया कि प्रत्येक चीज़ का नाश कर दिया गया। और वह मुर्दार खाने पर बाध्य हो गये । और यह दशा हो गयी कि जब वह आकाश की ओर देखते तो भूक के कारण धूवाँ जैसा दिखाई देता था। (देखियेः सहीह बुखारीः 4823, 4824)
सूरह अद-दुखान | Surah Dukhan in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ ﴾ 2 ﴿
वल्-किताबिल् – मुबीन
शपथ है इस खुली पुस्तक की।
إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُّبَارَكَةٍ ۚ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ ﴾ 3 ﴿
इन्ना अन्ज़ल्नाहु फ़ी लै – लतिम् मुबा – र कतिन् इन्ना कुन्ना मुन्ज़िरीन
हमने ही उतारा है इसे[1] एक शुभ रात्रि में। वास्तव में, हम सावधान करने वाले हैं। 1. शुभ रात्रि से अभिप्राय “लैलतुल क़द्र” है। यह रमज़ान के महीने के अन्तिम दशक की एक विषम रात्रि होती है। यहाँ आगे बताया जा रहा है कि इसी रात्रि में पूरे वर्ष होने वाले विषय का निर्णय किया जाता है। इस शुभ रात की विशेषता तथा प्रधानता के लिये सूरह क़द्र देखिये। इसी शुभ रात्रि में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर क़ुर्आन उतरने का आरंभ हुआ। फिर 23 वर्षों तक आवश्यक्तानुसार विभिन्न समय में उतरता रहा। (देखियेः सूरह बक़रह, आयत संख्याः 185)
فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ ﴾ 4 ﴿
फ़ीहा यफ़रक़ु कुल्लु अम्रिन् हकीम
उसी (रात्रि) में निर्णय किया जाता है, प्रत्येक सुदृढ़ कर्म का।
أَمْرًا مِّنْ عِندِنَا ۚ إِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ ﴾ 5 ﴿
अम्रम् मिन् अिन्दिना, इन्ना कुन्ना मुर्सिलीन
ये (आदेश) हमारे पास से है। हम ही भेजने वाले हैं, रसूलों को।
رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ ﴾ 6 ﴿
रह्म-तम् मिर्रब्बि-क इन्नहू हुवस्समी अुल्- अ़लीम
आपके पालनहार की दया से, वास्तव में, वह सब कुछ सुनने-जानने वाला है।
رَبِّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ ﴾ 7 ﴿
रब्बिस्समावाति वल्अर्ज़ि व मा बैनहुमा इन् कुन्तुम् मूक़िनीन
जो आकाशों तथा धरती का पालनहार है तथा जो कुछ उन दोनों के बीच है, यदि तुम विश्वास करने वाले हो।
لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ رَبُّكُمْ وَرَبُّ آبَائِكُمُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 8 ﴿
ला इला-ह इल्ला हु-व युह्यी व युमीतु, रब्बुकुम् व रब्बु आबा-इकुमुल्-अव्वलीन
नहीं है कोई वंदनीय, परन्तु वही, जो जीवन देता तथा मारता है। तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे गुज़रे हुए पूर्वजों का पालनहार है।
