सूरह मुमिनून के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 118 आयतें हैं।
- इस सूरह में ईमान वालों की सफलता तथा उन के गुणों को बताया गया है।
- और जिस आस्था पर सफलता निर्भर है उस के सत्य होने के प्रमाण प्रस्तुत किये गये हैं। और संदेहों को दूर किया गया है।
- यह बताया गया है कि सब नबियों का धर्म एक था, लोगों ने विभेद कर के अनेक धर्म बना लिये।
- जो लोग अचेत हैं उन्हें सावधान करने के साथ साथ मौत तथा प्रलय के दिन उनकी दुर्दशा को बताया गया है।
- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के माध्यम से मुसलमानों को अल्लाह की क्षमा तथा दया के लिये प्रार्थना की शिक्षा दी गयी है।
- हदीस में है कि जिस में तीन बातें हों उसे ईमान की मिठास मिल जाती हैः जिस को अल्लाह और उस के रसूल सब से अधिक प्रिय हों। और जो किसी से मात्र अल्लाह के लिये प्रेम करे। और जिसे यह अप्रिय हो कि इस के पश्चात् कुफ्र में वापिस जाये जब कि अल्लाह ने उसे उस से निकाल दिया। जैसे की उसे यह अप्रिय हो कि उसे नरक में फेंक दिया जाये। (सहीह बुखारी, 21, मुस्लिम, 43)
सूरह मोमिन | Surah Al Muminoon in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ ﴾ 1 ﴿
कद् अफ़्ल-हल मुअ्मिनून
सफल हो गये ईमान वाले।
الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ ﴾ 2 ﴿
अल्लज़ी-न हुम् फ़ी सलातिहिम् ख़ाशिअून
जो अपनी नमाज़ों में विनीत रहने वाले हैं।
وَالَّذِينَ هُمْ عَنِ اللَّغْوِ مُعْرِضُونَ ﴾ 3 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् अ़निल्लग्वि मुअ्-रिजून
और जो व्यर्थ[1] से विमुख रहने वाले हैं। 1. अर्थात प्रत्येक व्यर्थ कार्य तथा कथन से। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः जो अल्लाह और प्रलय के दिन पर ईमान रखता हो वह अच्छी बात बोले अन्यथा चुप रहे। (सह़ीह़ बुख़ारीः6019, मुस्लिमः 48)
وَالَّذِينَ هُمْ لِلزَّكَاةِ فَاعِلُونَ ﴾ 4 ﴿
वल्लज़ी न हुम् लिज़्ज़काति फ़ाअिलून
तथा जो ज़कात देने वाले हैं।
وَالَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَ ﴾ 5 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् लिफुरूजिहिम् हाफिजून
और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैं।
إِلَّا عَلَىٰ أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ ﴾ 6 ﴿
इल्ला अ़ला अज़्वाजिहिम् औ मा म-लकत् ऐमानुहुम् फ़-इन्नहुम् ग़ैरू मलूमीन
परन्तु अपनी पत्नियों तथा अपने स्वामित्व में आयी दासियों से, तो वही निन्दित नहीं हैं। ( Quran Surah 23 Ayat 5-6 in Hindi )
فَمَنِ ابْتَغَىٰ وَرَاءَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْعَادُونَ ﴾ 7 ﴿
फ़ मनिब्तग़ा वरा अ ज़ालि क फ़-उलाइ-क हुमुल् आ़दून
फिर जो इसके अतिरिक्त चाहें, तो वही उल्लंघनकारी हैं।
وَالَّذِينَ هُمْ لِأَمَانَاتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَاعُونَ ﴾ 8 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् लि- अमानातिहिम् व अ़दिहिम् राअून
और जो अपनी धरोहरों तथा वचन का पालन करने वाले हैं।
وَالَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَوَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ ﴾ 9 ﴿
वल्लज़ी-न हुम् अ़ला स-लवातिहिम् युहाफ़िजून *
तथा जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करने वाले हैं।
أُولَٰئِكَ هُمُ الْوَارِثُونَ ﴾ 10 ﴿
उलाइ-क हुमुल्-वारिसून
यही उत्तराधिकारी हैं।
الَّذِينَ يَرِثُونَ الْفِرْدَوْسَ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ﴾ 11 ﴿
अल्लज़ी-न यरिसूनल् फ़िरदौ-स हुम् फ़ीहा ख़ालिदून
जो उत्तराधिकारी होंगे फ़िर्दौस[1] के, जिसमें वे सदावासी होंगे। 1. फ़िर्दौस, स्वर्ग का सर्वोच्च स्थान।
وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ مِن سُلَالَةٍ مِّن طِينٍ ﴾ 12 ﴿
व ल-क़द् ख़लक़्नल्-इन्सा-न मिन सुलालतिम्-मिन् तीन
और हमने उत्पन्न किया है मनुष्य को मिट्टी के सार[1] से। 1. अर्थात वीर्य से।
ثُمَّ جَعَلْنَاهُ نُطْفَةً فِي قَرَارٍ مَّكِينٍ ﴾ 13 ﴿
सुम्-म जअ़ल्नाहु नुत्फ़-तन् फ़ी क़रारिम्-मकीन
फिर हमने उसे वीर्य बनाकर रख दिया एक सुरक्षित स्थान[1] में। 1. अर्थात गर्भाशय में।
ثُمَّ خَلَقْنَا النُّطْفَةَ عَلَقَةً فَخَلَقْنَا الْعَلَقَةَ مُضْغَةً فَخَلَقْنَا الْمُضْغَةَ عِظَامًا فَكَسَوْنَا الْعِظَامَ لَحْمًا ثُمَّ أَنشَأْنَاهُ خَلْقًا آخَرَ ۚ فَتَبَارَكَ اللَّهُ أَحْسَنُ الْخَالِقِينَ ﴾ 14 ﴿
सुम्-म ख़लक़्नन्-नुत्फ़-त अ़-ल क़तन् फ़-ख लक़्नल् अ-ल-क त मुज्-ग़तन् फ़ ख़लक्नल् मुज़्ग़ त अिज़ामन् फ़- कसौनल्-अिज़ा-म लह़्मन्, सुम्-म अन्शअ्नाहु ख़ल्क़न् आख-र, फ़-तबा-रकल्लाहु अहसनुल् ख़ालिक़ीन
