सूरह आराफ के संक्षिप्त विषय
यह सूरह मक्की है, इस में 206 आयतें हैं।
- इस में “आराफ़” की चर्चा है इस लिये इस का नाम सूरह आराफ़ है।
- इस में अल्लाह के भेजे हुये नबी का अनुसरण करने पर बल दिया गया है, जिस में डराने तथा सावधान करने की भाषा अपनाई गई है।
- इस में आदम (अलैहिस्सलाम) को शैतान के धोखा देने का वर्णन किया गया है ताकि मनुष्य उस से सावधान रहे। इस में यह बताया गया है कि अगले नबियों की जातियाँ नबियों के विरोध का दुष्परिणाम देख चुकी है, फिर अहले किताब को संबोधित किया गया है और एक जगह पूरे संसार वासियों को संबोधित किया गया है।
- इस में बताया गया है कि सभी नबियों ने एक अल्लाह की वंदना की, और उसी की ओर बुलाया और सब का मूल धर्म एक है।
- इस में यह भी बताया गया है कि ईमान लाने के पश्चात् निफ़ाक़ (द्विधा) का क्या दुष्परिणाम होता है और वचन तोड़ने का अन्त क्या होता है।
- सूरह के अन्त में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आप के साथियों को उपदेश देने के कुछ गुण बताये गये हैं और विरोधियों की बातों को सहन करने तथा उत्तोजित हो कर ऐसा कार्य करने से रोका गया है जो इस्लाम के लिये हानिकारक हो।
सूरह अल-आराफ़ | Surah Al Araf in Hindi
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
كِتَابٌ أُنزِلَ إِلَيْكَ فَلَا يَكُن فِي صَدْرِكَ حَرَجٌ مِّنْهُ لِتُنذِرَ بِهِ وَذِكْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ ﴾ 2 ﴿
किताबुन उन्ज़ि-ल इलै-क फला यकुन् फ़ी सदरि-क ह-रजुम् मिन्हु लितुन्ज़ि-र बिही व ज़िक्रा लिल्मु अ्मिनीन
ये पुस्तक है, जो आपकी ओर उतारी गयी है। अतः (हे नबी!) आपके मन में इससे कोई संकोच न हो, ताकि आप इसके द्वारा सावधान करें[1]और ईमान वालों के लिए उपदेश है। 1. अर्थात अल्लाह के इन्कार और उस के दुष्परिणाम से।
اتَّبِعُوا مَا أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ وَلَا تَتَّبِعُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ ۗ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ ﴾ 3 ﴿
इत्तबिअू मा उन्ज़ि-ल इलैकुम् मिर्रब्बिकुम् वला तत्तबिअू मिन् दूनिही औलिया-अ, क़लीलम् मा तज़क्करून
(हे लोगो!) जो तुम्हारे पालनहार की ओर से तुमपर उतारा गया है, उसपर चलो और उसके सिवा दूसरे सहायकों के पीछे न चलो। तुम बहुत थोड़ी शिक्षा लेते हो।
وَكَم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا فَجَاءَهَا بَأْسُنَا بَيَاتًا أَوْ هُمْ قَائِلُونَ ﴾ 4 ﴿
व कम् मिन् क़र् यतिन् अह़्लक्नाहा फ़जा-अहा बअ्सुना बयातन् औ हुम् क़ा-इलून
तथा बहुत सी बस्तियाँ हैं, जिन्हें हमने ध्वस्त कर दिया है, उनपर हमारा प्रकोप अकस्मात रात्रि में आया या जब वे दोपहर के समय आराम कर रहे थे।
فَمَا كَانَ دَعْوَاهُمْ إِذْ جَاءَهُم بَأْسُنَا إِلَّا أَن قَالُوا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ ﴾ 5 ﴿
फ़मा का-न दअ्वाहुम् इज़् जा-अहुम् बअ्सुना इल्ला अन् क़ालू इन्ना कुन्ना ज़ालिमीन
और जब उनपर हमारा प्रकोप आ पड़ा, तो उनकी पुकार यही थी कि वास्तव में हम ही अत्याचारी[1] थे। 1. अर्थात अपनी हठधर्मी को उस समय स्वीकार किया।
فَلَنَسْأَلَنَّ الَّذِينَ أُرْسِلَ إِلَيْهِمْ وَلَنَسْأَلَنَّ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 6 ﴿
फ़-लनस्-अलन्नल्लज़ी-न उरसि-ल इलैहिम् व ल-नस्-अलन्नल् मुरसलीन
तो हम उनसे अवश्य प्रश्न करेंगे, जिनके पास रसूलों को भेजा गया तथा रसूलों से भी अवश्य[1] प्रश्न करेंगे। 1. अर्थात प्रयल के दिन उन समुदायों से प्रश्न किया जायेगा कि तुम्हारे पास रसूल आये या नहीं? वह उत्तर देंगेः आये थे। परन्तु हम ही अत्याचारी थे। हम ने उन की एक न सुनी। फिर रसूलों से प्रश्न किया जायेगा कि उन्हों ने अल्लाह का संदेश पहुँचाया या नहीं? तो वह कहेंगेः अवश्य हम ने तेरा संदेश पहुँचा दिया।
فَلَنَقُصَّنَّ عَلَيْهِم بِعِلْمٍ ۖ وَمَا كُنَّا غَائِبِينَ ﴾ 7 ﴿
फ-ल-नक़ु स्सन् न अलैहिम् बिअिल्मिंव्-व मा कुन्ना ग़ा-इबीन
फिर हम अपने ज्ञान से उनके समक्ष वास्तविक्ता का वर्णन कर देंगे तथा हम अनुपस्थित नहीं थे।
وَالْوَزْنُ يَوْمَئِذٍ الْحَقُّ ۚ فَمَن ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ﴾ 8 ﴿
वल्वज़्-नु यौमइज़ि-निल्हक़्क़ु फ़-मन् सक़ुलत् मवाज़ीनुहू फ़-उलाइ-क हुमुल्-मुफ्लिहून
तथा उस (प्रलय के) दिन (कर्मों की) तोल न्याय के साथ होगी। फिर जिसके पलड़े भारी होंगे, वही सफल होंगे।
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُم بِمَا كَانُوا بِآيَاتِنَا يَظْلِمُونَ ﴾ 9 ﴿
व मन् ख़फ्फत् मवाज़ीनुहू फ़-उला-इकल्लज़ी-न ख़सिरू अन्फु-सहुम् बिमा कानू बिआयातिना यज़्लिमून
और जिनके पलड़े हलके होंगे, वही स्वयं को क्षति में डाल लिए होंगे। क्योंकि वे हमारी आयतों के साथ अत्याचार करते[1] रहे। 1. भावार्थ यह है कि यह अल्लाह का नियम है कि प्रत्येक व्यक्ति तथा समुदाय को उन के कर्मानुसार फल मिलेगा। और कर्मों की तौल के लिये अल्लाह ने नाप निर्धारित कर दी है।
وَلَقَدْ مَكَّنَّاكُمْ فِي الْأَرْضِ وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَايِشَ ۗ قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ ﴾ 10 ﴿
व-ल-क़द् मक्कन्नाकुम् फ़िलअर्ज़ि व जअ़ल्ना लकुम् फ़ीहा मआयि-श, क़लीलम् मा तश्कुरून
तथ हमने तुम्हें धरती में अधिकार दिया और उसमें तुम्हारे लिए जीवन के संसाधन बनाये। तुम थोड़े ही कृतज्ञ होते हो।
وَلَقَدْ خَلَقْنَاكُمْ ثُمَّ صَوَّرْنَاكُمْ ثُمَّ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ لَمْ يَكُن مِّنَ السَّاجِدِينَ ﴾ 11 ﴿
व ल-क़द् ख़लक़्नाकुम् सुम्-म सव्वर्नाकुम् सुम्-म क़ुल्ना लिल्मलाइ कतिस्जुदू लिआद-म, फ़-स-जदू इल्ला इब्ली-स, लम् यकुम् मिनस्साजिदीन
और हमने तुम्हें पैदा किया[1], फिर तुम्हारा रूप बनाया, फिर हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया। वह सज्दा करने वालों में से न हुआ। 1. अर्थात मूल पुरुष आदम को अस्तित्व दिया।
قَالَ مَا مَنَعَكَ أَلَّا تَسْجُدَ إِذْ أَمَرْتُكَ ۖ قَالَ أَنَا خَيْرٌ مِّنْهُ خَلَقْتَنِي مِن نَّارٍ وَخَلَقْتَهُ مِن طِينٍ ﴾ 12 ﴿
क़ा-ल मा म-न-अ-क अल्ला तस्जु-द इज़् अमरतु-क, क़ा-ल अ-ना ख़ैरूम्-मिन्हु, ख़लक़्तनी मिन् नारिंव्-व ख़लक़्तहू मिन् तीन
अल्लाह ने उससे कहाः किस बात ने तुझे सज्दा करने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था? उसने कहाः मैं उससे उत्तम हूँ। मेरी रचना तूने अग्नि से की है और उसकी मिट्टी से।
قَالَ فَاهْبِطْ مِنْهَا فَمَا يَكُونُ لَكَ أَن تَتَكَبَّرَ فِيهَا فَاخْرُجْ إِنَّكَ مِنَ الصَّاغِرِينَ ﴾ 13 ﴿
क़ा-ल फ़ह़्बित् मिन्हा फ़मा यकूनु ल-क अन् त-तकब्ब -र फ़ीहा फख़्रुज् इन्न-क मिनस्साग़िरीन
तो अल्लाह ने कहाः इस (स्वर्ग) से उतर जा। तेरे लिए ये योग्य नहीं कि इसमें घमण्ड करे। तू निकल जा। वास्तव में, तू अपमानितों में है।
قَالَ أَنظِرْنِي إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ ﴾ 14 ﴿
क़ा-ल अन्ज़िरनी इला यौमि युब्अ़सून
उसने कहाः मुझे उस दिन तक के लिए अवसर दे दो, जब लोग फिर जीवित किये जायेंगे।
قَالَ إِنَّكَ مِنَ الْمُنظَرِينَ ﴾ 15 ﴿
क़ा-ल इन्न-क मिनल् मुन्ज़रीन
अल्लाह ने कहाः तुझे अवसर दिया जा रहा है।
قَالَ فَبِمَا أَغْوَيْتَنِي لَأَقْعُدَنَّ لَهُمْ صِرَاطَكَ الْمُسْتَقِيمَ ﴾ 16 ﴿
क़ा-ल फबिमा अग़्वैतनी ल-अक़्अुदन्-न लहुम् सिरा-तकल् मुस्तक़ीम
उसने कहाः तो जिस प्रकार तूने मुझे कुपथ किया है, मैंभी तेरी सीधी राह पर इनकी घात में लगा रहूँगा।
ثُمَّ لَآتِيَنَّهُم مِّن بَيْنِ أَيْدِيهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ وَعَنْ أَيْمَانِهِمْ وَعَن شَمَائِلِهِمْ ۖ وَلَا تَجِدُ أَكْثَرَهُمْ شَاكِرِينَ ﴾ 17 ﴿
सुम्-म लआतियन्नहुम् मिम्-बैनि ऐदीहिम् व मिन् ख़ल्फ़िहिम् व अन् ऐमानिहिम् व अन् शमा-इलिहिम्, व ला तजिदु अक्स-रहुम् शाकिरीन
फिर उनके पास उनके आगे और पीछे तथा दायें और बायें से आऊँगा[1] और तू उनमें से अधिक्तर को (अपना) कृतज्ञ नहीं पायेगा[2]। 1. अर्थात प्रत्येक दिशा से घेरूँगा और कुपथ करूँगा। 2. शैतान ने अपना विचार सच्च कर दिखाया और अधिक्तर लोग उस के जाल में फंस कर शिर्क जैसे महा पाप में पड़ गये। (देखियेः सूरह सबा, आयतः20)
قَالَ اخْرُجْ مِنْهَا مَذْءُومًا مَّدْحُورًا ۖ لَّمَن تَبِعَكَ مِنْهُمْ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكُمْ أَجْمَعِينَ ﴾ 18 ﴿
क़ालख़्रुज मिन्हा मज़्ऊ मम्-मद्हूरन्, ल-मन् तबि-अ-क मिन्हुम् लअम्-लअन्-न जहन्न-म मिन्कुम अज्मईन
अल्लाह ने कहाः यहाँ से अपमानित धिक्कारा हुआ निकल जा। जो भी उनमें से तेरी राह चलेगा, तो मैं तुम सभी से नरक को अवश्य भर दूँगा।
وَيَا آدَمُ اسْكُنْ أَنتَ وَزَوْجُكَ الْجَنَّةَ فَكُلَا مِنْ حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَٰذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ الظَّالِمِينَ ﴾ 19 ﴿
व या आदमुस्कुन् अन्-त व ज़ौजुकल्जन्न-त फ़-कुला मिन् हैसु शिअ्तुमा व ला तक़्रबा हाज़िहिश्-श-ज-र-त फ़-तकूना मिनज़्-ज़ालिमीन
और हे आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी स्वर्ग में रहो और जहाँ से चाहो, खाओ और इस वृक्ष के समीप न जाना, अन्यथा अत्याचरियों में हो जाओगे।
فَوَسْوَسَ لَهُمَا الشَّيْطَانُ لِيُبْدِيَ لَهُمَا مَا وُورِيَ عَنْهُمَا مِن سَوْآتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَاكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هَٰذِهِ الشَّجَرَةِ إِلَّا أَن تَكُونَا مَلَكَيْنِ أَوْ تَكُونَا مِنَ الْخَالِدِينَ ﴾ 20 ﴿
फ़-वस्व-स लहुमश्-शैतानु लियुब्दि-य लहुमा मा वूरि-य अन्हुमा मिन् सौअतिहिमा व क़ा-ल मा नहाकुमा रब्बुकुमा अन् हाज़िहिश्श-ज-रति इल्ला अन् तकूना म-लकैनि औ तकूना मिनल्ख़ालिदीन
तो शैतान ने दोनों को संशय में डाल दिया, ताकि दोनों के लिए उनके गुप्तांगों को खोल दे, जो उनसे छुपाये गये थे और कहाः तुम्हारे पालनहार ने तुम दोनों को इस वृक्ष से केवल इसलिए रोक दिया है कि तुम दोनों फ़रिश्ते अथवा सदावासी हो जाओगे।
وَقَاسَمَهُمَا إِنِّي لَكُمَا لَمِنَ النَّاصِحِينَ ﴾ 21 ﴿
व क़ा-स-महुमा इन्नी लकुमा लमिनन्नासिहीन
तथा दोनों के लिए शपथ दी कि वास्तव में, मैं तुम दोनों का हितैषी हूँ।
فَدَلَّاهُمَا بِغُرُورٍ ۚ فَلَمَّا ذَاقَا الشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْآتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ الْجَنَّةِ ۖ وَنَادَاهُمَا رَبُّهُمَا أَلَمْ أَنْهَكُمَا عَن تِلْكُمَا الشَّجَرَةِ وَأَقُل لَّكُمَا إِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمَا عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴾ 22 ﴿
फ़दल्लाहुमा बिग़ुरूरिन्, फ़-लम्मा ज़ाक़श्श-ज-र-त बदत् लहुमा सौआतुहुमा व तफ़िक़ा यख़्सिफ़ानि अलैहिमा मिंव्व-रक़िल्-जन्नति, व नादाहुमा रब्बुहुमा अलम् अन्हकुमा अन् तिल्कुमश्श-ज-रति व अक़ुल् – लकुमा इन्नश्शैता-न लकुमा अदुव्वुम् मुबीन
तो उन दोनों को धोखे से रिझा लिया। फिर जब दोनों ने उस वृक्ष का स्वाद लिया, तो उनके लिए उनके गुप्तांग खुल गये और वे उनपर स्वर्ग के पत्ते चिपकाने लगे और उन्हें उनके पालनहार ने आवाज़ दीः क्या मैंने तुम्हें इस वृक्ष से नहीं रोका था और तुम दोनों से नहीं कहा था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है?
قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ ﴾ 23 ﴿
क़ाला रब्बना ज़लम्-ना अन्फु-सना, व इल्लम् तग़फ़िर् लना व तरहम्-ना ल-नकूनन्-न मिनल् ख़ासिरीन
दोनों ने कहाः हे हमारे पालनहार! हमने अपने ऊपर अत्याचार कर लिया और यदि तू हमें क्षमा तथा हमपर दया नहीं करेगा, तो हम अवश्य ही नाश हो[1] जायेंगे। 1. अर्थात आदम तथा ह़व्वा ने अपने पाप के लिये अल्लाह से क्षमा मांग ली। शैतान के समान अभिमान नहीं किया।
قَالَ اهْبِطُوا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ ۖ وَلَكُمْ فِي الْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَمَتَاعٌ إِلَىٰ حِينٍ ﴾ 24 ﴿
क़ालह़्बितू बअ्ज़ुकुम् लि-बअ्ज़िन् अ़दुव्वुन्, व लकुम् फ़िलअर्ज़ि मुस्तक़र्रूंव्-व मताअुन् इला हीन
उसने कहाः तुम सब उतरो, तुम एक-दूसरे के शत्रु हो और तुम्हारे लिए धरती में रहना और एक निर्धारित समय तक जीवन का साधन है।
قَالَ فِيهَا تَحْيَوْنَ وَفِيهَا تَمُوتُونَ وَمِنْهَا تُخْرَجُونَ ﴾ 25 ﴿
क़ा-ल फ़ीहा तह़्यौ-न व फ़ीहा तमूतू-न व मिन्हा तुख़रजून
तथा कहाः तुम उसीमें जीवित रहोगे, उसीमें मरोगे और उसीसे (फिर) निकाले जाओगे।
يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا ۖ وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ ﴾ 26 ﴿
या बनी आद-म क़द् अन्ज़ल्ना अ़लैकुम् लिबासंय्युवारी सौआतिकुम् वरीशन्, व लिबासुत्तक़्वा, ज़ालि-क खैरून, ज़ालि-क मिन् आयातिल्लाहि लअल्लहुम यज़्ज़क्करून
हे आदम के पुत्रो! हमने तुमपर ऐसा वस्त्र उतार दिया है, जो तुम्हारे गुप्तांगों को छुपाता तथा शोभा है और अल्लाह की आज्ञाकारिता का वस्त्र ही सर्वोत्तम है। ये अल्लाह की आयतों में से एक है, ताकि वे शिक्षा लें[1]। 1. तथा उस के आज्ञाकारी एवं कृतज्ञ बनें।
يَا بَنِي آدَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطَانُ كَمَا أَخْرَجَ أَبَوَيْكُم مِّنَ الْجَنَّةِ يَنزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْآتِهِمَا ۗ إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ ۗ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ ﴾ 27 ﴿
या बनी आद-म ला यक्तिनन्नकुमुश्शैतानु कमा अख़्र-ज अ-बवैकुम् मिनल्जन्नति यन्ज़िअु अन्हुमा लिबा- सहुमा लियुरि-यहुमा सौआतिहिमा, इन्नहू यराकुम् हु- व वक़बीलुहू मिन्हैसु ला तरौनहुम्, इन्ना जअ़ल्नश्शयाती-न औलिया-अ लिल्लज़ी-न ला युअ्मिनून
हे आदम के पुत्रो! ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें बहका दे, जैसे तुम्हारे माता-पिता को स्वर्ग से निकाल दिया, उनके वस्त्र उतरवा दिये, ताकि उन्हें उनके गुप्तांग दिखा दे। वास्तव में, वह तथा उसकी जाति, तुम्हें ऐसे स्थान से देखती है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते। वास्तव में, हमने शैतानों को उनका सहायक बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते।
وَإِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً قَالُوا وَجَدْنَا عَلَيْهَا آبَاءَنَا وَاللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا ۗ قُلْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ ۖ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴾ 28 ﴿
व इज़ा फ़-अलू फ़ाहि-शतन् क़ालू वजद्-ना अ़लैहा आबा-अना वल्लाहु अ-म-रना बिहा, क़ुल इन्नल्ला-ह ला यअ्मुरू बिल्फह़्शा-इ, अ-तक़ूलू-न अलल्लाहि मा ला तअ्लमून
तथा जब वे (मुश्रिक) कोई निर्लज्जा का काम करते हैं, तो कहते हैं कि इसी (रीति) पर हमने अपने पूर्वजों को पाया है तथा अल्लाह ने हमें इसका आदेश दिया है। (हे नबी!) आप उनसे कह दें कि अल्लाह कभी निर्लज्जा का आदेश नहीं देता। क्या तुम अल्लाह पर ऐसी बात का आरोप धरते हो, जिसे तुम नहीं जानते?