بَلْ هُمْ فِي شَكٍّ يَلْعَبُونَ ﴾ 9 ﴿
बल् हुम् फ़ी शक्किंय्-यल्-अ़बून
बल्कि, वे (मुश्रिक) संदेह में खेल रहे हैं।
فَارْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِي السَّمَاءُ بِدُخَانٍ مُّبِينٍ ﴾ 10 ﴿
फ़र्तकिब् यौ-म तअ्तिस्समा-उ बिदुख़ानिम् – मुबीन
तो आप प्रतीक्षा करें, उस दिन का, जब आकाश खुला धूँवा[1] लायेगा। 1. इस प्रत्यक्ष धुवें तथा दुःखदायी यातना की व्याख्या सह़ीह़ ह़दीस में यह आयी है कि जब मक्कावासियों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कड़ा विरोध किया तो आप ने यह शाप दिया कि हे अल्लाह! उन पर सात वर्ष का अकाल भेज दे। और जब अकाल आया तो भूक के कारण उन्हें धुवाँ जैसा दिखायी देने लगा। तब उन्हों ने आप से कहा कि आप अल्लाह से प्रार्थना कर दें। वह हम से अकाल दूर कर देगा तो हम ईमान ले आयेंगे। और जब अकाल दूर हुआ तो फिर अपनी स्थिति पर आ गये। फिर अल्लाह ने बद्र के युध्द के दिन उन से बदला लिया। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4821, तथा सह़ीह़ मुस्लिमः2798)
يَغْشَى النَّاسَ ۖ هَٰذَا عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴾ 11 ﴿
यग़्शन्ना-स, हाज़ा अ़ज़ाबुन् अलीम
जो छा जायेगा सब लोगों पर। यही दुःखदायी यातना है।
رَّبَّنَا اكْشِفْ عَنَّا الْعَذَابَ إِنَّا مُؤْمِنُونَ ﴾ 12 ﴿
रब्बनक्शिफ़् अ़न्नल्-अ़ज़ा-ब इन्ना मुअ्मिनून
(वे कहेंगेः) हमारे पालनहार! हमसे यातना दूर कर दे। निश्चय हम ईमान लाने वाले हैं।
أَنَّىٰ لَهُمُ الذِّكْرَىٰ وَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مُّبِينٌ ﴾ 13 ﴿
अन्ना लहुमुज़्ज़िक्-रा व क़द् जा- अहुम् रसूलुम् – मुबीन
और उनके लिए शिक्षा का समय कहाँ रह गया? जबकि उनके पास आ गये एक रसूल (सत्य को) उजागर करने वाले।
ثُمَّ تَوَلَّوْا عَنْهُ وَقَالُوا مُعَلَّمٌ مَّجْنُونٌ ﴾ 14 ﴿
सुम्-म तवल्लौ अ़न्हु व क़ालू मु- अ़ल्लमुम् – मज्नून
फिर भी वे आपसे मुँह फेर गये तथा कह दिया कि एक सिखाया हुआ पागल है।
إِنَّا كَاشِفُو الْعَذَابِ قَلِيلًا ۚ إِنَّكُمْ عَائِدُونَ ﴾ 15 ﴿
इन्ना काशिफ़ुल्-अ़ज़ाबि क़लीलन् इन्नकुम् आ़-इदून
हम दूर कर देने वाले हैं कुछ यातना, वास्तव में तुम, फिर अपनी प्रथम स्थिति पर आ जाने वाले हो।
يَوْمَ نَبْطِشُ الْبَطْشَةَ الْكُبْرَىٰ إِنَّا مُنتَقِمُونَ ﴾ 16 ﴿
यौ-म नब्तिशुल् बत्-शतल-कुब्रा इन्ना मुन्तक़िमून
जिस दिन हम अत्यंत कड़ी पकड़[1] में ले लेंगे। तो हम निश्चय बदला लेने वाले हैं। 1. यह कड़ी पकड़ का दिन बद्र के युध्द का दिन है। जिस में उन के बड़े-बड़े सत्तर प्रमुख मारे गये तथा इतनी ही संख्या में बंदी बनाये गये। और उन की दूसरी पकड़ क़्यामत के दिन होगी जो इस से भी बड़ी और गंभीर होगी।