फिर बदल दिया वीर्य को जमे हुए रक्त में, फिर हमने उसे मांस का लोथड़ा बना दिया, फिर हमने लोथड़े में हड्डियाँ बनायीं, फिर हमने पहना दिया हड्डियों को मांस, फिर उसे एक अन्य रूप में उत्पन्न कर दिया। तो शुभ है अल्लाह, जो सबसे अच्छी उत्पत्ति करने वाला है।
ثُمَّ إِنَّكُم بَعْدَ ذَٰلِكَ لَمَيِّتُونَ ﴾ 15 ﴿
सुम्-म इन्नकुम् बअ्-द ज़ालि-क ल-मय्यितून
फिर तुमसब इसके पश्चात् अवश्य मरने वाले हो।
ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تُبْعَثُونَ ﴾ 16 ﴿
सुम् – म इन्नकुम् यौमल् – कियामति तुब्अ़सून
फिर निश्चय तुमसब (प्रलय) के दिन जीवित किये जाओगे।
وَلَقَدْ خَلَقْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعَ طَرَائِقَ وَمَا كُنَّا عَنِ الْخَلْقِ غَافِلِينَ ﴾ 17 ﴿
व ल – क़द्ख़लकना फ़ौक़कुम् सब् – अ तराइ क़ व मा कुन्ना अ़निल् – ख़ल्कि ग़ाफ़िलीन
और हमने बना दिये तुम्हारे ऊपर सात आकाश और हम उत्पत्ति से अचेत नहीं[1] हैं। 1. अर्थात उत्पत्ति की आवश्यक्ता तथा जीवन के संसाधन की व्यवस्था भी कर रहे हैं।
وَأَنزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً بِقَدَرٍ فَأَسْكَنَّاهُ فِي الْأَرْضِ ۖ وَإِنَّا عَلَىٰ ذَهَابٍ بِهِ لَقَادِرُونَ ﴾ 18 ﴿
व अन्ज़ल्ना मिनस्समा-इ मा-अम् बि-क़-दरिन् फ-अस्कन्नाहु फिल्अर्जि व इन्ना अ़ला ज़हाबिम् बिही लकादिरून
और हमने आकाश से उचित मात्रा में पानी बरसाया और उसे धरती में रोक दिया तथा हम उसे विलुप्त कर देने पर निश्चय सामर्थ्यवान हैं।
فَأَنشَأْنَا لَكُم بِهِ جَنَّاتٍ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ لَّكُمْ فِيهَا فَوَاكِهُ كَثِيرَةٌ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ ﴾ 19 ﴿
फ़- अन्शअ्ना लकुम् बिही जन्नातिम् मिन् नख़ीलिंव् – व अअ्नाबिन् • लकुम् फ़ीहा फ़वाकिहु कसीरतुंव् – व मिन्हा तअ्कुलून
फिर हमने उपजा दिये तुम्हारे लिए उस (पानी) के द्वारा खजूरों तथा अंगूरों के बाग़, तुम्हारे लिए उसमें बहुत-से फल हैं और उसीमें से तुम खाते हो।
وَشَجَرَةً تَخْرُجُ مِن طُورِ سَيْنَاءَ تَنبُتُ بِالدُّهْنِ وَصِبْغٍ لِّلْآكِلِينَ ﴾ 20 ﴿
व श-ज-रतन् तख़्रुजु मिन् तूरि सैना – अ तम्बुतु बिद्दुह़्नि व सिब्गिल् लिल् आकिलीन
तथा वृक्ष जो निकलता है सैना पर्वत से, जो तेल लिए उगता है तथा सालन है खाने वालों के लिए।
وَإِنَّ لَكُمْ فِي الْأَنْعَامِ لَعِبْرَةً ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِي بُطُونِهَا وَلَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ كَثِيرَةٌ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ ﴾ 21 ﴿
व इन् – न लकुम् फ़िल् – अन्आ़मि ल – अिब् – रतन्, नुस्क़ीकुम् मिम्मा फ़ी बुतूनिहा व लकुम् फ़ीहा मनाफ़िअु कसी – रतुंव् – व मिन्हा तअ्कुलून
और वास्तव में, तुम्हारे लिए पशुओं में एक शिक्षा है, हम तुम्हें पिलाते हैं, उसमें से, जो उनके पेटों में[1] है तथा तुम्हारे लिए उनमें अन्य बहुत-से लाभ हैं और उनमें से कुछ को तुम खाते हो। 1. अर्थात दूध।
وَعَلَيْهَا وَعَلَى الْفُلْكِ تُحْمَلُونَ ﴾ 22 ﴿
व अ़लैहा व अ़लल्-फुल्कि तुह्मलून *
तथा उनपर और नावों पर तुम सवार किये जाते हो।
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 23 ﴿
व ल – क़द् अरसल्ना नूहन् इला क़ौमिही फ़का – ल या क़ौमि अ्बुदुल्ला-ह मा लकुम् मिन् इलाहिन् ग़ैरूहू, अ-फ़ला तत्तकून
तथा हमने भेजा नूह़[1] को उसकी जाति की ओर, उसने कहाः हे मेरी जाति को लोगो! इबादत (वंदना) अल्लाह की करो, तुम्हारा कोई पूज्य नहीं है उसके सिवा, तो क्या तुम डरते नहीं हो? 1. यहाँ यह बताया जा रहा है कि अल्लाह ने जिस प्रकार तुम्हारे आर्थिक जीवन के साधन बनाये उसी प्रकार तुम्हारे आत्मिक मार्ग दर्शन की व्यवस्था की और रसूलों को भेजा जिन में नूह़ अलैहिस्सलाम प्रथम रसूल थे।
فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُرِيدُ أَن يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَأَنزَلَ مَلَائِكَةً مَّا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ ﴾ 24 ﴿
फ़कालल् म-लउल्लज़ी-न क-फरू मिन् क़ौमिही मा हाज़ा इल्ला ब-शरूम्-मिस्लुकुम् युरीदु अंय्य तफ़ज़्ज़ल अ़लैकुम्, व लौ शा-अल्लाहु ल -अन्ज़-ल मलाइ कतम् मा समिअ्ना बिहाज़ा फी आबाइनल् – अव्वलीन
तो उन प्रमुखों ने कहा, जो काफ़िर हो गये उसकी जाति में से, ये तो एक मनुष्य है, तुम्हारे जैसा, ये तुमपर प्रधानता चाहता है और यदि अल्लाह चाहता, तो किसी फ़रिश्ते को उतारता, हमने तो इसे[1] सुना ही नहीं अपने पूर्वजों में। 1. अर्थात एकेश्वरवाद की बात अपने पूर्वजों के समय में सुनी ही नहीं।