قُلْ أَمَرَ رَبِّي بِالْقِسْطِ ۖ وَأَقِيمُوا وُجُوهَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۚ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَv ﴾ 29 ﴿
क़ुल् अ-म-र रब्बी बिल्क़िस्ति, व अक़ीमू वुजूहकुम् अिन्-द कुल्लि मस्जिदिंव-वद्अुहु मुख़्लिसी-न लहुद्दी-न, कमा ब-द-अकुम् तअूदून
आप उनसे कह दें कि मेरे पालनहार ने न्याय का आदेश दिया है। (और वो ये है कि) प्रत्येक मस्जिद में नमाज़ के समय अपना ध्यान सीधे उसी की ओर करो[1] और उसके लिए धर्म को विशुध्द करके उसी को पुकारो। जिस प्रकार, उसने तुम्हें पहले पैदा किया है, उसी प्रकार, (प्रलय में) फिर जीवित कर दिये जाओगे। 1. इस आयत में सत्य धर्म के निम्नलिखित तीन मूल नियम बताये गये हैः कर्म में संतुलन, वंदना में अल्लाह की ओर ध्यान तथा धर्म में विशुध्दता तथा एक अल्लाह की वंदना करना।
فَرِيقًا هَدَىٰ وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيْهِمُ الضَّلَالَةُ ۗ إِنَّهُمُ اتَّخَذُوا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ اللَّهِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ ﴾ 30 ﴿
फ़रीक़न् हदा व फ़रीक़न् हक़्-क़ अलैहिमुज़्ज़लालतु, इन्नहुमुत्त ख़ज़ुश्शयाती-न औलिया-अ मिन् दूनिल्लाहि व यह़्सबू-न अन्नहुम् मुह़्तदून
एक समुदाय को उसने सुपथ दिखा दिया और दूसरा समुदाय कुपथ पर स्थित रह गया। वास्तव में, इन लोगों ने अल्लाह के सिवा शैतानों को सहायक बना लिया, फिर भी वे समझते हैं कि वास्तव में वही सुपथ पर हैं।
يَا بَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ ﴾ 31 ﴿
या बनी आद-म ख़ुज़ू ज़ीन-तकुम् अिन्-द कुल्लि मस्जिदिंव्-व कुलू वश्रबू व ला तुस्रिफू, इन्नहू ला युहिब्बुल मुस्रिफीन*
हे आदम के पुत्रो! प्रत्येक मस्जिद के पास (नमाज़ के समय) अपनी शोभा धारण करो,[1] खाओ-पिओ और बेजा ख़र्च न करो। वस्तुतः, वह बेजा ख़र्च करने वालों से प्रेम नहीं करता। 1. कुरैश नग्न होकर काबा की परिकर्मा करते थे। इसी पर यह आयत उतरी।
قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ ۚ قُلْ هِيَ لِلَّذِينَ آمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا خَالِصَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴾ 32 ﴿
क़ुल् मन् हर्र-म ज़ी-नतल्लाहिल्लती अख़्र-ज लिअिबादिही वत्तय्यिबाति मिनर्रिज़्क़ि, क़ुल् हि-य लिल्लज़ी-न आमनू फ़िल्हयातिद्दुन्या ख़ालि-सतंय्यौमल्-क़ियामति, कज़ालि-क नुफस्सिलुल् -आयाति लिकौमिंय्यअ्लमून
(हे नबी!) इन (मिश्रणवादियों) से कहिए कि किसने अल्लाह की उस शोभा को ह़राम (वर्जित) किया है,[1] जिसे उसने अपने सेवकों के लिए निकाला है? तथा स्वच्छ जीविकाओं को? आप कह दें: ये सांसारिक जीवन में उनके लिए (उचित) है, जो ईमान लाये तथा प्रलय के दिन उन्हीं के लिए विशेष[2] है। इसी प्रकार, हम अपनी आयतों का सविस्तार वर्णन उनके लिए करते हैं, जो ज्ञान रखते हों। 1. इस आयत में सन्यास का खण्डन किया गया है कि जीवन के सुखों तथा शोभाओं से लभान्वित होना धर्म के विरुध्द नहीं है। इन सब से लाभान्वित होने ही में अल्लाह की प्रसन्नता है। नग्न रहना तथा संसारिक सुखों से वंचित हो जाना सत्धर्म नहीं है। धर्म की यह शिक्षा है कि अपनी शोभाओं से सुसज्जित हो कर अल्लाह की वंदना और उपासना करो। 2. एक बार नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से कहाः क्या तुम प्रसन्न नहीं हो कि संसार का काफ़िरों के लिये है और परलोक हमारे लिये। (बुख़ारीः 2468, मुस्लिमः 1479)
قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّيَ الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَالْإِثْمَ وَالْبَغْيَ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَأَن تُشْرِكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَأَن تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴾ 33 ﴿
क़ुल इन्नमा हर्र-म रब्बियल्-फवाहि-श मा ज़-ह-र मिन्हा वमा ब-त-न वल्इस्-म वल्बग्-य बिग़ैरिल्हक़्कि व अन् तुश्रिकू बिल्लाहि मा लम् युनज़्ज़िल् बिही सुल्तानंव्-व अन् तक़ूलू अलल्लाहि मा ला तअ्लमून
(हे नबी!) आप कह दें कि मेरे पालनहार ने तो केवल खुले तथा छुपे कुकर्मों, पाप तथा अवैध विद्रोह को ही ह़राम (वर्जित) किया है तथा इस बात को कि तुम उसे अल्लाह का साझी बनाओ, जिसका कोई तर्क उसने नहीं उतारा है तथा अल्लाह पर ऐसी बात बोलो, जिसे तुम नहीं जानते।
وَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ ﴾ 34 ﴿
व लिकुल्लि उम्मतिन् अ-जलुन् फ़-इज़ा जा-अ अ-जलुहुम् ला यस्तअ्खिरू-न सा-अतंव् व ला यस्तक़्दिमून
प्रत्येक समुदाय का[1] एक निर्धारित समय है, फिर जब वह समय आ जायेगा, तो क्षण भर देर या सवेर नहीं होगी। 1. अर्थात काफ़िर समुदाय की यातना के लिये।
يَا بَنِي آدَمَ إِمَّا يَأْتِيَنَّكُمْ رُسُلٌ مِّنكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آيَاتِي ۙ فَمَنِ اتَّقَىٰ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴾ 35 ﴿
या बनी आद-म इम्मा यअ्तियन्नकुम् रूसुलुम्-मिन्कुम् यक़ुस्सू-न अलैकुम् आयाती, फ-मनित्तक़ा व अस्ल-ह फला ख़ौफुन् अलैहिम् व ला हुम् यह़्ज़नून
हे आदम के पुत्रो! जब तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल आ जायें जो तुम्हें मेरी आयतें सुना रहे हों, तो जो डरेगा और अपना सुधार कर लेगा, उसके लिए कोई डर नहीं होगा और न वे[1] उदासीन होंगे। 1. इस आयत में मानव जाति के मार्गदर्शन के लिये समय समय पर रसूलों के आने के बारे में सूचित किया गया है और बताय जा रहा है कि अब इसी नियमानुसार अंतिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आ गये हैं। अतः उन की बात मान लो, अन्यथा इस का परिणाम स्वयं तुम्हारे सामने आ जायेगा।
وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ﴾ 36 ﴿
वल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना वस्तक्बरू अन्हा उलाइ-क अस्हाबुन्नारि, हुम् फ़ीहा ख़ालिदून
और जो हमारी आयतें झुठलायेंगे और उनसे घमण्ड करेंगे वही नारकी होंगे और वही उसमें सदावासी होंगे।
فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآيَاتِهِ ۚ أُولَٰئِكَ يَنَالُهُمْ نَصِيبُهُم مِّنَ الْكِتَابِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا يَتَوَفَّوْنَهُمْ قَالُوا أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ ۖ قَالُوا ضَلُّوا عَنَّا وَشَهِدُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ ﴾ 37 ﴿
फ-मन् अज़्लमु मिम्-मनिफ़्तरा अलल्लाहि कज़िबन् औ कज़्ज़-ब बिआयातिही, उलाइ-क यनालुहुम् नसीबुहुम् मिनल-किताबि, हत्ता इज़ा जाअत्हुम् रूसुलुना य-तवफ्फ़ौनहुम्, क़ालू ऐ-न मा कुन्तुम् तद्अू-न मिन् दूनिल्लाहि, क़ालू ज़ल्लू अन्ना व शहिदू अला अन्फुसिहिम् अन्नहुम् कानू काफ़िरीन
फिर उससे बड़ा अत्याचारी कौन है, जो अल्लाह पर मिथ्या बातें बनाये अथवा उसकी आयतों को मिथ्या कहे? उन्हें उनके भाग्य में लिखा भाग मिल जायेगा। यहाँ तक कि जिस समय हमारे फ़रिश्ते उनका प्राण निकालने के लिए आयेंगे, तो उनसे कहेंगे कि वे कहाँ हैं, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते थे? वे कहेंगे कि वे तो हमसे खो गये तथा अपने ही विरूध्द साक्षी (गवाह) बन जायेंगे कि वस्तुतः वे काफ़िर थे।
قَالَ ادْخُلُوا فِي أُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِكُم مِّنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ فِي النَّارِ ۖ كُلَّمَا دَخَلَتْ أُمَّةٌ لَّعَنَتْ أُخْتَهَا ۖ حَتَّىٰ إِذَا ادَّارَكُوا فِيهَا جَمِيعًا قَالَتْ أُخْرَاهُمْ لِأُولَاهُمْ رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ أَضَلُّونَا فَآتِهِمْ عَذَابًا ضِعْفًا مِّنَ النَّارِ ۖ قَالَ لِكُلٍّ ضِعْفٌ وَلَٰكِن لَّا تَعْلَمُونَ ﴾ 38 ﴿
क़ालद्ख़ुलू फी उ-ममिन् क़द् ख़लत् मिन् क़ब्लिकुम् मिनल-जिन्नि वल्इन्सि फिन्नारि, कुल्लमा द-ख़लत् उम्मतुल्ल-अनत् उख़्तहा, हत्ता इज़द्दा-रकू फीहा जमीअन्, क़ालत् उख़्राहुम् लिऊलाहुम् रब्बना हा-उला-इ अज़ल्लूना फ़आ़तिहिम् अज़ाबन् ज़िअ्फम्- मिनन्नारि, क़ा-ल लिकुल्लिन् ज़िअ्फुंव्-व लाकिल्ला तअ्लमून
अल्लाह का आदेश होगा कि तुम भी प्रवेश कर जाओ, उन समुदायों में, जो तुमसे पहले के जिन्नों और मनुष्यों में से नरक में। जब भी कोई समुदाय नरक में प्रवेश करेगा, तो अपने समान दूसरे समुदाय को धिक्कार करेगा, यहाँ तक कि जब उसमें सब एकत्र हो जायेंगे, तो उनका पिछला अपने पहले के लिए कहेगाः हे हमारे पालनहार! इन्होंने ही हमें कुपथ किया है। अतः इन्हें दुगनी यातना दे। वह (अल्लाह) कहेगाः तुममें से प्रत्येक के लिए दुगनी यातना है, परन्तु तुम्हें ज्ञान नहीं।
وَقَالَتْ أُولَاهُمْ لِأُخْرَاهُمْ فَمَا كَانَ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْسِبُونَ ﴾ 39 ﴿
व क़ालत् ऊलाहुम् लिउख़राहुम् फमा का-न लकुम् अ़लैना मिन् फ़ज्लिन् फज़ूक़ुल्-अज़ा-ब बिमा कुन्तुम् तक्सिबून*
तथा उनका पहला समुदाय अपने दूसरे समुदाय से कहेगाः (यदि हम दोषी थे) तो हमपर तुम्हारी कोई प्रधानता नहीं[1] हुई, तो तुम अपने कुकर्मों की यातना का स्वाद लो। 1. और हम और तुम यातना में बराबर हैं। आयत में इस तथ्य की ओर संकेत है कि कोई समुदाय कुपथ होता है तो वह स्वयं कुपथ नहीं होता, वह दूसरों को भी अपने कुचरित्र से कुपथ करता है। अतः सभी दुगनी यातना के अधिकारी हुये।
إِنَّ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَابُ السَّمَاءِ وَلَا يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّىٰ يَلِجَ الْجَمَلُ فِي سَمِّ الْخِيَاطِ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُجْرِمِينَإِنَّ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَابُ السَّمَاءِ وَلَا يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّىٰ يَلِجَ الْجَمَلُ فِي سَمِّ الْخِيَاطِ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُجْرِمِينَ ﴾ 40 ﴿
इन्नल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना वस्तक्बरू अ़न्हा ला तुफ़त्तहु लहुम् अब्वाबु स्समा-इ व ला यद्ख़ुलूनल् जन्न-त हत्ता यलिजल्-ज-मलु फी सम्मिल् ख़ियाति, व कज़ालि-क नज़्ज़िल्-मुज्रिमीन
वास्तव में, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठला दिया और उनसे अभिमान किया, उनके लिए आकाश के द्वार नहीं खोले जायेंगे और न वे स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, जब तक[1] ऊँट सूई के नाके से पार न हो जाये और हम इसी प्रकार अपराधियों को बदला देते हैं। 1. अर्थात उन का स्वर्ग में प्रवेश असंभव होगा।
لَهُم مِّن جَهَنَّمَ مِهَادٌ وَمِن فَوْقِهِمْ غَوَاشٍ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ ﴾ 41 ﴿
लहुम् मिन् जहन्न-म मिहादुंव्-व मिन् फौक़िहिम् ग़वाशिन्, व कज़ालि-क नज्ज़िज़्ज़ालिमीन
उन्हीं के लिए नरक का बिछौना और उनके ऊपर से ओढ़ना होगा और इसी प्रकार हम अत्याचारियों को प्रतिकार (बदला[1]) देते हैं। 1. अर्थात उन के कुकर्मों तथा अत्याचारों का।
وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ﴾ 42 ﴿
वल्लज़ी-न आमनू व अ़मिलुस्-सालिहाति ला नुकल्लिफु नफ्सन् इल्ला वुस्अ़हा, उलाइ-क अस्हाबुल्-जन्नति, हुम् फ़ीहा ख़ालिदून
और जो ईमान लाये और सत्कर्म किये और हम किसीपर उसकी सकत से (अधिक) भार नहीं रखते। वही स्वर्गी हैं, और वही उसमें सदावासी होंगे।
وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِم مِّنْ غِلٍّ تَجْرِي مِن تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ ۖ وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي هَدَانَا لِهَٰذَا وَمَا كُنَّا لِنَهْتَدِيَ لَوْلَا أَنْ هَدَانَا اللَّهُ ۖ لَقَدْ جَاءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِالْحَقِّ ۖ وَنُودُوا أَن تِلْكُمُ الْجَنَّةُ أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴾ 43 ﴿
व नज़अ्ना मा फी सुदूरिहिम् मिन् ग़िल्लिन् तज्री मिन् तह़्तिहिमुल-अन्हारू, व क़ालुल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी हदाना लिहाज़ा, व मा कुन्ना लिनह्तदि-य लौ ला अन् हदानल्लाहु, ल-क़द् जाअत् रूसुलु रब्बिना बिल्हक़्क़ि, व नूदू अन् तिल्कुमुल्-जन्नतु ऊरिस्तुमूहा बिमा कुन्तुम् तअ्मलून •
तथा उनके दिलों में जो द्वेष होगा, उसे हम निकाल देंगे[1]। उन (स्वर्गों में) बहती नहरें होंगी तथा वे कहेंगे कि उस अल्लाह की प्रशंसा है, जिसने हमें इसकी राह दिखाई और यदि अल्लाह हमें मार्गदर्शन न देता, तो हमें मार्गदर्शन न मिलता। हमारे पालनहार के रसूल सत्य लेकर आये तथा उन्हें पुकारा जायेगा कि इस स्वर्ग के अधिकारी तुम अपने सत्कर्मों के कारण हुए हो। 1. स्वर्गियों को सब प्रकार के सुख-सुविधा के साथ यह भी बड़ी नेमत मिलेगी कि उन के दिलों का बैर निकाल दिया जायेगा, ताकि स्वर्ग में मित्र बन कर रहें। क्यों कि आपस के बैर से सब सुख किरकिरा हो जाता है।
وَنَادَىٰ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ أَصْحَابَ النَّارِ أَن قَدْ وَجَدْنَا مَا وَعَدَنَا رَبُّنَا حَقًّا فَهَلْ وَجَدتُّم مَّا وَعَدَ رَبُّكُمْ حَقًّا ۖ قَالُوا نَعَمْ ۚ فَأَذَّنَ مُؤَذِّنٌ بَيْنَهُمْ أَن لَّعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الظَّالِمِينَ ﴾ 44 ﴿
व नादा अस्हाबुल्-जन्नति अस्हाबन्नारि अन् क़द् वजद्ना मा व-अ-दना रब्बुना हक़्क़न् फ़-हल् वजत्तुम् मा व- अ-द रब्बुकुम् हक़्क़न्, क़ालू न-अम्, फ़ अज़्ज़-न मुअज्ज़िनुम् बैनहुम् अल्लअ्-नतुल्लाहि अ़लज़्ज़ालिमीन
तथा स्वर्गवासी नरकवासियों को पुकारेंगे कि हमें, हमारे पालनहार ने जो वचन दिया था, उसे हमने सच पाया, तो क्या तुम्हारे पानलहार ने तुम्हें जो वचन दिया था, उसे तुमने सच पाया? वे कहेंगे कि हाँ! फिर उनके बीच एक पुकारने वाला पुकारेगा कि अल्लाह की धिक्कार है, उन अत्याचारियों पर।
الَّذِينَ يَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا وَهُم بِالْآخِرَةِ كَافِرُونَ ﴾ 45 ﴿
अल्लज़ी-न यसुद्दू-न अन् सबीलिल्लाहि व यब्ग़ूनहा अि-वजन्, व हुम् बिल्आख़ि-रति काफ़िरून
जो लोगों को अल्लाह की राह (सत्धर्म) से रोकते तथा उसे टेढ़ा करना चाहते थे और वही प्रलोक के प्रति विश्वास नहीं रखते।
وَبَيْنَهُمَا حِجَابٌ ۚ وَعَلَى الْأَعْرَافِ رِجَالٌ يَعْرِفُونَ كُلًّا بِسِيمَاهُمْ ۚ وَنَادَوْا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ أَن سَلَامٌ عَلَيْكُمْ ۚ لَمْ يَدْخُلُوهَا وَهُمْ يَطْمَعُونَ ﴾ 46 ﴿
व बैनहुमा हिजाबुन्, व अलल्-अअ्-राफ़ि रिजालुंय्यअ्-रिफू-न कुल्लम्-बिसीमाहुम्, व नादौ अस्हाबल्-जन्नति अन् सलामुन् अलैकुम्, लम् यद्ख़ुलूहा व हुम् यत्मअू-न
और दोनों (नरक तथा स्वर्ग) के बीच एक परदा होगा और कुछ लोग आराफ़[1] (ऊँचाइयों) पर होंगे, जो प्रत्येक को उनके लक्षणों से पहचानेंगे और स्वर्ग वासियों को पुकारकर उन्हें सलाम करेंगे और उन्होंने उसमें प्रवेश नहीं किया होगा, परन्तु उसकी आशा रखते होंगे। 1. आराफ़ नरक तथा स्वर्ग के मध्य एक दीवार है, जिस पर वह लोग रहेंगे जिन के सुकर्म और कुकर्म बराबर होंगे। और वह अल्लाह की दया से स्वर्ग में प्रवेश की आशा रखते होंगे। (इब्ने कसीर)
وَإِذَا صُرِفَتْ أَبْصَارُهُمْ تِلْقَاءَ أَصْحَابِ النَّارِ قَالُوا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 47 ﴿
व इज़ा सुरिफ़त् अब्सारूहुम् तिल्क़ा-अ अस्हाबिन्नारि, क़ालू रब्बना ला तज्अल्ना मअ़ल् क़ौमिज़्ज़ालिमीन*
और जब उनकी आँखें नरक वासियों की ओर फिरेंगी, तो कहेंगेः हे हमारे पालनहार! हमें अत्याचारियों में सम्मिलित न करना।
وَنَادَىٰ أَصْحَابُ الْأَعْرَافِ رِجَالًا يَعْرِفُونَهُم بِسِيمَاهُمْ قَالُوا مَا أَغْنَىٰ عَنكُمْ جَمْعُكُمْ وَمَا كُنتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ ﴾ 48 ﴿
व नादा अस्हाबुल्-अअ्-राफि रिजालंय्-यअ्-रिफूनहुम् बिसीमाहुम् क़ालू मा अग़्ना अ़न्कुम् जम्अुकुम् व मा कुन्तुम् तस्तक्बिरून
फिर आराफ़ (ऊँचाइयों) के लोग कुछ लोगों को उनके लक्षणों से पहचान जायेंगे[1], उनसे कहेंगे कि (देखो!) तुम्हारे जत्थे और तुम्हारा घमंड तुम्हारे किसी काम नहीं आया! 1. जिन को संसार में पहचानते थे और याद दिलायेंगे कि जिस पर तुम्हें घमंड था आज तुम्हारे काम नहीं आया।
أَهَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمْتُمْ لَا يَنَالُهُمُ اللَّهُ بِرَحْمَةٍ ۚ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمْ وَلَا أَنتُمْ تَحْزَنُونَ ﴾ 49 ﴿
अहा-उला-इल्लज़ी-न अक़्सम्तुम् ला यनालुहुमुल्लाहु बिरह् मतिन्, उद्ख़ुलुल्-जन्न-त ला ख़ौफुन अलैकुम् व ला अन्तुम तह़्ज़नून
(और स्वर्गवासियों की ओर संकेत करेंगे कि) क्या यही वे लोग नहीं हैं, जिनके संबंध में तुम शपथ लेकर कह रहे थे कि अल्लाह इन्हें अपनी दया में से कुछ नहीं देगा? (आज उनसे कहा जा रहा है कि) स्वर्ग में प्रवेश कर जाओ, न तुमपर किसी प्रकार का भय है और न तुम उदासीन होगे।
وَنَادَىٰ أَصْحَابُ النَّارِ أَصْحَابَ الْجَنَّةِ أَنْ أَفِيضُوا عَلَيْنَا مِنَ الْمَاءِ أَوْ مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ ۚ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ حَرَّمَهُمَا عَلَى الْكَافِرِينَ ﴾ 50 ﴿
व नादा अस्हाबुन्नारि अस्हाबल्-जन्नति अन् अफ़ीज़ू अलैना मिनल्मा-इ औ मिम्मा र-ज़-क़कुमुल्लाहु, क़ालू इन्नल्ला-ह हर्र-महुमा अ़लल्-काफ़िरीन
तथा नरकवासी स्वर्गवासियों को पुकारेंगे कि हमपर तनिक पानी डाल दो अथवा जो अल्लाह ने तुम्हें प्रदान किया है, उसमें से कुछ दे दो। वे कहेंगे कि अल्लाह ने ये दोनों (आज) काफ़िरों के लिए ह़राम (वर्जित) कर दिया है।
الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَهُمْ لَهْوًا وَلَعِبًا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا ۚ فَالْيَوْمَ نَنسَاهُمْ كَمَا نَسُوا لِقَاءَ يَوْمِهِمْ هَٰذَا وَمَا كَانُوا بِآيَاتِنَا يَجْحَدُونَ ﴾ 51 ﴿
अल्लज़ीनत्त-ख़ज़ू दीनहुम् लह़्वंव्-व लअिबंव्-व ग़र्रत्हुमुल्-हयातुद्दुन्या, फ़ल्यौ-म नन्साहुम् कमा नसू लिक़ा-अ यौमिहिम् हाज़ा, व मा कानू बिआयातिना यज्हदून
(उसका निर्णय है कि) जिन्होंने अपने धर्म को तमाशा और खेल बना लिया था तथा जिन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा था, तो आज हम उन्हें ऐसे ही भुला देंगे, जिस प्रकार उन्होंने आज के दिन के आने को भुला दिया था[1] और इसलिए भी कि वे हमारी आयतों का इन्कार करते रहे। 1. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहाःप्रलय के दिन अल्लाह ऐसे बंदों से कहेगाः क्या मैं ने तुम्हें बीवी-बच्चे नहीं दिये, आदर-मान नहीं दिया? क्या ऊँट-घोड़े तेरे अधीन नहीं किये, क्या तू मुख्या बन कर चुंगी नहीं लेता था? वह कहेगाः हे अल्लाह, सब सह़ीह़ है। अल्लाह प्रश्न करेगाः क्या मुझ से मिलने की आशा रखता था? वह कहेगाः नहीं। अल्लाह कहेगाः जैसे तू मुझे भूला रहा, आज मैं तुझे भूल जाता हूँ। (सह़ीह़ मुस्लिमः2968)
وَلَقَدْ جِئْنَاهُم بِكِتَابٍ فَصَّلْنَاهُ عَلَىٰ عِلْمٍ هُدًى وَرَحْمَةً لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴾ 52 ﴿
व ल-क़द् जिअ्नाहुम् बिकिताबिन् फ़स्सल्नाहु अ़ला अिल्मिन् हुदंव्-व रह़्मतल्-लिक़ौमिंय्-युअ्मिनून
जबकि हमने उनके लिए एक ऐसी पुस्तक दी, जिसे हमने ज्ञान के आधार पर सविस्तार वर्णित कर दिया है, जो मार्गदर्शन तथा दया है, उन लोगों के लिए, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا تَأْوِيلَهُ ۚ يَوْمَ يَأْتِي تَأْوِيلُهُ يَقُولُ الَّذِينَ نَسُوهُ مِن قَبْلُ قَدْ جَاءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِالْحَقِّ فَهَل لَّنَا مِن شُفَعَاءَ فَيَشْفَعُوا لَنَا أَوْ نُرَدُّ فَنَعْمَلَ غَيْرَ الَّذِي كُنَّا نَعْمَلُ ۚ قَدْ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ ﴾ 53 ﴿
हल् यन्ज़ुरू-न इल्ला तअ्वी-लहू, यौ-म यअ्ती तअ्वीलुहू यक़ूलुल्लज़ी-न नसूहु मिन् क़ब्लु क़द् जाअत् रूसुलु रब्बिना बिल्हक़्क़ि, फ़हल्-लना मिन् शु-फ़आ-अ फ़यश्फ़अू लना औ नुरद्दू फ़नअ्-म-ल ग़ैरल्लज़ी कुन्ना नअ्-मलु, क़द् ख़सिरू अन्फु-सहुम् व ज़ल्-ल अन्हुम् मा कानू यफ़्तरून *
(फिर) क्या वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि इसका परिणाम सामने आ जाये? जिस दिन इसका परिणाम आ जायेगा, तो वही, जो इससे पहले इसे भूले हुए थे, कहेंगे कि हमारे पालनहार के रसूल सच लेकर आए थे, (परन्तु हमने नहीं माना) तो क्या हमारे लिए कोई अनुशंसक (सिफ़ारिशी) है, जो हमारी अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे? अथवा हम संसार में फेर दिए जायेँ, तो जो कर्म हम करते रहे, उनके विपरीत कर्म करेंगे! उनहोंने स्वयं को छति में डाल दिया तथा उनसे जो मिथ्या बातें बना रहे थे खो गईं।