۞ وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَاءَهُمْ رَسُولٌ كَرِيمٌ ﴾ 17 ﴿
व ल-क़द् फ़तन्ना क़ब्लहुम् क़ौ-म फ़िर्-औ़-न व जा – अहुम् रसूलुन् करीम
तथा हमने परीक्षा ली इनसे पूर्व फ़िरऔन की जाति की तथा उनके पास एक आदरणीय रसूल आया।
أَنْ أَدُّوا إِلَيَّ عِبَادَ اللَّهِ ۖ إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ﴾ 18 ﴿
अन् अद्-दू इलय्-य अिबादल्लाहि, इन्नी लकुम् रसूलुन् अमीन
कि मुझे सौंप दो अल्लाह के भक्तों को। निश्चय मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
وَأَن لَّا تَعْلُوا عَلَى اللَّهِ ۖ إِنِّي آتِيكُم بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ ﴾ 19 ﴿
व अल्-ला तअ्लू अ़लल्लाहि, इन्नी आतीकुम् बिसुल्तानिम्- मुबीन
तथा अल्लाह के विपरीत घमंड न करो। मैं तुम्हारे सामने खुला प्रमाण प्रस्तुत करता हूँ।
وَإِنِّي عُذْتُ بِرَبِّي وَرَبِّكُمْ أَن تَرْجُمُونِ ﴾ 20 ﴿
व इन्नी अुज़्तु बिरब्बी व रब्बिकुम् अन् तर्जुमून
तथा मैंने शरण ली है, अपने पालनहार की तथा तुम्हारे पालनहार की इससे कि तुम मुझपर पथराव कर दो।
وَإِن لَّمْ تُؤْمِنُوا لِي فَاعْتَزِلُونِ ﴾ 21 ﴿
व इल्लम् तुअ्मनू ली फ़अ्तज़िलून
और यदि तुम मेरा विश्वास न करो, तो मुझसे परे हो जाओ।
فَدَعَا رَبَّهُ أَنَّ هَٰؤُلَاءِ قَوْمٌ مُّجْرِمُونَ ﴾ 22 ﴿
फ़-दआ़ रब्बहू अन्-न हाउला-इ क़ौमुम् – मुज्रिमून
अन्ततः, मूसा ने पुकारा अपने पालनहार को, कि वास्तव में ये लोग अपराधी हैं।
فَأَسْرِ بِعِبَادِي لَيْلًا إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ ﴾ 23 ﴿
फ़- अस्रि बिअिबादी लैलन् इन्नकुम् मुत्त- बअून
(हमने आदेश दिया) कि निकल जा रातों-रात, मेरे भक्तों को लेकर। निश्चय तुम्हारा पीछा किया जायेगा।
وَاتْرُكِ الْبَحْرَ رَهْوًا ۖ إِنَّهُمْ جُندٌ مُّغْرَقُونَ ﴾ 24 ﴿
वत् रूकिल्-बह्-र रह्वन्, इन्नहुम् जुन्दुम् मुग़्-रक़ून
तथा छोड़ दे सागर को उसकी दशा पर, खुला। वास्तव में, ये डूब जाने वाली सेना है।
كَمْ تَرَكُوا مِن جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ ﴾ 25 ﴿
कम् त रकू मिन् जन्नातिंव्-व अुयून
वे छोड़ गये बहुत-से बाग़ तथा जल स्रोत।
وَزُرُوعٍ وَمَقَامٍ كَرِيمٍ ﴾ 26 ﴿
व ज़ुरूअिंव् व मक़ामिन् करीम
तथा खेतियाँ और सुखदायी स्थान।
وَنَعْمَةٍ كَانُوا فِيهَا فَاكِهِينَ ﴾ 27 ﴿
व नअ्-मतिन् कानू फ़ीहा फ़ाकिहीन
तथा सुख के साधन, जिनमें वे आन्नद ले रहे थे।