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ بِهِ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِهِ حَتَّىٰ حِينٍ ﴾ 25 ﴿
इन् हु-व इल्ला रजुलुम्-बिही जिन्नतुन् फ़-तरब्बसू बिही हत्ता हीन
ये बस एक ऐसा पुरुष है, जो पागल हो गया है, तो तुम उसकी प्रतीक्षा करो कुछ समय तक।
قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ ﴾ 26 ﴿
का-ल रब्बिन्सुरनी बिमा कज़्ज़बून
नूह़ ने कहाः हे मेरे पालनहार! मेरी सहायता कर, उनके मुझे झुठलाने पर।
فَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ أَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَاءَ أَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُ ۙ فَاسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا تُخَاطِبْنِي فِي الَّذِينَ ظَلَمُوا ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ ﴾ 27 ﴿
फ – औहैना इलैहि अनिस्नअिल् – फुल् क बि – अअ्युनिना व वह्यिना फ़-इज़ा जा-अ अम्रुना व फ़ारत्तन्नूरू फ़स्लुक् फ़ीहा मिन् कुल्लिन् ज़ौजैनिस्नैनि व अह़्ल- क इल्ला मन् स-ब-क़ अ़लैहिल् कौलु मिन्हुम् व ला तुख़ातिब्नी फ़िल्लज़ी न ज़ – लमू इन्नहुम् मुग् रकून
तो हमने उसकी ओर वह़्यी की कि नाव बना हमारी रक्षा में हमारी वह्यी के अनुसार और जब हमारा आदेश आ जाये तथा तन्नूर उबल पड़े, तो रख ले प्रत्येक जीव के एक-एक जोड़े तथा अपने परिवार को, उसके सिवा जिसपर पहले निर्णय हो चुका है उनमें से, और मुझे संबोधित न करना उनके विषय में जिन्होंने अत्याचार किये हैं, निश्चय वे डुबो दिये जायेंगे।
فَإِذَا اسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى الْفُلْكِ فَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي نَجَّانَا مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 28 ﴿
फ़-इज़ स्तवै-त अन्-त व मम्म-अ-क अलल् – फुल्कि फ़कुलिल् – हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी नज्जाना मिनल् – कौमिज़्ज़ालिमीन
और जब स्थिर हो जाये तू और जो तेरे साथी हैं नाव पर, तो कहः सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने हमें मुक्त किया अत्याचारी लोगों से।
وَقُل رَّبِّ أَنزِلْنِي مُنزَلًا مُّبَارَكًا وَأَنتَ خَيْرُ الْمُنزِلِينَ ﴾ 29 ﴿
व कुर्रब्बि अन्ज़िल्नी मुन्ज़ लम् मुबा-रकव् – व अन् – त ख़ैरूल् – मुन्ज़िलीन
तथा कहः हे मेरे पालनहार! मुझे शुभ स्थान में उतार और तू उत्तम स्थान देने वाला है।
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ وَإِن كُنَّا لَمُبْتَلِينَ ﴾ 30 ﴿
इन् – न फ़ी ज़ालि – क लआयातिंव् – व इन् कुन्ना लमुब्तलीन
निश्चय इसमें कई निशानियाँ हैं तथा निःसंदेह हम परीक्ष लेने[1]वाले हैं। 1. अर्थात रसूलों के द्वारा परीक्षा लेते रहे हैं।
ثُمَّ أَنشَأْنَا مِن بَعْدِهِمْ قَرْنًا آخَرِينَ ﴾ 31 ﴿
सुम् – म अन्शअ्ना मिम्-बअ्दिहिम् कर्नन् आख़रीन
फिर हमने पैदा किया उनके पश्चात् दूसरे समुदाय को।
فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 32 ﴿
फ़- अरसल्ना फ़ीहिम् रसूलम् मिन्हुम् अनिअ्बुदुल्ला – ह मा लकुम् मिन् इलाहिन् ग़ैरूहू, अ-फ़ला तत्तकून *
फिर हमने भेजा उनमें रसूल उन्हीं में से कि तुम इबादत (वंदना) करो अल्लाह की, तुम्हारा कोई ( सच्चा) पूज्य नहीं है उसके सिवा, तो क्या तुम डरते नहीं हो?
وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ الَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِلِقَاءِ الْآخِرَةِ وَأَتْرَفْنَاهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ ﴾ 33 ﴿
व कालल् – मल- उ मिन् क़ौमिहिल्लज़ी – न क फ़रू व कज़्ज़बू बिलिक़ाइल – आख़िरति व अतरफ़्नाहुम् फ़िल् हयातिद्दुन्या मा हाज़ा इल्ला ब – शरूम् – मिस्लुकुम् यअ्कुलु मिम्मा तअ्कुलू – न मिन्हु व यश्रबू मिम्मा तश्रबून
और उसकी जाति के प्रमुखों ने कहा, जो काफ़िर हो गये तथा आख़िरत (परलोक) का सामना करने को झुठला दिया तथा हमने उन्हें सम्पन्न किया था, सांसारिक जीवन में: ये तो बस एक मनुष्य है तुम्हारे जैसा, खाता है, जो तुम खाते हो और पीता है, जो तुम पीते हो।
وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ ﴾ 34 ﴿
वल – इन् अ- तअ्तुम् ब – शरम् मिस् – लकुम् इन्नकुम् इज़ल् – लख़ासिरून
और यदि तुमने मान लिया अपने जैसे एक मनुज को, तो निश्चय तुम क्षतिग्रस्त हो।
أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًا وَعِظَامًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ ﴾ 35 ﴿
अ-यअिदुकुम् अन्नकुम् इज़ा मित्तुम् व कुन्तुम् तुराबंव् – व अिज़ामन् अन्नकुम् मुखरजून
क्या वह तुम्हें वचन देता है कि जब तुम मर जाओगे और धूल तथा हड्डियाँ हो जाओगे, तो तुम, फिर जीवित निकाले जाओगे?
هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ ﴾ 36 ﴿
हैहा – त हैहा – त लिमा तूअ़दून
बहुत दूर की बात है, जिसका तुम्हें वचन दिया जा रहा है।
إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ ﴾ 37 ﴿
इन् हि – य इल्ला हयातुनद्दुन्या नमूतु व नह़्या व मा नह्नु बिमब्अूसीन
जीवन तो बस सांसारिक जीवन है, हम मरते-जीते हैं और हम फिर जीवित नहीं किये जायेंगे।
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا وَمَا نَحْنُ لَهُ بِمُؤْمِنِينَ ﴾ 38 ﴿
इन् हु-व इल्ला रजुलु – निफ़्तरा अ़लल्लाहि कज़िबंव्व मा नह्नु लहू बिमुअ्मिनीन
ये तो बस एक व्यक्ति है, जिसने अल्लाह पर एक झूठ घड़ लिया है और हम उसका विश्वास करने वाले नहीं हैं।
قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ ﴾ 39 ﴿
का – ल रब्बिन्सुर्नी बिमा कज़्ज़बून
नबी ने प्रार्थना कीः मेरे पालनहार! मेरी सहायता कर, उनके झुठलाने पर मुझे।
قَالَ عَمَّا قَلِيلٍ لَّيُصْبِحُنَّ نَادِمِينَ ﴾ 40 ﴿
का-ल अ़म्मा क़लीलिल् – लयुस्बिहुन् – न नादिमीन
(अल्लाह ने) कहाः शीघ्र ही वे (अपने किये पर) पछतायेंगे।
فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ بِالْحَقِّ فَجَعَلْنَاهُمْ غُثَاءً ۚ فَبُعْدًا لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 41 ﴿
फ़ अ – ख़ज़त्हुमुस्सै हतु बिल्हक्कि फ़ – जअ़ल्नाहुम् गुसा – अन् फ़बुअ्दल् – लिल्क़ौमिज़्ज़ालिमीन
अन्ततः पकड़ लिया उन्हें कोलाहल ने सत्यानुसार और हमने उन्हें कचरा बना दिया, तो दूरी हो अत्याचारियों के लिए।
ثُمَّ أَنشَأْنَا مِن بَعْدِهِمْ قُرُونًا آخَرِينَ ﴾ 42 ﴿
सुम् – म अन्शअ्ना मिम् – बअ्दिहिम् कुरूनन् आ – ख़रीन
फिर हमने पैदा किया उनके पश्चात् दूसरे युग के लोगों को।
مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ ﴾ 43 ﴿
मा तस्बिकु मिन् उम्मतिन् अ-ज-लहा व मा यस्तअ्खिरून
नहीं आगे होती है, कोई जाति अपने समय से और न पीछे[1]। 1. अर्थात किसी जाति के विनाश का समय आ जाता है तो एक क्षण की भी देर-सवेर नहीं होती।
ثُمَّ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَىٰ ۖ كُلَّ مَا جَاءَ أُمَّةً رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُ ۚ فَأَتْبَعْنَا بَعْضَهُم بَعْضًا وَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ ۚ فَبُعْدًا لِّقَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ ﴾ 44 ﴿
सूम-म अरसल्ना रूसु – लना ततरा कुल्लमा जा- अ उम्मतर्रसूलुहा कज़्ज़बूहु फ़ – अत्बअ्ना बअ् – ज़हुम् बअ्ज़ंव् – व जअ़ल्नाहुम् अहादी-स फ़बुअ्दल् – लिकौमिल् ला युअ्मिनून
फिर, हमने भेजा अपने रसूलों को निरन्तर, जब-जबकिसी समुदाय के पास उसका रसूल आया, उन्होंने उसे झुठला दिया, तो हमने पीछे लगा[1] दिया उनके, एक को दूसरे के और उन्हें कहानी बना दिया। तो दूरी है उनके लिए, जो ईमान नहीं लाते। 1. अर्थात विनाश में।
ثُمَّ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ وَأَخَاهُ هَارُونَ بِآيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُّبِينٍ ﴾ 45 ﴿
सुम्म अरसल्ना मूसा व अख़ाहु हारू-न बिआयातिना व सुल्तानिम् मुबीन
फिर हमने भेजा मूसा तथा उसके भाई हारून को अपनी निशानियों तथा खुले तर्क के साथ।
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا عَالِينَ ﴾ 46 ﴿
इला फिरऔ-न व म-लइही फ़स्तक्बरू व कानू क़ौमन आ़लीन
फ़िरऔन और उसके प्रमुखों की ओर, तो उन्होंने गर्व किया तथा वे थे ही अभिमानी लोग।
فَقَالُوا أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَ ﴾ 47 ﴿
फ़क़ालू अनुअ्मिनु लि – ब शरैनि मिस्लिना व क़ौमूहुमा लना आ़बिदून
उन्होंने कहाः क्या हम ईमान लायें अपने जैसे दो व्यक्तियों पर, जबकि उन दोनों की जाति हमारे अधीन है?
فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا مِنَ الْمُهْلَكِينَ ﴾ 48 ﴿
फ़- कज़्ज़बूहुमा फ़कानू मिनल् – मुह़्लकीन
तो उन्होंने दोनों को झुठला दिय, तथा हो गये विनाशों में।
وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ ﴾ 49 ﴿
व ल कद आतैना मूसल किता-ब लअ़ल्लहुम् यह्तदून
और हमने प्रदान की मूसा को पुस्तक[1], ताकि वे मार्गदर्शन पा जायें। 1. अर्थात तौरात।
وَجَعَلْنَا ابْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُ آيَةً وَآوَيْنَاهُمَا إِلَىٰ رَبْوَةٍ ذَاتِ قَرَارٍ وَمَعِينٍ ﴾ 50 ﴿
व जअ़ल्नब् – न मर्य-म व उम्महू आ-यतंव् – व आवैनाहुमा इला रब्वतिन् ज़ाति करारिंव् – व मईन *
और हमने बना दिया मर्यम के पुत्र तथा उसकी माँ को एक निशानी तथा दोनों को शरण दी एक उच्च बसने योग्य तथा प्रवाहित स्रोत के स्थान की ओर[1]। 1. इस से अभिप्राय बैतुल मक़्दिस है।
يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا ۖ إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ ﴾ 51 ﴿
या अय्युहर्रूसुलु कुलू मिनत्तय्यिबाति वअ्मलू सालिहन्, इन्नी बिमा तअ्मलू-न अ़लीम
हे रसूलो! खाओ स्वच्छ[1]चीज़ों में से तथा अच्छे कर्म करो, वास्तव में, मैं उससे, जो तुम कर रहे हो, भली-भाँति अवगत हूँ। 1. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः अल्लाह स्वच्छ है और स्वच्छ ही को स्वीकार करता है। और ईमान वालों को वही आदेश दिया है जो रसूलों को दिया है। फिर आप ने यही आयत पढ़ी। (संक्षिप्त अनुवाद मुस्लिमः1015)
وَإِنَّ هَٰذِهِ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَأَنَا رَبُّكُمْ فَاتَّقُونِ ﴾ 52 ﴿
व इन् – न हाज़िही उम्मतुकुम् उम्मतंव्वाहि- दतंव् – व अ-न रब्बुकुम् फत्तकून
और वास्तव में, तुम्हारा धर्म एक ही धर्म है और मैं ही तुम सबका पालनहार हूँ, अतः मुझी से डरो।