إِنَّ رَبَّكُمُ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَىٰ عَلَى الْعَرْشِ يُغْشِي اللَّيْلَ النَّهَارَ يَطْلُبُهُ حَثِيثًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ وَالنُّجُومَ مُسَخَّرَاتٍ بِأَمْرِهِ ۗ أَلَا لَهُ الْخَلْقُ وَالْأَمْرُ ۗ تَبَارَكَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ ﴾ 54 ﴿
इन्-न रब्बकुमुल्लाहुल्लज़ी ख-लक़स्समावाति वल्अर्-ज़ फ़ी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्तवा अलल्-अर्शि, युग़्शिल्लैलन्नहा-र यत्लुबुहू हसीसंव् वश्शम्-स वल्क़-म-र वन्नुजू-म मुस्ख़्ख़रातिम्-बिअम्रिही, अला लहुल-ख़ल्क़ु वल्अम्रू, तबा-रकल्लाहु रब्बुल आलमीन
तुम्हारा पालनहार वही अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छः दिनों में बनाया[1], फिर अर्श (सिंहासन) पर स्थित हो गया। वह रात्रि से दिन को ढक देता है, दिन उसके पीछे दौड़ता हुआ आ जाता है, सूर्य तथा चाँद और तारे उसकी आज्ञा के अधीन हैं। सुन लो! वही उत्पत्तिकार है और वही शासक[2] है। वही अल्लाह अति शुभ संसार का पालनहार है। 1. यह छः दिन शनिवार, रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार और बृहस्पतिवार हैं। पहले दो दिन में धरती को, फिर आकाश को बनाया, फिर आकाश को दो दिन में बराबर किया, फिर धरती को फैलाया और उस में पर्वत, पानी और उपज की व्यवस्था दो दिन में की। इस प्रकार यह कुल छः दिन हुये। (देखियेः सूरह सज्दह, आयतः9-10) 2. अर्थात इस विश्व की व्यवस्था का अधिकार उस के सिवा किसी को नहीं है।
ادْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةً ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ ﴾ 55 ﴿
उद्अू रब्बकुम् त-ज़र्रूअंव्-व ख़ुफ़्य-तन्, इन्नहू ला युहिब्बुल मुअ्तदीन
तुम अपने (उसी) पालनहर को रोते हुए तथा धीरे धीरे पुकारो। निःसंदेह वह सीमा पार करने वालों से प्रेम नहीं करता।
وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا وَادْعُوهُ خَوْفًا وَطَمَعًا ۚ إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِّنَ الْمُحْسِنِينَ ﴾ 56 ﴿
व ला तुफ़्सीदू फ़िल्अर्ज़ि बअ्-द इस्लाहिहा वद्अूहु ख़ौफ़ूंव्-व त मअ़न्, इन्-न रह़्मतल्लाहि क़रीबुम् मिनल मुह़्सिनीन
तथा धरती में उसके सुधार के पश्चात्[1] उपद्रव न करो और उसीसे डरते हुए तथा आशा रखते हुए[2] प्रार्थना करो। वास्तव में, अल्लाह की दया सदाचारियों के समीप है। 1. अर्थात सत्धर्म और रसूलों द्वारा सुधार किये जाने के पश्चात। 2. अर्थात पापाचार से डरते और उस की दया की आशा रखते हुये।
وَهُوَ الَّذِي يُرْسِلُ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِهِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا أَقَلَّتْ سَحَابًا ثِقَالًا سُقْنَاهُ لِبَلَدٍ مَّيِّتٍ فَأَنزَلْنَا بِهِ الْمَاءَ فَأَخْرَجْنَا بِهِ مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ ۚ كَذَٰلِكَ نُخْرِجُ الْمَوْتَىٰ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴾ 57 ﴿
व हुवल्लज़ी युर्सिलुर्रिया-ह बुश्रम् बै-न यदै रह़्मतिही, हत्ता इज़ा अक़ल्लत् सहाबन् सिक़ालन् सुक़्नाहु लि-ब-लदिम् मय्यितिन् फ़-अन्ज़ल्ना बिहिल्-मा-अ फ़अख़्-रज्-ना बिही मिन् कुल्लिस्स-मराति, कज़ालि-क नुख़रिजुल्मौता लअ़ल्लकुम् तज़क्करून
और वही है, जो अपनी दया (वर्षा) से पहले वायुओं को (वर्षा) की शुभ सूचना देने के लिए भेजता है और जब वे भारी बादलों को लिए उड़ती हैं, तो हम उसे किसी निर्जीव धरती को (जीवित) करने के लिए पहुँचा देते हैं, फिर उससे जल वर्षा कर, उसके द्वारा प्रत्येक प्रकार के फल उपजा देते हैं। इसी प्रकार, हम मुर्दों को जीवित करते हैं, ताकि तुम शिक्षा ग्रहण कर सको।
وَالْبَلَدُ الطَّيِّبُ يَخْرُجُ نَبَاتُهُ بِإِذْنِ رَبِّهِ ۖ وَالَّذِي خَبُثَ لَا يَخْرُجُ إِلَّا نَكِدًا ۚ كَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَشْكُرُونَ ﴾ 58 ﴿
वल्ब-लदुत्तय्यिबु यख़्-रूजु नबातुहू बि-इज़् नि रब्बिही, वल्लज़ी ख़बु-स ला यख़्रुजु इल्ला नकिदन्, कज़ालि-क नुसर्रिफुल-आयाति लिक़ौमिंय्यश्कुरून *
और स्वच्छ भूमि अपनी उपज अल्लाह की अनुमति से भरपूर देती है तथा खराब भूमि की उपज थोड़ी ही होती है। इसी प्रकार, हम अपनी[1] आयतें (निशानियाँ) उनके लिए दुहराते हैं, जो शुक्र अदा करते हैं। 1. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहाः मुझे अल्लाह ने जिस मार्गदर्शन और ज्ञान के साथ भेजा है, वह उस वर्षा के समान है, जो किसी भूमि में हुई। तो उस का कुछ भाग अच्छा था जिस ने पानी लिया और उस से बहुत सी घास और चारा उगाया। और कुछ कड़ा था जिस ने पानी रोक लिया तो लोगों को लाभ हुआ और उस से पिया और सींचा। और कुछ चिकना था, जिस ने न पानी रोका न घास उपजाई। तो यही उस की दशा है जिस ने अल्लाह के धर्म को समझा और उसे सीखा तथा सिखाया। और उस की जिस ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया और न अल्लाह के मार्गदर्शन को स्वीकार किया, जिस के साथ मुधे भेजा गया है। (सह़ीह़ बुख़ारीः79)
لَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴾ 59 ﴿
ल-क़द् अरसल्ना नूहन् इला क़ौमिही फ़क़ा-ल या-क़ौमिअ्बुदुल्ला-ह मा लकुम् मिन् इलाहिन् ग़ैरूहू, इन्नी अख़ाफु अ़लैकुम् अ़ज़ा-ब यौमिन् अ़ज़ीम
हमने नूह़[1] को उसकी जाति की ओर (अपना संदेश पहुँचाने के लिए) भेजा था, तो उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! (केवल) अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ। 1. बताया जाता है कि नूह़ अलैहिस्सलाम प्रथम मनु आदम (अलैहिस्स्लाम) के दसवें वंश में थे। उन के कुछ पहले तक लोग इस्लाम पर चले आ रहे थे। फिर अपने धर्म से फिर गये अपने पुनीत पूर्वजों की मुर्तियाँ बना कर पूजने लगे। तब अल्लाह ने नूह़ को भेजा। किन्तु कुछ के सिवा किसी ने उन की बात नहीं मानी। अन्ततः सब डुबो दिये गये। फिर नूह़ के तीन पुत्रों से मानव वंश चला। इसी लिये उन को दूसरा आदम भी कहा जाता है। (देखियेः सूरह नूह़, आयतः71)
قَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ إِنَّا لَنَرَاكَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ﴾ 60 ﴿
क़ालल्म-लउ मिन् क़ौमिही इन्ना ल-नरा-क फी ज़लालिम्-मुबीन
उसकी जाति के प्रमुखों ने कहाः हमें लगता है कि तुम खुले कुपथ में पड़ गये हो।
قَالَ يَا قَوْمِ لَيْسَ بِي ضَلَالَةٌ وَلَٰكِنِّي رَسُولٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 61 ﴿
क़ा-ल या क़ौमि लै-स बी ज़लालतुंव् व लाकिन्नी रसूलुम् मिर्रब्बिल्-आलमीन
उसने कहाः हे मेरी जाति! मैं किसी कुपथ में नहीं हूँ, परन्तु मैं विश्व के पालनहार का रसूल हूँ।
أُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنصَحُ لَكُمْ وَأَعْلَمُ مِنَ اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴾ 62 ﴿
उबल्लिग़ुकुम् रिसालाति रब्बी व अन्सहु लकुम् व अअ्लमु मिनल्लाहि मा ला तअ्लमून
तुम्हें अपने पालनहार का संदेश पहुँचा रहा हूँ, तुम्हारा भला चाहता हूँ और अल्लाह की ओर से उन चीज़ों का ज्ञान रखता हूँ, जिनका ज्ञान तुम्हें नहीं है।
أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ وَلِتَتَّقُوا وَلَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ﴾ 63 ﴿
अ-व अ़जिब्तुम् अन् जा-अकुम् ज़िक्रुम् मिर्रब्बिकुम् अ़ला रजुलिम्-मिन्कुम् लियुन्ज़ि-रकुम् व लि-तत्तक़ू व लअ़ल्लकुम् तुर्हमून
क्या तुम्हें इसपर आश्चर्य हो रहा है कि तुम्हारे पालनहार की शिक्षा तुम्हीं में से एक पुरुष द्वारा तुम्हारे पास आ गयी है, ताकि वह तुम्हें सावधान करे और ताकि तुम आज्ञाकारी बनो और अल्लाह की दया के योग्य हो जाओ?
فَكَذَّبُوهُ فَأَنجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ فِي الْفُلْكِ وَأَغْرَقْنَا الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا عَمِينَ ﴾ 64 ﴿
फ़-कज़्ज़बूहु फ़-अन्जैनाहु वल्लज़ी-न म-अहू फिल्फुल्कि व अग़्रक़्नल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना, इन्नहुम् कानू क़ौमन् अ़मीन *
फिर भी उन्होंने उसे झुठला दिया। तो हमने उसे और जो नौका में उसके साथ थे, उन्हें बचा लिया और उन्हें डुबो दिया, जो हमारी आयतों को झुठला चुके थे। वास्तव में, वह (समझ-बूझ के) अंधे थे।
وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴾ 65 ﴿
व इला आदिन् अख़ाहुम हूदन्, क़ा-ल या क़ौमिअ्बुदुल्ला-ह मा लकुम् मिन् इलाहिन् ग़ैरूहू, अ-फला तत्तक़ून
(और इसी प्रकार) आद[1] की ओर उनके भाई हूद को (भेजा)। उसने कहाः हे मेरी जाति! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तो क्या तुम (उसकी अवज्ञा से) नहीं डरते? 1. नूह़ की जाति के पश्चात अरब में आद जाति का उत्थान हूआ। जिस का निवास स्थान अह़क़ाफ़ का क्षेत्र था। जो ह़िजाज तथा यमामा के बीच स्थित है। उन की आबादियाँ उमान से ह़ज़रमौत और इराक़ तक फैली हुई थीं।
قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ إِنَّا لَنَرَاكَ فِي سَفَاهَةٍ وَإِنَّا لَنَظُنُّكَ مِنَ الْكَاذِبِينَ ﴾ 66 ﴿
क़ालल्-म-लउल्लज़ी-न क-फरू मिन् क़ौमिही इन्ना ल-नरा-क-फ़ी सफ़ाहतिंव्-व इन्ना ल-नज़ुन्नु-क मिनल्-काज़िबीन
(इसपर) उनकी जाति में से उन प्रमुखों ने कहा, जो काफ़िर हो गये कि हमें ऐसा लग रहा है कि तुम नासमझ हो गये हो और वास्तव में हम तुम्हें झूठों में समझ रहे हैं।
قَالَ يَا قَوْمِ لَيْسَ بِي سَفَاهَةٌ وَلَٰكِنِّي رَسُولٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 67 ﴿
क़ा-ल या क़ौमि लै-स बी सफ़ाहतुंव्-व लाकिन्नी रसूलुम् मिर्रब्बिल-आलमीन
उसने कहाः हे मेरी जाति! मुझमें कोई नासमझी की बात नहीं है, परन्तु मैं तो संसार के पालनहार का रसूल (संदेशवाहक) हूँ।
أُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنَا لَكُمْ نَاصِحٌ أَمِينٌ ﴾ 68 ﴿
उबल्लिग़ुकुम् रिसालाति रब्बी व अ-ना लकुम् नासिहुन् अमीन
मैं तुम्हें अपने पालनहार का संदेश पहुँचा रहा हूँ और वास्तव में मैं तुम्हारा भरोसा करने योग्य शिक्षक हूँ।
أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ ۚ وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِن بَعْدِ قَوْمِ نُوحٍ وَزَادَكُمْ فِي الْخَلْقِ بَسْطَةً ۖ فَاذْكُرُوا آلَاءَ اللَّهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ ﴾ 69 ﴿
अ-व अ़जिब्तुम् अन् जा-अकुम् ज़िक्रुम्-मिर्रब्बिकुम् अला रजुलिम्-मिन्कुम् लियुन्ज़ि-रकुम्, वज़्कुरू इज़् ज -अ-लकुम् ख़ु-लफा-अ मिम् बअ्दि क़ौमि नूहिंव्-व ज़ादकुम् फिल्ख़ल्क़ि बस्त-तन्, फज़्कुरू आला-अल्लाहि लअ़ल्लकुम् तुफ़्लिहून
क्या तुम्हें इसपर आश्चर्य हो रहा है कि तुम्हारे पालनहार की शिक्षा, तुम्हीं में से एक पुरुष द्वारा तुम्हारे पास आ गई है, ताकि वह तुम्हें सावधान करे? तथा याद करो कि अल्लाह ने नूह़ की जाति के पश्चात तुम्हें धरती में अधिकार दिया है और तुम्हें अधिक शारीरिक बल दिया है। अतः अल्लाह के पुरस्कारों को याद[1] करो। संभवतः तुम सफल हो जाओगे। 1. अर्थात उस के आज्ञाकारी तथा कृतज्ञ बनो।
قَالُوا أَجِئْتَنَا لِنَعْبُدَ اللَّهَ وَحْدَهُ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُنَا ۖ فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ﴾ 70 ﴿
क़ालू अजिअ्तना लिनअ्बुदल्ला-ह वह्दहू व न-ज़-र मा का-न यअ्बुदु आबाउना, फअ्तिना बिमा तअिदुना इन् कुन्-त मिनस्-सादिक़ीन
उन्होंने कहाः क्या तुम हमारे पास इसलिए आये हो कि हम केवल एक ही अल्लाह की इबादत (वंदना) करें और उन्हें छोड़ दें, जिनकी पूजा हमारे पूर्वज करते आ रहे हैं? तो वो बात हमारे पास ला दो, जिससे हमें डरा रहे हो, यदि तुम सच्चे हो?
قَالَ قَدْ وَقَعَ عَلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ رِجْسٌ وَغَضَبٌ ۖ أَتُجَادِلُونَنِي فِي أَسْمَاءٍ سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَآبَاؤُكُم مَّا نَزَّلَ اللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَانٍ ۚ فَانتَظِرُوا إِنِّي مَعَكُم مِّنَ الْمُنتَظِرِينَ ﴾ 71 ﴿
क़ा-ल क़द् व-क़-अ अलैकुम् मिर्रब्बिकुम् रिज्सुंव्-व ग़-ज़बुन्, अतुजादिलू-ननी फी अस्माइन् सम्मैतुमूहा अन्तुम् व आबाउकुम् मा नज़्ज़लल्लाहु बिहा मिन् सुल्तानिन्, फ़न्तज़िरू इन्नी म-अ़कुम् मिनल मुन्तज़िरीन
उसने कहाः तुमपर तुम्हारे पालनहार का प्रकोप और क्रोध आ पड़ा है। क्या तुम मुझसे कुछ (मूर्तियों के) नामों के विषय में विवाद कर रहे हो, जिनका तुमने तथा तुम्हारे पूर्वजों ने (पूज्य) नाम रखा है, जिसका कोई तर्क (प्रमाण) अल्लाह ने नहीं उतारा है? तो तुम (प्रकोप की) प्रतीक्षा करो और तुम्हारे साथ मैं भी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
فَأَنجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِّنَّا وَقَطَعْنَا دَابِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۖ وَمَا كَانُوا مُؤْمِنِينَ ﴾ 72 ﴿
फ़-अन्जैनाहु वल्लज़ी-न म-अ़हू बिरह़्मतिम्-मिन्ना व क़तअ्ना दाबिरल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना व मा कानू मुअ्मिनीन *
फिर हमने उसे और उसके साथियों को बचा लिया तथा उनकी जड़ काट दी, जिन्होंने हमारी आयतों (आदेशों) को झुठला दिया था और वे ईमान लाने वाले नहीं थे।
وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ هَٰذِهِ نَاقَةُ اللَّهِ لَكُمْ آيَةً ۖ فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ ۖ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴾ 73 ﴿
व इला समू-द अख़ाहुम् सालिहन् • क़ा-ल या क़ौमिअ्बुदुल्ला-ह मा लकुम मिन् इलाहिन् ग़ैरूहू, क़द् जाअत्कुम् बय्यि-नतुम् मिर्रब्बिकुम्, हाज़िही नाक़तुल्लाहि लकुम् आ-यतन् फ़ -ज़रूहा तअ्कुल् फी अरज़िल्लाहि व ला तमस्सूहा बिसूइन् फ़-यअ्ख़ु- ज़कुम् अज़ाबुन् अलीम
और (इसी प्रकार) समूद[1] (जाति) के पास उनके भाई सालेह़ को भेजा। उसने कहाः हे मेरी जाति! अल्लाह की (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से खुला प्रमाण (चमत्कार) आ गया है। ये अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक चमत्कार[2] है। अतः इसे अल्लाह की धरती में चरने के लिए छोड़ दो और इसे बुरे विचार से हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें दुःखदायी यातना घेर लेगी। 1. समूद जाति अरब के उस क्षेत्र में रहती थी, जो ह़िजाज़ तथा शाम के बीच “वादिये क़ुर” तक चला गया है। जिस को आज “अल उला” कहते हैं। इसी को दूसरे स्थान पर “अलहिज्र” भी कहा गया है। 2. समूद जाति ने अपने नबी सालेह़ अलैहिस्सलाम से यह माँग की थी कि पर्वत से एक ऊँटनी निकाल दें। और सालेह़ अलैहिस्सलाम की प्रार्थना से अल्लाह ने उन की यह माँग पूरी कर दी। (इब्ने कसीर)
وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِن بَعْدِ عَادٍ وَبَوَّأَكُمْ فِي الْأَرْضِ تَتَّخِذُونَ مِن سُهُولِهَا قُصُورًا وَتَنْحِتُونَ الْجِبَالَ بُيُوتًا ۖ فَاذْكُرُوا آلَاءَ اللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ﴾ 74 ﴿
वज़्कुरू इज़् ज-अ-लकुम् ख़ु-लफा-अ मिम् बअ्दि आदिंव्-व बव्व-अकुम् फ़िल्अर्ज़ि तत्तख़िज़ू-न मिन् सुहूलिहा क़ुसूरंव्-व तन्हितूनल जिबा-ल बुयूतन् फ़ज़्कुरू आलाअल्लाहि व ला तअ्सौ फिल्अर्ज़ि मुफ्सिदीन
तथा याद करो कि अल्लाह ने आद जाति के ध्वस्त किए जाने के पश्चात् तुम्हें धरती में अधिकार दिया है और तुम्हें धरती में बसाया है, तुम उसके मैदानों में भवन बनाते हो और पर्वतों को तराशकर घर बनाते हो। अतः अल्लाह के उपकारों को याद करो और धरती में उपद्रव करते न फिरो।
قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا مِن قَوْمِهِ لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِمَنْ آمَنَ مِنْهُمْ أَتَعْلَمُونَ أَنَّ صَالِحًا مُّرْسَلٌ مِّن رَّبِّهِ ۚ قَالُوا إِنَّا بِمَا أُرْسِلَ بِهِ مُؤْمِنُونَ ﴾ 75 ﴿
क़ालल्-म-लउल्लज़ीनस्तक्बरू मिन् क़ौमिही लिल्लज़ीनस्-तुज़्अिफू लिमन् आम-न मिन्हुम् अ-तअ्लमू-न अन्-न सालिहम् मुर्सलुम्-मिर्रब्बिही, क़ालू इन्ना बिमा उर्सि-ल बिही मुअ्मिनून
उसकी जाति के घमंडी प्रमुखों ने उन निर्बलों से कहा, जो उनमें से ईमान लाये थेः क्या तुम विश्वास रखते हो कि सालेह़ अपने पालनहार का भेजा हुआ है? उन्होंने कहाः निश्चय जिस (संदेश) के साथ वह भेजा गया है, हम उसपर ईमान (विश्वास) रखते हैं।
قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا بِالَّذِي آمَنتُم بِهِ كَافِرُونَ ﴾ 76 ﴿
क़ालल्लज़ीनस्तक्बरू इन्ना बिल्लज़ी आमन्तुम् बिही काफिरून
(तो इसपर) घमंडियों[1] ने कहाः हमतो जिसका तुमने विश्वास किया है उसे नहीं मानते। 1. अर्तथात अपने संसारिक सुखों के कारण अपने बड़े होने का गर्व था।
فَعَقَرُوا النَّاقَةَ وَعَتَوْا عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ وَقَالُوا يَا صَالِحُ ائْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الْمُرْسَلِينَ ﴾ 77 ﴿
फ़-अ-क़रूनाक़-त व अ़तौ अ़न् अम्रि रब्बिहिम् व क़ालू या सालिहुअ्तिना बिमा तअिदुना इन् कुन्-त मिनल्-मुर्सलीन
फिर उन्होंने ऊँटनी को वध कर दिया और अपने पालनहार के आदेश का उल्लंघन किया और कहाः हे सालेह़! तू हमें जिस (यातना) की धमकी दे रहा था, उसे ले आ, यदि तू वास्तव में रसूलों में है।
فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ ﴾ 78 ﴿
फ़-अ-ख़ज़त्हुमुर्रज्फतु फ़ अस्बहू फी दारिहिम् जासिमीन
तो उन्हें भूकंप ने पकड़ लिया। फिर जब भोर हुई, तो वे अपने घरों में औंधे पड़े हुए थे।
فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلَٰكِن لَّا تُحِبُّونَ النَّاصِحِينَ ﴾ 79 ﴿
फ़-तवल्ला अ़न्हुम् व क़ा-ल या क़ौमि ल-क़द् अब्ल़ग़्तुकुम् रिसाल-त रब्बी व नसह्तु लकुम् व लाकिल्ला तुहिब्बूनन्नासिहीन
तो सालेह़ ने उनसे मुँह फेर लिया और कहाः हे मेरी जाति! मैंने तुम्हें अपने पालनहार के उपदेश पहुँचा दिये थे और मैंने तुम्हारा भला चाहा। परन्तु तुम उपकारियों से प्रेम नहीं करते।
وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ الْعَالَمِينَ ﴾ 80 ﴿
व लूतन् इज़् क़ा-ल लिक़ौमिही अ-तअ्तूनल्-फ़ाहि-श-त मा स-ब-क़कुम् बिहा मिन् अ-हदिम् मिनल-आलमीन
और हमने लूत[1] को भेजा। जब उसने अपनी जाति से कहाः क्या तुम ऐसी निर्लज्जा का काम कर रहे हो, जो तुमसे पहले संसारवासियों में से किसी ने नहीं किया है? 1. लूत अलैहिस्सलाम इब्राहीम अलैहिस्सलाम के भतीजे थे। और वह जिस जाति के मार्गदर्शन के लिये भेजे गये थे, वह उस क्षेत्र में रहती थी जहाँ अब “मृत सागर” स्थित है। उस का नाम भाष्यकारों ने सदूम बताया है।
إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِّن دُونِ النِّسَاءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ مُّسْرِفُونَ ﴾ 81 ﴿
इन्नकुम ल-तअ्तूनर्रिजा-ल शह़्व-तम् मिन् दूनिन्निसा-इ, बल् अन्तुम् क़ौमुम्-मुस्रिफून
तुम स्त्रियों को छोड़कर कामवासना की पूर्ति के लिए पुरुषों के पास जाते हो? बल्कि तुम सीमा लांघने वाली जाति[1]हो। 1. लूत अलैहिस्सलाम की जाति ने निर्लज्जा और बालमैथुन की कुरीति बनाई थी जो मनुष्य के स्वभाव के विरुध्द था। आज रिसर्च से पता चला कि यह विभिन्न प्रकार के रोगों का कारण है, जिस में विशेष कर “एड्स” के रोगों का वर्णन करते हैं। परन्तु आज पश्चिमि देश दुबारा उस अंधकार युग की ओर जा रहे हैं और इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नाम दे रखा है।
وَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَن قَالُوا أَخْرِجُوهُم مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ ﴾ 82 ﴿
व मा का-न जवा-ब क़ौमिही इल्ला अन् क़ालू अख्रीजूहुम् मिन् क़र् यतिकुम्, इन्नहुम् उनासुंय्य-ततह़्हरून
और उसकी जाति का उत्तर बस ये था कि इनको अपनी बस्ती से निकाल दो। ये लोग अपने में बड़े पवित्र बन रहे हैं।
فَأَنجَيْنَاهُ وَأَهْلَهُ إِلَّا امْرَأَتَهُ كَانَتْ مِنَ الْغَابِرِينَ ﴾ 83 ﴿
फ-अन्जैनाहु व अह़्लहू इल्लम् र-अ-तहू, कानत् मिनल ग़ाबिरीन
हमने उसे और उसके परिवार को, उसकी पत्नी के सिवा, बचा लिया, वह पीछे रह जाने वाली थी।
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ ﴾ 84 ﴿
व अम्तरना अ़लैहिम् म-तरन्, फ़न्ज़ुर कै-फ़ का-न आक़ि-बतुल्-मुज्रिमीन *
और हमने उनपर (पत्थरों) की वर्षा कर दी। तो देखो कि अपराधियों का परिणाम कैसा रहा?
وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ فَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴾ 85 ﴿
व इला मद् य-न अख़ाहुम् शुऐबन्, क़ा-ल या क़ौमिअ्बुदुल्ला-ह मा लकुम् मिन् इलाहिन् ग़ैरूहू, क़द् जाअत्कुम् बय्यि-नतुम् मिर्रब्बिकुम् फ़-औफुल्कै-ल वल्मीज़ा-न व ला तब्ख़ सुन्ना-स अश्या-अहुम् व ला तुफ्सिदू फ़िल्अर्ज़ि बअ्-द इस्लाहिहा, ज़ालिकुम् ख़ैरूल्लकुम् इन् कुन्तुम् मुअ्मिनीन
तथा मद्यन[1] की ओर हमने उसके भाई शोऐब को रसूल बनाकर भेजा। उसने कहः हे मेरी जाति के लोगो! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं है। तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार का खुला तर्क (प्रमाण) आ गया है। अतः नाप और तोल पूरी करो और लोगों की चीज़ों में कमी न करो तथा धरती में उसके सुधार के पश्चात उपद्रव न करो। यही तुम्हारे लिए उत्त्म है, यदि तुम ईमान वाले हो। 1. मद्यन एक क़बीले का नाम था। और उसी के नाम पर एक नगर बस गया, जो ह़िजाज़ के उत्तर-पश्चिम तथा फ़लस्तीन के दक्षिण में लाल सागर और अक़्बा खाड़ी के किनारे पर रहता था। यह लोग व्यपार करते थे। प्राचीन व्यपार राजपथ, लाल सागर के किनारे यमन से मक्का तथा यंबुआ होते हुये सीरिया तक जाता था।
وَلَا تَقْعُدُوا بِكُلِّ صِرَاطٍ تُوعِدُونَ وَتَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ مَنْ آمَنَ بِهِ وَتَبْغُونَهَا عِوَجًا ۚ وَاذْكُرُوا إِذْ كُنتُمْ قَلِيلًا فَكَثَّرَكُمْ ۖ وَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ ﴾ 86 ﴿
व ला तक़अुदू बिकुल्लि सिरातिन् तूअिदू-न व तसुद्दू -न अन् सबीलिल्लाही मन् आम-न बिही व तब्ग़ूनहा अि-वजन् वज़्क़ुरू इज़् कुन्तुम् क़लीलन् फ़-कस्स-रकुम्, वन्ज़ुरू कै-फ़ का-न आक़ि-बतुल् मुफ्सिदीन
तथा प्रत्येक मार्ग पर लोगों को धमकाने के लिए न बैठो और उन्हें अल्लाह की राह से न रोको, जो उसपर ईमान लाये[1] हैं और उसे टेढ़ा न बनाओ तथा उस समय को याद करो, जब तुम थोड़े थे, तो तुम्हें अल्लाह ने अधिक कर दिया तथा देखो कि उपद्रवियों का परिणाम क्या हुआ? 1. जैसे मक्का वाले मक्का के बाहर से आने वालों को क़ुर्आन सुनने से रोका करते थे। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जादूगर कह कर आप के पास जाने से रोकते थे। परन्तु उन की एक न चली और क़ुर्आन लोगों के दिलों में उतरता और इस्लाम फैलता चला गया। इस से पता चलता है कि नबियों की शिक्षाओं के साथ उन की जातियों ने एक जैसा व्यवहार किया।
وَإِن كَانَ طَائِفَةٌ مِّنكُمْ آمَنُوا بِالَّذِي أُرْسِلْتُ بِهِ وَطَائِفَةٌ لَّمْ يُؤْمِنُوا فَاصْبِرُوا حَتَّىٰ يَحْكُمَ اللَّهُ بَيْنَنَا ۚ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ ﴾ 87 ﴿
व इन् का-न ताइ-फ़तुम् मिन्कुम् आमनू बिल्लज़ी उर्सिल्तु बिही व ताइ-फतुल-लम् युअ्मिनू फ़स्बिरू हत्ता यह्कुमल्लाहु बैनना, व हु-व ख़ैरूल् हाकिमीन
और यदि तुम्हारा एक समुदाय उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और दूसरा ईमान नहीं लाया है, तो तुम धैर्य रखो, यहाँ तक कि अल्लाह हमारे बीच निर्णय कर दे और वह उत्तम न्याय करने वाला है।
قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا مِن قَوْمِهِ لَنُخْرِجَنَّكَ يَا شُعَيْبُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَكَ مِن قَرْيَتِنَا أَوْ لَتَعُودُنَّ فِي مِلَّتِنَا ۚ قَالَ أَوَلَوْ كُنَّا كَارِهِينَ ﴾ 88 ﴿
क़ालल् म-लउल्लज़ीनस्तक्बरू मिन् क़ौमिही लनुख़् रि जन्न-क या शुऐबु वल्लज़ी-न आमनू म-अ-क मिन् क़र् यतिना औ ल-तअूदुन्-न फ़ी मिल्लतिना, क़ा-ल अ-व लौ कुन्ना कारिहीन
उसकी जाति के प्रमुखों ने, जिन्हें घमंड था, कहा कि हे शोऐब! हम तुम्हें तथा जो तुम्हारे साथ ईमान लाये हैं, अपने नगर से अवश्य निकाल देंगे अथवा तुम सबको हमारे धर्म में अवश्य वापस आना होगा। (शोऐब) ने कहाः क्या यदि हम उसे दिल से न मानें तो?
قَدِ افْتَرَيْنَا عَلَى اللَّهِ كَذِبًا إِنْ عُدْنَا فِي مِلَّتِكُم بَعْدَ إِذْ نَجَّانَا اللَّهُ مِنْهَا ۚ وَمَا يَكُونُ لَنَا أَن نَّعُودَ فِيهَا إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّنَا ۚ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا ۚ عَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْنَا ۚ رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَأَنتَ خَيْرُ الْفَاتِحِينَ ﴾ 89 ﴿
क़दिफ़्तरैना अलल्लाहि कज़िबन इन् उद्-ना फी मिल्लतिकुम् बअ्-द इज़् नज्जानल्लाहु मिन्हा, व मा यकूनु लना अन्-नअू-द फ़ीहा इल्ला अंय्यशा-अल्लाहु रब्बुना, वसि-अ रब्बुना कुल्-ल शैइन् अिल्मन्, अलल्लाहि तवक्कल्ना, रब्बनफ़्तह् बैनना व बै-न क़ौमिना बिल्-हक़्क़ि व अन्-त ख़ैरूल्-फ़ातिहीन
हमने अल्लाह पर मिथ्या आरोप लगाया है, यदि तुम्हारे धर्म में इसके पश्चात वापस आ गये, जबकि हमें अल्लाह ने उससे मुक्त कर दिया है और हमारे लिए संभव नहीं कि उसमें फिर आ जायें, परन्तु ये कि हमारा पालनहार चाहता हो। हमारा पालनहार प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान में समोये हुए है, अल्लाह ही पर हमारा भरोसा है। हे हमारे पालनहार! हमारे और हमारी जाति के बीच न्याय के साथ निर्णय कर दे और तू ही उत्तम निर्णयकारी है।
وَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ لَئِنِ اتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ ﴾ 90 ﴿
व क़ालल् म-लउल्लज़ी-न क-फरू मिन् क़ौमिही ल-इनित्तबअ्तुम् शुऐबन् इन्नकुम् इज़ल्-लख़ासिरून
तथा उसकी जाति के काफ़िर प्रमुखों ने कहा कि यदि तुम लोग शोऐब का अनुसरण करोगे, तो वस्तुतः तुम लोगों का उस समय नाश हो जायेगा।
فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ ﴾ 91 ﴿
फ़-अ-ख़ज़त्हुमुर्रज्फतु फ़अस्बहू फ़ी दारिहिम् जासिमीन
तो उन्हें भुकम्प ने पकड़ लिया, फिर भोर हुई, तो वे अपने घरों में औंधे पड़े हुए थे।
الَّذِينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا فِيهَا ۚ الَّذِينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَانُوا هُمُ الْخَاسِرِينَ ﴾ 92 ﴿
अल्लज़ी-न कज़्ज़बू शुऐबन कअल्लम् यग़्नौ फ़ीहा, अल्लज़ी-न कज़्ज़बू शुऐबन् कानू हुमुल ख़ासिरीन
जिन्होंने शोऐब को झुठलाया (उनकी ये दशा हुई कि) मानो कभी उस नगर में बसे ही नहीं थे।
فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ ۖ فَكَيْفَ آسَىٰ عَلَىٰ قَوْمٍ كَافِرِينَ ﴾ 93 ﴿
फ़-तवल्ला अन्हुम् व क़ा-ल या क़ौमि ल-क़द् अब्लग़्तुकुम् रिसालाति रब्बी व नसह्तु लकुम्, फ़कै-फ़ आसा अला क़ौमिन् काफ़िरीन *
तो शोऐब उनसे विमुख हो गया तथा कहाः हे मेरी जाति! मैंने तुम्हें अपने पालनहार के संदेश पहुँचा दिये, तथा तुम्हारा हितकारी रहा। तो काफ़िर जाति (के विनाश) पर कैसे शोक करूँ?
وَمَا أَرْسَلْنَا فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّبِيٍّ إِلَّا أَخَذْنَا أَهْلَهَا بِالْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ لَعَلَّهُمْ يَضَّرَّعُونَ ﴾ 94 ﴿
व मा अरसल्ना फी क़र यतिम् मिन् नबिय्यिन् इल्ला अख़ज़्ना अह़्लहा बिल्बअ्सा-इ वज़्ज़र्रा-इ लअ़ल्लहुम् यज़्ज़र्रअून
तथा हमने जब किसी नगरी में कोई नबी भेजा, तो उसके निवासियों को आपदा तथा दुःख में ग्रस्त कर दिया कि संभवतः वह विनती करें[1]। 1. आयत का भावार्त यह है कि सभी नबी अपनी जाति में पैदा हुये। सब अकेले धर्म का प्रचार करने के लिये आये। और सब का उपदेश एक था कि अल्लाह की वंदना करो, उस के सिवा कोई पूज्य नहीं। सब ने सत्कर्म की प्रेर्णा दी, और कुकर्म के दुष्परिणाम से सावधान किया। सब का साथ निर्धनों तथा निर्बलों ने दिया। प्रमुखों और बड़ों ने उन का विरोध किया। नबियों का विरोध भी उन्हें धमकी तथा दुःख दे कर किया गया। और सब का परिणाम भी एक प्रकार हुआ, अर्थात उन को अल्लाह की यातना ने घेर लिया। और यही सदा इस संसार में अल्लाह का नियम रहा है।
ثُمَّ بَدَّلْنَا مَكَانَ السَّيِّئَةِ الْحَسَنَةَ حَتَّىٰ عَفَوا وَّقَالُوا قَدْ مَسَّ آبَاءَنَا الضَّرَّاءُ وَالسَّرَّاءُ فَأَخَذْنَاهُم بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴾ 95 ﴿
सुम्-म बद्दल्ना मकानस्सय्यि-अतिल् ह-स-न-त हत्ता अफ़ौ व क़ालू क़द् मस्-स आबा अनज़्ज़र्रा उ वस्सर्रा- उ फ़-अख़ज़्ना हुम् ब़ग़्त-तंव् व हुम् ला यश्अुरून
फिर हमने आपदा को सुःख सुविधा से बदल दिया, यहाँ तक कि जब वे सुःखी हो गये और उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों को भी दुःख तथा सुख पहुँचता रहा है, तो अकस्मात् हमने उन्हें पकड़ लिया और वे समझ नहीं सके।
وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْقُرَىٰ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَيْهِم بَرَكَاتٍ مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ وَلَٰكِن كَذَّبُوا فَأَخَذْنَاهُم بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ ﴾ 96 ﴿
व लौ अन्-न अह़्लल्क़ुरा आमनू वत्तक़ौ ल-फ़तह़्ना अलैहिम् ब-रकातिम् मिनस्समा-इ वल्अर्ज़ि व लाकिन् कज़्ज़बू फ़-अख़ज़्नाहुम् बिमा कानू यक्सिबून
और यदि इन नगरों के वासी ईमान लाते और कुकर्मों से बचे रहते, तो हम उनपर आकाशों तथा धरती की सम्पन्नता के द्वार खोल देते। परन्तु उन्होंने झुठला दिया। अतः, हमने उनके करतूतों के कारण उन्हें (यातना में) घेर लिया।
أَفَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا بَيَاتًا وَهُمْ نَائِمُونَ ﴾ 97 ﴿
अ-फ़ अमि-न अह़्लुल्क़ुरा अंय्यअ्ति-यहुम् बअ्सुना बयातंव्-व हुम् ना इमून
तो क्या नगर वासी इस बात से निश्चिन्त हो गये हैं कि उनपर हमारी यातना रातों-रात आ जाये और वे पड़े सो रहे हों?
أَوَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا ضُحًى وَهُمْ يَلْعَبُونَ ﴾ 98 ﴿
अ-व अमि-न अह़्लुल्क़ुरा अंय्यअ्ति-यहुम् बअ्सुना जुहंव्वहुम् यल्अ़बून
अथवा नगर वासी निश्चिन्त हो गये कि हमारी यातना उनपर दिन के समय आ पड़े और वे खेल रहे हों?
أَفَأَمِنُوا مَكْرَ اللَّهِ ۚ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ ﴾ 99 ﴿
अ-फ़अमिनू मक्रल्लाहि, फ़ला यअ्मनु मक्रल्लाहि इल्लल् क़ौमुल-खासिरून*
तो क्या वे अल्लाह के गुप्त उपाय से निश्चिन्त हो गये हैं? तो (याद रखो!) अल्लाह के गुप्त उपाय से नाश होने वाली जाति ही निश्चिन्त होती है।
أَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ أَهْلِهَا أَن لَّوْ نَشَاءُ أَصَبْنَاهُم بِذُنُوبِهِمْ ۚ وَنَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ ﴾ 100 ﴿
अ-व लम् यह़्दि लिल्लज़ी-न यरिसूनल्-अर्-ज़ मिम् -बअ्दि अह़्लिहा अल्लौ नशा-उ असब्नाहुम् बिज़ुनूबिहिम्, व नत्बअु अला क़ुलूबिहिम् फ़हुम् ला यस्मअून
तो क्या उनको शिक्षा नहीं मिली, जो धरती के वारिस होते हैं, उसके अगले वासियों के पश्चात् कि यदि हम चाहें, तो उनके पापों के बदले उन्हें आपदा में ग्रस्त कर दें और उनके दिलों पर मुहर लगा दें, फिर वे कोई बात ही न सुन सकें?
تِلْكَ الْقُرَىٰ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنبَائِهَا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا مِن قَبْلُ ۚ كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ الْكَافِرِينَ ﴾ 101 ﴿
तिल्कल्कुरा नकुस्सु अ़लै-क मिन् अम्बा-इहा व ल-कद् जाअत्हुम् रूसुलूहुम् बिल्बय्यिनाति फ़मा कानू लियुअ्मिनू बिमा कज़्ज़बू मिन् कब्लु, कज़ालि-क यत्बअुल्लाहु अला कुलूबिल् काफ़िरीन
(हे नबी!) ये वे नगर हैं, जिनकी कथा हम आपको सुना रहे हैं। इन सबके पास उनके रसूल खुले तर्क (प्रमाण) लाये, तो वे ऐसे न थे कि उस सत्य पर विश्वास कर लें, जिसे वे इससे पूर्व झुठला[1] चुके थे। इसी प्रकार, अल्लाह काफ़िरों के दिलों पर मुहर लगाता है। 1. अर्थात सत्य का प्रमाण आने से पहले झुठला दिया था, उस के पश्चात् भी अपनी हठधर्मी से उसी पर अड़े रहे।
وَمَا وَجَدْنَا لِأَكْثَرِهِم مِّنْ عَهْدٍ ۖ وَإِن وَجَدْنَا أَكْثَرَهُمْ لَفَاسِقِينَ ﴾ 102 ﴿
व मा वजद्ना लिअक्सरिहिम् मिन् अह़्दिन व इंव् -वजद्ना अक्स – रहुम् लफ़ासिक़ीन
और हमने उनमें अधिक्तर को वचन पर स्थित नहीं पाया[1] तथा हमने उनमें अधिक्तर को अवज्ञाकारी पाया। 1. इस से उस प्रण (वचन) की ओर संकेत है, जो अल्लाह ने सब से “आदि काल” में लिया था कि क्या मैं तुम्हारा पालनहार (पूज्य) नहीं हूँ? तो सब ने इसे स्वीकार किया था। (देखियेः सूरह आराफ, आयतः172)
ثُمَّ بَعَثْنَا مِن بَعْدِهِم مُّوسَىٰ بِآيَاتِنَا إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَظَلَمُوا بِهَا ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ ﴾ 103 ﴿
सुम् -म बअ़स्ना मिम् -बअ्दिहिम् मूसा बिआयातिना इला फ़िरऔ-न व म-ल इही फ़-ज़-लमू बिहा फन्जुर् कै-फ़ का-न आकि – बतुल मुफ्सिदीन
फिर हमने इन रसूलों के पश्चात् मूसा को अपनी आयतों (चमत्कारों) के साथ फ़िरऔन[1] और उसके प्रमुखों के पास भेजा, तो उन्होंने भी हमारी आयतों के साथ अन्याय किया, तो देखो कि उपद्रवियों का क्या परिणाम हुआ? 1. मिस्र के शासकों की उपाधि फ़िरऔन होती थी। यह ईसा पूर्व डेढ़ हज़ार वर्ष की बात है। उन का राज्य शाम से लीबिया तथा ह़बशा तक था। फ़िरऔन अपने को सब से बड़ा पूज्य मानता था और लोग भी उस की पूजा करते थे। उस की ओर अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को एक अल्लाह की इबादत का संदेश दे कर भेजा कि पूज्य तो केवल अल्लाह है उस के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं।
وَقَالَ مُوسَىٰ يَا فِرْعَوْنُ إِنِّي رَسُولٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 104 ﴿
व का -ल मूसा या फ़िरऔनु इन्नी रसूलुम् मिर्रब्बिल – आलमीन
तथा मूसा ने कहाः हे फ़िरऔन! मैं वास्तव, में विश्व के पालनहार का रसूल (संदेश वाहक) हूँ।
حَقِيقٌ عَلَىٰ أَن لَّا أَقُولَ عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ ۚ قَدْ جِئْتُكُم بِبَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّكُمْ فَأَرْسِلْ مَعِيَ بَنِي إِسْرَائِيلَ ﴾ 105 ﴿
हक़ीकुन् अला अल्ला अकू-ल अ़लल्लाहि इल्लल्हक् -क, कद् जिअ्तुकुम् बिबय्यि -नतिम् मिर्रब्बिकुम् फ़-अरसिल् मअि-य बनी इस्राईल
मेरे लिए यही योग्य है कि अल्लाह के विषय में सत्य के अतिरिक्त कोई बात न करूँ। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से खुला प्रमाण लाया हूँ। इसलिए मेरे साथ बनी इस्राईल[1] को जाने दो। 1. बनी इस्राईल यूसुफ अलैहिस्सलाम के युग में मिस्र आये थे। तथा चार सौ वर्ष का युग बड़े आदर के साथ व्यतीत किया। फिर उन के कुकर्मों के कारण फ़िरऔन और उस की जाति ने उन को अपना दास बना लिया। जिस के कारण मूसा (अलैहिस्सलाम) ने बनी इस्राईल को मुक्त करने की माँग की। (इब्ने कसीर)
قَالَ إِن كُنتَ جِئْتَ بِآيَةٍ فَأْتِ بِهَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ﴾ 106 ﴿
का -ल इन् कुन् -त जिअ् -त बिआयतिन् फ़अ्ति बिहा इन् कुन्-त मिनस्सादिक़ीन
उसने कहाः यदि तुमकोई प्रमाण (चमत्कार) लाये हो, तो प्रस्तुत करो, यदि तुम सच्चे हो।
فَأَلْقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ ثُعْبَانٌ مُّبِينٌ ﴾ 107 ﴿
फ़अल्क़ा अ़साहु फ़-इज़ा हि-य सुअ्बानुम् मुबीन
फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, तो अकस्मात् वह एक अजगर बन गई।
وَنَزَعَ يَدَهُ فَإِذَا هِيَ بَيْضَاءُ لِلنَّاظِرِينَ ﴾ 108 ﴿
व न -ज़ –अ य- दहू-फ़ इज़ा हि-य बैज़ा -उ लिन्नाज़िरीन *
और अपना हाथ (जैब से) निकाला, तो वह देखने वालों के लिए चमक रहा था।
قَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِ فِرْعَوْنَ إِنَّ هَٰذَا لَسَاحِرٌ عَلِيمٌ ﴾ 109 ﴿
कालल्म – लउ मिन् कौमि फिरऔ़-न इन्- न हाज़ा लसाहिरून् अ़लीम
फ़िर्औन की जाति के प्रमुखों ने कहाः वास्तव में, ये बड़ा दक्ष जादूगर है।
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُمْ ۖ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ ﴾ 110 ﴿
युरीदु अंय्युखरि जकुम् मिन् अर्जिकुम् फ़-माज़ा तअ्मुरून
वह तुम्हें, तुम्हारे देश से निकालना चाहता है। तो अब क्या आदेश देते हो?