كَذَٰلِكَ ۖ وَأَوْرَثْنَاهَا قَوْمًا آخَرِينَ ﴾ 28 ﴿
कज़ालि-क, व औरस्नाहा क़ौमन् आ-ख़रीन
इसी प्राकार हुआ और हमने उनका उत्तराधिकारी बना दिया दूसरे[1] लोगों को। 1. अर्थात बनी इस्राईल (याक़ूब अलैहिस्सलाम की संतान) को।
فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ السَّمَاءُ وَالْأَرْضُ وَمَا كَانُوا مُنظَرِينَ ﴾ 29 ﴿
फ़मा ब-कत् अ़लैहिमुस्समा-उ वल्अर्जु व मा कानू मुन्ज़रीन
तो नहीं रोया उनपर आकाश और न धरती और न उन्हें अवसर (समय) दिया गया।
وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ مِنَ الْعَذَابِ الْمُهِينِ ﴾ 30 ﴿
व ल-क़द् नज्जैना बनी इस्राईल मिनल्-अ़ज़ाबिल्-मुहीन
तथा हमने बचा लिया इस्राईल की संतान को, अपमानकारी यातना से।
مِن فِرْعَوْنَ ۚ إِنَّهُ كَانَ عَالِيًا مِّنَ الْمُسْرِفِينَ ﴾ 31 ﴿
मिन् फ़िर्-औ़न, इन्नहू का-न आ़लि-यम् मिनल्–मुस् -रिफ़ीन
फ़िरऔन से। वास्तव में, वह चढ़ा हुआ उल्लंघनकारियों में से था।
وَلَقَدِ اخْتَرْنَاهُمْ عَلَىٰ عِلْمٍ عَلَى الْعَالَمِينَ ﴾ 32 ﴿
व ल- कदिख़्तर्-नाहुम् अ़ला अिल्मिन् अ़लल्-आ़लमीन
तथा हमने प्रधानता दी उन्हें, जानते हुए, संसार वासियों पर।
وَآتَيْنَاهُم مِّنَ الْآيَاتِ مَا فِيهِ بَلَاءٌ مُّبِينٌ ﴾ 33 ﴿
व आतैनाहुम् मिनल्-आयाति मा फ़ीहि बलाउम्-मुबीन
तथा हमने उन्हें प्रदान कीं ऐसी निशानियाँ, जिनमें खुली परीक्षा थी।
إِنَّ هَٰؤُلَاءِ لَيَقُولُونَ ﴾ 34 ﴿
इन्-न हाउला-इ ल-यक़ूलून
वास्तव में, ये[1] कहते हैं कि 1. अर्थात मक्का के मुश्रिक कहते हैं कि संसारिक जीवन ही अन्तिम जीवन है। इस के पश्चात् परलोक का जीवन नहीं है।
إِنْ هِيَ إِلَّا مَوْتَتُنَا الْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنشَرِينَ ﴾ 35 ﴿
इन् हि-य इल्ला मौततुनल्-ऊला व मा नह्नु बिमुन्शरीन
हमें तो बस प्रथम बार मरना है तथा हम फिर जीवित नहीं किये जायेंगे।
فَأْتُوا بِآبَائِنَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ﴾ 36 ﴿
फ़क्तू बिआबा – इना इन् कुन्तुम् सादिक़ीन
फिर यदि तुम सच्चे हो, तो हमारे पूर्वजों को (जीवित करके) ला दो।
أَهُمْ خَيْرٌ أَمْ قَوْمُ تُبَّعٍ وَالَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ أَهْلَكْنَاهُمْ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِمِينَ ﴾ 37 ﴿
अ-हुम् ख़ैरुन् अम् क़ौमु तुब्बअिंव्-वल्लज़ी – न मिन् क़ब्लिहिम्, अह्लक्नाहुम् इन्नहुम् कानू मुज्रिमीन