فَتَقَطَّعُوا أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ زُبُرًا ۖ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ ﴾ 53 ﴿
फ़- तक़त्तअू अमरहुम बैनहुम् जुबुरन्, कुल्लु हिज़्बिम् – बिमा लदैहिम् फ़रिहून
तो उन्होंने खण्ड कर लिया, अपने धर्म का, आपस में कई खण्ड, प्रत्येक सम्प्रदाय उसीमें जो उनके पास[1] है, मगन है। 1. इन आयतों में कहा गया है कि सब रसूलों ने यही शिक्षा दी है कि स्वच्छ पवित्र चीज़ें खाओ और सदाचार करो। तुम्हारा पालनहार एक है और तुम सभी का धर्म एक है। परन्तु लोगों ने धर्म में विभेद कर के बहुत से सम्प्रदाय बना लिये. और अब प्रत्येक सम्प्रदाय अपने विश्वास तथा कर्म में मग्न है भले ही वह सत्य से दूर हो।
فَذَرْهُمْ فِي غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ ﴾ 54 ﴿
फ़ ज़रहुम फ़ी – ग़म् – रतिहिम् हत्ता हीन
अतः (हे नबी!) आप उन्हें छोड़ दें, उनकी अचेतना में कुछ समय तक।
أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِ مِن مَّالٍ وَبَنِينَ ﴾ 55 ﴿
अ – यह्सबू – न अन्नमा नुमिद्दुहुम्’ बिही मिम् – मालिंव् – व बनीन
क्या वे समझते हैं कि हम, जो सहायता कर रहे हैं उनकी धन तथा संतान से।
نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ ﴾ 56 ﴿
नुसारिअु लहुम् फ़िल-ख़ैराति, बल् ला यश्अुरून
शीघ्रता कर रहे हैं उनके लिए भलाईयों में? बल्कि वे समझते नहीं हैं[1]। 1. अर्थात यह कि हम उन्हें अवसर दे रहे हैं।
إِنَّ الَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ ﴾ 57 ﴿
इन्नल्लज़ी – न हुम् मिन् ख़श्यति रब्बिहिम् मुश्फ़िकून
वास्तव में, जो अपने पालनहार के भय से डरने वाले हैं।
وَالَّذِينَ هُم بِآيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ ﴾ 58 ﴿
वल्लज़ी – न हुम् बिआयाति रब्बिहिम् युअ्मिनून
और जो अपने पालनहार की आयतों पर ईमान रखते हैं।
وَالَّذِينَ هُم بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَ ﴾ 59 ﴿
वल्लज़ी – न हुम् बिरब्बिहिम् ला युश्रिकून
और जो अपने पालनहार का साझी नहीं बनाते हैं।
وَالَّذِينَ يُؤْتُونَ مَا آتَوا وَّقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَىٰ رَبِّهِمْ رَاجِعُونَ ﴾ 60 ﴿
वल्लज़ी – न युअ्तू – न मा आतौ व कुलूबुहुम् वजि – लतुन् अन्नहुम् इला रब्बिहिम् राजिअून
और जो करते हैं, जो कुछ भी करें और उनके दिल काँपते रहते हैं कि वे अपने पालनहार की ओर फिरकर जाने वाले हैं।
أُولَٰئِكَ يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَهُمْ لَهَا سَابِقُونَ ﴾ 61 ﴿
उलाइ-क युसारिअू-न फ़िल्-ख़ैराति व हुम् लहा साबिकून
वही शीघ्रता कर रहे हैं भलाईयों में तथा वही उनके लिए अग्रसर हैं।
وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنطِقُ بِالْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴾ 62 ﴿
व ला नुकल्लिफु नफ़्सन् इल्ला वुस्अहा व लदैना किताबुंय्यन्तिकु बिल्हक्कि व हुम् ला युज़्लमून
और हम बोझ नहीं रखते किसी प्राणी पर, परन्तु उसके सामर्थ्य के अनुसार तथा हमारे पास एक पुस्तक है, जो सत्य बोलती है और उनपर अत्याचार नहीं किया[1] जायेगा। 1. अर्थात प्रत्येक का कर्म लेख है जिस के अनुसार ही उसे बदला दिया जायेगा।
بَلْ قُلُوبُهُمْ فِي غَمْرَةٍ مِّنْ هَٰذَا وَلَهُمْ أَعْمَالٌ مِّن دُونِ ذَٰلِكَ هُمْ لَهَا عَامِلُونَ ﴾ 63 ﴿
बल कुलूबुहुम् फी गम्रतिम् – मिन् हाज़ा व लहुम् अअ्मालुम् – मिन् दूनि ज़ालि-क हुम् लहा आ़मिलून
बल्कि उनके दिल अचेत हैं इससे तथा उनके बहुत-से कर्म हैं इसके सिवा, जिन्हें वे करने वाले हैं।
حَتَّىٰ إِذَا أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِالْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْأَرُونَ ﴾ 64 ﴿
हत्ता इज़ा अख़ज्ना मुत्रफ़ीहिम् बिल् – अज़ाबि इज़ा हुम् यज्अरून
यहाँतक कि जब हम पकड़ लेंगे उनके सुखियों को यातना में, तो वे विलाप करने लगेंगे।
لَا تَجْأَرُوا الْيَوْمَ ۖ إِنَّكُم مِّنَّا لَا تُنصَرُونَ ﴾ 65 ﴿
ला तज्अरूल् यौ-म इन्नकुम् मिन्ना ला तुन्सरून
आज विलाप न करो, निःसंदेह तुम हमारी ओर से सहायता नहीं दिये जाओगे।
قَدْ كَانَتْ آيَاتِي تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ تَنكِصُونَ ﴾ 66 ﴿
कद् कानत् आयाती तुत्ला अ़लैकुम् फ़कुन्तुम् अ़ला अअ्क़ाबिकुम् तन्किसून
मेरी आयतें तुम्हें सुनायी जाती रहीं, तो तुम एड़ियों के बल फिरते रहे।
مُسْتَكْبِرِينَ بِهِ سَامِرًا تَهْجُرُونَ ﴾ 67 ﴿
मुस्तक्बिरी न बिही सामिरन् तह्जुरून
अभिमान करते हुए, उसे कथा बनाकर बकवास करते रहे।
أَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا الْقَوْلَ أَمْ جَاءَهُم مَّا لَمْ يَأْتِ آبَاءَهُمُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 68 ﴿
अ-फ़लम् यद्दब्बरूल् – क़ौल अम् जा अहुम् मा लम् यअ्ति आबा – अहुमुल अव्वलीन
क्या उन्होंने इस कथन (क़ुर्आन) पर विचार नहीं किया अथवा इनके पास वह[1]आ गया, जो उनके पूर्वजों के पास नहीं आया? 1. अर्थात् कुर्आन तथा रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आ गये। इस पर तो इन्हें अल्लाह का कृतज्ञ होना और इसे स्वीकार करना चाहिये।
أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنكِرُونَ ﴾ 69 ﴿
अम् लम् यअ् रिफू रसूलहुम् फहुम् लहू मुन्किरून
अथवा वह अपने रसूल से परिचित नहीं हुए, इसलिए वे उसका इन्कार कर रहे[1] हैं? 1. इस में चेतावनी है कि वह अपने रसूल की सत्यता, अमानत तथा उन के चरित्र और वंश से भली भाँति अवगत हैं।
أَمْ يَقُولُونَ بِهِ جِنَّةٌ ۚ بَلْ جَاءَهُم بِالْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ ﴾ 70 ﴿
अम् यकूलू – न बिही जिन्नतुन्, बल जा – अहुम् बिल्हक्कि व अक्सरूहुम् लिल्हक्कि कारिहून