قَالُوا أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَأَرْسِلْ فِي الْمَدَائِنِ حَاشِرِينَ ﴾ 111 ﴿
कालू अरजिह् व अख़ाहु व अरसिल फ़िल्मदाइनि हाशिरीन
सबने कहाः उसे और उसके भाई (हारून) को अभी छोड़ दो और नगरों में एकत्र करने के लिए हरकारे भेजो।
يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَاحِرٍ عَلِيمٍ ﴾ 112 ﴿
यअ्तू – क बिकुल्लि साहिरिन् अलीम
जो प्रत्येक दक्ष जादूगर को तुम्हारे पास लायें।
وَجَاءَ السَّحَرَةُ فِرْعَوْنَ قَالُوا إِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ الْغَالِبِينَ ﴾ 113 ﴿
व जाअस्स- ह-रतु फ़िरऔ-न कालू इन -न लना लअज्रन् इन् कुन्ना नह़्नुल् गालिबीन
और जादूगर फ़िरऔन के पास आ गये। उन्होंने कहाः हमें निश्चय पुरस्कार मिलेगा, यदि हम ही विजय हो गये तो?
قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ لَمِنَ الْمُقَرَّبِينَ ﴾ 114 ﴿
का -ल न -अम् व इन्नकुम् लमिन्ल मुकर्रबीन
फ़िर्औन ने कहाः हाँ! और तुम मेरे समीपवर्तियों में से भी हो जाओगे।
قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِمَّا أَن تُلْقِيَ وَإِمَّا أَن نَّكُونَ نَحْنُ الْمُلْقِينَ ﴾ 115 ﴿
कालू या मूसा इम्मा अन् तुल्कि -य व इम्मा अन्नकू – न नह़्नुल – मुल्क़ीन
जादूगरों ने कहाः हे मूसा! तुम (पहले) फेंकोगे या हमें फेंकना होगा?
قَالَ أَلْقُوا ۖ فَلَمَّا أَلْقَوْا سَحَرُوا أَعْيُنَ النَّاسِ وَاسْتَرْهَبُوهُمْ وَجَاءُوا بِسِحْرٍ عَظِيمٍ ﴾ 116 ﴿
का-ल अल्कू फ़-लम्मा अल्कौ स-हरू अअ्युनन्नासि वस्तर हबूहुम् व जाऊ बिसिह़रिन अ़ज़ीम
मूसा ने कहाः तुम्हीं फेंको। तो उन्होंने जब (रस्सियाँ) फेंकीं, तो लोंगों की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें भयभीत कर दिया और बहुत बड़ा जादू कर दिखाया।
وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ أَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَإِذَا هِيَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ ﴾ 117 ﴿
व औहैना इला मूसा अन् अल्कि असा-क फ़-इज़ा हि- य तल्कफु मा यअ्फिकून
तो हमने मूसा को वह़्यी की कि अपनी लाठी फेंको और वह अकस्मात् झूठे इन्द्रजाल को निगलने लगी।
فَوَقَعَ الْحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 118 ﴿
फ़-व-क़अ़ल-हक्कु व ब-त-ल मा कानू यअ्मलून
अतः सत्य सिध्द हो गया और उनका बनाया मंत्र-तंत्र व्यर्थ होकर[1] रह गया। 1. क़ुर्आन ने अब से तेरह सौ वर्ष पहले यह घोषणा कर दी थी कि जादू तथा मंत्र-तंत्र निर्मूल हैं।
فَغُلِبُوا هُنَالِكَ وَانقَلَبُوا صَاغِرِينَ ﴾ 119 ﴿
फ़गुलिबू हुनालि-क वन्क-लबू साग़िरीन
अंततः वे प्राजित कर दिये गये और तुच्छ तथा अपमानित होकर रह गये।
وَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سَاجِدِينَ ﴾ 120 ﴿
व उल्कियस्स-ह-रतु साजिदीन
तथा सभी जादूगर (मूसा का सत्य) देखकर सज्दे में गिर गये।
قَالُوا آمَنَّا بِرَبِّ الْعَالَمِينَ ﴾ 121 ﴿
कालू आमन्ना बिरब्बिल्-आ़लमीन
उन्होंने कहाः हम विश्व के पालनहार पर ईमान लाये।
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَارُونَ ﴾ 122 ﴿
रब्बि मूसा व हारून
जो मूसा तथा हारून का पालनहार है।
قَالَ فِرْعَوْنُ آمَنتُم بِهِ قَبْلَ أَنْ آذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّ هَٰذَا لَمَكْرٌ مَّكَرْتُمُوهُ فِي الْمَدِينَةِ لِتُخْرِجُوا مِنْهَا أَهْلَهَا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ﴾ 123 ﴿
क़ा-ल फ़िरऔनु आमन्तुम् बिही क़ब्-ल अन् आज़-न लकुम्, इन्-न हाज़ा लमक़रूम्-मकर तुमू हु फ़िल्मदीनति लितुख़रिजू मिन्हा अह़्लहा, फ़सौ-फ़ तअ्लमून
फ़िरऔन ने कहाः इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ, तुम उसपर ईमान ले आये? वास्तव में, ये षड्यंत्र है, जिसे तुमने नगर में रचा है, ताकि उसके निवासियों को उससे निकाल दो! तो शीघ्र ही तुम्हें इस (के परिणाम) का ज्ञान हो जायेगा।
لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَافٍ ثُمَّ لَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ ﴾ 124 ﴿
ल-उक़त्तिअ़न् न ऐदियकुम् व अर्जु-लकुम् मिन् ख़िलाफ़िन सुम्-म ल-उसल्लिबन्नकुम् अज्मईन
मैं अवश्य तुम्हारे हाथ तथा पाँव विपरीत दिशाओं में काट दूँगा, फिर तुम सभी को फाँसी पर लटका दूँगा।
قَالُوا إِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ ﴾ 125 ﴿
क़ालू इन्ना इला रब्बिना मुन्क़लिबून
उन्होंने कहाः हमें अपने पालनहार ही की ओर प्रत्येक दशा में जाना है।
وَمَا تَنقِمُ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِآيَاتِ رَبِّنَا لَمَّا جَاءَتْنَا ۚ رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ ﴾ 126 ﴿
व मा तन्क़िमु मिन्ना इल्ला अन् आमन्ना बिआयाति रब्बिना लम्मा जाअत्-ना, रब्बना अफ्-रिग़ अलैना सब् –रंव्-व तवफ्फ़ना मुस्लिमीन *
तू हमसे इसी बात का तो बदला ले रहा है कि हमारे पास हमारे पालनहार की आयतें (निशानियाँ) आ गयीं? तो हम उनपर ईमान ला चुके हैं। हे हमारे पालनहार! हमपर धैर्य (की धारा) उंडेल दे! और हमें इस दशा में (संसार से) उठा कि तेरे आज्ञाकारी रहें।
وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِ فِرْعَوْنَ أَتَذَرُ مُوسَىٰ وَقَوْمَهُ لِيُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ وَيَذَرَكَ وَآلِهَتَكَ ۚ قَالَ سَنُقَتِّلُ أَبْنَاءَهُمْ وَنَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ وَإِنَّا فَوْقَهُمْ قَاهِرُونَ ﴾ 127 ﴿
व क़ालल्म-लउ मिन् क़ौमि फिरऔ-न अ-त-ज़रू मूसा व क़ौमहू लियुफ्सिदू फिल्अर्ज़ि व य-ज़-र-क व आलि-ह-त-क, क़ा-ल सनुक़त्तिलु अब्-ना-अहुम् व नस्तह़्यी निसा-अहुम्, व इन्ना फ़ौक़हुम् क़ाहिरून
और फ़िरऔन की जाति के प्रमुखों ने (उससे) कहाः क्या तुम मूसा और उसकी जाति को छोड़ दोगे कि देश में विद्रोह करें तथा तुम्हें और तुम्हारे पूज्यों[1] को छोड़ दें? उसने कहाः हम उनके पुत्रों को वध कर देंगे और उनकी स्त्रियों को जीवित रहने देंगे, हम उनपर दबाव रखते हैं। 1. कुछ भाष्यकारों ने लिखा है कि मिस्री अनेक देवताओं की पूजा करते थे, जिन में सब से बड़ा देवता सूर्य था, जिसे “रूअ” कहते थे। और राजा को उसी का अवतार मानते थे, और उस की पूजा और उस के लिये सज्दा करते थे, जिस प्रकार अल्लाह के लिये सज्दा किया जाता है।
قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ اسْتَعِينُوا بِاللَّهِ وَاصْبِرُوا ۖ إِنَّ الْأَرْضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ ﴾ 128 ﴿
क़ा-ल मूसा लिक़ौमिहिस्तईनू बिल्लाहि वस्बिरू, इन्नल्-अर्-ज़ लिल्लाहि, यूरिसुहा मंय्यशा -उ मिन् अिबादिही, वल्आक़ि-बतु लिल्मुत्तक़ीन
मूसा ने अपनी जाति से कहाः अल्लाह से सहायता माँगो और सहन करो, वास्तव में, धरती अल्लाह की है, वह अपने भक्तों में जिसे चाहे, उसका वारिस (उत्तराधिकारी) बना देता है और अन्त उन्हीं के लिए है, जो आज्ञाकारी हों।
قَالُوا أُوذِينَا مِن قَبْلِ أَن تَأْتِيَنَا وَمِن بَعْدِ مَا جِئْتَنَا ۚ قَالَ عَسَىٰ رَبُّكُمْ أَن يُهْلِكَ عَدُوَّكُمْ وَيَسْتَخْلِفَكُمْ فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ ﴾ 129 ﴿
क़ालू ऊज़ीना मिन् क़ब्लि अन् तअ्ति-यना व मिम्-बअ्दि मा जिअ्तना, क़ा-ल अ़सा रब्बुकुम् अंय्युह़्लि-क अदुव्वकुम् व यस्तख़्लि-फकुम् फ़िल्अर्ज़ि फ़-यन्ज़ु-र कै-फ़ तअ्मलून *
उन्होंने कहाः हम तुम्हारे आने से पहले भी सताये गये और तुम्हारे आने के पश्चात् भी (सताये जा रहे हैं)! मूसा ने कहाः समीप है कि तुम्हारा पालनहार तुम्हारे शत्रु का विनाश कर दे और तुम्हें देश में अधिकारी बना दे। फिर देखे कि तुम्हारे कर्म कैसे होते हैं?
وَلَقَدْ أَخَذْنَا آلَ فِرْعَوْنَ بِالسِّنِينَ وَنَقْصٍ مِّنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ ﴾ 130 ﴿
व ल-क़द् अख़ज्-ना आ-ल फ़िरऔ-न बिस्सिनी-न व नक़्सिम् मिनस्स-मराति लअ़ल्लहुम् यज़्ज़क्करून
और हमने फ़िरऔन की जाति को अकालों तथा उपज की कमी में ग्रस्त कर दिया, ताकि वे सावधान हो जायेँ।
فَإِذَا جَاءَتْهُمُ الْحَسَنَةُ قَالُوا لَنَا هَٰذِهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَطَّيَّرُوا بِمُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُ ۗ أَلَا إِنَّمَا طَائِرُهُمْ عِندَ اللَّهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 131 ﴿
फ़-इज़ा जाअत्हुमुल ह-स-नतु क़ालू लना हाज़िही, व इन् तुसिब्हुम् सय्यि-अतुंय्यत्तय्यरू बिमूसा व मम्-म-अ़हू, अला इन्नमा ताइरूहुम् अिन्दल्लाहि व लाकिन्-न अक्स-रहुम् ला यअ्लमून
तो जब उनपर सम्पन्नता आती, तो कहते कि हम इसके योग्य हैं और जब अकाल पड़ता, तो मूसा और उसके साथियों से बुरा सगुन लेते। सुन लो! उनका बुरा सगुम तो अल्लाह के पास[1] था, परन्तु अधिक्तर लोग इसका ज्ञान नहीं रखते। 1. अर्थात अल्लाह ने प्रत्येक दशा के लिये एक नियम बना दिया है, जिस के अनुसार कर्मों के परिणाम सामने आते हैं, चाहे वह अशुभ हों या न हों, सब अल्लाह के निर्धारित नियमानुसार होते हैं।
وَقَالُوا مَهْمَا تَأْتِنَا بِهِ مِنْ آيَةٍ لِّتَسْحَرَنَا بِهَا فَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ ﴾ 132 ﴿
व क़ालू मह़्मा तअ्तिना बिही मिन् आयतिल्-लितस्ह-रना बिहा, फ़मा नह़्नु ल-क बिमुअ्मिनीन
और उन्होंने कहाः तू हमपर जादू करने के लिए कोई भी आयत (चमत्कार) ले आये, हम तेरा विश्वास करने वाले नहीं हैं।
رْسَلْنَا عَلَيْهِمُ الطُّوفَانَ وَالْجَرَادَ وَالْقُمَّلَ وَالضَّفَادِعَ وَالدَّمَ آيَاتٍ مُّفَصَّلَاتٍ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا مُّجْرِمِينَ ﴾ 133 ﴿
फ़-अरसल्ना अलैहिमुत्तूफा-न वल्जरा-द वल्क़ुम्म-ल वज़्ज़फ़ादि-अ वद्द-म आयातिम् मुफ़स्सलातिन्, फ़स्तक्बरू व कानू क़ौमम् मुज्रिमीन
अन्ततः, हमने उनपर तूफ़ान (उग्र वर्षा), टिड्डी दल, जुयें, मेढक और रक्त की वर्षा भेजी। अलग-अलग निशानियाँ; फिर भी उन्होंने अभिमान किया और वे थी ही अपराधी जाति।
وَلَمَّا وَقَعَ عَلَيْهِمُ الرِّجْزُ قَالُوا يَا مُوسَى ادْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ ۖ لَئِن كَشَفْتَ عَنَّا الرِّجْزَ لَنُؤْمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرْسِلَنَّ مَعَكَ بَنِي إِسْرَائِيلَ ﴾ 134 ﴿
व लम्मा व-क़-अ अलैहिमुर्रिज्ज़ु क़ालू या मूसद्अु लना रब्ब-क बिमा अहि-द अिन्द-क, ल-इन् कशफ्-त अन्नर्रिज्-ज़ लनुअ्मिनन्-न ल-क व लनुर्सिलन्-न म-अ-क बनी इस्राईल
और जब उनपर यातना आ पड़ी, तो उन्होंने कहाः हे मूसा! तू अपने पालनहार से उस वचन के कारण, जो उसने तुझे दिया है, हमारे लिए प्रार्थना कर। यदि तूने (अपनी प्रार्थना से) हमसे यातना दूर कर दी, तो हम अवश्य तेरा विश्वास कर लेंगे और बनी इस्राईल को तेरे साथ जाने की अनुमति देंगे।
فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ الرِّجْزَ إِلَىٰ أَجَلٍ هُم بَالِغُوهُ إِذَا هُمْ يَنكُثُونَ ﴾ 135 ﴿
फ़-लम्मा कशफ़्ना अ़न्हुमुर्रिज् ज़ इला अ-जलिन् हुम् बालिग़ूहु इज़ा हुम् यन्कुसून
फिर जब हमने एक विशेष समय तक के लिए उनसे यातना दूर कर दी, जिस तक उन्हें पहुँचना था, तो अकस्मात् वे वचन भंग करने लगे।
فَانتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَأَغْرَقْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِلِينَ ﴾ 136 ﴿
फ़न्तक़म्-ना मिन्हुम् फ़-अग़्-र-क़्नाहुम् फिल्यम्मि बिअन्नहुम् कज़्ज़बू बिआयातिना व कानू अ़न्हा ग़ाफ़िलीन
अन्ततः, हमने उनसे बदला लिया और उन्हें सागर में डुबो दिया, इस कारण कि उन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठला दिया और उनसे निश्चेत हो गये। उनके धैर्य रखने के कारण तथा हमने उसे ध्वस्त कर दिया, जो फ़िरऔन और उसकी जाति कलाकारी कर रही थी और जो बेलें छप्परों पर चढ़ रही थीं।[1] 1. अर्थात उन के ऊँचे-ऊँचे भवन तथा सुन्दर बाग़-बग़ीचे।
وَأَوْرَثْنَا الْقَوْمَ الَّذِينَ كَانُوا يُسْتَضْعَفُونَ مَشَارِقَ الْأَرْضِ وَمَغَارِبَهَا الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا ۖ وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ الْحُسْنَىٰ عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ بِمَا صَبَرُوا ۖ وَدَمَّرْنَا مَا كَانَ يَصْنَعُ فِرْعَوْنُ وَقَوْمُهُ وَمَا كَانُوا يَعْرِشُونَ ﴾ 137 ﴿
व औरस् नल् क़ौमल्लज़ी-न कानू युस्तज़्-अफू-न मशारिक़ल् अर्ज़ि व मग़ारि-बहल्लती बारक्ना फ़ीहा, व तम्मत् कलि-मतु रब्बिकल् हुस्-ना अला बनी इस्राई-ल, बिमा स-बरू, व दम्मरना मा का-न यस्बअु फिरऔनु व क़ौमुहू व मा कानू यअ्-रिशून •
और हमने उस जाति (बनी इस्राईल) को, जो निर्बल समझे जा रहे थे, धरती (शाम देश) के पश्चिमों तथा पूर्वों का, जिसमें हमने बरकत दी थी, अधिकारी बना दिया और (इस प्रकार हे नबी!) आपके पालनहार का शुभ वचन बनी इस्राईल के लिए पूरा हो गया, उनके धैर्य रखने के कारण तथा हमने उसे धवस्त कर दिया, जो फ़िरऔन और उसकी जाति कलाकारी कर रही थी और जो बेलें छप्परों पर चढ़ा रहे थे[1]। 1. अर्थात उन के ऊँचे-ऊँचे भवन तथा सुन्दर बाग़-बग़ीचे।
وَجَاوَزْنَا بِبَنِي إِسْرَائِيلَ الْبَحْرَ فَأَتَوْا عَلَىٰ قَوْمٍ يَعْكُفُونَ عَلَىٰ أَصْنَامٍ لَّهُمْ ۚ قَالُوا يَا مُوسَى اجْعَل لَّنَا إِلَٰهًا كَمَا لَهُمْ آلِهَةٌ ۚ قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ ﴾ 138 ﴿
व जावज़्ना बि-बनी इस्राईलल्-बह़्-र फ-अतौ अ़ला कौमिंय्यअ्कुफू-न अ़ला अस्-ना मिल्लहुम्, क़ालू या मूसज् अल्-लना इलाहन् कमा लहुम् आलि-हतुन्, क़ा-ल इन्नकुम् क़ौमुन् तज्हलून
और बनी इस्राईल को हमने सागर पार करा दिया, तो वे एक जाति के पास से होकर गये, जो अपनी मूर्तियों की पूजा कर रही थी, उन्होंने कहाः हे मूसा! हमारे लिए वैसा ही एक पूज्य बना दीजिये, जैसे इनके पूज्य हैं। मूसा ने कहाः वास्तव में, तुम अज्ञान जाति हो।
إِنَّ هَٰؤُلَاءِ مُتَبَّرٌ مَّا هُمْ فِيهِ وَبَاطِلٌ مَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 139 ﴿
इन्-न हाउला-इ मुतब्बरूम् मा हुम् फ़ीहि व बातिलुम् मा कानू यअ्मलून
ये लोग जिस रीति में हैं, उसे नाश हो जाना है और वे जो कुछ कर रहे हैं, सर्वथा असत्य है।
قَالَ أَغَيْرَ اللَّهِ أَبْغِيكُمْ إِلَٰهًا وَهُوَ فَضَّلَكُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ ﴾ 140 ﴿
क़ा-ल अग़ैरल्लाहि अब्ग़ीकुम् इलाहंव्-व हु-व फज़्ज़-लकुम् अलल्-आलमीन
मूसा ने कहाः क्या मैं अल्लाह के सिवा तुम्हारे लिए कोई दूसरा पूज्य निर्धारित करूँ, जबकि उसने तुम्हें सारे संसारों के वासियों पर प्रधानता दी है?