ये अच्छे हैं अथवा तुब्बअ की जाति[1] तथा जो उनसे पूर्व रहे हैं? हमने उनका विनाश कर दिया। निश्चय वे अपराधि थे। 1. तुब्बअ की जाति से अभिप्राय यमन की जाति सबा है। जिस के विनाश का वर्णन सूरह सबा में किया गया है। तुब्बअ ह़िम्यर जाति के शासकों की उपाधि थी जिसे उन की अवज्ञा के कारण ध्वस्त कर दिया गया। (देखियः सूरह सबा की आयतः 15 से 19 तक।)
وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَاعِبِينَ ﴾ 38 ﴿
व मा ख़लक़्नस्समावाति वल्अर्ज़ व मा बैनहुमा लाअिबीन
तथा हमने आकाशों और धरती को एवं जो कुछ उन दोनों के बीच है, खेल नहीं बनाया है।
مَا خَلَقْنَاهُمَا إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 39 ﴿
मा ख़लक़्नाहुमा इल्ला बिल्हक़्क़ि व लाकिन् न अक्स रहुम् ला यअ्लमून
हमने नहीं पैदा किया है उन दोनों को, परन्तु सत्य के आधार पर। किन्तु अधिक्तर लोग इसे नहीं जानते हैं।
إِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ مِيقَاتُهُمْ أَجْمَعِينَ ﴾ 40 ﴿
इन्-न यौमल्-फ़स्लि मीक़ातुहुम् अज्मईन
निःसंदेह निर्णय[1] का दिन, उन सबका निश्चित समय है। 1. अर्थात आकाशों तथा धरती की रचना लोगों की परीक्षा के लिये की गई है। और परीक्षा फल के लिये प्रलय का समय निर्धारित कर दिया गया है।
يَوْمَ لَا يُغْنِي مَوْلًى عَن مَّوْلًى شَيْئًا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴾ 41 ﴿
यौ-म ला युग़्नी मौलन् अ़म्मौलन् शैअंव-व ला हुम् युन्सरून
जिस दिन, कोई साथी किसी साथी के कुछ काम नहीं आयेगा और न उनकी सहायता की जायेगी।
إِلَّا مَن رَّحِمَ اللَّهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ ﴾ 42 ﴿
इल्ला मर्रहिमल्लाहु, इन्नहू हुवल् अ़ज़ीज़ुर्रहीम
परन्तु, जिसपर अल्लाह की दया हो जाये, तो वास्तव में वह बड़ा प्रभावशाली, दयावान है।
إِنَّ شَجَرَتَ الزَّقُّومِ ﴾ 43 ﴿
इन्-न श-ज-रतज़्ज़क़्क़ूम
निःसंदेह ज़क्कूम (थोहड़) का वृक्ष।
كَالْمُهْلِ يَغْلِي فِي الْبُطُونِ ﴾ 45 ﴿
कल्मुहिल यग़्ली फ़िल्बुतून
पिघले हुए ताँबे जैसा, जो खौलेगा पेटों में।
كَغَلْيِ الْحَمِيمِ ﴾ 46 ﴿
क-ग़ल्यिल्-हमीम
गर्म पानी के खौलने के समान।
خُذُوهُ فَاعْتِلُوهُ إِلَىٰ سَوَاءِ الْجَحِيمِ ﴾ 47 ﴿
ख़ुजूहु फ़अ्तिलूहु इला सवाइल्-जहीम
(आदेश होगा कि) उसे पकड़ो तथा धक्का देते हुए नरक के बीच तक पहुँचा दो।
ثُمَّ صُبُّوا فَوْقَ رَأْسِهِ مِنْ عَذَابِ الْحَمِيمِ ﴾ 48 ﴿
सुम्-म सुब्बू फ़ौ-क़ रअ्सिही मिन् अ़ज़ाबिल्-हमीम
फिर बहाओ उसके सिर के ऊपर अत्यंत गर्म जल की यातना।[1] 1. ह़दीस में है कि इस से जो कुछ उस के भीतर होगा पिघल कर दोनों पाँव के बीच से निकल जायेगा, फिर उसे अपनी पहली दशा पर कर दिया जायेगा। (तिर्मिज़ीः 2582, इस ह़दीस की सनद हसन है।)