अथवा वे कहते हैं कि वह पागल है? बल्कि वह तो उनके पास सत्य लाये हैं और उनमें से अधिक्तर को सत्य अप्रिय है।
وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ أَهْوَاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَاهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ ﴾ 71 ﴿
व लवित्त – बअ़ल्- हक़्कु अह़्वा अहुम् ल-फ-स दतिस्- समावातु वल्अर्जु व मन् फ़ीहिन् – न, बल् अतैनाहुम् बिज़िकरिहिम् फ़हुम् अ़न् जिकरिहिम् मुअ्-रिजून
और यदि अनुसरण करने लगे सत्य उनकी मनमानी का, तो अस्त-व्यस्त हो जाये आकाश तथा धरती और जो उनके बीच है, बल्कि हमने दे दी है उन्हें उनकी शिक्षा, फिर (भी) वे अपनी शिक्षा से विमुख हो रहे हैं।
أَمْ تَسْأَلُهُمْ خَرْجًا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌ ۖ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ ﴾ 72 ﴿
अम् तसअलुहुम खरजन फ़ख़राजु रब्बिका ख़ैरुन व हुवा ख़ैरुर-ऱाज़िकीन।
(हे नबी!) क्या आप उनसे कुछ धन माँग रहे हैं? आपके लिए तो आपके पालनहार का दिया हुआ ही उत्तम है और वह सर्वोत्तम जीविका देने वाला है।
وَإِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴾ 73 ﴿
व इन्न – क ल – तद्अूहुम इला सिरातिम् – मुस्तकीम
निश्चय आप तो उन्हें सुपथ की ओर बुला रहे हैं।
وَإِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ عَنِ الصِّرَاطِ لَنَاكِبُونَ ﴾ 74 ﴿
व इन्नल्लज़ी – न ला युअ्मिनू – न बिल – आखिरति अनिस्सिराति लनाकिबून
और जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं रखते, वे सुपथ से कतराने वाले हैं।
وَلَوْ رَحِمْنَاهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِم مِّن ضُرٍّ لَّلَجُّوا فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ ﴾ 75 ﴿
व लौ रहिम्नाहुम् व कशफ़्ना मा बिहिम् मिन् जुर्रिल ल – लज्जू फ़ी तुग्यानिहिम् यअ्महून
और यदि हम उनपर दया करें और दूर करें, जो दुःख उनके साथ है[1] तो वे अपने कुकर्मों में और अधिक बहकते जायेंगे। 1. इस से अभिप्राय वह अकाल है जो मक्का के काफ़िरों पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अवज्ञा के कारण आ पड़ा था। (देखियेः बुख़ारीः4823)
وَلَقَدْ أَخَذْنَاهُم بِالْعَذَابِ فَمَا اسْتَكَانُوا لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ ﴾ 76 ﴿
व ल – क़द् अख़ज़्नाहुम् बिल् अ़ज़ाबि फ़मस्तकानू लिरब्बिहिम् व मा य तज़र्रअून
और हमने उन्हें यातना में ग्रस्त (भी) किया, तो अपने पालनहार के समक्ष नहीं झुके और न विनय करते हैं।
حَتَّىٰ إِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِم بَابًا ذَا عَذَابٍ شَدِيدٍ إِذَا هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ ﴾ 77 ﴿
हत्ता इज़ा फ़तह़्ना अ़लैहिम् बाबन् जा अ़ज़ाबिन शदीदिन् इज़ा हुम् फ़ीहि मुब्लिसून *
यहाँतक कि जब हम उनपर खोल देंगे कड़ी यातना के[1] द्वार, तो सहसा वे उस समय निराश हो जायेंगे[2]। 1. कड़ी यातना से अभिप्राय परलोक की यातना है। 2. अर्थात प्रत्येक भलाई से।
وَهُوَ الَّذِي أَنشَأَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةَ ۚ قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ ﴾ 78 ﴿
व हुवल्लज़ी अनश – अ लकुमुस्सम् – अ वलअब्सा – र वल्- अफ़इ – द – त, क़लीलम् – मा तश्कुरून
वही है, जिसने बनाये हैं तुम्हारे लिए कान तथा आँखें और दिल[1], (फिर भी) तुम बहुत कम कृतज्ञ होते हो। 1. सत्य को सुनने, देखने और उस पर विचार कर के उसे स्वीकार करने के लिये।
وَهُوَ الَّذِي ذَرَأَكُمْ فِي الْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴾ 79 ﴿
व हुवल्लज़ीज़-र अकुम् फ़िल्अर्ज़ि व इलैहि तुह्शरून
और उसीने तुम्हें धरती में फैलाया है और उसी की ओर एकत्र किये जाओगे।
وَهُوَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ وَلَهُ اخْتِلَافُ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴾ 80 ﴿
व हुवल्लज़ी युह़्यी व युमीतु व लहुख्तिलाफुल – लैलि वन्नहारि, अ – फ़ला तअ्किलून
तथा वही है, जो जीवन देता और मारता है और उसी के अधिकार में है रात्रि तथा दिन का फेर-बदल, तो क्या तुम समझ नहीं रखते?
بَلْ قَالُوا مِثْلَ مَا قَالَ الْأَوَّلُونَ ﴾ 81 ﴿
बल् कालू मिस् – ल मा कालल् – अव्वलून
बल्कि उन्होंने वही बात कही, जो अगलों ने कही।
قَالُوا أَإِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ ﴾ 82 ﴿
कालू अ – इज़ा मित्ना व कुन्ना तुराबंव् – व अिज़ामन् अ- इन्ना लमब् अूसून
उन्होंने कहाः क्या जब हम मर जायेंगे और मिट्टी तथा हड्डियाँ हो जायेंगे, तो क्या हम फिर अवश्य जीवित किये जायेंगे?
لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَآبَاؤُنَا هَٰذَا مِن قَبْلُ إِنْ هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ ﴾ 83 ﴿
ल – क़द् वुअिदना नह्नु व आबाउना हाज़ा मिन् क़ब्लु इन् हाजा इल्ला असातीरूल – अव्वलीन
हमें तथा हमारे पूर्वजों को इससे पहले यही वचन दिया जा चुका है, ये तो बस अगलों की कल्पित कथाएँ हैं।
قُل لِّمَنِ الْأَرْضُ وَمَن فِيهَا إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴾ 84 ﴿
कुल लि-मनिल् अर्जु व मन् फ़ीहा इन् कुन्तुम् तअ्लमून
(हे नबी!) उनसे कहोः किसकी है धरती और जो उसमें है, यदि तुम जानते हो?
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴾ 85 ﴿
स- यकूलू – न लिल्लाहि, कुल अ- फ़ला तज़क्करून
वे कहेंगे कि अल्लाह की। आप कहिएः फिर तुम क्यों शिक्षा ग्रहण नहीं करते?
قُلْ مَن رَّبُّ السَّمَاوَاتِ السَّبْعِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ ﴾ 86 ﴿
कुल मर्रब्बुस्समावातिस्- सब्अि व रब्बुल्-अ़र्शिल-अ़ज़ीम
आप पूछिए कि कौन है सातों आकाशों का स्वामी तथा महा सिंहासन का स्वामी?