وَإِذْ أَنجَيْنَاكُم مِّنْ آلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوءَ الْعَذَابِ ۖ يُقَتِّلُونَ أَبْنَاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَاءَكُمْ ۚ وَفِي ذَٰلِكُم بَلَاءٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌ ﴾ 141 ﴿
व इज़् अन्जैनाकुम् मिन् आलि फ़िरऔ-न यसूमूनकुम् सूअल्-अ़ज़ाबि, युक़त्तिलू-न अब्-ना-अकुम् व यस्तह्यू-न निसा-अकुम्, व फ़ी जालिकुम् बलाउम् मिर्रब्बिकुम् अज़ीम *
तथा उस समय को याद करो, जब हमने तुम्हें फ़िरऔन की जाति से बचाया। वह तुम्हें घोर यातना दे रहे थे; तुम्हारे पुत्रों को वध कर रहे थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रख रहे थे और इसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से भारी परीक्षा थी।
وَوَاعَدْنَا مُوسَىٰ ثَلَاثِينَ لَيْلَةً وَأَتْمَمْنَاهَا بِعَشْرٍ فَتَمَّ مِيقَاتُ رَبِّهِ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً ۚ وَقَالَ مُوسَىٰ لِأَخِيهِ هَارُونَ اخْلُفْنِي فِي قَوْمِي وَأَصْلِحْ وَلَا تَتَّبِعْ سَبِيلَ الْمُفْسِدِينَ ﴾ 142 ﴿
व वाअ़द्-ना मूसा सलासी-न लै-लतंव्-व अत्मम्-ना हा बिअ़श्रिन् फ-तम्-म मीक़ातु रब्बिही अरबई-न लै-लतन्, व क़ा-ल मूसा लिअख़ीहि हारूनख़्लुफ़्नी फ़ी क़ौमी व अस्लिह् व ला तत्तबिज् सबीलल्-मुफ्सिदीन
और हमने मूसा को तीस रातों का वचन[1] दिया और उसकी पूर्ती दस रातों से कर दी, तो तेरे पालनहार की निर्धारित अवधि चालीस रात पूरी हो गयी तथा मूसा ने अपने भाई हारून से कहाः तुम मेरी जाति में मेरा प्रतिनिधि रहना, सुधार करते रहना और उपद्रवकारियों की नीति न अपनाना। 1. अर्थात तूर पर्वत पर आ कर अल्लाह की इबादत करने और धर्म विधान प्रदान करने के लिये।
وَلَمَّا جَاءَ مُوسَىٰ لِمِيقَاتِنَا وَكَلَّمَهُ رَبُّهُ قَالَ رَبِّ أَرِنِي أَنظُرْ إِلَيْكَ ۚ قَالَ لَن تَرَانِي وَلَٰكِنِ انظُرْ إِلَى الْجَبَلِ فَإِنِ اسْتَقَرَّ مَكَانَهُ فَسَوْفَ تَرَانِي ۚ فَلَمَّا تَجَلَّىٰ رَبُّهُ لِلْجَبَلِ جَعَلَهُ دَكًّا وَخَرَّ مُوسَىٰ صَعِقًا ۚ فَلَمَّا أَفَاقَ قَالَ سُبْحَانَكَ تُبْتُ إِلَيْكَ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُؤْمِنِينَ ﴾ 143 ﴿
व लम्मा जा-अ मूसा लिमीक़ातिना व कल्ल-महू रब्बुहु, क़ा-ल रब्बि अरिनी अन्ज़ुर् इलै-क, क़ा-ल लन् तरानी व लाकिनिन्ज़ुर् इलल्-ज-बलि फ़-इनिस्त-क़र्-र मकानहू फ़सौ-फ तरानी, फ़-लम्मा तजल्ला रब्बुहू लिल्जबलि ज-अ़-लहू दक्कंव्-व खर्-र मूसा सअिकन्, फ़-लम्मा अफ़ा-क़ क़ा-ल सुब्हान-क तुब्तु इलै-क व अ-ना अव्वलुल-मुअ्मिनीन
और जब मूसा हमारे निर्धारित समय पर आ गया और उसके पालनहार ने उससे बात की, तो उसने कहाः हे मेरे पालनहार! मेरे लिए अपने आपको दिखा दे, ताकि मैं तेरा दर्शन कर लूँ। अल्लाहने कहाः तू मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा। परन्तु इस पर्वत की ओर देख! यदि ये अपने स्थान पर स्थिर रह गया, तो तू मेरा दर्शन कर सकेगा। फिर जब उसका पालनहार पर्वत की ओर प्रकाशित हुआ, तो उसे चूर-चूर कर दिया और मूसा निश्चेत होकर गिर गया। फिर जब चेतना आयी, तो उसने कहाः तू पवित्र है! मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ। तथा मैं सर्व प्रथम[1] ईमान लाने वालों में से हूँ। 1. इस से प्रत्यक्ष हुआ कि कोई व्यक्ति इस संसार में रहते हुये अल्लाह को नहीं देख सकता और जो ऐसा कहते हैं वह शैतान के बहकावे में हैं। परन्तु सह़ीह़ ह़दीस से सिध्द होता है कि आख़िरत में ईमान वाले अल्लाह का दर्शन करेंगे।
قَالَ يَا مُوسَىٰ إِنِّي اصْطَفَيْتُكَ عَلَى النَّاسِ بِرِسَالَاتِي وَبِكَلَامِي فَخُذْ مَا آتَيْتُكَ وَكُن مِّنَ الشَّاكِرِينَ ﴾ 144 ﴿
क़ा-ल या मूसा इन्निस्तफैतु-क अलन्नासि बिरिसालाती व बि-कलामी, फख़ुज़् मा आतैतुक व कुम् मिनश्शाकिरीन
अल्लाह ने कहाः हे मूसा! मैंने तुझे लोगों पर प्रधानता देकर अपने संदेशों तथा अपने वार्तालाप द्वारा निर्वाचित कर लिया है। अतः जो कुछ तुझे प्रदान किया है, उसे ग्रहण कर ले और कृतज्ञों में हो जा।
وَكَتَبْنَا لَهُ فِي الْأَلْوَاحِ مِن كُلِّ شَيْءٍ مَّوْعِظَةً وَتَفْصِيلًا لِّكُلِّ شَيْءٍ فَخُذْهَا بِقُوَّةٍ وَأْمُرْ قَوْمَكَ يَأْخُذُوا بِأَحْسَنِهَا ۚ سَأُرِيكُمْ دَارَ الْفَاسِقِينَ ﴾ 145 ﴿
व कतब्-ना लहू फ़िल्-अल्वाहि मिन् कुल्लि शैइम् मौअि-ज़तंव् व तफ्सीलल्-लिकुल्लि शैइन्, फ़ख़ुज्हा बिक़ुव्वतिंव् वअ्मुर् क़ौम-क यअ्ख़ुज़ू बिअह़्सनिहा, सउरीकुम् दारल्फ़ासिक़ीन
और हमने उसके लिए तख़्तियों पर (धर्म के) प्रत्येक विषय के लिए निर्देश और प्रत्येक बात का विवरण लिख दिया। (तथा कहा कि) इसे दृढ़ता से पकड़ लो और अपनी जाति को आदेश दो कि उसके उत्तम निर्देशों का पालन करे और मैं तुम्हें अवैज्ञाकरियों का घर दिखा दूँगा।
سَأَصْرِفُ عَنْ آيَاتِيَ الَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَإِن يَرَوْا كُلَّ آيَةٍ لَّا يُؤْمِنُوا بِهَا وَإِن يَرَوْا سَبِيلَ الرُّشْدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا وَإِن يَرَوْا سَبِيلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِلِينَ ﴾ 146 ﴿
सअस् रिफु अन् आयातियल्लज़ी-न य-तकब्बरू-न फिल्अर्ज़ि बिग़ैरिल्-हक़्क़ि, व इंय्यरौ कुल-ल आयतिल् ला युअ्मिनू बिहा, व इंय्यरौ सबीलर्रुश्दि ला यत्तख़िज़ूहु सबीलन्, व इंय्यरौ सबीलल्-ग़य्यि यत्तख़िज़ूहु सबीलन्, ज़ालि-क बिअन्नहुम् कज़्ज़बू बिआयातिना व कानू अन्हा ग़ाफ़िलीन
मैं उन्हें[1] अपनी आयतों (निशानियों) से फेर[2] दूँगा, जो धरती में अवैध अभिमान करते हैं, यदि वे प्रत्येक आयत (निशानी) देख लें, तब भी उसपर ईमान नहीं लायेंगे; यदि वे सुपथ देखेंगे, तो उसे नहीं अपनायेंगे और यदि कुपथ देख लें, तो उसे अपना लेंगे। ये इस कारण कि उन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठला दिया और उनसे निश्चेत रहे। 1. अर्थात तुम्हें उन पर विजय दूँगा जो अवैज्ञाकारी हैं, जैसे उस समय की अमालिक़ा इत्यादि जातियों पर। 2. अर्थात जो जान-बूझ कर अवैज्ञा करेगा, अल्लाह का नियम यही है कि वह तर्कों तथा प्रकाशों से प्रभावित होने की योग्यता खो देगा। इस का यह अर्थ नहीं कि अल्लाह किसी को अकारण कुपथ पर बाध्य कर देता है।
وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَلِقَاءِ الْآخِرَةِ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 147 ﴿
वल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना व लिक़ाइल आख़ि-रति हबितत् अअ्मालुहुम्, हल युज्ज़ौ-न इल्ला-मा कानू यअ्मलून *
और जिन लोगों ने हमारी आयतों तथा प्रलोक (में हमसे) मिलने को झुठला दिया, उन्हीं के कर्म व्यर्थ हो गये और उन्हें उसी का बदला मिलेगा, जो कुकर्म वे कर रहे थे।
وَاتَّخَذَ قَوْمُ مُوسَىٰ مِن بَعْدِهِ مِنْ حُلِيِّهِمْ عِجْلًا جَسَدًا لَّهُ خُوَارٌ ۚ أَلَمْ يَرَوْا أَنَّهُ لَا يُكَلِّمُهُمْ وَلَا يَهْدِيهِمْ سَبِيلًا ۘ اتَّخَذُوهُ وَكَانُوا ظَالِمِينَ ﴾ 148 ﴿
वत्त-ख़-ज़ क़ौमु मूसा मिम्-बअ्दिही मिन् हुलिय्यिहिम् अिज्लन् ज-सदल्लहू खुवारून्, अलम् यरौ अन्नहू ला युकल्लिमुहुम् व ला यह्दीहिम सबीला • इत्त ख़ज़ूहु व कानू ज़ालिमीन
और मूसा की जाति ने उसके (पर्वत पर जाने के) पश्चात् अपने आभूषणों से एक बछड़े की मूर्ति बना ली, जिससे गाय के डकारने के समान ध्वनि निकलती थी। क्या उन्होंने ये नहीं सोचा कि न तो वह उनसे बात[1] करता है और न किसी प्रकार का मार्गदर्शन देता है? उन्होंने उसे बना लिया तथा वे अत्याचारी थे। 1. अर्थात उस से एक ही प्रकार की ध्वनि क्यों निकलती है। बाबिल और मिस्र में भी प्राचीन युग में गाय-बैल की पूजा हो रही थी। और यदि बाबिल की सभ्यता को प्राचीन मान लिया जाये तो यह विचार दूसरे देशों में वहीं से फैला होगा।
وَلَمَّا سُقِطَ فِي أَيْدِيهِمْ وَرَأَوْا أَنَّهُمْ قَدْ ضَلُّوا قَالُوا لَئِن لَّمْ يَرْحَمْنَا رَبُّنَا وَيَغْفِرْ لَنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ ﴾ 149 ﴿
व लम्मा सुक़ि-त फ़ी ऐदीहिम् व रऔ अन्नहुम् क़द् ज़ल्लू, क़ालू ल-इल्लम् यर्हम्-ना रब्बुना व यग़्फिर लना ल-नकूनन्-न मिनल्ख़ासिरीन
और जब वे (अपने किये पर) लज्जित हुए और समझ गये कि वे कुपथ हो गये हैं, तो कहने लगेः यदि हमारे पालनहार ने हमपर दया नहीं की और हमें क्षमा नहीं किया, तो हम अवश्य विनाशों में हो जायेंगे।
وَلَمَّا رَجَعَ مُوسَىٰ إِلَىٰ قَوْمِهِ غَضْبَانَ أَسِفًا قَالَ بِئْسَمَا خَلَفْتُمُونِي مِن بَعْدِي ۖ أَعَجِلْتُمْ أَمْرَ رَبِّكُمْ ۖ وَأَلْقَى الْأَلْوَاحَ وَأَخَذَ بِرَأْسِ أَخِيهِ يَجُرُّهُ إِلَيْهِ ۚ قَالَ ابْنَ أُمَّ إِنَّ الْقَوْمَ اسْتَضْعَفُونِي وَكَادُوا يَقْتُلُونَنِي فَلَا تُشْمِتْ بِيَ الْأَعْدَاءَ وَلَا تَجْعَلْنِي مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ﴾ 150 ﴿
व लम्मा र-ज-अ मूसा इला क़ौमिही ग़ज़्बा-न असिफ़न्, क़ा-ल बिअ्-समा ख़लफ्तुमूनी मिम् बअ्दी, अ-अ़जिल्तुम् अम्-र रब्बिकुम्, व अल्क़ल्-अल्वा-ह व अ-ख़-ज़ बिरअ्सि अख़ीहि यजुर्रूहू इलैहि, क़ालब्-न उम्-म इन्नल् क़ौमस्तज़्अ़ फूनी व कादू यक़्तुलू-ननी, फला तुश्मित् बियल्-अअ्दा-अ व ला तज्अ़ल्नी मअ़ल् क़ौमिज़्-ज़ालिमीन
और जब मूसा अपनी जाति की ओर क्रोध तथा दुःख से भरा हुआ वापस आया, तो उसने कहाः तुमने मेरे पश्चात् मेरा बहुत बुरा प्रतिनिधित्व किया। क्या तुम अपने पालनहार की आज्ञा से पहले ही जल्दी कर[1] गये? तथा उसने लेख तख़्तियाँ डाल दीं तथा अपने भाई (हारून) का सिर पकड़ के अपनी ओर खींचने लगा। उसने कहाः हे मेरे माँ जाये भाई! लोगों ने मुझे निर्बल समझ लिया तथा समीप था कि वे मुझे मार डालें। अतः तू शत्रुओं को मुझपर हँसने का अवसर न दे। मुझे अत्याचारियों का साथी न बना। 1. अर्थात मेरे आने की प्रतीक्षा नहीं की।
قَالَ رَبِّ اغْفِرْ لِي وَلِأَخِي وَأَدْخِلْنَا فِي رَحْمَتِكَ ۖ وَأَنتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ ﴾ 151 ﴿
क़ा-ल रब्बिग़्फ़िर ली व लि-अख़ी व अद्खिल्ना फी रह़्मति-क, व अन्-त अर्हमुर्-राहिमीन •
मूसा ने कहाः[1] हे मेरे पालनहार! मुझे तथा मेरे भाई को क्षमा कर दे और हमें अपनी दया में प्रवेश दे और तू ही सब दयाकारियों से अधिक दयाशील है। 1. अर्थात जब यह सिध्द हो गया कि मेरा भाई निर्देष है।
إِنَّ الَّذِينَ اتَّخَذُوا الْعِجْلَ سَيَنَالُهُمْ غَضَبٌ مِّن رَّبِّهِمْ وَذِلَّةٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُفْتَرِينَ ﴾ 152 ﴿
इन्नल्लज़ीनत्त-ख़ज़ुल्-अिज्-ल स-यनालुहुम् ग़-ज़बुम् मिर्रब्बिहिम् व ज़िल्लतुन् फ़िल्-हयातिद्दुन्या, व कज़ालि-क नजज़िल मुफ़्तरीन
जिन लोगों ने बछड़े को पूज्य बनाया, उनपर उनके पालनहार का प्रकोप आयेगा और वे सांसारिक जीवन में अपमानित होंगे और इसी प्रकार हम झूठ घड़ने वालों को दण्ड देते हैं।
وَالَّذِينَ عَمِلُوا السَّيِّئَاتِ ثُمَّ تَابُوا مِن بَعْدِهَا وَآمَنُوا إِنَّ رَبَّكَ مِن بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴾ 153 ﴿
वल्लज़ी-न अमिलुस्सय्यिआति सुम्-म ताबू मिम् – बअ्दिहा व आमनू, इन्-न रब्ब-क मिम्-बअ़दिहा ल-ग़फूरुर्रहीम
और जिन लोगों ने दुष्कर्म किया, फिर उसके पश्चात् क्षमा माँग ली और ईमान लाये, तो वास्तव में, तेरा पालनहार अति क्षमाशील दयावान् है।
وَلَمَّا سَكَتَ عَن مُّوسَى الْغَضَبُ أَخَذَ الْأَلْوَاحَ ۖ وَفِي نُسْخَتِهَا هُدًى وَرَحْمَةٌ لِّلَّذِينَ هُمْ لِرَبِّهِمْ يَرْهَبُونَ ﴾ 154 ﴿
व लम्मा स-क-त अम्मूसल-ग़-ज़बु अ-ख़ज़ल्-अल्वा-ह, व फी नुस्ख़तिहा हुदंव्-व रहमतुल्लिल्लज़ी-न हुम् लिरब्बिहिम् यर्हबून
फिर जब मूसा का क्रोध शान्त हो गया, तो उसने लेख तख़्तियाँ उठा लीं, जिनके लिखे आदेशों में मार्गदर्शन तथा दया थी, उन लोगों के लिए, जो अपने पालनहार से ही डरते हों।
وَاخْتَارَ مُوسَىٰ قَوْمَهُ سَبْعِينَ رَجُلًا لِّمِيقَاتِنَا ۖ فَلَمَّا أَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ قَالَ رَبِّ لَوْ شِئْتَ أَهْلَكْتَهُم مِّن قَبْلُ وَإِيَّايَ ۖ أَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ السُّفَهَاءُ مِنَّا ۖ إِنْ هِيَ إِلَّا فِتْنَتُكَ تُضِلُّ بِهَا مَن تَشَاءُ وَتَهْدِي مَن تَشَاءُ ۖ أَنتَ وَلِيُّنَا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۖ وَأَنتَ خَيْرُ الْغَافِرِينَ ﴾ 155 ﴿
वख़्ता-र मूसा क़ौमहू सब्ई-न रजुलल् लिमीक़ातिना, फ़-लम्मा अ-ख़ज़त्हुमुर्रज्-फतु क़ा-ल रब्बि लौ शिअ्-त अह़्लक्तहुम् मिन् क़ब्लु व इय्या-य, अतुह़्लिकुना बिमा फ़-अलस्सु फ़हा-उ मिन्ना, इन् हि-य इल्ला फ़ित् नतु-क, तुज़िल्लु बिहा मन् तशा-उ व तह्दी मन् तशा-उ, अन्-त वलिय्युना फ़ग़्फ़िर लना वरहम्-ना व अन्-त खैरुल्ग़ाफ़िरीन
और मूसा ने हमारे निर्धारित[1] समय के लिए अपनी जाति के सत्तर व्यक्तियों को चुन लिया और जब उन्हें भूकंप ने घेर[2] लिया, तो मूसा ने कहाः हे मेरे पालनहार! यदि तू चाहता तो इन सबका इससे पहले ही विनाश कर देता और मेरा भी। क्या तू हमारा उस कुकर्म के कारण नाश कर देगा, जो हममें से कुछ निर्बोध कर गये? ये[3] तेरी ओर से केवल एक परीक्षा थी। तू जिसे चाहे, उसके द्वारा कुपथ कर दे और जिसे चाहे, सुपथ दर्शा दे। तू ही हमारा संरक्षक है, अतः हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमपर दया कर, तू सर्वोत्तम क्षमावान् है। 1. अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम को आदेश दिया था कि वह तूर पर्वत के पास बछड़े की पूजा से क्षमा याचना के लिये कुछ लोगों को लायें। (इब्ने कसीर) 2. जब वह उस स्थान पर पहुँचे तो उन्हों ने यह माँग की कि हम को हमारी आँखों से अल्लाह को दिखा दे। अन्यथा हम तेरा विश्वास नहीं करेंगे। उस समय उन पर भूकम्प आया। (इब्ने कसीर) 3. अर्थात बछड़े की पूजा।
وَاكْتُبْ لَنَا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ إِنَّا هُدْنَا إِلَيْكَ ۚ قَالَ عَذَابِي أُصِيبُ بِهِ مَنْ أَشَاءُ ۖ وَرَحْمَتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ ۚ فَسَأَكْتُبُهَا لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَالَّذِينَ هُم بِآيَاتِنَا يُؤْمِنُونَ ﴾ 156 ﴿
वक्तुब् लना फी हाज़िहिद्दुन्या ह-स नतंव्-व फिल्आख़ि-रति इन्ना हुद्-ना इलै-क, क़ा-ल अज़ाबी उसीबु बिही मन् अशा-उ, व रह़्मती वसि अ़त् कुल-ल शैइन्, फ़-सअक्तुबुहा लिल्लज़ी-न यत्तक़ू-न व युअ्तूनज़्ज़का-त वल्लज़ी-न हुम् बिआयातिना युअ्मिनून
और हमारे लिए इस संसार में भलाई लिख दे तथा परलोक में भी, हम तेरी ओर लौट आये। उस (अल्लाह) ने कहाः मैं अपनी यातना जिसे चाहता हूँ, देता हूँ। और मेरी दया प्रत्येक चीज़ को समोये हुए है। मैं उसे उन लोगों के लिए लिख दूँगा, जो अवज्ञा से बचेंगे, ज़कात देंगे और जो हमारी आयतों पर ईमान लायेंगे।
الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ الرَّسُولَ النَّبِيَّ الْأُمِّيَّ الَّذِي يَجِدُونَهُ مَكْتُوبًا عِندَهُمْ فِي التَّوْرَاةِ وَالْإِنجِيلِ يَأْمُرُهُم بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَاهُمْ عَنِ الْمُنكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ الطَّيِّبَاتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيْهِمُ الْخَبَائِثَ وَيَضَعُ عَنْهُمْ إِصْرَهُمْ وَالْأَغْلَالَ الَّتِي كَانَتْ عَلَيْهِمْ ۚ فَالَّذِينَ آمَنُوا بِهِ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَاتَّبَعُوا النُّورَ الَّذِي أُنزِلَ مَعَهُ ۙ أُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ﴾ 157 ﴿
अल्लज़ी-न यत्तबिअूनर्रसूलन्नबिय्यल् उम्मिय्यल्लज़ी यजिदूनहू मक्तूबन् अिन्दहुम् फ़ित्तौराति वल्-इन्जीलि, यअ्मुरुहुम् बिल्-मअ्-रूफ़ि व यन्हाहुम् अनिल-मुन्करि व युहिल्लु लहुमुत्तय्यिबाति व युहर्रिमु अलैहिमुल् ख़बाइ-स व य-ज़अु अन्हुम् इस्रहुम् वल्अग़्लालल्लती कानत् अलैहिम्, फ़ल्लज़ी-न आमनू बिही व अ़ज़्ज़रूहु व न-सरूहु वत्त-बअुन्-नूरल्लज़ी उन्ज़ि-ल म-अहू, उलाइ-क हुमुल्-मुफ्लिहून *
जो उस रसूल का अनुसरण करेंगे, जो उम्मी नबी[1] हैं, जिन (के आगमन) का उल्लेख वे अपने पास तौरात तथा इंजील में पाते हैं; जो सदाचार का आदेश देंगे और दुराचार से रोकेंगे, उनके लिए स्वच्छ चीज़ों को ह़लाल (वैध) तथा मलिन चीज़ों को ह़राम (अवैध) करेंगे, उनसे उनके बोझ उतार देंगे तथा उन बंधनों को खोल देंगे, जिनमें वे जकड़े हुए होंगे। अतः जो लोग आपपर ईमान लाये, आपका समर्थन किया, आपकी सहायता की तथा उस प्रकाश (क़ुर्आन) का अनुसरण किया, जो आपके साथ उतारा गया, तो वही सफल होंगे। 1. अर्थात बनी इस्राईल से नहीं। इस से अभिप्राय अन्तिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, जिन के आगमण की भविष्यवाणी तौरात, इंजील तथा दूसरे धर्म शास्त्रों में पाई जाती है। यहाँ पर आप की तीन विशेषताओं की चर्चा की गयी हैः 1. आप सदाचार का आदेश देंगे तथा दुराचार से रोकेंगे। 2. स्वच्छ चीज़ों के प्रयोग को उचित तथा मलीन चीज़ों के प्रयोग को अनुचित घोषित करेंगे। 3. अह्ले किताब जिन कड़े धार्मिक नियों के बोझ तले दबे हुये थे उन्हें उन से मुक्त करेंगे। और रसूल इस्लामी धर्म विधान प्रस्तुत करेंगे, और उन के आगमन के पश्चात् लोक-प्रलोक की सफलता आप ही के धर्म विधान के अनुसरण में सीमित होगी।
قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ النَّبِيِّ الْأُمِّيِّ الَّذِي يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَكَلِمَاتِهِ وَاتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴾ 158 ﴿