ذُقْ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْكَرِيمُ ﴾ 49 ﴿
ज़ुक़् इन्न-क अन्तल्-अ़ज़ीज़ुल्-करीम
(तथा कहा जायेगा कि) चख, क्योंकि तू बड़ा आदरणीय सम्मानित था।
إِنَّ هَٰذَا مَا كُنتُم بِهِ تَمْتَرُونَ ﴾ 50 ﴿
इन्- न हाज़ा मा कुन्तुम् बिही तम्तरून
यही वह चीज़ है, जिसमें तुम संदेह कर रहे थे।
إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي مَقَامٍ أَمِينٍ ﴾ 51 ﴿
इन्नल्-मुत्तक़ी न फ़ी मक़ामिन् अमीन
निःसंदेह आज्ञाकारी शान्ति के स्थान में होंगे।
فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ ﴾ 52 ﴿
फ़ी जन्नातिंव्-व अुयून
बाग़ों तथा जल स्रोतों में।
يَلْبَسُونَ مِن سُندُسٍ وَإِسْتَبْرَقٍ مُّتَقَابِلِينَ ﴾ 53 ﴿
यल्बसू-न मिन् सुन्दुसिंव्-व इस्तब्रक़िम् मु-तक़ाबिलीन
वस्त्र धारण किये हुए महीन तथा कोमल रेशम के, एक-दूसरे के सामने (आसीन) होंगे।
كَذَٰلِكَ وَزَوَّجْنَاهُم بِحُورٍ عِينٍ ﴾ 54 ﴿
कज़ालि-क, व ज़व्वज्नाहुम् बिहूरिन् ईन
इसी प्रकार होगा तथा हम विवाह देंगे उनको ह़ूरों से।[1] 1. ह़ूर, अर्थात गोरी और बड़े-बड़े नैनों वाली स्त्रियाँ।
يَدْعُونَ فِيهَا بِكُلِّ فَاكِهَةٍ آمِنِينَ ﴾ 55 ﴿
यद्अू न फ़ीहा बिकुल्लि फ़ाकि-हतिन् आमिनीन
वे माँग करेंगे उसमें, प्रत्येक प्रकार के मेवों की निश्चिन्त होकर।
لَا يَذُوقُونَ فِيهَا الْمَوْتَ إِلَّا الْمَوْتَةَ الْأُولَىٰ ۖ وَوَقَاهُمْ عَذَابَ الْجَحِيمِ ﴾ 56 ﴿
ला यज़ूक़ू-न फ़ीहल्मौ-त इल्लल्-मौ-ततल्-ऊला व वक़ाहुम् अ़ज़ाबल्- जहीम
वे उस स्वर्ग में मौत[1] नहीं चखेंगे, प्रथम (सांसारिक) मौत के सिवा तथा (अल्लाह) बचा लेगा उन्हें, नरक की यातना से। 1. ह़दीस में है कि जब स्वर्गी स्वर्ग में और नारकी नरक में चले जायेंगे तो मौत को स्वर्ग और नरक के बीच ला कर वध कर दिया जायेगा। और एलान कर दिया जायेगा कि अब मौत नहीं होगी। जिस से स्वर्गी प्रसन्न हो जायेंगे और नारकियों को शोक पर शोक हो जायेगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6548, सह़ीह़ मुस्लिमः2850)
فَضْلًا مِّن رَّبِّكَ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ ﴾ 57 ﴿
फ़ज़्लम्-मिर्रब्बि-क, ज़ालि-क हुवल् फ़ौज़ुल्- अ़ज़ीम
आपके पालनहार की दया से, वही बड़ी सफलता है।
فَإِنَّمَا يَسَّرْنَاهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴾ 58 ﴿
फ़-इन्नमा यस्सर्नाहु बिलिसानि-क लअ़ल्लहुम् य-तज़क्करून
तो हमने सरल कर दिया इस (क़ुर्आन) को आपकी भाषा में, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।