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 87 ﴿
स- यकूलू – न लिल्लाहि, कुल अ फ़ला तत्तकून
वे कहेंगेः अल्लाह है। आप कहिएः फिर तुम उससे डरते क्यों नहीं हो?
قُلْ مَن بِيَدِهِ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴾ 88 ﴿
कुल मम् – बि- यदिही म – लकूतु कुल्लि शैइंव्व हु – व युजीरू व ला युजारू अ़लैहि इन् कुन्तुम् तअ्लमून
आप उनसे कहिए कि किसके हाथ में है, प्रत्येक वस्तु का अधिकार? और वह शरण देता है और उसे कोई शरण नहीं दे सकता, यदि तुम ज्ञान रखते हो?
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ فَأَنَّىٰ تُسْحَرُونَ ﴾ 89 ﴿
स- यकूलू – न लिल्लाहि, कुल फ़-अन्ना तुस्हरून
वे अवश्य कहेंगे कि (ये सब गुण) अल्लाह ही के हैं। आप कहिएः फिर तुमपर कहाँ से जादू[1] हो जाता है? 1. अर्थात जब यह मानते हो कि सब अधिकार अल्लाह के हाथ में है और शरण भी वही देता है तो फिर उस के साझी कहाँ से आ गये और उन्हें कहाँ से अधिकार मिल गया?
بَلْ أَتَيْنَاهُم بِالْحَقِّ وَإِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ ﴾ 90 ﴿
बल् अतैनाहुम् बिल्हक्कि व इन्नहुम् लकाज़िबून
बल्कि हमने उन्हें सत्य पहुँचा दिया है और निश्चय यही मिथ्यावादी हैं।
مَا اتَّخَذَ اللَّهُ مِن وَلَدٍ وَمَا كَانَ مَعَهُ مِنْ إِلَٰهٍ ۚ إِذًا لَّذَهَبَ كُلُّ إِلَٰهٍ بِمَا خَلَقَ وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ ﴾ 91 ﴿
मत्त – ख़ज़ल्लाहु मिंव्व – लदिंव् व मा का-न म-अ़हू मिन् इलाहिन् इज़ल् ल-ज़-ह-ब कुल्लु इलाहिम् – बिमा ख़-ल-क़ व ल – अ़ला बअ्जुहुम् अ़ला बअ्जिन, सुब्हानल्लाहि अ़म्मा यसिफून
अल्लाह ने नहीं बनाया है अपनी कोई संतान और न उसके साथ कोई अन्य पूज्य है। यदि ऐसा होता, तो प्रत्येक पूज्य अलग हो जाता अपनी उत्पत्ति को लेकर और एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ता। पवित्र है अल्लाह उन बातों से, जो ये सब लोग बनाते हैं।
عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴾ 92 ﴿
आ़लिमिल्-ग़ैबि वश्शहा दति फ़ तआ़ला अ़म्मा युश्रिकून *
वह परोक्ष (छुपे) तथा प्रत्यक्ष (खुले) का ज्ञानी है तथा उच्च है, उस शिर्क से, जो वे करते हैं।
قُل رَّبِّ إِمَّا تُرِيَنِّي مَا يُوعَدُونَ ﴾ 93 ﴿
कुर्रब्बि इम्मा तुरियन्नी मा यूअ़दून
(हे नबी!) आप प्रार्थना करें कि हे मेरे पालनहार! यदि तू मुझे वह दिखाये, जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही है।
رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِي فِي الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 94 ﴿
रब्बि फ़ला तज्अ़ल्नी फ़िल्- क़ौमिज़्ज़ालिमीन
तो मेरे पालनहार! मुझे इन अत्याचारियों में सम्मिलित न करना।
وَإِنَّا عَلَىٰ أَن نُّرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَادِرُونَ ﴾ 95 ﴿
व इन्ना अ़ला अन् नुरि-य-क मा नअिदुहुम् लकादिरून
तथा वास्तव में, हम आपको उसे दिखाने पर, जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही है, अवश्य सामर्थ्यवान हैं।
ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ السَّيِّئَةَ ۚ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ ﴾ 96 ﴿
इद् फ़अ् बिल्लती हि – य अह्सनुस्सय्यि अ-त, नह्नु अअ्लमु बिमा यसिफून
(हे नबी!) आप दूर करें उस (व्यवहार) से जो उत्तम हो, बुराई को। हम भली-भाँति अवगत हैं, उन बातों से जो वे बनाते हैं।
وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ ﴾ 97 ﴿
व कुर्रब्बि अअूजु बि-क मिन् ह-मज़ातिश् शयातीन
तथा आप प्रार्थना करें कि हे मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण माँगता हूँ, शैतानों की शंकाओं से।
وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ ﴾ 98 ﴿
व अअूजु बि-क रब्बि अंय्यह्जुरून
तथा मैं तेरी शरण माँगता हूँ, मेरे पालनहार! कि वे मेरे पास आयें।
حَتَّىٰ إِذَا جَاءَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِ ﴾ 99 ﴿
हत्ता इज़ा जा-अ अ-ह दहुमुल् मौतु का-ल रब्बिरजिअून
यहाँतक कि जब उनमें किसी की मौत आने लगे, तो कहता हैः मेरे पालनहार! मुझे (संसार में) वापस कर दे[1]। 1. यहाँ मरण के समय काफ़िर की दशा को बताया जा रहा है। (इब्ने कसीर)
لَعَلِّي أَعْمَلُ صَالِحًا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّا ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَائِلُهَا ۖ وَمِن وَرَائِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ ﴾ 100 ﴿
लअ़ल्ली अअ्मलु सालिहन् फ़ीमा तरक्तु कल्ला, इन्नहा कलि – मतुन् हु-व क़ाइलुहा व मिंव्वरा – इहिम् बर् – ज़खुन् इला यौमि युब्अ़सून
संभवतः, मैं अच्छा कर्म करूँगा, उस (संसार में) जिसे छोड़ आया हूँ! कदापि ऐसा नहीं होगा! वह केवल एक कथन है, जिसे वह कह रहा[1] है और उनके पीछे एक आड़[2] है, उनके पुनः जीवित किये जाने के दिन तक। 1. अर्थात उस के कथन का कोई प्रभाव नहीं होगा। 2. आड़ जिस के लिये बर्ज़ख शब्द आया है, उस अवधि का नाम है जो मृत्यु तथा प्रलय के बीच होगी।
فَإِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ فَلَا أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَاءَلُونَ ﴾ 101 ﴿
फ़-इज़ा नुफ़ि-ख़ फ़िस्सूरि फ़ला अन्सा – ब बैनहुन् यौमइजिंव् – व ला य – तसा – अलून
तो जब नरसिंघा में फूँक दिया जायेगा, तो कोई संबन्ध नहीं होगा, उनके बीच, उस[1] दिन और न वे एक-दूसरे को पूछेंगे। 1. अर्थात प्रलय के दिन। उस दिन भय के कारण सब को अपनी चिन्ता होगी।
فَمَن ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ﴾ 102 ﴿
फ़- मन् सकुलत् मवाजीनुहू फ़-उलाइ-क हुमुल् – मुफ्लिहून
फिर जिसके पलड़े भारी होंगे, वही सफल होने वाले हैं।
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ فِي جَهَنَّمَ خَالِدُونَ ﴾ 103 ﴿
व मन् ख़फ़्फ़त् मवाज़ीनुहू फ़-उलाइ-कल्लज़ी-न ख़सिरू अन्फु-सहुम् फ़ी जहन्न-म ख़ालिदून
और जिसके पलड़े हल्क होंगे, तो उन्होंने ही स्वयं को क्षतिग्रस्त कर लिया, (तथा वे) नरक में सदावासी होंगे।
تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ النَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَالِحُونَ ﴾ 104 ﴿
तल्फ़हु वुजू- हहुमुन्नारु व हुम् फीहा कालिहून
झुलसा देगी उनके चेहरों को अग्नि तथा उसमें उनके जबड़े (झुलसकर) बाहर निकले होंगे।
أَلَمْ تَكُنْ آيَاتِي تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ ﴾ 105 ﴿
अलम् तकुन् आयाती तुत्ला अ़लैकुम् फ़कुन्तुम् बिहा तुकज्ज़िबून
(उनसे कहा जायेगाः) क्या जब मेरी आयतें तुम्हें सुनाई जाती थीं, तो तुम उनको झुठलाते नहीं थे?