क़ुल या अय्युहन्नासु इन्नी रसूलुल्लाहि इलैकुम् जमी-अ़निल्लज़ी लहू मुल्कुस्समावाति वल्अर्ज़ि, ला इला-ह इल्ला हु-व युह़्यी व युमीतु, फ़आमिनू बिल्लाहि व रसूलिहिन्-नबिय्यिल् उम्मिय्यिल्लज़ी युअ्मिनु बिल्लाहि व कलिमातिही वत्तबिअुहु लअ़ल्लकुम् तह्तदून
(हे नबी!) आप लोगों से कह दें कि हे मानव जाति के लोगो! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाश तथा धरती का राज्य है। कोई वंदनीय (पूज्य) नहीं है, परन्तु वही, जो जीवन देता तथा मारता है। अतः अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके उस उम्मी नबी पर, जो अल्लाह पर और उसकी सभी (आदि) पुस्तकों पर ईमान रखते हैं और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्गदर्शन पा जाओ[1]। 1. इस आयत का भावार्थ यह है कि इस्लाम के नबी किसी विशेष जाति तथा देश के नबी नहीं हैं, प्रलय तक के लिये पूरी मानव जाति के नबी हैं। यह सब को एक अल्लाह की वंदना कराने के लिये आये हैं, जिस के सिवा कोई पूज्य नहीं। आप का चिन्ह अल्लाह पर तथा सब प्राचीन पुस्तकों और नबियों पर ईमान है। आप का अनुसरण करने का अर्थ यह है कि अब उसी प्रकार अल्लाह की पूजा अराधना करो, जैसे आप ने की और बताई है। और आप के लाये हुये धर्म विधान का पालन करो।
وَمِن قَوْمِ مُوسَىٰ أُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِهِ يَعْدِلُونَ ﴾ 159 ﴿
व मिन् क़ौमि मूसा उम्मतुंय्यह़्दू-न बिल्हक़्क़ि व बिही यअ्दिलून
और मूसा की जाति में एक गिरोह ऐसा भी है, जो सत्य पर स्थित है और उसी के अनुसार निर्णय (न्याय) करता है।
وَقَطَّعْنَاهُمُ اثْنَتَيْ عَشْرَةَ أَسْبَاطًا أُمَمًا ۚ وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ إِذِ اسْتَسْقَاهُ قَوْمُهُ أَنِ اضْرِب بِّعَصَاكَ الْحَجَرَ ۖ فَانبَجَسَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍ مَّشْرَبَهُمْ ۚ وَظَلَّلْنَا عَلَيْهِمُ الْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْهِمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ ۚ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَٰكِن كَانُوا أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ﴾ 160 ﴿
व क़त्तअ्नाहुमुस् नती अश्र-त अस्बातन् उ-ममन्, व औहैना इला मूसा इज़िस्तस्क़ाहु क़ौमुहू अनिज़्-रिब बिअ़साकल् ह-ज-र, फम्ब-जसत् मिन्हुस्नता अश्र-त ऐनन्, क़द् अलि-म कुल्लु उनासिम् मश्र-बहुम्, व ज़ल्लल्ना अलैहिमुल् ग़मा-म व अन्ज़ल्ना अलैहिमुल मन्-न वस्सल्वा, कुलू मिन् तय्यिबाति मा रज़क़्नाकुम्, व मा ज़-लमूना व लाकिन् कानू अन्फु-सहुम् यज़्लिमून
और[1] हमने मूसा की जाति के बारह घरानों को बारह जातियों में विभक्त कर दिया और हमने मूसा की ओर वह़्यी भेजी, जब उसकी जाति ने उससे जल माँगा कि अपनी लाठी इस पत्थर पर मारो, तो उससे बारह स्रोत उबल पड़े तथा प्रत्येक समुदाय ने अपने पीने का स्थान जान लिया और उनपर बादलों की छाँव की और उनपर मन्न तथा सल्वा उतारा। (हमने कहाः) इन स्वच्छ चीज़ों में से, जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं, खाओ और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं (अवज्ञा करके) अपने प्राणों पर अत्याचार कर रहे थे। 1. इस से अभिप्राय वह लोग हैं जो मूसा (अलैहिस्सलाम) के लाये हुये धर्म पर क़ायम थे और आने वाले नबी की प्रतीक्षा कर रहे थे और जब वह आये तो तुरन्त आप पर ईमान लाये, जैसे अबदुल्लाह बिन सलाम इत्यादि।
وَإِذْ قِيلَ لَهُمُ اسْكُنُوا هَٰذِهِ الْقَرْيَةَ وَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ وَقُولُوا حِطَّةٌ وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطِيئَاتِكُمْ ۚ سَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ ﴾ 161 ﴿
व इज़् क़ी-ल लहु मुस्कुनू हाज़िहिल्क़र्य-त व कुलू मिन्हा हैसु शिअ्तुम् व क़ूलू हित्ततुंव्-वद्ख़ुलुल्-बा-ब सुज्जदन् नग़्फ़िर् लकुम् ख़तिआतिकुम्, स-नज़ीदुल् मुह़्सिनीन
और जब उन (बनी इस्राईल) से कहा गया कि इस नगर (बैतुल मक़्दिस) में बस जाओ और उसमें से जहाँ इच्छा हो, खाओ और कहो कि हमें क्षमा कर दे तथा द्वार से सज्दा करते हुए प्रवेश करो, हम तुम्हारे लिए तुम्हारे दोष क्षमा कर देंगे और सत्कर्मियों को और अधिक देंगे।
فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَظْلِمُونَ ﴾ 162 ﴿
फ़-बद्दलल्लज़ी-न ज़-लमू मिन्हुम् क़ौलन् ग़ैरल्लज़ी क़ी-ल लहुम् फ-अर्सल्ना अलैहिम् रिज्ज़म्-मिनस्-समा-इ बिमा कानू यज़्लिमून *
तो उनमें से अत्याचारियों ने उस बात को, दूसरी बात से[1] बदल दिया, जो उनसे कही गयी थी। तो हमने उनपर आकाश से प्रकोप उतार दिया। क्योंकि वे अत्याचार कर रहे थे। 1. और चूतड़ों के बल खिसकते और यह कहते हुये प्रवेश किया कि गेहूँ मिले। (सह़ीह़ बुख़ारीः4641)
وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ ۙ لَا تَأْتِيهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَبْلُوهُم بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ ﴾ 163 ﴿
वस्अल्हुम् अनिल्क़र्यतिल्लती कानत् हाज़ि-रतल्-बहरि • इज़् यअ्दू-न फिस्सब्ति इज़् तअ्तीहिम् हीतानुहुम् यौ-म सब्तिहिम् शुर्रअंव्-व यौ-म ला यस्बितू-न, ला तअ्तीहिम् कज़ालि-क, नब्लूहुम् बिमा कानू यफ्सुक़ून •
तथा (हे नबी!) इनसे उस नगरी के सम्बंध में प्रश्न करो, जो समुद्र (लाल सागर) के समीप थी, जब उसके निवासी सब्त (शनिवार) के दिन के विषय में आज्ञा का उल्लंघन[1] कर रहे थे, जब उनके पास उनकी मछलियाँ सब्त के दिन पानी के ऊपर तैरकर आ जाती थीं और सब्त का दिन न हो, तो नहीं आती थीं। इसी प्रकार, उनकी अवज्ञा के कारण हम उनकी परीक्षा ले रहे थे। 1. क्यों कि उन के लिये यह आदेश था कि शनिवार को मछलियों का शिकार नहीं करेंगे। अधिकांश भाष्यकारों ने उस नगरी का नाम ईला (ईलात) बताया है, जो क़ुल्ज़ुम सागर के किनारे पर आबाद थी।
وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِّنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا ۙ اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ﴾ 164 ﴿
व इज़् क़ालत् उम्मतुम्-मिन्हुम् लि-म तअिज़ू-न क़ौ- मनिल्लाहु मुह़्लिकुहुम् औ मुअ़ज़्ज़िबुहुम् अ़ज़ाबन् शदीदन्, क़ालू मअ्ज़ि-रतन् इला रब्बिकुम् व लअ़ल्लहुम् यत्तक़ून
तथा जब उनमें से एक समुदाय ने कहा कि तुम उन्हें क्यों समझा रहे हो, जिन्हें अल्लाह (उनकी अवज्ञा के कारण) ध्वस्त करने अथवा कड़ा दण्ड देने वाला है? उन्होंने कहाः तुम्हारे पालनहार के समक्ष क्षम्य होने के लिए और इस आशा में कि वे आज्ञाकारी हो जायेँ[1]। 1. आयत में यह संकेत है कि बुराई को रोकने से निराश नहीं होना चाहिये, क्यों कि हो सकता है कि किसी के दिल में बात लग ही जाये, और यदि न भी लगे तो अपना कर्तव्य पूरा हो जायेगा।
فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِهِ أَنجَيْنَا الَّذِينَ يَنْهَوْنَ عَنِ السُّوءِ وَأَخَذْنَا الَّذِينَ ظَلَمُوا بِعَذَابٍ بَئِيسٍ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ ﴾ 165 ﴿
फ़-लम्मा नसू मा ज़ुक्किरू बिही अन्जैनल्लज़ी-न यन्हौ-न अनिस्सू-इ व अख़ज़्नल्लज़ी-न ज़-लमू बिअज़ाबिम् बईसिम्-बिमा कानू यफ़्सुक़ून
फिर जब उन्होंने जो कुछ उन्हें स्मरण कराया गया, उसे भुला दिया, तो हमने उन लोगों को बचा लिया, जो उन्हें बुराई से रोक रहे थे और हमने अत्याचारियों को कड़ी यातना में उनकी अवज्ञा के कारण घेर लिया।
فَلَمَّا عَتَوْا عَن مَّا نُهُوا عَنْهُ قُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِئِينَ ﴾ 166 ﴿
फ़-लम्मा अ़तौ अम्मा नुहू अन्हु क़ुल्ना लहुम् कूनू क़ि-र-दतन् ख़ासिईन
फिर जब उन्होंने उसका उल्लंघन किया, जिससे वे रोके गये थे, तो हमने उनसे कहा कि तुच्छ बंदर हो जाओ।
وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكَ لَيَبْعَثَنَّ عَلَيْهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَن يَسُومُهُمْ سُوءَ الْعَذَابِ ۗ إِنَّ رَبَّكَ لَسَرِيعُ الْعِقَابِ ۖ وَإِنَّهُ لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴾ 167 ﴿
व इज़् त-अज़्ज़-न रब्बु-क लयब्अ-सन्-न अलैहिम् इला यौमिल्-क़ियामति मंय्यसूमुहुम् सूअल्-अ़ज़ाबि, इन्-न रब्ब-क ल-सरीअुल-अिक़ाबि, व इन्नहू ल-ग़फूरुर्रहीम
और याद करो, जब आपके पालनहार ने घोषणा कर दी कि वह प्रलय के दिन तक, उन (यहूदियों) पर उन्हें प्रभुत्व देता रहेगा, जो उन्हें घोर यातना देते रहेंगे[1]। निःसंदेह आपका पालनहार शीघ्र दण्ड देने वाला है और वह अति क्षमाशील, दयावान (भी) है। 1. यह चेतावनी बनी इस्राईल को बहुत पहले से दी जा रही थी। ईसा (अलैहिस्सलाम) से पूर्व आने वाले नबियों ने बनी इस्राईल को डराया कि अल्लाह की अवैज्ञा सै बचो। और स्वयं ईसा ने भी उन को डराया, परन्तु वह अपनी अवैज्ञा पर बाक़ी रहे, जिस के कारण अल्लाह की यातना ने उन्हें घेर लिया और कई बार बैतुल मक़्दिस को उजाड़ा गया, और तौरात जलाई गई।
وَقَطَّعْنَاهُمْ فِي الْأَرْضِ أُمَمًا ۖ مِّنْهُمُ الصَّالِحُونَ وَمِنْهُمْ دُونَ ذَٰلِكَ ۖ وَبَلَوْنَاهُم بِالْحَسَنَاتِ وَالسَّيِّئَاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ﴾ 168 ﴿
व क़त्तअ्नाहुम् फ़िल्अर्ज़ि उ-ममन् मिन्हुमुस्सालिहू-न व मिन्हुम् दू-न जालि-क, व बलौनाहुम् बिल्ह-सनाति वस्सय्यिआति लअ़ल्लहुम् यर्जिअून
और हमने उन्हें धरती में कई सम्प्रदायों में विभक्त कर दिया, उनमें कुछ सदाचारी थे और कुछ इसके विपरीत थे। हमने अच्छाईयों तथा बुराईयों, दोनों के द्वारा उनकी परीक्षा ली, ताकि वे (कुकर्मों से) रुक जायेँ।
فَخَلَفَ مِن بَعْدِهِمْ خَلْفٌ وَرِثُوا الْكِتَابَ يَأْخُذُونَ عَرَضَ هَٰذَا الْأَدْنَىٰ وَيَقُولُونَ سَيُغْفَرُ لَنَا وَإِن يَأْتِهِمْ عَرَضٌ مِّثْلُهُ يَأْخُذُوهُ ۚ أَلَمْ يُؤْخَذْ عَلَيْهِم مِّيثَاقُ الْكِتَابِ أَن لَّا يَقُولُوا عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ وَدَرَسُوا مَا فِيهِ ۗ وَالدَّارُ الْآخِرَةُ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴾ 169 ﴿
फ़-ख़-ल-फ़ मिम्-बअ्दिहिम् ख़ल्फुंव्वरिसुल-किता-ब यअ्ख़ुज़ू-न अ-र-ज़ हाज़ल्-अद्-ना व यक़ूलू-न सयुग़्फ़रू लना, व इंय्यअ्तिहिम् अ-रज़ुम् मिस्लुहू यअ्ख़ुज़ूहु, अलम् युअ्ख़ज़् अलैहिम् मीसाक़ुल-किताबि अल्ला यक़ूलू अलल्लाहि इल्लल्हक़्क़ व द-रसू मा फ़ीहि, वद्दारूल् आख़िरतु ख़ैरुलल्लिल्लज़ी-न यत्तक़ू-न, अ-फला तअ्क़िलून
फिर उनके पीछे कुछ ऐसे लोगों ने उनकी जगह ली, जो पुस्तक के उत्तराधिकारी होकर भी तुच्छ संसार का लाभ समेटने लगे और कहने लगे कि हमें क्षमा कर दिया जायेगा और यदि उसी के समान उन्हें लाभ हाथ आ जाये, तो उसे भी ले लेंगे। क्या उनसे पुस्तक का दृढ़ वचन नहीं लिया गया है कि अल्लाह पर सच ही बोलेंगे, जबकि पुस्तक में जो कुछ है, उसका अध्ययन कर चुके हैं? और परलोक का घर (स्वर्ग) उत्तम है, उनके लिए जो अल्लाह से डरते हों। तो क्या वे इतना भी नहीं[1] समझते? 1. इस आयत में यहूदी विद्वानों की दुर्दशा बताई गयी है कि वह तुच्छ संसारिक लाभ के लिये धर्म में परिवर्तन कर देते थे और अवैध को वैध बना लेते थे। फिर भी उन्हें यह गर्व था कि अल्लाह उन्हें अवश्य क्षमा कर देगा।
وَالَّذِينَ يُمَسِّكُونَ بِالْكِتَابِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُصْلِحِينَ ﴾ 170 ﴿
वल्लज़ी-न युमस्सिकू-न बिल्किताबि व अक़ामुस्सला-त, इन्ना ला नुज़ीअु अज्रल् मुस्लिहीन
और जो लोग पुस्तक को दृढ़ता से पकड़ते और नमाज़ की स्थापना करते हैं, तो वास्तव में, हम सत्कर्मियों का प्रतिफल अकारथ नहीं करते।
وَإِذْ نَتَقْنَا الْجَبَلَ فَوْقَهُمْ كَأَنَّهُ ظُلَّةٌ وَظَنُّوا أَنَّهُ وَاقِعٌ بِهِمْ خُذُوا مَا آتَيْنَاكُم بِقُوَّةٍ وَاذْكُرُوا مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴾ 171 ﴿
व इज़् न-तक़्नल् ज-ब-ल फौक़हुम् क-अन्नहू ज़ुल्लतुंव् -व ज़न्नू अन्नहू वाक़िअुम् बिहिम्, ख़ुज़ू मा आतैनाकुम् बिक़ुव्वतिंव्वज़्कुरू मा फ़ीहि लअ़ल्लकुम् तत्तक़ून *
और जब हमने उनके ऊपर पर्वत को इस प्रकार छा दिया, जैसे वह कोई छतरी हो और उन्हें विश्वास हो गया कि वह उनपर गिर पड़ेगा, (तथा ये आदेश दिया कि) जो (पुस्तक) हमने तुम्हें प्रदान की है, उसे दृढ़ता से थाम लो तथा उसमें जो कुछ है, उसे याद रखो, ताकि तुम आज्ञाकारी हो जाओ।
وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِن بَنِي آدَمَ مِن ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ ۛ شَهِدْنَا ۛ أَن تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَٰذَا غَافِلِينَ ﴾ 172 ﴿
व इज़् अ-ख़-ज़ रब्बु-क मिम्-बनी आद-म मिन् ज़ुहूरिहिम् ज़ुर्रिय्य-तहुम् व अश्ह-दहुम् अला अन्फुसिहिम्, अलस्तु बिरब्बिकुम्, क़ालू बला, शहिद्-ना, अन् तक़ूलू यौमल्-क़ियामति इन्ना कुन्ना अन् हाज़ा ग़ाफ़िलीन
तथा (वह समय याद करो) जब आपके पालनहार ने आदम के पुत्रों की पीठों से उनकी संतति को निकाला और उन्हें स्वयं उनपर साक्षी (गवाह) बनाते हुए कहाः क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ? सबने कहाः क्यों नहीं? हम (इसके) साक्षी[1] हैं; ताकि प्रलय के दिन ये न कहो कि हम तो इससे असूचित थे। 1. यह उस समय की बात है जब आदम अलैहिस्सलाम की उत्पत्ति के पश्चात् उन की सभी संतान को जो प्रलय तक होगी, उन की आत्माओं से अल्लाह ने अपने पालनहार होने की गवाही ली थी। (इब्ने कसीर)
أَوْ تَقُولُوا إِنَّمَا أَشْرَكَ آبَاؤُنَا مِن قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِّن بَعْدِهِمْ ۖ أَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ ﴾ 173 ﴿
औ तक़ूलू इन्नमा अश्र-क आबाउना मिन् क़ब्लु व कुन्ना जुर्रिय्यतम्-मिम्-बअ्दिहिम्, अ-फ़तुह् लिकुना बिमा फ़-अलल् मुब्तिलून
अथवा ये कहो कि हमसे पूर्व हमारे पूर्वजों ने शिर्क (मिश्रण) किया और हम उनके पश्चात् उनकी संतान थे। तो क्या तू गुमराहों के कर्म के कारण हमारा विनाश[1] करेगा? 1. आयत का भावार्थ यह है कि अल्लाह के अस्तित्व तथा एकेश्वर्वाद की आस्था सभी मानव का स्वभाविक धर्म है। कोई यह नहीं कह सकता कि मैं अपने पूर्वजों की गुमराही से गुमराह हो गया। यह स्वभाविक आन्तरिक आवाज़ है जो कभी दब नहीं सकती।
وَكَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ وَلَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ﴾ 174 ﴿
व कज़ालि-क नुफस्सिलुल आयाति व लअ़ल्लहुम् यर्ज़िअून
और इसी प्रकार, हम आयतों को खोल-खोल कर बयान करते हैं, ताकि लोग (सत्य की ओर) लौट जायेँ।
وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ الَّذِي آتَيْنَاهُ آيَاتِنَا فَانسَلَخَ مِنْهَا فَأَتْبَعَهُ الشَّيْطَانُ فَكَانَ مِنَ الْغَاوِينَ ﴾ 175 ﴿
वत्लु अलैहिम् न-बअल्लज़ी आतैनाहु आयातिना फन्स -ल-ख़ मिन्हा फ़-अत्ब-अहुश्शैतानु फ़का-न मिनल् -ग़ावीन
और उन्हें उसकी दशा पढ़कर सुनायें, जिसे हमने अपनी आयतों (का ज्ञान) दिया, तो वह उस (के खोल से) निकल गया। फिर शैतान उसके पीछे लग गया और वह कुपथों में हो गया।
وَلَوْ شِئْنَا لَرَفَعْنَاهُ بِهَا وَلَٰكِنَّهُ أَخْلَدَ إِلَى الْأَرْضِ وَاتَّبَعَ هَوَاهُ ۚ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ الْكَلْبِ إِن تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ أَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَث ۚ ذَّٰلِكَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۚ فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ ﴾ 176 ﴿
व लौ शिअ्ना ल-रफ़अ्नाहु बिहा व लाकिन्नहू अख़्ल-द इलल् अर्ज़ि वत्त-ब-अ हवाहु, फ़-म-सलुहू क-म- सलिल्कल्बि, इन तह़्मिल अ़लैहि यल्हस् औ तत्रूक्हु यल्हस्, ज़ालि-क म-सलुल-क़ौमिल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना, फ़क़्सुसिल् क़-स-स लअ़ल्लहुम् य- तफ़क्करून
और यदि हम चाहते, तो उन (आयतों) के द्वारा उसका पद ऊँचा कर देते, परन्तु वह माया-मोह में पड़ गया और अपनी मनमानी करने लगा। तो उसकी दशा उस कुत्ते के समान हो गयी, जिसे हाँको, तब भी जीभ निकाले हाँपता रहे और छोड़ दो, तब भी जीभ निकाले हाँपता है। यही उपमा है, उन लोगों की, जो हमारी आयतों को झुठलाते हैं। तो आप ये कथायें उन्हें सुना दें, संभवतः वे सोच-विचार करें।
سَاءَ مَثَلًا الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَأَنفُسَهُمْ كَانُوا يَظْلِمُونَ ﴾ 177 ﴿
सा-अ म-स-ल-निल्क़ौमुल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना व अन्फु-सहुम् कानू यज़्लिमून
उनकी उपमा कितनी बुरी है, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया! और वे अपने ही ऊपर अत्याचार[1] कर रहे थे। 1. भाष्यकारों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग और प्राचीन युग के कई ऐसे व्यक्तियों का नाम लिया है, जिन का यह उदाहरण हो सकता है। परन्तु आयत का भावार्थ बस इतना है कि प्रत्येक व्यक्ति जिस में यह अवगुण पाये जाते हों, उस की दशा यही होती है, जिस की जीभ से माया-मोह के कारण राल टपकती रहती है, और उस की लोभाग्नि कभी नहीं बुझती।
مَن يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِي ۖ وَمَن يُضْلِلْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ ﴾ 178 ﴿
मंय्यह़्दिल्लाहु फ़हुवल्-मुह़्तदी, व मंय्युज़्लिल् फ़उलाइ-क हुमुल ख़ासिरून