قَالُوا رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَالِّينَ ﴾ 106 ﴿
कालू रब्बना ग-लबत् अ़लैना शिक्वतुना व कुन्ना क़ौमन् ज़ाल्लीन
वे कहेंगेःहमारे पालनहार! हमरा दुर्भाग्य हमपर छा गया[1] और वास्तव में, हम कुपथ थे। 1. अर्थात अपने दुर्भाग्य के कारण हम ने तेरी आयतों को अस्वीकार कर दिया।
رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَالِمُونَ ﴾ 107 ﴿
रब्बना अख़रिज्ना मिन्हा फ़-इन् अुद्ना फ़-इन्ना ज़ालिमून
हमारे पालनहार! हमें इससे निकाल दे, यदि अब हम ऐसा करें, तो निश्चय हम अत्याचारी होंगे।
قَالَ اخْسَئُوا فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ ﴾ 108 ﴿
कालख़्सऊ फ़ीहा व ला तुकल्लिमून
वह (अल्लाह) कहेगाः इसीमें अपमानित होकर पड़े रहो और मुझसे बात न करो।
إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ ﴾ 109 ﴿
इन्नहु काना फ़रीकुन मिन इबादी यक़ूलूना रब्बना आमन्ना फ़ग़फ़िर लना वरहमना वा अंता ख़ैरुर राहिमीन।
मेरे भक्तों में एक समुदाय था, जो कहता था कि हमारे पालनहार! हम ईमान लाये। तू हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर और तू सब दयावानों से उत्तम है।
فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِي وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ ﴾ 110 ﴿
फ़त्त – ख़ज्तुमूहुम् सिख़रिय्यन् हत्ता अन्सौकुम् ज़िक्री व कुन्तुम् मिन्हुम् तज़्हकून
तो तुमने उनका उपहास किया, यहाँ तक कि उन्होंने तुम्हें मेरी याद भुला दी और तुम उनपर हँसते रहे।
إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ ﴾ 111 ﴿
इन्नी जज़ैतुहुमुल-यौ-म बिमा स-बरू अन्नहुम् हुमुल् – फ़ाइजून
मैंने उन्हें आज बदला (प्रतिफल) दे दिया है उनके धैर्य का, वास्तव में, वही सफल हैं।
قَالَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِي الْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ ﴾ 112 ﴿
क़ाला कम लबिस्तुम फ़िल अरज़ि अददा सिनी़न
(अल्लाह) उनसे कहेगाः तुम धरती में कितने वर्ष रहे?
قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَاسْأَلِ الْعَادِّينَ ﴾ 113 ﴿
क़ालू लबिस्ना यौमन् औ बअू – ज़ यौमिन् फ़स्अलिल्-आ़द्दीन
वे कहेंगेः हम एक दिन या दिन के कुछ भाग रहे। तो गणना करने वालों से पूछ लें।
قَالَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ لَّوْ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴾ 114 ﴿
क़ा-ल इल्लबिस्तुम् इल्ला कलीलल्-लौ अन्नकुम् कुन्तुम् तअ्लमून
वह कहेगाः तुम नहीं रहे, परन्तु बहुत कम। क्या ही अच्छा होता कि तुमने (पहले ही) जान लिया[1] होता। 1. आयत का भावार्थ यह है कि यदि तुम यह जानते कि परलोक का जीवन स्थायी है तथा संसार का अस्थायी तो आज तुम भी ईमान वालों के समान अल्लाह की आज्ञा का पालन कर के सफल हो जाते, और अवज्ञा तथा दुराचार न करते।
أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَاكُمْ عَبَثًا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ ﴾ 115 ﴿
अ-फ़-हसिब्तुम् अन्नमा ख़लक़्नाकुम् अ़-बसंव् – व अन्नकुम् इलैना ला तुर्जअून
क्या तुमने समझ रखा है कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और तुम हमारी ओर फिर नहीं लाये[1] जाओगे? 1. अर्थात परलोक में।
فَتَعَالَى اللَّهُ الْمَلِكُ الْحَقُّ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيمِ ﴾ 116 ﴿
फ़-तआ़लल्लाहुल् -मलिकुल- हक़्कु ला इला-ह इल्ला हु-व रब्बुल अ़र्शिल् – करीम
तो सर्वोच्च है अल्लाह वास्तविक अधिपति। नहीं है कोई सच्चा पूज्य, परन्तु वही महिमावान अर्श (सिंहासन) का स्वामी।
وَمَن يَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ لَا بُرْهَانَ لَهُ بِهِ فَإِنَّمَا حِسَابُهُ عِندَ رَبِّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ ﴾ 117 ﴿
व मंय्यद्अु मअ़ल्लाहि इलाहन् आख़-र ला बुरहा-न लहू बिही फ़ इन्नमा हिसाबुहू अिन् – द रब्बिही, इन्नहू ला युफ्लिहुल्-काफ़िरून
और जो (भी) पुकारेगा अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को, जिसके लिए उसके पास कोई प्रमाण नहीं, तो उसका ह़िसाब केवल उसके पालनहार के पास है, वास्तव में, काफ़िर सफव नहीं[1] होंगे। 1. अर्थात परलोक में उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होगी, और न मुक्ति ही मिलेगी।