जिसे अल्लाह सुपथ कर दे, वही सीधी राह पा सकता है और जिसे कुपथ कर दे,[1] तो वही लोग असफल हैं। 1. क़ुर्आन ने बार-बार इस तथ्य को दुहराया है कि मार्गदर्शन के लिये सोच-विचार की आवश्यक्ता है। और जो लोग अल्लाह की दी हुई विचार शक्ति से काम नहीं लेते, वही सीधी राह नहीं पाते। यही अल्लाह के सुपथ और कुपथ करने का अर्थ है।
وَلَقَدْ ذَرَأْنَا لِجَهَنَّمَ كَثِيرًا مِّنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ ۖ لَهُمْ قُلُوبٌ لَّا يَفْقَهُونَ بِهَا وَلَهُمْ أَعْيُنٌ لَّا يُبْصِرُونَ بِهَا وَلَهُمْ آذَانٌ لَّا يَسْمَعُونَ بِهَا ۚ أُولَٰئِكَ كَالْأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ ﴾ 179 ﴿
वल-क़द् ज़रअ्ना लि-जहन्न-म कसीरम् मिनल्-जिन्नि वल्इन्सि, लहुम् क़ुलूबुल् ला यफ़्क़हू-न बिहा, व लहुम् अअ्युनुल-ला युब्सिरू-न बिहा, व लहुम् आज़ानुल्-ला यस्मअू-न बिहा, उलाइ-क कल्अन् आमि बल् हुम् अज़ल्लु, उलाइ-क हुमुल् ग़ाफ़िलून
और बहुत-से जिन्न और मानव को हमने नरक के लिए पैदा किया है। उनके पास दिल हैं, जिनसे सोच-विचार नहीं करते, उनकी आँखें हैं, जिनसे[1] नहीं देखते और कान हैं, जिनसे नहीं सुनते। वे पशुओं के समान हैं; बल्कि उनसे भी अधिक कुपथ हैं, यही लोग अचेतना में पड़े हुए हैं। 1. आयत का भावार्थ यह है कि सत्य को प्राप्त करने के दो ही साधन हैः ध्यान और ज्ञान। ध्यान यह है कि अल्लाह की दी हुयी विचार शक्ति से काम लिया जाये। और ज्ञान यह है कि इस विश्व की व्यवस्था को देखा जाये और नबियों द्वारा प्रस्तुत किये हुये सत्य को सुना जाये, और जो इन दोनों से वंचित हो वह अंधा बहरा है।
وَلِلَّهِ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ فَادْعُوهُ بِهَا ۖ وَذَرُوا الَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِي أَسْمَائِهِ ۚ سَيُجْزَوْنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ 180 ﴿
व लिल्लाहिल्-अस्माउल-हुस्-ना फ़द्अूहु बिहा, व ज़रूल्लज़ी-न युल्हिदू-न फ़ी अस्माइही, सयुज्ज़ौ-न मा कानू यअ्मलून
और अल्लाह ही के शुभ नाम हैं, अतः उसे उन्हीं के द्वारा पुकारो और उन्हें छोड़ दो, जो उसके नामों में परिवर्तन[1] करते हैं, उन्हें शीघ्र ही उनके कुकर्मों का कुफल दे दिया जायेगा। 1. अर्थात उस के गौणिक नामों से अपनी मूर्तियों को पुकारते हैं। जैसे अज़ीज़ से “उज़्ज़ा” और इलाह से “लात” इत्यादि।
وَمِمَّنْ خَلَقْنَا أُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِهِ يَعْدِلُونَ ﴾ 181 ﴿
व मिम्-मन् ख़लक़्ना उम्मतुंय्-यह् दू-न बिल्हक़्क़ि व बिही यअ्दिलून *
और उनमें से जिन्हें हमने पैदा किया है, एक समुदाय ऐसा (भी) है, जो सत्य का मार्ग दर्शाता तथा उसी के अनुसार (लोगों के बीच) न्याय करता है।
وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 182 ﴿
वल्लज़ी-न कज़्ज़बू बिआयातिना सनस् तद् रिजुहुम् मिन् हैसु ला यअ्लमून
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया, हम उन्हें क्रमशः (विनाश तक) ऐसे पहुँचायेंगे कि उन्हें इसका ज्ञान नहीं होगा।
وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ ﴾ 183 ﴿
व उम्ली लहुम्, इन्-न कैदी मतीन
और उन्हें अवसर देंगे, निश्चय मेरा उपाय बड़ा सुदृढ़ है।
أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا ۗ مَا بِصَاحِبِهِم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴾ 184 ﴿
अ-व लम् य-तफ़क्करू, मा बिसाहिबिहिम् मिन् जिन्नतिन्, इन् हु-व इल्ला नज़ीरूम्-मुबीन
और क्या उन्होंने ये नहीं सोचा कि उनका साथी[1] तनिक भी पागल नहीं है? वह तो केवल खुले रूप से सचेत करने वाला है। 1. साथी से अभिप्राय मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, जिन को नबी होने से पहले वही लोग “अमीन” कहते थे।
أَوَلَمْ يَنظُرُوا فِي مَلَكُوتِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا خَلَقَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ وَأَنْ عَسَىٰ أَن يَكُونَ قَدِ اقْتَرَبَ أَجَلُهُمْ ۖ فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ ﴾ 185 ﴿
अ-व लम् यन्ज़ुरू फ़ी म-लकूतिस्समावाति वल्अर्ज़ि व मा ख़-लक़ल्लाहु मिन् शैइंव्-व अन् अ़सा अंय्यकू-न क़दिक़्त-र-ब अजलुहुम्, फबिअय्यि हदीसिम्-बअ्दहू युअ्मिनून
क्या उन्होंने आकाशों तथा धरती के राज्य को और जो कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, उसे नहीं देखा[1]? और (येभी नहीं सोचा कि) हो सकता है कि उनका (निर्धारित) समय समीप आ गया हो? तो फिर इस (क़ुर्आन) के पश्चात् वह किस बात पर ईमान लायेंगे? 1. अर्थात यदि यह विचार करें, तो इस पूरे विश्व की व्यवस्था और उस का एक-एक कण अल्लाह के अस्तित्व और उस के गुणों का प्रमाण है। और उसी ने मानव जीवन की व्यवस्था के लिये नबियों को भेजा है।
مَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَا هَادِيَ لَهُ ۚ وَيَذَرُهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ ﴾ 186 ﴿
मंय्युज़्लिलिल्लाहु फ़ला हादि-य लहू, व य-ज़रूहुम् फी तुग़्यानिहिम् यअ्महून
जिसे अल्लाह कुपथ कर दे, उसका कोई पथपर्दर्शक नहीं और उन्हें उनके कुकर्मों में बहकते हुए छोड़ देता है।
يَسْأَلُونَكَ عَنِ السَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَاهَا ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ رَبِّي ۖ لَا يُجَلِّيهَا لِوَقْتِهَا إِلَّا هُوَ ۚ ثَقُلَتْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ لَا تَأْتِيكُمْ إِلَّا بَغْتَةً ۗ يَسْأَلُونَكَ كَأَنَّكَ حَفِيٌّ عَنْهَا ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ اللَّهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ﴾ 187 ﴿
यस् अलू न-क अनिस्सा-अति अय्या-न मुरसाहा, क़ुल इन्नमा अिल्मुहा अिन्-द रब्बी, ला युज़ल्लीहा लिवक़्तिहा इल्ला हु-व• सक़ुलत् फ़िस्समावाति वल्अर्ज़ि, ला तअ्तीकुम् इल्ला बग़्त-तन्, यस्अलून-क कअन्न-क हफ़िय्युन् अन्हा, क़ुल् इन्नमा अिल्मुहा अिन्दल्लाहि व लाकिन्-न अक्सरन्नासि ला यअ्लमून
(हे नबी!) वे आपसे प्रलय के विषय में प्रश्न करते हैं कि वह कब आयेगी? कह दो कि उसका ज्ञान तो मेरे पालनहार के पास है, उसे उसके समय पर वही प्रकाशित कर देगा। वह आकाशों तथा धरती में भारी होगी, तुमपर अकस्मात आ जायेगी। वह आपसे ऐसे प्रश्न कर रहे हैं, जैसे कि आप उसी की खोज में लगे हुए हों। आप कह दें कि उसका ज्ञान अल्लाह ही को है। परन्तु[1] अधिकांश लोग इस (तथ्य) को नहीं जानते। 1. मक्का के मिश्रणवादी आप से उपहास स्वरूप प्रश्न करते थे कि यदि प्रलय होना सत्य है, तो बताओ बह कब होगी?
قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ ۚ وَلَوْ كُنتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ ۚ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴾ 188 ﴿
क़ुल् ला अम्लिकु लिनफ़्सी नफ्अंव-व ला ज़र्रन् इल्ला मा शाअल्लाहु, वलौ कुन्तु अअ्-लमुल-ग़ै-ब लस् तक् सरतु मिनल्-ख़ैरि, व मा मस्सनियस्-सू-उ, इन् अ-ना इल्ला नज़ीरूंव्-व बशीरूल्-लिकौमिंय्युअ्मिनून *
आप कह दें कि मुझे तो अपने लाभ और हानि का अधिकार नहीं, परन्तु जो अल्लाह चाहे, (वही होता है)। यदि मैं ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान रखता, तो मैं बहुत सा लाभ प्राप्त कर लेता। मैं तो केवल उन लोगों को सावधान करने तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
هُوَ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَاحِدَةٍ وَجَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا لِيَسْكُنَ إِلَيْهَا ۖ فَلَمَّا تَغَشَّاهَا حَمَلَتْ حَمْلًا خَفِيفًا فَمَرَّتْ بِهِ ۖ فَلَمَّا أَثْقَلَت دَّعَوَا اللَّهَ رَبَّهُمَا لَئِنْ آتَيْتَنَا صَالِحًا لَّنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِرِينَ ﴾ 189 ﴿
हुवल्लज़ी ख़-ल-क़कुम् मिन् नफ़्सिंव्वाहि-दतिंव्-व ज-अ-ल मिन्हा ज़ौजहा लियस्कु-न इलैहा, फ़-लम्मा तग़श्शाहा ह-मलत् हम्लन् ख़फ़ीफ़न् फ़-मर्रत् बिही, फ़-लम्मा अस्-क़लद्द-अवल्ला-ह रब्बहुमा ल-इन् आतैतना सालिहल् ल-नकूनन्-न मिनश्-शाकिरीन
वही (अल्लाह) है, जिसने तुम्हारी उत्पत्ति एक जीव[1] से की और उसीसे उसका जोड़ा बनाया, ताकि उससे उसे संतोष मिले। फिर जब किसी[2] ने उस (अपनी स्त्री) से सहवास किया, तो उस (स्त्री) को हल्का सा गर्भ हो गया। जिसके साथ वह चलती फिरती रही, फिर जब बोझल हो गयी, तो दोनों (पति-पत्नी) ने अपने पालनहार से प्रार्थना कीः यदि तू हमें एक अच्छा बच्चा प्रदान करेगा, तो हम अवश्य तेरे कृतज्ञ (आभारी) होंगे। 1. अर्थात आदम अलैहिस्सलाम से। 2. अर्थात जब मानव जाति के किसी पुरुष ने स्त्री के साथ सहवास किया।
فَلَمَّا آتَاهُمَا صَالِحًا جَعَلَا لَهُ شُرَكَاءَ فِيمَا آتَاهُمَا ۚ فَتَعَالَى اللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴾ 190 ﴿
फ़-लम्मा आताहुमा सालिहन् ज-अला लहू शु-रका अ फ़ीमा आताहुमा, क़-तआलल्लाहु अम्मा युश्रिकून
और जब उन दोनों को (अल्लाह ने) एक स्वस्थ बच्चा प्रदान कर दिया, तो अल्लाह ने जो प्रदान किया, उसमें दूसरों को उसका साझी बनाने लगे। तो अल्लाह इनके शिर्क[1] की बातों से बहुत ऊँचा है। 1. इन आयतों में यह बताया गया है कि मिश्रणवादी स्वस्थ बच्चे अथवा किसी भी आवश्यक्ता अथवा आपदा निवारण के लिये अल्लाह ही से प्रार्थना करते हैं। और जब स्वस्थ सुंदर बच्चा पैदा हो जाता है तो देवी-देवताओं और पीरों के नाम चढ़ावे चढ़ाने लगते हैं और इसे उन्हीं की दय समझते हैं।
أَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ ﴾ 191 ﴿
अयुश्रिकू-न मा ला यख़लुक़ु शैअंव-व हुम् युख़्लक़ून
क्या वह अल्लाह का साझी उन्हें बनाते हैं, जो कुछ पैदा नहीं कर सकते और वे स्वयं पैदा किये हुए हैं?
وَلَا يَسْتَطِيعُونَ لَهُمْ نَصْرًا وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ ﴾ 192 ﴿
व ला यस्ततीअू-न लहुम् नस्रंव्-व ला अन्फु-सहुम् यन्सुरून
तथा न उनकी सहायता कर सकते हैं और न स्वयं अपनी सहायता कर सकते हैं?
وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَتَّبِعُوكُمْ ۚ سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنتُمْ صَامِتُونَ ﴾ 193 ﴿
व इन् तद्अूहुम् इलल्हुदा ला यत्तबिअूकुम्, सवाउन् अलैकुम् अ-दऔतुमूहम् अम् अन्तुम् सामितून
और यदि तुम उन्हें सीधी राह की ओर बुलाओ, तो तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते। तुम्हारे लिए बराबर है, चाहे उन्हें पुकारो अथवा तुम चुप रहो।
إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ ۖ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا لَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ﴾ 194 ﴿
इन्नल्लज़ी-न तद्अू-न मिन् दूनिल्लाहि अिबादुन् अम्सालुकुम् फ़द्अूहुम् फ़ल्यस्तजीबू लकुम् इन् कुन्तुम् सादिक़ीन
वास्तव में, अल्लाह के सिवा जिनको तुम पुकारते हो, वे तुम्हारे जैसे ही (अल्लाह के) दास हैं। अतः तुम उनसे प्रार्थना करो, फिर वे तुम्हारी प्रार्थना का उत्तर दें, यदि उनके बारे में तुम्हारे विचार सत्य हैं?
أَلَهُمْ أَرْجُلٌ يَمْشُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ أَيْدٍ يَبْطِشُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ أَعْيُنٌ يُبْصِرُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ آذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَا ۗ قُلِ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ ثُمَّ كِيدُونِ فَلَا تُنظِرُونِ ﴾ 195 ﴿
अ-लहुम् अर्जुलुंय्यम्शू-न बिहा, अम् लहुम् ऐदिंय्यब्तिशू-न बिहा, अम् लहुम् अअ्युनुंय्युब्सिरू-न बिहा, अम् लहुम् आज़ानुंय्यस्मअू-न बिहा, क़ुलिद्अू शु-रका-अकुम् सुम्-म कीदूनि फ़ला तुन्ज़िरून
क्या इन (पत्थर की मूर्तियों) के पाँव हैं, जिनसे चलती हों? उनके हाथ हैं, जिनसे पकड़ती हों, उनकी आँखें हैं, जिनसे देखती हों? अथवा कान हैं, जिनसे सुनती हों? आप कह दें कि अपने साझियों को पुकार लो, फिर मेरे विरुध्द उपाय कर लो और मुझे कोई अवसर न दो!
إِنَّ وَلِيِّيَ اللَّهُ الَّذِي نَزَّلَ الْكِتَابَ ۖ وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِحِينَ ﴾ 196 ﴿
इन्-न वलिय्यि-यल्लाहुल्लज़ी नज़् ज़लल्-किता-ब, व हु-व य-तवल्लस्सालिहीन
वास्तव में, मेरा संरक्षक अल्लाह है, जिसने ये पुस्तक (क़ुर्आन) उतारी है और वही सदाचारियों की रक्षा करता है।
وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ ﴾ 197 ﴿
वल्लज़ी-न तद्अू-न मिन् दूनिही ला यस्ततीअू-न नस्रकुम् व ला अन्फु-सहुम् यन्सुरून
और जिन्हें अल्लाह के सिवा तुम पुकारते हो, वे न तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते हैं।
وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَسْمَعُوا ۖ وَتَرَاهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ ﴾ 198 ﴿
व इन् तद्अूहुम् इलल्हुदा ला यस्मअू, व तराहुम् यन्ज़ुरू-न इलै-क व हुम् ला युब्सिरून
और यदि तुम उन्हें सीधी राह की ओर बुलाओ, तो वे सुन नहीं सकते और (हे नबी!) आप उन्हें देखेंगे कि वे आपकी ओर देख रहे हैं, जबकि वास्तव में वे कुछ नहीं देखते।
خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ ﴾ 199 ﴿
ख़ुज़िल्-अफ्-व वअ्मुर् बिल्अुर्फि व अअ्-रिज़ अ़निल् जाहिलीन
(हे नबी!) आप क्षमा से काम लें, सदाचार का आदेश दें तथा अज्ञानियों की ओर ध्यान[1] न दें। 1. ह़दीस में है कि अल्लाह ने इसे लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने के बारे में उतारा है। (देखियेः सह़ीह़ बुख़ारीः4643)
وَإِمَّا يَنزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۚ إِنَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴾ 200 ﴿
व इम्मा यन्ज़ग़न्न-क मिनश्शैतानि नज़्ग़ुन फ़स्तअिज़् बिल्लाहि, इन्नहू समीअुन् अलीम
और यदि शैतान आपको उकसाये, तो अल्लाह से शरण माँगिये। निःसंदेह वह सबकुछ सुनने-जानने वाला है।
إِنَّ الَّذِينَ اتَّقَوْا إِذَا مَسَّهُمْ طَائِفٌ مِّنَ الشَّيْطَانِ تَذَكَّرُوا فَإِذَا هُم مُّبْصِرُونَ ﴾ 201 ﴿
इन्नल्लज़ीनत्तक़ौ इज़ा मस्सहुम् ताइ-फुम्-मिनश्शैतानि तज़क्करू फ़-इज़ा हुम् मुब्सिरून
वास्तव में, जो आज्ञाकारी होते हैं, यदि शैतान की ओर से उन्हें कोई बुरा विचार आ भी जाये, तो तत्काल चौंक पड़ते हैं और फिर अकस्मात् उन्हें सूझ आ जाती है।
وَإِخْوَانُهُمْ يَمُدُّونَهُمْ فِي الْغَيِّ ثُمَّ لَا يُقْصِرُونَ ﴾ 202 ﴿
व इख़्वानुहुम् यमुद्दूनहुम् फ़िल्-ग़य्यि सुम्-म ला युक़्सिरून
और जो शैतानों के भाई हैं, वे उन्हें कुपथ में खींचते जाते हैं, फिर (उन्हें कुपथ करने में) तनिक भी कमी (आलस्य) नहीं करते।
وَإِذَا لَمْ تَأْتِهِم بِآيَةٍ قَالُوا لَوْلَا اجْتَبَيْتَهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا أَتَّبِعُ مَا يُوحَىٰ إِلَيَّ مِن رَّبِّي ۚ هَٰذَا بَصَائِرُ مِن رَّبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴾ 203 ﴿
व इज़ा लम् तअ्तिहिम् बिआयतिन् क़ालू लौलज्तबै- तहा, क़ुल् इन्नमा अत्तबिअु मा यूहा इलय्-य मिर्रब्बी, हाज़ा बसा-इरू मिर्रब्बिकुम् व हुदंव्-व रह़्मतुल्- लिक़ौमिंय्युअ्मिनून
और जब आप, इन मिश्रणवादियों के पास कोई निशानी न लायेंगे, तो कहेंगे कि क्यों (अपनी ओर से) नहीं बना ली? आप कह दें कि मैं केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो मेरे पालनहार के पास से मेरी ओर वह़्यी की जाती है। ये सूझ की बातें हैं, तुम्हारे पालनहार की ओर से (प्रमाण) हैं तथा मार्गदर्शन और दया हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान (विश्वास) रखते हों।
وَإِذَا قُرِئَ الْقُرْآنُ فَاسْتَمِعُوا لَهُ وَأَنصِتُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ﴾ 204 ﴿
व इज़ा क़ुरिअल् क़ुरआनु फस्तमिअु लहू व अन्सितू लअल्लकुम् तुर्हमून
और जब क़ुर्आन पढ़ा जाये, तो उसे ध्यान पूर्वक सुनो तथा मौन साध लो। शायद कि तुमपर दया[1] की जाये। 1. यह क़ुर्आन की एक विशेषता है कि जब भी उसे पढ़ा जाये तो मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह ध्यान लगा कर अल्लाह का कलाम सुने। हो सकता है कि उस पर अल्लाह की दया हो जाये। काफ़िर कहते थे कि जब क़ुर्आन पढ़ा जाये तो सुनो नहीं, बल्कि शोर-गुल करो। (देखियेः सूरह ह़ा-मीम सज्दाः26)
وَاذْكُر رَّبَّكَ فِي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخِيفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ وَلَا تَكُن مِّنَ الْغَافِلِينَ ﴾ 205 ﴿
वज़्क़ुर् रब्ब-क फी नफ्सि-क तज़र्रूअंव्-व ख़ी-फ़तंव् -व दूनल्जह़रि मिनल्क़ौलि बिलग़ुदुव्वि वल्-आसालि व ला तकुम् मिनल्-ग़ाफ़िलीन
और (हे नबी!) अपने पालनहार का स्मरण विनय पूर्वक तथा डरते हुए और धीमे स्वर में प्रातः तथा संध्या करते रहो और उनमें न हो जाओ, जो अचेत रहते हैं।
إِنَّ الَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَيُسَبِّحُونَهُ وَلَهُ يَسْجُدُونَ ﴾ 206 ﴿
इन्नल्लज़ी न अिन्-द रब्बि-क ला यस्तक्बिरू-न अन् अिबा दतिही व युसब्बिहूनहू व लहू यस्जुदून
वास्तव में, जो (फ़रिश्ते) आपके पालनहार के समीप हैं, वे उसकी इबादत (वंदना) से अभिमान नहीं करते, उसकी पवित्रता वर्णन करते रहते हैं और उसी को सज्दा[1] करते हैं। 1. इस आयत के पढ़ने तथा सुनने वाले को चाहिये कि सज्दा तिलावत करें।